क्या लिखूँ?
संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं व्याकरण हल · कक्षा गंगा (हिंदी)
मेरे उत्तर मेरे तर्क
सटीक उत्तर चुनिए और कारण भी समझिए- (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
- (ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना
- (ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना
- (घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना
गार्डिनर के इस उदाहरण में हैट = मन के सच्चे भाव (असली वस्तु) और खूँटी = विषय (केवल आधार/माध्यम) का प्रतीक है। जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी चल जाती है, वैसे ही अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। इससे स्पष्ट होता है कि निबंध में विषय गौण है और लेखक के हृदय के भाव प्रधान हैं।
शेष विकल्प इसलिए गलत हैं — (ख) यहाँ तथ्य नहीं, भाव की बात है; (ग) भाषा-व्यवस्था की चर्चा नहीं; (घ) सिद्धांत बनाम उदाहरण का प्रसंग नहीं है।
- (क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न देना
- (ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना
- (ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना
- (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
मानटेन ने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में उतार दिया। ऐसे निबंध मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं जिनमें लेखक की सच्ची अनुभूति और उल्लास रहता है। इसी से प्रेरित होकर लेखक भी अपने अनुभव के आधार पर स्वतंत्र/स्वच्छंद लेखन करने का निर्णय लेता है — “तब इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ।”
अन्य विकल्प गलत — (क) यह पद्धति सहज भाषा को महत्व देती है; (ख) लेखक परंपरा को पूरी तरह नकारता नहीं, केवल भिन्न मार्ग चुनता है; (ग) यह पद्धति अनुभव पर आधारित है, ‘बिना अध्ययन’ पर नहीं।
- (क) तर्क और भावना
- (ख) ज्ञान और शिक्षा
- (ग) परिश्रम और उपलब्धि
- (घ) अभिलाषा और अनुभव
तरुण भविष्य की ओर देखते हैं — यह उनकी अभिलाषा/आकांक्षा है; वृद्ध अतीत की ओर देखते हैं — यह उनका अनुभव/स्मृति है। दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर एक सपने (अभिलाषा) के सहारे और दूसरा बीते अनुभव के सहारे। इसलिए यह तुलना अभिलाषा (तरुण) और अनुभव (वृद्ध) पर आधारित है।
- (क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए
- (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
- (ग) ढोल के महत्व को दर्शाने के लिए
- (घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में
अमीर खुसरो ने एक ही पद्य में चार स्त्रियों की चार भिन्न इच्छाएँ (खीर, चरखा, कुत्ता, ढोल) पूरी कर दीं। लेखक के सामने भी दो विषय थे — ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’। खुसरो की इसी पद्धति को अपनाकर वह दोनों विषयों को एक ही निबंध में समेट लेता है। अतः कहानी का उद्देश्य एक साथ कई विषयों को संभालने की प्रतिभा दिखाना है।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।”
- (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
- (ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं।
