मैं और मेरा देश ✒️
— कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
🖊️ लेखक परिचय
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ का जन्म सन् 1906 में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में हुआ। पत्रकारिता उनका मुख्य कार्यक्षेत्र था — उन्होंने ‘नया जीवन’ और ‘विकास’ पत्रों का संपादन किया। स्वतंत्रता संग्राम व सामाजिक कार्यों में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा। उनकी उत्कृष्ट रचनाओं के लिए उन्हें ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया। उनके संस्मरणात्मक निबंध-संग्रह गहन मानवतावादी दृष्टिकोण के परिचायक हैं। सन् 1995 में उनका निधन हुआ।
📖 निबंध का सार
यह निबंध एक अनोखी प्रश्नोत्तर शैली (संवादात्मक शैली) में लिखा गया है, जिसमें लेखक खुद से सवाल पूछकर खुद ही जवाब देते हैं। लेखक बताते हैं कि वे अपने घर, पड़ोस और नगर में रहकर खुद को एक पूर्ण मनुष्य समझते थे — उन्हें लगता था कि उनकी ज़िंदगी में अब कोई कमी नहीं है।
लेकिन एक दिन उनके “आनंद की दीवार में दरार” पड़ गई — यह दरार असल में एक भूकंप जैसा मानसिक झटका था, जो उन्हें लाला लाजपत राय के एक अनुभव को सुनकर लगा। लाला जी ने बताया था कि वे अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस — जहाँ भी गए, हर जगह भारत की गुलामी का कलंक उनके माथे पर लगा रहा। इस बात ने लेखक को झकझोर दिया और उन्हें एहसास हुआ कि व्यक्ति चाहे कितना भी संपन्न या सुखी क्यों न हो, अगर उसका देश पराधीन या हीन है तो उसकी अपनी पूर्णता अधूरी ही रहती है।
इसी विचार से लेखक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जैसे वे अपने सम्मान की रक्षा करते हैं, वैसे ही देश के सम्मान की रक्षा करना भी उनका कर्तव्य है — और जैसे उन्हें अपने सम्मान की रक्षा का अधिकार है, वैसे ही देश के सम्मान से सहारा पाने का भी उन्हें अधिकार है।
🌏 प्रेरक कहानियाँ
- स्वामी रामतीर्थ और जापानी युवक: जापान में फल न मिलने पर स्वामी जी के मुँह से निकला “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते” — यह सुनकर एक जापानी युवक भागकर ताज़े फल लाया और मूल्य के बदले सिर्फ यही माँगा कि स्वामी जी अपने देश में जाकर यह बात न कहें। इस छोटे-से कार्य से उस युवक ने अपने देश का गौरव बढ़ा दिया।
- दूसरा विदेशी छात्र: इसके विपरीत, एक अन्य देश के छात्र ने जापान की लाइब्रेरी से दुर्लभ चित्र चुरा लिए — इससे न सिर्फ उसे निकाला गया, बल्कि पूरे उसके देश के लोगों के लाइब्रेरी में प्रवेश पर रोक लगा दी गई। इससे उसके देश की छवि पर वर्षों तक कलंक लगा रहा।
- कमालपाशा और बूढ़ा किसान: तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा ने एक गरीब किसान द्वारा लाए गए शहद के उपहार को बड़े प्यार से स्वीकार किया, क्योंकि महत्व उपहार की कीमत में नहीं, भावना में होता है।
- नेहरू जी और खाट वाला किसान: एक किसान रंगीन खाट बनाकर पंडित नेहरू को भेंट करने आया — नेहरू जी ने उपहार तो स्वीकार नहीं किया, पर अपनी दस्तखती फोटो देकर उसकी भावना का सम्मान किया।
🇮🇳 मुख्य संदेश
- महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं, उसे करने वाले की भावना में होता है।
- हर नागरिक चाहे कितना भी साधारण हो, अपने देश के सम्मान की रक्षा के लिए कुछ न कुछ कर सकता है — “अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है।”
- देश को दो चीज़ों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है — शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। हमारा कोई भी काम देश की कमज़ोरी या गंदगी का कारण नहीं बनना चाहिए।
- देश की उच्चता-हीनता जानने की सबसे बड़ी कसौटी है — सही और निष्पक्ष चुनाव। सही मनुष्य को मत देना हर नागरिक का कर्तव्य है।
- नागरिक और देश का सम्मान एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है — नागरिक के अच्छे-बुरे कर्मों का असर देश की छवि पर भी पड़ता है।
