Chapter 3 सिंधु घाटी सभ्यता का सार notes Class 8 Hindi Bharat ki Khoj

सिंधु घाटी सभ्यता सार

1. सिंधु घाटी सभ्यता (3300-1700 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी। यह हड़प्पा सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इसके प्रमुख केंद्र थे।

2. रेडियो कार्बन c14 जैसी विलक्षण-पद्धति के द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2350 ई पू से 1750 ई पूर्व मानी गई है।

3. सिंधु सभ्यता की खोज रायबहादुर दयाराम साहनी ने की।

4. सिंधु सभ्यता को प्राक्ऐतिहासिक (Prohistoric) युग में रखा जा सकता है।

5. इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ और भूमध्यसागरीय थे।

6. सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल सुतकांगेंडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल आलमगीर ( मेरठ), उत्तरी पुरास्थल मांदा ( अखनूर, जम्मू कश्मीर) और दक्षिणी पुरास्थल दाइमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) हैं।

7. सिंधु सभ्यता सैंधवकालीन नगरीय सभ्यता थी.  सैंधव सभ्‍यता से प्राप्‍त परिपक्‍व अवस्‍था वाले स्‍थलों में केवल 6 को ही बड़े नगरों की संज्ञा दी गई है। ये हैं: मोहनजोदड़ों, हड़प्पा, गणवारीवाला, धौलवीरा, राखीगढ़ और कालीबंगन।

8. हड़प्पा के सर्वाधिक स्थल गुजरात से खोजे गए हैं।

9. लोथल और सुतकोतदा-सिंधु सभ्यता का बंदरगाह था।

10.  जुते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से प्राप्त हुआ है।

11. मोहनजोदड़ो से मिले अन्नागार शायद सैंधव सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत थी।

12. मोहनजोदड़ो से मिला स्नानागार एक प्रमुख स्मारक है, जो 11.88 मीटर लंबा, 7 मीटर चौड़ा है।

13.  अग्निकुंड लोथल और कालीबंगा से मिले हैं।

14 .  मोहनजोदड़ों से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता की मूर्ति मिली है जिसके चारो ओर हाथी, गैंडा, चीता और भैंसा थे।

15.  हड़प्पा की मोहरों में एक ऋृंगी पशु का अंकन मिलता है।

16.   मोहनजोदड़ों से एक नर्तकी की कांस्य की मूर्ति मिली है।

17.  मनके बनाने के कारखाने लोथल और चन्हूदड़ों में मिले हैं।

18.  सिंधु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है. यह लिपि दाई से बाईं ओर लिखी जाती है।

19.  सिंधु सभ्यता के लोगों ने नगरों और घरों के विनयास की ग्रिड पद्धति अपनाई थी, यानी दरवाजे पीछे की ओर खुलते थे।

20.  सिंधु सभ्यता की मुख्य फसलें थी गेहूं और जौ।

21.  सिंधु सभ्यता को लोग मिठास के लिए शहद का इस्तेमाल करते थे।

22. रंगपुर और लोथल से चावल के दाने मिले हैं, जिनसे धान की खेती का प्रमाण मिला है।

23.  सरकोतदा, कालीबंगा और लोथल से सिंधुकालीन घोड़ों के अस्थिपंजर मिले हैं।

24.  तौल की इकाई 16 के अनुपात में थी।

25.  सिंधु सभ्यता के लोग यातायात के लिए बैलगाड़ी और भैंसागाड़ी का इस्तेमाल करते थे।

26. मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित मेलूहा शब्द का अभिप्राय सिंधु सभ्यता से ही है।

27.  हड़प्पा सभ्यता का शासन वणिक वर्ग को हाथों में था।

28.  सिंधु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानते थे और पूजा करते थे।

29.  पेड़ की पूजा और शिव पूजा के सबूत भी सिंधु सभ्यता से ही मिलते हैं।

30.  स्वस्तिक चिह्न हड़प्पा सभ्यता की ही देन है. इससे सूर्यपासना का अनुमान लगाया जा सकता है।

31.  सिंधु सभ्यता के शहरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।

32.  सिंधु सभ्यता में मातृदेवी की उपासना होती थी।

33.  पशुओं में कूबड़ वाला सांड, इस सभ्यता को लोगों के लिए पूजनीय था।

34.  स्त्री की मिट्टी की मूर्तियां मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि सैंधव सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक था।