- (ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं।
- (घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।
लेखक कहता है कि मनुष्य-जाति के इतिहास में ऐसा कोई काल नहीं हुआ जब सुधारों की आवश्यकता न रही हो। समाज में नए-नए दोष उत्पन्न होते रहते हैं और नए-नए सुधार होते रहते हैं — “न दोषों का अंत है और न सुधारों का।” इसलिए सुधार की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
विकल्प (घ) गलत है क्योंकि दोष कभी समाप्त नहीं होते; जो आज सुधार है वही कल दोष बन जाता है — यही जीवन को प्रगतिशील बनाता है।
मेरी समझ मेरे विचार
चर्चा कीजिए और उत्तर लिखिए| आधार | ए.जी. गार्डिनर | लेखक (बख्शी जी) |
|---|---|---|
| लेखन का स्रोत | लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है | ऐसी मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया |
| भावों का उठना | मन में उमंग, हृदय में स्फूर्ति, मस्तिष्क में आवेग स्वयं उठता है; भाव अपने आप उत्पन्न | भाव अपने आप नहीं आते — सोचना, चिंता व परिश्रम करना पड़ता है |
| विषय की चिंता | विषय की चिंता नहीं रहती — कोई भी विषय चल जाता है | विषय व सामग्री दोनों के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है |
| प्रकृति | लेखन स्वतःस्फूर्त (सहज) | लेखन श्रमसाध्य (प्रयत्नपूर्वक) |
संक्षेप में — गार्डिनर के लिए निबंध-लेखन भीतरी आवेग से सहज ही हो जाता है, जबकि लेखक के लिए वह सोच-विचार और मेहनत माँगता है।
तरुणों की असंतुष्टि के कारण —
- वे भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं; वर्तमान उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप नहीं लगता।
- उनमें जोश व अधीरता होती है; वे क्रांति व परिवर्तन के समर्थक हैं और धीमी गति से असंतुष्ट रहते हैं।
- पुरानी परंपराएँ व बंधन उन्हें रुकावट लगते हैं।
वृद्धों की असंतुष्टि के कारण —
- उन्हें अतीत का गौरव वर्तमान में दिखाई नहीं देता; वे अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं।
- वे अतीत-गौरव के संरक्षक हैं; नए परिवर्तन उन्हें मूल्यों का ह्रास लगते हैं।
- अनुभव की कसौटी पर वर्तमान उन्हें अपूर्ण व बदला हुआ प्रतीत होता है।
मेरे विचार से दोनों पीढ़ियों के बीच यह असंतोष — तेज़ी से बदलते समाज, अपेक्षाओं के पूरा न होने और पुराने-नए मूल्यों के टकराव के कारण भी होता है।
विषय — नमिता चाहती है ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ पर निबंध; अमिता का आग्रह है ‘समाज-सुधार’ पर। दोनों विषय परीक्षा में आ चुके हैं।
कठिनाइयाँ —
- लेखक को वह स्वतःस्फूर्त मानसिक स्थिति नहीं आती जिसमें भाव अपने आप उठें — उसे श्रम करना पड़ता है।
- ‘दूर के ढोल’ जैसे विषय पर पाँच पेज लिखना और उसकी रूपरेखा बनाना कठिन — वह सोच ही नहीं पाता कि रूपरेखा कैसी हो।
- ‘समाज-सुधार’ अनादि काल से विवादास्पद है; बड़े-बड़े विज्ञों में भी मतभेद है — इसे पाँच पेज में समेटना कठिन।
- समय की कमी — दो घंटे में दो निबंध तैयार करने हैं।
- पास में विश्वकोश/संदर्भ ग्रंथ/पुस्तकालय नहीं — केवल अपने ज्ञान पर भरोसा करना पड़ा।
समाधान — लेखक ने अमीर खुसरो की पद्धति अपनाकर दोनों विषयों को एक ही निबंध में समेट लिया।
