रीढ़ की हड्डी ✒️
— जगदीशचंद्र माथुर
🖊️ लेखक परिचय
जगदीशचंद्र माथुर का जन्म सन् 1917 में शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ और शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हुई। वे इंडियन सिविल सर्विस (ICS) में चयनित हुए और बिहार के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक जैसे बड़े प्रशासनिक पदों पर रहते हुए भी आजीवन साहित्य-सृजन करते रहे। उन्होंने ऐतिहासिक नाटकों के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं पर आधारित एकांकी-नाटक भी लिखे — जैसे भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया आदि। ‘कोणार्क’ उनका सबसे चर्चित और मंचित नाटक है। 1978 में उनका निधन हुआ। ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी सन् 1939 में लिखी गई थी और उस समय की स्त्री-शिक्षा व विवाह से जुड़ी सामाजिक कुरीतियों पर करारा व्यंग्य करती है।
📖 कहानी का सार
यह एकांकी एक ऐसे परिवार की कहानी है जहाँ बेटी उमा के विवाह के लिए लड़का देखने आने वाला है। पिता रामस्वरूप (बाबू) और माँ प्रेमा घर को सजाने और नाश्ते की तैयारी में जुटे हैं। नौकर रतन को इधर-उधर भागदौड़ करने के लिए कहा जाता है। रामस्वरूप, प्रेमा से कहते हैं कि उमा को अच्छी तरह तैयार करके भेजा जाए, पर पाउडर लगाने से उमा साफ इनकार कर देती है।
तभी लड़के का पिता गोपालप्रसाद और लड़का शंकर आते हैं। बातचीत में गोपालप्रसाद खुलकर कहते हैं कि उन्हें ज़्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए, क्योंकि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ नखरे करती हैं और मर्दों के बराबरी की बात करने लगती हैं — जबकि वे खुद और उनका बेटा शंकर, दोनों पढ़े-लिखे और वकील/डॉक्टरी के छात्र हैं। यह उनके दोहरे मापदंड (पाखंड) को उजागर करता है।
जब उमा पान लेकर सामने आती है तो उसकी नाक पर चश्मा देखकर सब चौंक जाते हैं — रामस्वरूप झूठ बोलकर बहाना बनाते हैं कि आँखें दुखने की वजह से चश्मा लगाना पड़ा। उमा गाना गाती है, पर बीच में ही शंकर की झेंपती नज़रों से नज़र मिलते ही रुक जाती है। जब गोपालप्रसाद पूछते हैं कि क्या उमा ने कोई इनाम जीता है, तो उमा चुप रहती है — रामस्वरूप और गोपालप्रसाद उसे शर्मीली समझकर जवाब देने को कहते हैं।
आखिरकार उमा दृढ़तापूर्वक बोल पड़ती है — वह बताती है कि वह बी.ए. पास है, और साथ ही यह भी उजागर कर देती है कि शंकर पिछली फरवरी में लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमते पकड़ा गया था और डरकर मुँह छिपाकर भाग गया था। यह सुनते ही गोपालप्रसाद क्रोधित होकर धमकाते हैं कि उनकी इज़्ज़त उतारी गई है, और शंकर को लेकर गुस्से में वहाँ से चले जाते हैं। जाते-जाते उमा तंज कसती है —
अंत में उमा भावुक होकर रोने लगती है, तभी नौकर रतन “बाबूजी, मक्खन!” कहते हुए अंदर आता है और नाटक व्यंग्यात्मक ढंग से समाप्त हो जाता है।
🎭 शीर्षक व मुख्य भाव
- ‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक शारीरिक अंग का नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है।
- एकांकी में लड़का-लड़की की शिक्षा के प्रति समाज की भेदभावपूर्ण, दोहरी सोच पर तीखा व्यंग्य है।
- रामस्वरूप ऊपर से आधुनिक दिखते हैं पर अंदर से रूढ़िवादी हैं — यह पाखंड बार-बार उजागर होता है।
- उमा का चरित्र एक पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर और साहसी स्त्री का प्रतिनिधित्व करता है, जो अपनी इज़्ज़त के लिए खुलकर बोलती है।
- संवाद शैली स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण है, जो विवाह के लेन-देन जैसी सामाजिक कुरीतियों को उजागर करती है।