35.  सैंधव सभ्यता के लोग सूती और ऊनी वस्त्रों का इस्तेमाल करते थे।

36.  मनोरंजन के लिए सैंधव सभ्यता को लोग मछली पकड़ना, शिकार करना और चौपड़ और पासा खेलते थे।

37.  कालीबंगा एक मात्र ऐसा हड़प्पाकालीन स्थल था, जिसका निचला शहर भी किले से घिरा हुआ था।

38.  सिंधु सभ्यता के लोग तलवार से परिचित नहीं थे।

39.  पर्दा-प्रथा और वैश्यवृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थीं।

40.  शवों को जलाने और गाड़ने की प्रथाएं प्रचलित थी। हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ों में जलाने की प्रथा थी. लोथल और कालीबंगा में काफी युग्म समाधियां भी मिली हैं।

41.  सैंधव सभ्यता के विनाश का सबसे बड़ा कारण बाढ़ था।

42.  आग में पकी हुई मिट्टी को टेराकोटा कहा जाता है।

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Chapter 2 तलाश का सार notes class 8th hindi Bharat ki khoj

Bharat Ki Khoj Class 8 Chapter 2 Summary

भारत की अतीत की झाँकी नेहरू जी इस पाठ के माध्यम से कहते हैं कि बीते सालों में उनका यह प्रयास रहा है कि वे भारत को समझें और उसके प्रति उनके प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करें। कभी-कभी उनके मन में यह भी विचार आता था कि आखिर भारत क्या है? यह भूतकाल की किन विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करता था? उसने अपनी प्राचीन शक्ति को कैसे खो दिया? भारत उनके खून में रचा-वसा था। उन्होंने भारत को शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में देखा था। क्या अब वह अपनी शक्ति को खो दिया है? इतना विशाल जन समूह होने के बावजूद भारत के पास कुछ ऐसा है जिसे जानदार कहा जा सके। इस आधुनिक युग में तालमेल किस रूप में बैठता था।

उस समय नेहरू जी भारत के उत्तर पश्चिम में स्थित सिंधु घाटी में मोहनजोदड़ो के एक टीले पर खड़े थे। इस नगर को 5000 वर्ष पहले का बताया गया है। यह एक पूर्ण विकसित सभ्यता थी। इसका ठेठ भारतीयपन हमारी आधुनिक सभ्यता का आधार है। भारत ने फारस, मिश्र, ग्रीस, चीन, अरब, मध्य एशिया तथा भूमध्यसागर के लोगों को प्रभावित किया तथा स्वयं भी उनसे प्रभावित हुआ। नेहरू जी ने आने वाले विदेशी विद्वान यात्री जो चीन, पश्चिमी व मध्य एशिया से आए थे, उनके द्वारा लिखित साहित्य का अध्ययन किया। उन्होंने पूर्वी एशिया, अंगकोर, बोरोबुदुर और बहुत सी जगहों से भारत की उपलब्धियों के बारे में जाना। हिमालय पर्वत व उनसे जुड़ी प्राचीन कथाओं को भी उन्होंने जाना। वे हिमालय में भी घूमते रहे जिसका पुराने मिथकों और दंत कथाओं के साथ निकट का संबंध है। पहाड़ों के प्रति विशेषकर कश्मीर के प्रति उनका विशेष लगाव रहा। भारत की विशाल नदियों ने भी उन्हें आकर्षित किया। इंडस या सिंधु के नाम पर हमारे देश का नाम इंडिया और हिंदुस्तान पड़ा। यमुना के चारों ओर नृत्य और नृत्य उत्सव और नाटक से संबद्ध न जाने कितनी पौराणिक कथाएँ एकत्र हैं। भारत की नदी गंगा ने भारत के हृदय पर राज किया है। प्राचीन काल से आधुनिक युग तक गंगा की गाथा भारत की सभ्यता और संस्कृति की कहानी है।

भारत के अतीत की कहानी को स्वरूप देनेवाली अजंता, एलोरा, ऐलिफेंटा की गुफाएँ व दिल्ली तथा आगरा की विशेष इमारतों ने भी नेहरू जी को भारत के अस्तित्व के बारे में अवगत करवाया।

