Chapter-9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः (Kritam Pratikritam Bhuyad Esha Dharmah Sanatanah) Quick Revision Notes | Class 9th Sanskrit (Sharada) Summary

कक्षा ९ संस्कृत – पाठ ९ : कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः – सारांश
कक्षा ९ • संस्कृत • नवमः पाठः

कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः

✍️ आसान भाषा में पूरा पाठ-सार (Handwritten Notes Style)
रूपक अंश — “एकचक्रम्” (लेखक : महामहोपाध्याय श्रीरङ्गनाथशर्मा) | कथावस्तु : महाभारत का बकासुर-वध प्रसंग

पाठ का परिचय

यह पाठ गद्य-नाट्य (रूपक) के रूप में है, जो “एकचक्रम्” नामक लघु रूपक के तृतीय और चतुर्थ अंक से लिया गया है। इसके रचयिता हैं महामहोपाध्याय श्री एन्. रङ्गनाथशर्मा। कथा महाभारत में वर्णित बकासुर-वध की घटना पर आधारित है। इस पाठ का शीर्षक ही इसका मूल संदेश है — “जो उपकार किया गया है, उसका बदला (प्रत्युपकार) करना ही सनातन धर्म है।”

मुख्य पात्र

कुन्ती — पाण्डवों की माता भीमसेन — बलशाली पाण्डव पुत्र युधिष्ठिर — धर्मराज अर्जुन, नकुल, सहदेव बकासुर — नरभक्षी राक्षस ब्राह्मण परिवार — एकचक्रनगर के मेजबान

कथा — क्रमवार (Story Flow)

  1. पूर्व-प्रसंग : पाण्डव अज्ञातवास में एकचक्रनगर के एक ब्राह्मण के घर रहते हैं। एक दिन उस घर से रोने की आवाज़ सुनकर कुन्ती कारण पूछती है।
  2. समस्या का पता चलना : पता चलता है कि नगर के पास बकासुर नामक राक्षस रहता है। संधि के अनुसार हर दिन बारी-बारी से एक नगरवासी उसका भोजन (बलि) बनता है। आज उसी ब्राह्मण परिवार की बारी है।
  3. कुन्ती की प्रतिज्ञा : ब्राह्मण के उपकार (आतिथ्य) का बदला चुकाने के लिए कुन्ती अपने एक पुत्र को बकासुर के पास भेजने की प्रतिज्ञा करती है — और वह चुनती हैं भीम को।
  4. भीम की सहमति : भीम प्रसन्नता से तैयार हो जाता है। वह कहता है — माता की आज्ञा टाली नहीं जा सकती, और उपकार का बदला देना ही धर्म है। यहीं से पाठ का शीर्षक-श्लोक आता है।
  5. भाइयों की बातचीत (हास्य दृश्य) : युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव आते हैं। भीम को खुश देखकर वे मज़ाक करते हैं कि उसे खूब भोजन मिलने वाला है — तभी पता चलता है कि यह भोजन नहीं, बकासुर से युद्ध है!
  6. युधिष्ठिर की चिंता : युधिष्ठिर पहले चिंतित होते हैं कि माता ने बलशाली भीम को ही क्यों भेजने का निश्चय किया। भीम उत्तर देता है — यह मातृ-आज्ञा और धर्म-संग्रह (कर्तव्य) है, इसे टाला नहीं जा सकता।
  7. भीम प्रस्थान करता है : सबकी अनुमति से भीम मिष्ठान्न से भरी बैलगाड़ी लेकर बकासुर के पास पहुँचता है।
  8. बकासुर से संवाद : बकासुर भोजन माँगता है। भीम स्वयं भोजन खा जाता है और बताता है कि वह नरभक्षण जैसे अधर्म को समाप्त करने आया है — नर की रक्षा करना क्षत्रिय का धर्म है, जबकि नरभक्षण राक्षस का “धर्म” बताया जाता है।
  9. पहचान : बकासुर पूछता है — क्या तुम वही कौन्तेय हो जिसने मेरे मित्र हिडिम्ब को मारा था? भीम स्वीकार करता है — हाँ, मैं भीमसेन हूँ।
  10. मल्लयुद्ध और अंत : दोनों में भीषण मल्लयुद्ध होता है। अंततः भीम बकासुर का वध कर देता है और ब्राह्मण परिवार तथा सम्पूर्ण एकचक्रनगर को उसके आतंक से मुक्त कराता है।