आचार्यों की युक्तियाँ —
- निबंध छोटा होना चाहिए; छोटे निबंध में रचना की सुंदरता बनी रहती है।
- निबंध के दो प्रधान अंग हैं — सामग्री और शैली।
- पहले सामग्री/विचार एकत्र करना चाहिए (मनन व अध्ययन से)।
- लिखने से पहले निबंध की रूपरेखा बना लेनी चाहिए।
- भाषा में प्रवाह हो — वाक्य छोटे-छोटे पर एक-दूसरे से संबद्ध हों।
मेरी तैयारी — सबसे पहले विषय को अच्छी तरह समझता/समझती हूँ, फिर जानकारी व मुख्य बिंदु एकत्र करता हूँ, एक रूपरेखा बनाता हूँ (भूमिका → विषय-विस्तार → उपसंहार), सरल व प्रवाहपूर्ण भाषा में लिखता हूँ, उपयुक्त उदाहरण व लोकोक्तियाँ जोड़ता हूँ और अंत में पुनरावलोकन करता हूँ।
- देखे-सुने-अनुभूत अनुभव लेखन को जीवंत, सजीव और विश्वसनीय बनाते हैं।
- लेखक को उधार के विचारों के बजाय वास्तविक जीवन से मौलिक सामग्री मिलती है।
- सच्ची अनुभूति से निबंध में आत्मीयता और उल्लास आता है, जिससे पाठक सीधे जुड़ जाता है।
- ऐसा लेखन स्वाभाविक व प्रभावशाली होता है — उसमें न दिखावटी ज्ञान की गरिमा होती है, न केवल कल्पना की महिमा।
- अनुभव लेखक की दृष्टि को व्यापक बनाता है और विषय को गहराई से समझने में मदद करता है।
निबंध लेखन की कला (आरेख)
दिए गए आरेख को देखिए और इसके आधार पर निबंध लिखिए‘निबंध’ का शाब्दिक अर्थ है — ‘बाँधना’ (नि + बंध), अर्थात् भली-भाँति बँधा या गठा हुआ। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार, दृष्टिकोण व भावनाओं को तार्किक, भावनात्मक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप से प्रस्तुत करता है। शैली का अर्थ है — अभिव्यक्ति का ढंग।
निबंध-लेखन प्रक्रिया का आरेख —
आरेख के अनुसार निबंध-लेखन के चरण —
- प्रेरणा — लिखने की भीतरी या बाहरी प्रेरणा का जागना।
- विषय चयन — रुचि व जानकारी के अनुसार उपयुक्त विषय चुनना।
- सामग्री संग्रह — विषय से जुड़े विचार, तथ्य व उदाहरण एकत्र करना।
- रूपरेखा निर्माण — मुख्य बिंदुओं का क्रम (भूमिका, मध्य, उपसंहार) तय करना।
- भाव-विस्तार — बिंदुओं को विचार व भावों के साथ विस्तार देना।
- शैली निर्धारण — सरल, प्रवाहपूर्ण व प्रभावी भाषा-शैली चुनना।
- लेखन और समापन — क्रमबद्ध लेखन और सुंदर उपसंहार के साथ समाप्ति।
📝 इस प्रक्रिया पर आधारित आदर्श लघु-निबंध — “समय का महत्व”
(प्रेरणा व विषय चयन) जीवन में सबसे मूल्यवान वस्तु यदि कोई है, तो वह है समय। धन खोकर फिर कमाया जा सकता है, पर बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता।
(भाव-विस्तार) समय निरंतर बहती नदी के समान है। जो व्यक्ति इसका सदुपयोग करता है, वही जीवन में सफलता पाता है। महापुरुषों की उपलब्धियों के पीछे समय का अनुशासन ही छिपा रहता है। इसके विपरीत, आलस्य में समय गँवाने वाला बाद में केवल पछताता है।
(उपसंहार/समापन) अतः हमें प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए। आज का काम कल पर न टालना ही समय के प्रति सच्चा सम्मान है — यही उन्नति का मूल मंत्र है।
भाव-विस्तार
