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परिशिष्टम् ४ · कक्षा ९ संस्कृत
शब्दरूपाणि — Chapter Summary
Handwritten-style Quick Notes ✍️ (सारे शब्दरूप एक जगह याद करें)
1️⃣ इस अध्याय में क्या है?
इस Appendix में असाधारण/विशेष शब्दों के रूप दिए गए हैं जो सामान्य अकारान्त शब्दों (जैसे रामः) से अलग चलते हैं। इन्हें व्यंजनान्त (हलन्त) शब्द कहते हैं।
2️⃣ पुंलिङ्ग शब्द (10 शब्द)
| अन्त | शब्द | प्रथमा ए.व. | याद रखने की पहचान |
|---|---|---|---|
| न्-कारान्त | ब्रह्मन् | ब्रह्मा | तीनों वचनों में मूर्धन्य ण होता है — ब्रह्मणा, ब्रह्मणे |
| न्-कारान्त | गुणिन् | गुणी | इकारान्त की तरह सरल — गुणिनौ, गुणिनः |
| न्-कारान्त | पथिन् | पन्थाः | अनोखा रूप — पन्थानौ, पथः, पथि |
| स्-कारान्त | विद्वस् | विद्वान् | विद्वांसौ, विदुषा, विद्वत्सु |
| स्-कारान्त | चन्द्रमस् | चन्द्रमाः | चन्द्रमसा, चन्द्रमोभ्याम् (स→ओ) |
| स्-कारान्त | पुंस् | पुमान् | पुंसा, पुंभ्याम्/पुम्भ्याम् (दो रूप) |
| स्-कारान्त | वेधस् | वेधाः | वेधसा, वेधोभ्याम् |
| द्-कारान्त | सुहृद् | सुहृद्/सुहृत् | सुहृदा, सुहृद्भिः |
| ज्-कारान्त | वणिज् | वणिग्/वणिक् | वणिजा, वणिग्भ्याम् |
| ज्-कारान्त | भिषज् | भिषग्/भिषक् | भिषजा, भिषग्भ्याम् |
3️⃣ स्त्रीलिङ्ग शब्द (8 शब्द)
| अन्त | शब्द | प्रथमा ए.व. | अर्थ |
|---|---|---|---|
| च्-कारान्त | वाच् | वाग्/वाक् | वाणी |
| च्-कारान्त | त्वच् | त्वग्/त्वक् | त्वचा |
| ज्-कारान्त | स्रज् | स्रग्/स्रक् | माला |
| ज्-कारान्त | रुज् | रुग्/रुक् | रोग |
| त्-कारान्त | सरित् | सरिद्/सरित् | नदी |
| त्-कारान्त | विद्युत् | विद्युद्/विद्युत् | बिजली |
| व्-कारान्त | दिव् | द्यौः | आकाश (अनोखा — दिवा, द्युभ्याम्) |
| श्-कारान्त | दिश् | दिग्/दिक् | दिशा |
पैटर्न पहचानें: ज्/च्/श् अंत वाले शब्दों में प्रथमा-द्वितीया एकवचन में अंतिम व्यंजन ग् या क् बनता है (वाग्/वाक्, दिग्/दिक्), और तृतीया से शुरू “भ्याम्/भिः” के पहले भी ग् आता है।
4️⃣ नपुंसकलिङ्ग शब्द (10 शब्द)
| अन्त | शब्द | प्रथमा ए.व. | विशेष |
|---|---|---|---|
| त्-कारान्त | जगत् | जगद्/जगत् | जगती (द्वि.व.), जगन्ति (ब.व.) |
| न्-कारान्त | नामन् | नाम | नाम्ना, नाम्ने, नामानि |
| न्-कारान्त | कर्मन् | कर्म | कर्मणा, कर्माणि |
| न्-कारान्त | चर्मन् | चर्म | चर्मणा, चर्माणि |
| स्-कारान्त | मनस् | मनः | मनसा, मनांसि |
| स्-कारान्त | तपस् | तपः | तपसा, तपांसि |
| स्-कारान्त | पयस् | पयः | पयसा, पयांसि |
| स्-कारान्त | शिरस् | शिरः | शिरसा, शिरांसि |
| स्-कारान्त | छन्दस् | छन्दः | छन्दसा, छन्दांसि |
| ष्-कारान्त | चक्षुष् | चक्षुः | चक्षुषा, चक्षूंषि |
पैटर्न: नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के रूप हमेशा एक जैसे होते हैं — यह नियम हर नपुंसक शब्द पर लागू होता है।
5️⃣ सुप्-प्रत्यय तालिका (सभी लिंगों के लिए मूल विभक्ति-चिह्न)
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | सु | औ | जस् |
| द्वितीया | अम् | औट् | शस् |
| तृतीया | टा | भ्याम् | भिस् |
| चतुर्थी | ङे | भ्याम् | भ्यस् |
| पञ्चमी | ङसि | भ्याम् | भ्यस् |
| षष्ठी | ङस् | ओस् | आम् |
| सप्तमी | ङि | ओस् | सुप् |
इन्हीं मूल प्रत्ययों (सुप्-प्रत्यय) के धातु/प्रातिपदिक से जुड़ने पर ऊपर के सभी शब्दरूप बनते हैं।
Exam Tip: इन शब्दों के तृतीया-बहुवचन, चतुर्थी-बहुवचन व पञ्चमी-बहुवचन में मूल व्यंजन बदलकर भ्याम्/भिः/भ्यः से पहले “sandhi” होती है (जैसे मनस् → मनोभिः, चन्द्रमस् → चन्द्रमोभ्यः)। यही सबसे ज़्यादा पूछा जाता है!