जब भी वे अपने शहर इलाहाबाद या फिर हरिद्वार में महान-स्नान पर्व कुंभ के मेले को देखते तो उन्हें एहसास होता था कि हज़ारों वर्ष पूर्व से उनके पूर्वज भी इस स्नान के लिए आते रहे हैं। विदेशियों ने भी इन पर्यों के लिए बहुत कुछ लिखा। उन्हें इस बात की हैरानी थी कि वह कौन-सी प्रबल आस्था है जो भारतीयों को कई पीढ़ियों से भारत की इस प्रसिद्ध नदी की ओर खींचती रही है। उनकी यात्राओं ने अतीत में देखने की दृष्टि प्रदान की। उन्हें सच्चाई का बोध होने लगा। उनके मन में अतीत के सैकड़ों चित्र भरे पड़े थे। ढाई हजार वर्ष पहले दिया महात्मा बुद्ध का उपदेश उन्हें ऐसा लगता जैसे बुद्ध अपना पहला उपदेश अभी दे रहे हों, अशोक के पाषण स्तंभ अपने शिलालेखों के माध्यम से अशोक की महानता प्रकट करते, फतेहपुर सीकरी में अकबर सभी धर्मों में समानता को मानते हुए मनुष्य की शाश्वत समस्याओं का हल खोजता फिरता है।

इस प्रकार नेहरू जी को प्राचीन पाँच हज़ार वर्ष पूर्व से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता में विलक्षणता साफ़ और स्पष्ट तथा वर्तमान के धरातल पर सजीव प्रतीत होती है।

भारत की शक्ति और सीमा
भारत की शक्ति और सीमा के बारे में खोज लंबे समय से हो रही है। नई वैज्ञानिक तकनीकों से पश्चिमी देशों को सैन्य शक्ति के विस्तार का मौका मिला। इन शक्तियों का प्रयोग कर इन देशों ने पूरब के देशों पर अधिकार कर लिया। प्राचीन काल में भारत में मानसिक सजगता और तकनीकी कौशल की कमी नहीं थी लेकिन बाद में इसमें काफ़ी गिरावट हो गई। नई खोजों की लालच में परिश्रम की कमी होने लगी। नित नए आविष्कार करने वाला भारत दूसरों का अनुकरण करने लगा। विकास के कार्यों में शिथिलता आने लगी। साहित्य रचना अधिक होने लगी। सुंदर इमारतों का निर्माण करने वाले भारत में पश्चिमी देशों के प्रभाव के कारण पच्चीकारी वाली नक्काशी की जाने लगी।

सरल, सजीव और समृद्ध भाषा की जगह अलंकृत और जटिल साहित्य-शैली विकसित हुई। विवेकपूर्ण चेतना लुप्त होती चली गई और अतीत की अंधी मूर्ति पूजा ने उसकी जगह ले ली। इस हालत में भारत का पतन होने लगा जबकि इस समय में विश्व के दूसरे हिस्से लगातार प्रगति करते रहे।

इन उपरोक्त बातों के साथ-साथ यह भी नहीं कहा जा सकता है कि इतना कुछ होने पर भी भारत की मज़बूती, दृढ़ता और अटलता को हिला नहीं सका। प्राचीन भारत का स्वरूप तो पुराने रूप में रहा लेकिन अंदर की गतिविधियाँ बदलती रहीं, भले ही नए लक्ष्य खींचे गए लेकिन पुरानी व नई सामंजस्य स्थापित करने की इच्छा बराबर बनी रही। इसी लालसा ने भारत को गति दी और पुराने के जगह नए विचारों को आत्मसात करने का सामर्थ्य दिया।

भारत की तलाश
नेहरू जी की सोच यह थी भारत का अतीत जानने के लिए पुस्तकों का अध्ययन, प्राचीन स्मारकों तथा भवनों का दर्शन, सांस्कृतिक उपलब्धियों का अध्ययन तथा भारत के विभिन्न भागों की पद यात्राएँ पर्याप्त होगी, पर इन सबसे उन्हें वह संतोष न हो सका जिसकी उन्हें तालाश थी। उन्होंने भारत के नाम पर भरत नाम की प्राचीनता बताई। उन्होंने उन्हें सुदूर-उत्तर-पश्चिम में खैबर पास से कन्याकुमारी या केप कैमोरिन तक अपनी यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने देश के किसानों की विभिन्न समस्याओं गरीबी, कर्ज, निहित स्वार्थ, जमींदार, महाजन, भारी लगान और पुलिस अत्याचार पर चर्चा की। उन लोगों को प्राचीन महाकाव्यों, दंत कथाओं की पूरी जानकारी थी। ग्रामीण अभावों में रहते हुए भी भारत की शान थे। जो बात उनमें थी वह भारत के माध्यम वर्ग में न थी। केवल उत्तेजना के भाव रहते थे।