नीचे दिए वाक्यों का अपने शब्दों में भाव-विस्तारजिन युवाओं ने अभी जीवन के वास्तविक संघर्ष व कठिनाइयों का सामना नहीं किया, उन्हें यह संसार अत्यंत सुंदर व आकर्षक लगता है। दूरी से देखने पर हर चीज़ मनोहर दिखती है, क्योंकि यथार्थ की कठोरता का अनुभव अभी उन्हें नहीं हुआ होता। जैसे ‘दूर के ढोल सुहावने’ लगते हैं, वैसे ही अनुभवहीन तरुण को संसार स्वप्न-सा रमणीय प्रतीत होता है।
मानव-समाज में हर युग में कोई न कोई दोष या कमी रही है, इसलिए सुधार की आवश्यकता सदा बनी रही। समय के साथ नए दोष जन्म लेते हैं और उनके निवारण के लिए नए सुधारक आते हैं। सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है — इसी से समाज जीवित व प्रगतिशील बना रहता है। यही कारण है कि सुधारकों की परंपरा कभी समाप्त नहीं होती।
समय एक चक्र है। आज का युवा कल वृद्ध होगा, और तब उसका आज का वर्तमान उसके लिए ‘अतीत’ बन जाएगा। तब वह भी अपने बीते दिनों को गौरवमय मानकर उनका स्मरण करेगा, ठीक जैसे आज के वृद्ध अपने अतीत को सुखद मानते हैं। इस प्रकार हर पीढ़ी अपने समय में भविष्य के सपने देखती है और वृद्ध होकर अतीत के गौरव में डूब जाती है।
संक्षिप्त निबंध में विचारों की कसावट और रचना की सुंदरता बनी रहती है। छोटे निबंध में लेखक केवल आवश्यक व सारगर्भित बातें ही रखता है, जिससे वह सुगठित व प्रभावशाली बनता है। इसके विपरीत बड़ा निबंध प्रायः बिखर जाता है और उसमें अनावश्यक विस्तार आ जाता है, जिससे उसकी सुंदरता घट जाती है। अतः छोटा व कसा हुआ निबंध श्रेष्ठ माना जाता है।
“तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक” → युवा पीढ़ी में किसी समस्या को लेकर आक्रोश व त्वरित निर्णय की भावना प्रबल होती है, जबकि वृद्ध पीढ़ी समस्या के समाधान के लिए अनुभव और परंपरागत ढंग पर विश्वास करती है।
मेरा अनुभव
आपको किन विषयों पर लिखना सरल/कठिन लगा?मुझे उन विषयों पर लिखना सरल लगा जिनसे मैं रोज़ के जीवन में जुड़ा/जुड़ी रहती हूँ — जैसे ‘मेरा प्रिय त्योहार’, ‘मेरा विद्यालय’ या ‘वर्षा ऋतु’। इनमें मेरे पास देखे-अनुभव किए हुए सजीव चित्र पहले से मौजूद थे, इसलिए विचार सहज ही आते गए।
वहीं कठिन वे विषय लगे जो अमूर्त या विवादास्पद थे — जैसे ‘समाज-सुधार’ या ‘विज्ञान वरदान या अभिशाप’। इनमें तथ्य व उदाहरण जुटाने और संतुलित विचार रखने में अधिक परिश्रम करना पड़ा, क्योंकि इनसे मेरा सीधा अनुभव कम था।
निष्कर्ष — जिस विषय का अनुभव या अध्ययन अधिक होता है, उस पर लिखना उतना ही सहज हो जाता है।
विषयों से संवाद
जानकारी एकत्र कीजिए और लिखिए| महापुरुष | समाज के लिए योगदान |
|---|---|
| गौतम बुद्ध | अहिंसा, करुणा, मध्यम मार्ग व अष्टांगिक मार्ग का उपदेश; जाति-भेद का विरोध; बौद्ध धर्म की स्थापना। |
| महावीर स्वामी | अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह व अनेकांतवाद का प्रचार; जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर; जीव-दया का संदेश। |
| नागार्जुन | बौद्ध दार्शनिक; ‘शून्यवाद/माध्यमिक’ दर्शन के प्रवर्तक; तर्क व ज्ञान-परंपरा को समृद्ध किया। |
| आदि शंकराचार्य | अद्वैत वेदांत का प्रतिपादन; चार मठों की स्थापना; भारत की आध्यात्मिक एकता को सुदृढ़ किया। |
| कबीर | निर्गुण भक्ति के संत; जाति-पाँति, आडंबर व बाह्य कर्मकांड का विरोध; हिंदू-मुस्लिम एकता व सादगी का संदेश। |
