यह लेखक मोहन राकेश की कन्याकुमारी यात्रा पर आधारित एक जीवंत यात्रा-वृत्तांत है, जहाँ अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी — तीनों का संगम होता है। यह रचना भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान से जुड़े अनुभवों, सूर्योदय-सूर्यास्त के अद्भुत दृश्यों और मन में उठने वाले भावों का सुंदर चित्रण करती है।
🔸 आखिरी चट्टान पर खड़े होकर — शक्ति का एहसास
लेखक समुद्र के अंदर उभरी काली चट्टानों में से एक पर खड़े होकर भारत की आखिरी चट्टान को देर तक निहारते हैं। यहीं वह जगह है जहाँ स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगाई थी। तीनों तरफ से टकराती ऊँची-ऊँची लहरें देखकर लेखक को “शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” का गहरा एहसास होता है। कुछ देर के लिए वे अपने अस्तित्व को भूल जाते हैं और खुद को उस विशाल दृश्य का एक हिस्सा महसूस करते हैं — तभी अचानक होश आता है कि उनकी चट्टान भी बढ़ते पानी में घिरने लगी है, और वे फुर्ती से दूसरी सुरक्षित चट्टान पर कूदकर किनारे पहुँचते हैं।
🔸 सूर्यास्त की खोज — सैंड हिल की यात्रा
लेखक सूर्यास्त देखने के लिए एक ऊँचे रेत के टीले (“सैंड हिल”) की तरफ बढ़ते हैं, जहाँ पहले से बहुत सारे यात्री, नवयुवतियाँ और गाँधी टोपी वाले लोग जमा हैं। पर वहाँ पहुँचकर पता चलता है कि सूर्यास्त का पूरा दृश्य ठीक से दिखाई नहीं देता, क्योंकि सामने एक और ऊँचा टीला है। लेखक अकेले ही आगे बढ़ते जाते हैं — एक टीला पार करने पर लगता अगला आख़िरी होगा, पर हर बार एक नया टीला सामने आ जाता। आखिरकार जब वे अपने प्रयास में सफल होकर सही टीले पर पहुँचते हैं, तो एक गहरी संतुष्टि महसूस करते हैं — जैसे उन्होंने संसार की सबसे ऊँची चोटी पहली बार सर की हो।
🎨 सुंदर वर्णन: सूर्य डूबते समय समुद्र पर पहले सोने जैसी चमक फैलती है, फिर वह रंग बदलकर लहू जैसा लाल, फिर बैंजनी और अंततः काला हो जाता है — लेखक ने इस पूरे रंग-परिवर्तन को बहुत ही चित्रात्मक भाषा में उकेरा है।
🔸 रंग-बिरंगी रेत और अँधेरे का डर
सूर्यास्त के बाद लेखक तट की अनोखी, रंग-बिरंगी रेत देखते हैं — सुरमई, खाकी, पीली, लाल जैसे अनगिनत रंग एक-दूसरे से मिलते हुए। वे कुछ रंगीन रेत हाथ में लेकर देखते हैं पर उसे साथ नहीं ले जा पाते, यह सोचकर उदास हो जाते हैं। तभी उन्हें एहसास होता है कि अँधेरा होने से पहले उन्हें वापस भी लौटना है — समुद्र का पानी तेज़ी से बढ़ रहा है और तट का किनारा संकरा होता जा रहा है। एक ऊँची लहर से बचते हुए वे एक चट्टान से टकरा जाते हैं, हल्की खरोंच लगती है, फिर हिम्मत करके चट्टान पार कर आखिरकार सुरक्षित रास्ते तक पहुँच जाते हैं — यह पूरा हिस्सा रोमांच और संघर्ष से भरा है।
🔸 सुबह — सूर्योदय और स्थानीय जीवन की झलक
रात केप होटल में बिताने के बाद अगली सुबह लेखक “विवेकानंद चट्टान” पर आठ लोगों के साथ एक छोटी मछुआ नाव में बैठकर सूर्योदय देखने जाते हैं। नाव नीचे नुकीली चट्टानों और ऊँची लहरों से बचते हुए आगे बढ़ती है, जिससे यात्रियों में हल्का डर भी रहता है। वहाँ एक स्थानीय ग्रेजुएट नवयुवक लेखक को बताता है कि कन्याकुमारी में बहुत से पढ़े-लिखे युवा बेरोज़गार हैं — वे फोटो-एल्बम बेचकर या छोटे-मोटे काम करके गुज़ारा करते हैं, और अपने बेकार समय में दार्शनिक बहसें करते हैं।
🔸 समापन दृश्य
चारों तरफ पानी-आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिलाते हुए सूर्य उदय होता है। घाट पर लोग सूर्य को अर्घ्य देते हैं, मंदिर में पूजा की घंटियाँ बजती हैं, भक्त मंदिर की दीवार को प्रणाम करते हैं। लेखक का मन अब वापसी की बस पकड़ने की चिंता में लग जाता है — यात्रा का यह अंतिम, सहज-सा दृश्य पूरे वृत्तांत को एक सुंदर विराम देता है।
🌿 वृत्तांत का सार: यह यात्रा-वृत्तांत केवल कन्याकुमारी के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं है, बल्कि इसमें प्रकृति की भव्यता के साथ-साथ लेखक के मन में उठने वाले विस्मय, रोमांच, भय, संघर्ष और आत्मिक शांति के भाव भी गहराई से व्यक्त हुए हैं। यह हमें सिखाता है कि यात्राएँ सिर्फ जगहें देखना नहीं, बल्कि खुद को और प्रकृति की शक्ति को नए ढंग से महसूस करना भी होती हैं।