नेहरू जी इस बात से भी अपरिचित न थे कि भारत की तस्वीर कुछ-कुछ बदल रही है क्योंकि हमारा देश 200 वर्षों से अंग्रेजों के अत्याचार झेल रहे थे। काफ़ी कुछ तो उसी कारण समाप्त हो गया लेकिन जो मूल्य या धरोहर बच गई है वह सार्थक है। लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो निरर्थक व अनिष्टकारी है।

भारत-माता
नेहरू जी सभी भारतीय किसानों को संदेश देना चाहते थे कि भारत महान है। हमें इसकी महत्ता को समझना चाहिए। वे जब भी किसी भी सभा में जाते तो लोगों को अवगत कराते कि इस विशाल भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसका भाग अलग-अलग होते हुए भी सभी को मिलाकर भारत बना है। उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम तक यह एक ही स्वरूप रखता है। उन्होंने उन्हें सुदूर उत्तर-पश्चिम में खैबर पास से कन्याकुमारी या केप केमोरिन तक अपनी यात्रा के बारे में बताया। उन्होंने किसानों की विविध समस्याओं गरीबी, कर्ज, निहित स्वार्थ, जमींदार, महाजन, भारी लगान और पुलिस अत्याचार पर चर्चा की। उन लोगों को प्राचीन महाकाव्यों दंत कथाओं की पूरी जानकारी थी। लोग जब ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते तब नेहरू जी उनसे पूछते थे कि भारत माता की जय इसका क्या अर्थ है ? इसका इन्हें सही-सही उत्तर नहीं सूझता था। एक व्यक्ति ने उत्तर दिया – भारत माता हमारी धरती है, भारत की प्यारी मिट्टी। भारत तो वह सब कुछ है भारत के पहाड़ और नदियाँ, जंगल, खेत और भारत की जनता। भारत माता की जय का अर्थ है- इसी जनता जनार्दन की जय। यह विचार उनके दिमाग में बैठता जाता था। उनकी आखें चमकने लगती थीं मानो उन्होंने एक नई महान खोज कर दी हो।

भारत की विविधता और एकता
यह सौ प्रतिशत सत्य है कि भारत में विविधता होते हुए भी एकता है। पूरे भारत देश में लोगों के खान-पान, रहन-सहन, पहनावे, भाषा, शारीरिक व मानसिक रूप में विविधता झलकती है, पर विविधता होते हुए भी भारत देश एक है। इनमें चेहरे-मोहरे, खान-पान, पहनावे और भाषा में बहुत अंतर है। पठानों के लोक प्रचलित नृत्य रूसी कोजक नृत्य शैली में मिलते हैं। इन तमाम विविधताओं के बावजूद पठान पर भारत की छाप वैसी ही स्पष्ट है जैसे तमिल पर 1 सीमांत क्षेत्र प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रमुख केंद्रों में था। तक्षशिला का महान विश्वविद्यालय दो हज़ार वर्ष पहले इसकी लोकप्रियता चरम सीमा पर थी। पठान और तमिल दो चरम उदाहरण है, बाकी की स्थिति इन दोनों के बीच की है। सबकी अलग-अलग विशेषताएँ हैं, पर इन सब पर भारतीयता की गहरी छाप है। भारत में विविध भाषाओं के बोलने वाले लोग हैं। प्राचीन चीन की भाँति प्राचीन भारत अपने आप एक संसार थी। यहाँ विदेशी भी आए और यहाँ जज्ब हो गए। किसी भी देशी समूह में छोटी-बड़ी विभिन्नताएँ हमेशा देखी जाती हैं। अब राष्ट्रवाद की अवधारणा जोरों पर विकसित होने लगी। विदेशों में भारतीय एक राष्ट्रीय समुदाय के लोग एक साथ रहते हैं। भले ही उनमें भीतरी मतभेद हो, एक हिंदुस्तानी भले ही किसी भी धर्म का हो, वह अन्य देशों में हिंदुस्तानी ही माना जाता है।