| गुरु नानक | सिख धर्म के संस्थापक; ‘एक ओंकार’ का संदेश; जाति-भेद व पाखंड का विरोध; ‘कीरत करो, नाम जपो, वंड छको’। |
- स्त्री-शिक्षा — सावित्रीबाई फुले (प्रेरणा-स्रोत); ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान; अनेक एनजीओ बालिकाओं को निःशुल्क शिक्षा देते हैं।
- पर्यावरण — सुंदरलाल बहुगुणा (चिपको आंदोलन); ‘ग्रीन/पर्यावरण मित्र’ संस्थाएँ वृक्षारोपण व स्वच्छता का कार्य करती हैं।
- असमानता/समाज-सेवा — मदर टेरेसा, बाबा आम्टे; अनेक स्वयंसेवी संस्थाएँ गरीबों व वंचितों की सहायता करती हैं।
- दिव्यांगजन — अनेक विशेष विद्यालय व पुनर्वास केंद्र दिव्यांग बच्चों को शिक्षा, कौशल व आत्मनिर्भरता प्रदान करते हैं।
आप अपने नगर/गाँव की किसी ऐसी संस्था या व्यक्ति का नाम जोड़कर इस उत्तर को और सजीव बना सकते हैं।
- शिक्षा — हर बच्चे, विशेषकर बालिकाओं, के लिए निःशुल्क व समान शिक्षा; निरक्षरता उन्मूलन के लिए प्रौढ़ शिक्षा शिविर।
- स्वच्छता व पर्यावरण — वृक्षारोपण, कचरा-प्रबंधन व जल-संरक्षण के लिए जन-जागरूकता।
- सामाजिक कुरीतियाँ — जाति-भेद, दहेज-प्रथा व बाल-विवाह के विरुद्ध जागरूकता व कानून का पालन।
- कैसे — स्वयं उदाहरण बनकर, ‘नुक्कड़ नाटक’, पोस्टर व सोशल मीडिया द्वारा जागरूकता, और स्वयंसेवी समूह बनाकर निरंतर प्रयास से।
भारतीय ज्ञान-परंपरा में ‘धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष’ चार पुरुषार्थों के द्वारा जीवन में संतुलन का आदर्श रखा गया। गीता का निष्काम कर्म, उपनिषदों का आत्मज्ञान तथा लोक-व्यवहार की नीति — ये सब मिलकर नैतिक, आध्यात्मिक व व्यावहारिक जीवन में संतुलन सिखाते हैं। शिक्षक के साथ इन उदाहरणों पर चर्चा कीजिए।
सृजन
रचनात्मक लेखनजैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास
‘आम के आम गुठलियों के दाम’ — अर्थात् एक ही प्रयास से दोहरा लाभ। हमारी पाठशाला ने इसी सिद्धांत को अपनाते हुए रसोई व बगीचे के कचरे से जैविक खाद बनाने का काम शुरू किया। सब्ज़ियों के छिलके, सूखी पत्तियाँ व बचा हुआ भोजन — जो पहले व्यर्थ फेंका जाता था — अब गड्ढे में डालकर खाद में बदला जाता है।
इससे दोहरा लाभ हुआ — एक ओर कचरे का निपटान हुआ और स्वच्छता बढ़ी, दूसरी ओर बिना पैसे खर्च किए उपजाऊ खाद मिल गई, जिससे विद्यालय का बगीचा हरा-भरा हो गया। रासायनिक खाद से बचाव हुआ और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रही। सचमुच यह ‘आम के आम और गुठलियों के दाम’ वाली कहावत को चरितार्थ करता है।
दिनांक: …… दिन: ……
आज मुझे एक रोचक अनुभव हुआ। दूर से मुझे लगा कि पड़ोस के मैदान में कोई उत्सव हो रहा है — ढोल की मधुर थाप व रोशनी देखकर मन उत्साह से भर गया। मैं सोचने लगा कि वहाँ कितनी रौनक होगी।
परंतु जब मैं पास पहुँचा तो अनुभव बिल्कुल अलग था। ढोल की आवाज़ इतनी तीव्र थी कि कान सुन्न हो गए, भीड़ का धक्का-मुक्की भरा शोर सिर चकरा देने वाला था। दूर से जो ‘सुहावना’ लग रहा था, निकट से वह कष्टदायक निकला।
इस घटना से मैंने सीखा कि — ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं।’ किसी भी वस्तु या स्थिति का दूर से किया अनुमान और निकट का यथार्थ अनुभव अक्सर भिन्न होते हैं।
गतिविधियाँ
