णमो अरिहन्ताणम्
पाठ का परिचय
यह पाठ ऋषभदेव / आदिनाथ के जीवन पर आधारित है, जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर माने जाते हैं। इस पाठ में उनके राजा बनने, प्रजा के जीवन को व्यवस्थित करने, वैराग्य लेने, कठोर तपस्या करने और अंततः केवलज्ञान प्राप्त करने की कथा वर्णित है। साथ ही जैन धर्म के मूल सिद्धांतों तथा प्रसिद्ध नवकार मन्त्र का भी परिचय दिया गया है।
मुख्य पात्र
कथा — क्रमवार (Story Flow)
- जन्म व गुण : युग के आरम्भ में नाभि नामक प्रजाप्रिय महाराज थे, जिनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और करुणाशालिनी थीं। उनके पुत्र ऋषभ सर्वगुणसम्पन्न, विद्वान और राजनीति में निपुण थे।
- राज्याभिषेक : जब समाज में दुर्भिक्ष (अकाल) और आपसी द्वेष जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं, तब नाभि ने यह उचित समय समझकर राज्य ऋषभ को सौंप दिया।
- समस्याओं की जड़ खोजना : राजा बनते ही ऋषभ ने चिन्तन किया कि समस्याओं का मूल कारण क्या है। उन्हें पता चला — आलस्य, कृषि-कार्य में कमी, और उत्पादन-क्षमता का अभाव ही मूल समस्याएँ हैं।
- जीवन-कौशल का प्रशिक्षण : ऋषभ ने प्रजा को कृषि-कार्य, विविध भोजन बनाना, वस्त्र-निर्माण (तंतु से), पशुपालन (गाय-घोड़े आदि), बर्तन-निर्माण, गृह-निर्माण और नगर-निर्माण जैसे जीवन-कौशल सिखाए।
- सुखी राज्य : इससे प्रजा सक्रिय हो गई, उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई और राज्य पुनः सुभिक्ष (समृद्ध) हो गया। यहीं प्रसिद्ध श्लोक आता है — “प्रजासुखे सुखं राज्ञः…”
- विनीता नगर व साम्राज्य विस्तार : ऋषभ के कुशल शासन से विनीता नामक नगर बसा। प्रजा प्रेम से उन्हें “राजा ऋषभदेव” कहने लगी। उनके पुत्रों में भरत और बाहुबलि तथा पुत्रियों में ब्राह्मी और सुन्दरी अत्यंत प्रसिद्ध हुईं (ब्राह्मी लिपि का विकास भी ब्राह्मी द्वारा ही माना जाता है)।
- वैराग्य का कारण : एक दिन राजमहल में नृत्य-प्रदर्शन के दौरान एक नर्तकी अचानक भूमि पर गिरकर मर गई। इस घटना से ऋषभदेव का मन विचलित हो गया — उन्हें एहसास हुआ कि संसार में कुछ भी शाश्वत (स्थायी) नहीं है।
- सन्यास ग्रहण : स्थिर सुख की खोज में ऋषभदेव ने सब कुछ त्यागकर भिक्षु का जीवन अपनाया। अपना विशाल साम्राज्य पुत्रों में बाँट दिया — विनीता राज्य भरत को और तक्षशिला बाहुबलि को सौंपकर स्वयं परम सत्य की खोज में निकल पड़े।
- तपस्या व कठिन उपवास : वन में जाकर वे मौन, ध्यान और अध्ययन में लीन रहने लगे — कई बार भोजन-पानी भी भूल जाते। उनके अनुयायी उनके साथ रहे, परन्तु लोग भिक्षा में भोजन के बजाय आभूषण देते रहे, जिससे ऋषभदेव को लगातार चार सौ (४००) दिन तक निराहार उपवास करना पड़ा।
- उपवास की समाप्ति : हस्तिनापुर में उनके प्रपौत्र श्रेयांस ने उन्हें इक्षुरस (गन्ने का रस) पिलाया। यह दिन वैशाख मास की अक्षय तृतीया था — इसी कारण आज भी जैन सम्प्रदाय में इस दिन को “वर्षीतप पारणा महोत्सव” के रूप में मनाया जाता है (पालीताणा, हस्तिनापुर आदि तीर्थों में)।