नेहरू जी का कहना है कि वे जब भी भारत के बारे में सोचते हैं तो उनके सामने दूर-दूर तक फैले मैदान, उन पर बसे अनगिनत गाँव, व शहर व कस्बे जिनमें वे घूमे, वर्षा ऋतु की जादुई बरसात जिससे झुलसी हुई धरती का सौंदर्य और हरियाली खिल जाए, विशाल नदियाँ व उनमें बहता जल, ठंडा प्रदेश खैबर, भारत का दक्षिण रूप, बर्फीला प्रदेश हिमालय या वसंत ऋतु में कश्मीर की कोई घाटी फूलों से लदी हुई व उसके बीच से कल-कल छल-छल करते बहते झरने की तस्वीर बन जाती है, जिसे वे सहेजकर रखना चाहते हैं।

जन संस्कृति
भारत की तलाश के क्रम में नेहरू जी जब भारतीय जनता के जीवन की गतिशीलता को देखते तो उसका संबंध अतीत से जोड़ते थे, जबकि इन लोगों की नज़रें भविष्य पर टीकी रहती थी। लेखक को हर जगह एक संस्कृति पृष्ठभूमि मिली जिसका जनता के जीवन पर गहरा असर था। इस पृष्ठभूमि में लोक प्रचलित दर्शन परंपरा, इतिहास, मिथक, पुरा-कथाओं का सम्मेलन था। ये कथाएँ आपस में इस प्रकार से मिली हुई थी कि इसे एक दूसरे से अलग करना असंभव था। भारत के प्राचीन महाकाव्य रामायण और महाभारत जनता के बीच प्रसिद्ध थे। वे ऐसी कहानी का उल्लेख करते थे जिससे कोई नैतिक उपदेश निकलता था। लेखक के मन में लिखित इतिहास और तथ्यों का भंडार था। गाँव के रास्ते से गुजरते हए लेखक की नज़र मनोहर पुरुष या सुंदर स्त्री पर पड़ती थी जिसे देखकर वह विस्मय विमुग्ध हो जाता था। चारों ओर अनगिनत विपत्तियाँ फैली हुई थीं। लेखक को इस बात से हैरानी होती थी कि तमाम भयानक कष्टों के बावजूद, आखिर यह सौंदर्य कैसे टिका और बना रहा। भारत में स्थितियों को समर्पित भाव से स्वीकार करने की प्रवृत्ति प्रबल थी।

भारत में नम्रता, यह सब कुछ होने के बाद भी स्थिति को स्वीकारने की प्रबल प्रवृत्ति थी जो हज़ारों सालों की संस्कृति विरासत की देन थी और इसे दुर्भाग्य भी न मिटा पाया था। यानी भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्वों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था।

very short summary

तलाश पाठ में पंडित जवाहर लाल नेहरु जी ने भारत के बारे में अपने विचार व्यक्त करे हैं। वे प्राचीन भारत की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। वे यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्या वास्तव में भारत ने अपनी शक्ति को खो दिया है। वे इस बात पर विचार करते हैं कि आधुनिक विश्व में भारत का क्या स्थान है।

वे बताते हैं कि भारतीय सभ्यता पांच – छह हजारों वर्ष पुरानी है। उसका सांस्कृतिक आधार इतना मज़बूत है कि इतने वर्षों में भी हिला नहीं। उन्होंने पुराने स्मारकों को देखा और हजारों वर्ष पुराने पर्वों को देखा जो भारत की महानता का प्रतीक हैं।

लेकिन भारत तकनीकी विकास में अन्य देशों से पीछे रह गया। भारत में आबादी और गरीबी बढ़ गई।

वे भारत की चर्चा करते समय लोगों को बताते थे कि इसका नाम भरत के नाम पर आधारित है। वे लोगों से पूछते थे कि उनके लिए भारत माता की जय का क्या आशय है। उन्हें भारत के पहाड़, खेत, जंगल, नदियाँ, और जनता सबसे प्रेम था।

वे कहते हैं कि भारत में विविधता है पर साथ में एकता भी है।

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Chapter 1 अहमदनगर का किला का सार notes class 8th hindi harat ki Khoj

Bharat Ki Khoj Class 8 Chapter 1 Summary

अतीत का भार नेहरू जी को बागवानी का शौक था। उन्हें अंग्रेज़ी सरकार द्वारा जिन जेलों में रखा गया वहाँ उन्होंने अपने शौक को पूरा किया। दूसरी जेलों की तरह उन्होंने अहमद नगर के किले में भी बागवानी शुरू कर दी थी। वे प्रतिदिन धूप में भी फूलों के लिए क्यारियाँ बनाते थे। वहाँ की ज़मीन की मिट्टी काफ़ी खराब थी। यह मिट्टी पुराने मलबे से भरी हुई थी। इस मिट्टी ने अनेक युद्ध और गुप्त संधियाँ देखी हैं। इसलिए इसे ऐतिहासिक जगह भी कहा जाता है। यहाँ की एक महत्त्वपूर्ण घटना चाँद बीबी की याद नेहरू जी को आती है। उसी चाँद बीबी ने इस किले की रक्षा के लिए अकबर की मुगल सेना के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। उसी चाँद बीबी की हत्या उसी के विश्वासी आदमी ने की थी।