संकलन व वाद-विवादअमीर खुसरो हास्य-व्यंग्यपूर्ण ‘अनमेली’, ‘मुकरी’ व ‘पहेली’ रचने में निपुण थे। ‘अनमेली’ में असंगत बातों को जोड़कर मनोरंजन किया जाता है, ‘मुकरी’ में सखी अपनी बात कहकर अंत में मुकर जाती है, और ‘पहेली’ में किसी वस्तु का गुप्त वर्णन रहता है। कुछ प्रसिद्ध उदाहरण —
चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।।” (उत्तर — आकाश व तारे)
अपनी कक्षा में शिक्षक की सहायता से ऐसी और मुकरियों व पहेलियों को ढूँढ़कर एक सुंदर संकलन तैयार कीजिए।
पक्ष (युवा पीढ़ी श्रेष्ठ) —
- नवीन सोच, तकनीकी कुशलता व परिवर्तन का साहस।
- ऊर्जा, उत्साह व जोखिम लेने की क्षमता।
विपक्ष (वृद्ध पीढ़ी श्रेष्ठ) —
- जीवन का गहरा अनुभव व धैर्य।
- परंपरा, मूल्य व सोच-समझकर निर्णय लेने की परिपक्वता।
निष्कर्ष — दोनों पीढ़ियों का सामंजस्य (युवा का जोश + वृद्ध का अनुभव) ही समाज को संतुलित प्रगति देता है। वाद-विवाद के नियम कक्षा 7–8 की पाठ्यपुस्तक ‘मल्हार’ से देखकर तय करें।
व्याकरण — समास
परिभाषा, भेद व पाठ से उदाहरणसमास का अर्थ है — संक्षेप। दो या अधिक शब्दों के मेल से बने नए शब्द को समास कहते हैं; जैसे — गंगा + जल = गंगाजल, देश + भक्ति = देशभक्ति। समास से बने शब्द को समस्त पद कहते हैं। पहले पद को पूर्वपद व दूसरे को उत्तरपद कहते हैं। समस्त पद के अंगों को अलग करना समास-विग्रह कहलाता है — जैसे गंगाजल = गंगा + जल (गंगा का जल)।
समास के छह प्रमुख भेद —
| भेद | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| 1. तत्पुरुष | उत्तरपद प्रधान; बीच के परसर्ग (का, से, के लिए) का लोप | रसोईघर = रसोई के लिए घर |
| 2. कर्मधारय | पूर्वपद विशेषण व उत्तरपद विशेष्य; या उपमेय-उपमान संबंध | नीलकमल = नीले रंग का कमल |
| 3. द्विगु | पूर्वपद संख्यावाची; अर्थ प्रायः समूहवाची | तिरंगा = तीन रंगों का समाहार |
| 4. बहुव्रीहि | दोनों पद गौण; मिलकर किसी अन्य (प्रधान) पद की ओर संकेत | पीतांबर = पीला है अंबर जिसका (कृष्ण/विष्णु) |
| 5. द्वंद्व | दोनों पद प्रधान; योजक अव्यय (और) का लोप | भाई-बहन = भाई और बहन |
| 6. अव्ययीभाव | पूर्वपद अव्यय; समस्त पद भी अव्यय (क्रिया-विशेषण) का काम करे | यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार; धीरे-धीरे |
| सामासिक पद | समास विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| निबंधशास्त्र | निबंध का शास्त्र | तत्पुरुष |
| निबंध-रचना | निबंध की रचना | तत्पुरुष |
| समाज-सुधार | समाज का सुधार | तत्पुरुष |
| विश्वकोश | विश्व का कोश | तत्पुरुष |
| जीवन-संग्राम | जीवन रूपी संग्राम | कर्मधारय |
| अतीत-गौरव | अतीत का गौरव | तत्पुरुष |
| विवाहोत्सव | विवाह का उत्सव | तत्पुरुष |
| लोकजीवन | लोक का जीवन | तत्पुरुष |
| नव-वधू | नई वधू | कर्मधारय |
| नगर-नगर | प्रत्येक नगर | अव्ययीभाव |
| गाँव-गाँव | प्रत्येक गाँव | अव्ययीभाव |
उपसर्ग एवं प्रत्यय
परिभाषा व अभ्यास हलउपसर्ग — भाषा के सार्थक व लघुतम खंड जो स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं होते; ये शब्दों के आरंभ में लगकर नया शब्द बनाते हैं। जैसे — दुर्+बोध = दुर्बोध, अन्+आदि = अनादि।
प्रत्यय — ऐसे सार्थक लघुतम खंड जो शब्दों के अंत में लगकर नया शब्द बनाते हैं। जैसे — सुधार+क = सुधारक, कठिन+आई = कठिनाई।