प्रसिद्ध श्लोक और उनका भावार्थ

भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम् ।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः ॥
भावार्थ : हम लोग बहुत समय से इस ब्राह्मण परिवार की भिक्षा (आतिथ्य) से उपकृत हैं। जो उपकार हम पर किया गया है, उसका प्रत्युपकार (बदला) होना चाहिए — यही सनातन धर्म है।
इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम ।
बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥
भावार्थ : ये मेरी दोनों पुष्ट भुजाएँ ही मेरी सहज सहायक हैं। जैसे सिंह किसी छोटे पशु को नष्ट कर देता है, वैसे ही मैं बकासुर का विनाश कर दूँगा।

याद रखने योग्य मुख्य बातें (परीक्षा के लिए)

  • पाठ का शीर्षक ही इसका मूल-भाव है : “कृतं प्रतिकृतं भूयात्” — किए गए उपकार का बदला अवश्य मिलना चाहिए।
  • यह अंश “एकचक्रम्” रूपक के तृतीय-चतुर्थ अंक से उद्धृत है।
  • कथा-स्रोत : महाभारत का बकासुर-वध प्रसंग।
  • क्षत्रिय-धर्म की परिभाषा पाठ में इस प्रकार दी गई है — “नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः” (प्रजा की रक्षा करना ही क्षत्रिय का धर्म है), जबकि बकासुर कहता है “नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः” (नरभक्षण राक्षसों का धर्म है)।
  • भीम ने पहले भी हिडिम्ब नामक राक्षस का वध किया था — बकासुर उसी का मित्र निकलता है।
  • अंत में मल्लयुद्ध में भीम बकासुर को मार डालता है।

कठिन शब्दों के अर्थ (चुनिंदा)

  • आतिथेयः — अतिथि की सेवा करने वाला (Host)
  • आयोधनम् — युद्ध (Battle)
  • प्रतिश्रुतम् — प्रतिज्ञात, वचन दिया हुआ (Promised)
  • निषूदकः — विनाशक (Destroyer)
  • मृष्टान्नम् — स्वादिष्ट भोजन (Tasty food)
  • श्रोत्रियः — जिसने वेद पढ़ा हो (One who has studied Vedas)
  • हुताशनाय — अग्नि के लिए (For fire)
  • वाचाट — डींग मारने वाला (Boastful)

लेखक-परिचय : डॉ. एन्. रङ्गनाथशर्मा

जन्म : ७ अप्रैल १९२६ (नडळल्ली ग्राम, शिवमोग्गा, कर्नाटक)  |  देहावसान : २०१४
उपाधियाँ : महामहोपाध्यायः, विद्यावारिधिः, व्याकरणशास्त्रप्रवीणः, राष्ट्रप्रशस्तिभाक्
प्रमुख कृतियाँ : बाहुबलिविजयम्, एकचक्रम्, कुसुमाञ्जलिः, श्रीशङ्करचरितामृतम् आदि
बेंगलुरु के चामराजेन्द्र संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरण के प्राध्यापक रहे।

🪔 पाठ का संदेश

जो हम पर उपकार करता है, उसका प्रत्युपकार करना ही सनातन धर्म है। साथ ही, निर्बलों/असहायों की रक्षा करना बलशाली और क्षत्रिय का सच्चा कर्तव्य है — यही इस पाठ की मूल शिक्षा है।

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