Chapter-11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २ (Varnochcharan Shiksha 2) Quick Revision Notes | Class 9th Sanskrit (Sharada) Summary

🗣️ एकादशः पाठः · कक्षा ९ संस्कृत

वर्णोच्चारण-शिक्षा २

Handwritten-style Summary ✍️ (स्थान, करण, आभ्यन्तर-प्रयत्न)

1️⃣ वर्ण-उच्चारण के 3 आवश्यक तत्त्व

(क) स्थानम्मुख के अन्दर वह जगह जहाँ ध्वनि बनती है — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका (कुल 6 स्थान)
(ख) करणम्वह अंग जो स्थान को छूता है — जिह्वा के भाग, ओष्ठ आदि (कुल 6 करण)
(ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नःकरण जिस प्रयत्न (बल) से स्थान को छूता या पास जाता है (कुल 5 प्रयत्न — इसी अध्याय का मुख्य विषय)

इस पाठ में हम विशेष रूप से आभ्यन्तर-प्रयत्नः को विस्तार से पढ़ते हैं।

2️⃣ आभ्यन्तर-प्रयत्न — 5 प्रकार (सबसे ज़रूरी 🔑)

प्रयत्नक्या होता हैकिन वर्णों में
1. स्पृष्ट-प्रयत्नःकरण स्थान को पूरी तरह स्पर्श करता हैस्पर्श व्यञ्जन (क-वर्ग से म-वर्ग तक, 25 वर्ण)
2. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नःकरण स्थान को थोड़ा-सा ही स्पर्श करता हैअन्तःस्थ व्यञ्जन — य, र, ल, व
3. ईषद्-विवृत-प्रयत्नःकरण स्थान को छूता नहीं, पर बहुत पास जाता है (लघु विवर)ऊष्म व्यञ्जन (श, ष, स, ह) + अयोगवाह (अं, अः)
4. विवृत-प्रयत्नःकरण स्थान से दूर रहता है, बड़ा खुला विवर बनता हैसभी स्वर (अ को छोड़कर)
5. संवृत-प्रयत्नःकण्ठ सिकुड़ा हुआ रहता है (सबसे विशेष प्रयत्न)केवल ह्रस्व अ-कार के लिए
ध्यान दें: आ-कार व अ३-कार (दीर्घ व प्लुत अ) में भी विवृत-प्रयत्न ही होता है, जैसे अन्य स्वरों में। केवल ह्रस्व अ में ही अपवाद रूप से संवृत-प्रयत्न होता है — यही सबसे ज़्यादा पूछा जाने वाला बिंदु है!

3️⃣ आसान Example — बाँसुरी (Flute) से समझें

पाठ में एक सुंदर उपमा दी गई है — जैसे बांसुरी में अंगुलियाँ = करण, छिद्र = स्थान, और अंगुली का छिद्र की ओर प्रयत्न (दबाव) = आभ्यन्तर-प्रयत्न, वैसे ही मुख में जिह्वा/ओष्ठ (करण) मुख के भीतर स्थान को छूकर विभिन्न ध्वनियाँ (वर्ण) उत्पन्न करते हैं।

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4️⃣ वर्णों के भेद-उपभेद (Quick Revision)

(अ) स्वर और व्यञ्जन में अंतर

बिंदुस्वरव्यञ्जन
स्वतंत्रतास्वतन्त्र वर्णपरतन्त्र (आधार-स्वर ज़रूरी)
मात्राएक/दो/तीन मात्राअर्धमात्रा (सदा)
प्रयत्नविवृत (21) / संवृत (केवल अ)स्पृष्ट/ईषत्स्पृष्ट/ईषद्विवृत

(ब) स्वरों के दो भेद

समानाक्षर स्वर (एक-स्थानी, ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत तीनों) — अ, इ, उ, ऋ, ऌ
सन्ध्यक्षर स्वर (द्वि-स्थानी, केवल दीर्घ-प्लुत) — ए, ऐ, ओ, औ

(स) व्यञ्जनों के चार भेद

स्पर्श (क से म तक 25) · अन्तःस्थ (य र ल व) · ऊष्म (श ष स ह) · अयोगवाह (अं अः — विशिष्ट व्यञ्जन, आधार-स्वर सदा पहले)

5️⃣ छह स्थान व छह करण — Quick Chart

स्थानकरणवर्ण उदाहरण
कण्ठःस्वस्थान (कण्ठ का अग्र भाग)अ, आ, क-वर्ग, ह, विसर्ग
तालुजिह्वा-मध्यःइ, ई, च-वर्ग, य, श
मूर्धाजिह्वा-उपाग्रःऋ, ट-वर्ग, र, ष
दन्तःजिह्वा-अग्रःऌ, त-वर्ग, ल, स
ओष्ठौस्वस्थान (दोनों ओष्ठ)उ, ऊ, प-वर्ग, व
नासिकास्वस्थानङ, ञ, ण, न, म, अनुस्वार
Exam Tip: पाणिनीय शिक्षा-सूत्र याद रखें — “प्रयत्नोऽपि द्विविधः। आभ्यन्तरो बाह्यश्च।” (प्रयत्न दो प्रकार का है — आभ्यन्तर और बाह्य)। इसी अध्याय में केवल आभ्यन्तर-प्रयत्न पढ़ाया गया है; बाह्य-प्रयत्न आगे की कक्षा में आएगा।
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