उपसर्ग वाले शब्द —
दुर् → दुर्बोध, दुर्बोधताअन् → अनादिअनु → अनुभव, अनुसंधान, अनुसरणप्र → प्रसिद्ध, प्रबल, प्रमुखवि → विश्वास, विरोध, विशेषसम् → संचार, समावेशअति → अत्यंत
प्रत्यय वाले शब्द —
क → सुधारकआई → कठिनाईता → मधुरता, यथार्थता, सुंदरता, विद्वताअक → लेखक, पाठकशील → प्रगतिशील
- निबंध लिखना बड़ी कठिनाई (कठिन + आई) की बात है।
- वर्तमान से दोनों को असंतोष (अ + संतोष) होता है।
- वाक्यों में कुछ अस्पष्टता (अ + स्पष्ट + ता) भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता (दुर् + बोध + ता) गांभीर्य ला देती है।
| मूल शब्द | नए शब्द |
|---|---|
| मधुर | मधुरता, मधुरमय, सुमधुर (उदाहरण) |
| सुधार | सुधारक, सुधारवादी, सुधारात्मक |
| सुंदर | सुंदरता, सौंदर्य, सुंदरतम |
| गति | गतिशील, गतिमान, प्रगति, अगति |
| समाज | सामाजिक, समाजसेवी, असामाजिक |
भाव एक · शब्द अनेक
मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्द व वाक्य-प्रयोग| शब्द-समूह | वाक्य-प्रयोग |
|---|---|
| विचार · मनन · चिंतन | गहरे चिंतन व मनन के बाद ही अच्छे विचार मन में आते हैं। |
| सुहावने · मधुर · मनमोहक | दूर के ढोल सुहावने लगते हैं, उनकी ध्वनि मधुर व दृश्य मनमोहक प्रतीत होता है। |
| आवेग · उमंग · स्फूर्ति | लिखते समय मन में उमंग, हृदय में स्फूर्ति और मस्तिष्क में आवेग उठता है। |
| विषाद · अवसाद · उदासी | असफलता से उसके मन में विषाद, अवसाद व गहरी उदासी छा गई। |
| कोलाहल · शोर · हंगामा | बाज़ार के कोलाहल और शोर–हंगामे में बात सुनना कठिन था। |
| यथार्थ · सत्य · वास्तविक | दूर रहने से जीवन के यथार्थ, सत्य व वास्तविक रूप का अनुभव नहीं होता। |
भाषा संगम
‘निबंध’ शब्द विभिन्न भारतीय भाषाओं में| भाषा | शब्द | भाषा | शब्द |
|---|---|---|---|
| हिंदी | निबंध | मराठी | निबंध |
| संस्कृत | निबंधः | गुजराती | निबंध |
| पंजाबी | निबंध | बांग्ला | निबंध, प्रबंध |
| उर्दू | मज़मून | असमिया | निबंध-रचना |
| कश्मीरी | मज़मून | ओड़िआ | प्रबंध, रचना |
| सिंधी | मज़्मूनु, निबंधु | तेलुगु | व्यासम् |
| कोंकणी | निबंध | तमिल | कट्टुरै |
| नेपाली | निबंध | मलयालम | उपन्यासम् |
| मणिपुरी | निबंध, वाड़्ङ् | कन्नड़ | लेख, प्रबंध |
अन्य भाषाओं में — अंग्रेज़ी: Essay। आप अपनी मातृभाषा में भी ‘निबंध’ का शब्द व यह वाक्य लिखिए: “निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए।”
झरोखे से व खोजबीन
आगे की पढ़ाई के लिए‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ — सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का यह लेख कहता है कि लेखक इसलिए लिखता है क्योंकि वह स्वयं जानना चाहता है कि वह क्यों लिखता है; लिखकर ही वह अपनी भीतरी विवशता को पहचानता और उससे मुक्त होता है। सच्चा लेखन भीतरी प्रेरणा का फल होता है, बाहरी दबाव कभी-कभी भीतरी उन्मेष का निमित्त भर बन जाता है।
खोजबीन — पाठ में आए साहित्यकारों — बाणभट्ट, श्रीहर्ष, अमीर खुसरो, सेनापति, महात्मा गांधी, ए.जी. गार्डिनर, शेक्सपीयर व मानटेन — के विषय में पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँढ़कर पढ़िए।