- केवलज्ञान की प्राप्ति : दीर्घकालिक उपवास, निरंतर अध्ययन और कठोर तप से ऋषभदेव ने फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष एकादशी को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। इसीलिए वे जैन सम्प्रदाय के प्रथम तीर्थंकर “आदिनाथ” कहलाए।
- जैन संघ की स्थापना : ऋषभदेव ने प्रजा के मार्गदर्शन हेतु भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक, श्राविका का क्रम बनाया — यही आगे चलकर जैन संघ कहलाया।
प्रसिद्ध श्लोक और उनका भावार्थ
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥ भावार्थ : प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही राजा का हित है। राजा का हित अपने प्रिय में नहीं, बल्कि प्रजा को जो प्रिय व हितकर हो, उसी में है।
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम् ॥ भावार्थ : यह सम्पूर्ण संसार भाग्य (दैव) के अधीन है — जन्म, कर्म और शुभ-अशुभ सब भाग्य से जुड़े हैं। मिलना-बिछड़ना भी दैव के अधीन है, और दैव से बड़ा कोई बल नहीं है।
नवकार मन्त्र (णमोकार मन्त्र)
अर्थ : मैं अरिहंतों को नमस्कार करता हूँ, सिद्धों को नमस्कार करता हूँ, आचार्यों को नमस्कार करता हूँ, उपाध्यायों को नमस्कार करता हूँ, और लोक में सभी साधुओं को नमस्कार करता हूँ। यह जैनों का सबसे पवित्र मन्त्र है, जो पंच परमेष्ठी (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) को प्रणाम करता है। प्रतिवर्ष अप्रैल मास के नवें दिन को “नवकार महामन्त्र दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
जैन धर्म के मूल सिद्धांत (परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण)
- अहिंसा परमो धर्मः — मन, वचन और कर्म से अहिंसा का पालन
- अनेकान्तवाद — सत्य के अनेक पक्ष होते हैं
- स्याद्वाद — प्रत्येक कथन को सापेक्ष (“स्यात्”) रूप में ग्रहण करना
- अपरिग्रह — आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना
- त्रिरत्न — सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान, सम्यक्चरित्र
- पंच महाव्रत — सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य
कठिन शब्दों के अर्थ (चुनिंदा)
- अधीतविद्यः — पढ़ा-लिखा, विद्वान (Learned)
- दुर्भिक्षम् — अकाल (Famine)
- उपवासः — निराहार व्रत (Fasting)
- केवलज्ञानम् — पूर्ण/परम ज्ञान (Absolute knowledge)
- तीर्थङ्करः — धर्म-मार्ग दिखाने वाले (Tirthankara)
- न्यायिकव्यवस्था — न्याय व्यवस्था (Judicial system)
- परित्यज्य — त्यागकर (Abandoning)
- दैवाधीनम् — भाग्य के अधीन (Dependent on fate)
जैन धर्म के प्रमुख तीर्थ-स्थान
सम्मेतशिखर (झारखण्ड), श्रवणबेलगोळ (कर्नाटक), पावापुरी (बिहार), गिरनार पर्वत (गुजरात), शत्रुंजय पर्वत / पालीताणा (गुजरात), राजगृहम् (बिहार), अयोध्या, काशी, हस्तिनापुर (उत्तरप्रदेश), चम्पापुरम् (बिहार), मिथिला (बिहार), द्वारिका (गुजरात) — कुल 24 तीर्थंकर हुए, जिनमें प्रथम ऋषभदेव (आदिनाथ) और अंतिम (चौबीसवें) महावीर (वर्धमान) हैं।
🪔 पाठ का संदेश
एक अच्छा शासक वही है जो प्रजा के सुख में अपना सुख समझे। साथ ही, संसार अस्थायी है — इसलिए मोह-माया त्यागकर सत्य और आत्म-कल्याण की खोज करना ही जीवन का सच्चा उद्देश्य है।