जेल में बागवानी के लिए खुदाई करते समय नेहरू जी को सतह के काफ़ी नीचे पुरानी दीवारों के हिस्से, गुंबद और इमारतों के ऊपरी हिस्से मिले। लेकिन जेल अधिकारी सीमित स्थानों से आगे बढ़ने की इजाजत नहीं देते थे। इसलिए उन्होंने कुदाल छोड़कर कलम हाथ में उठाई और उन्होंने यह प्रण लिया जब तक देश आज़ाद नहीं हो जाता है, वे देश की आजादी के लिए लिखते रहेंगे। वे भविष्य के बारे में इसलिए नहीं लिख सकते, क्योंकि वह किसी पैगम्बर की भूमिका में नहीं हैं। अब बचा अतीत के बारे में इतिहास व विद्वान की तरह लिखने में सक्षम नहीं थे। वे केवल वर्तमान विचारों और क्रियाकलापों के साथ संबंध स्थापित करके ही उसके बारे में कुछ लिख सकते हैं। गेटे के अनुसार, इस तरह का इतिहास लेखन अतीत के भारी बोझ से एक सीमा तक राहत दिलाता है।

अतीत का दबाव

मनुष्य के मस्तिष्क पर सभ्यता के अतीत का दबाव चाहे भला हो या बुरा दोनों तरह से अभिभूत करता है। यह दबाव कभी-कभी दमघोटू होता है।

नेहरू जी बराबर सोचा करते थे कि आखिर इनकी विरासत क्या है ? वे किन बातों के उत्तराधिकारी हैं? फिर स्वयं ही उनका मानना है कि मानवता के जिन मूल्यों को हजारों वर्षों से प्राप्त किया गया, जीत का उल्लास, हार का दुख व मानव के साहसी कारनामे ये सभी उनके साथ जुड़े हैं। वे इन्हीं सबके संतान हैं।

नेहरू जी ने अपने विचारों में अपनी घटना का भी उल्लेख किया है कि भारतवासियों की विरासत की विशेष बात यह है कि ये आपको अपना-पराया का भेद-भाव नहीं करते। यह विचार हमारे अंदर कूट-कूट कर भरा हुआ है। यही विचार हमें एकसूत्र में बाँधकर रखते हैं। इन आधारों पर वर्तमान और भावी रूप बनेगा।

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Chapter 18 टोपी का सार notes class 8th hindi vasant

टोपी पाठ सार

यह कहानी एक गौरैया के जोड़े की है। उन दोनों में बहुत प्रेम था। एक-दूसरे के बगैर वे कोई भी काम नहीं करते थे। एक बार मादा गौरैया ने किसी मनुष्य को कपड़े पहने देखा तो उसकी प्रशंसा की परंतु नर गौरैया ने कहा कि वस्त्रों से मनुष्य सुन्दर नहीं लगता, वह तो मनुष्य के वास्तविक सौंदर्य को ढाक लेता है। परन्तु मादा गौरैया को टोपी पहनने का मन करता है, नर गौरैया कहता है कि हमें वस्त्रों की कोई आवश्यकता नहीं हम तो ऐसे ही ठीक हैं। मगर मादा गौरैया अपनी जिद की पक्की थी, उसने निश्चय कर लिया था कि वह टोपी बनवाकर ही रहेगी।

एक दिन उसे रूई का टुकड़ा मिला, जिसे पहले वह धुनिया के पास ले जा कर धुनवाती है, फिर सूत कतवाने के लिए कोरी के पास ले जाती है तथा दोनों को बनवाई आधा-आधा हिस्सा मजदूरी दे देती है। गौरैया धागा बनवाने के बाद बुनकर के पास जाती है और बुनकर को कपड़े का आधा हिस्सा मजदूरी देकर तथा अपना कपड़ा लेकर दर्जी के पास जाती है तथा उसे भी उसकी मजदूरी देकर, उससे दो टोपियाँ बनवा लेती है। दर्जी ने खुश हो कर उसकी टोपी में पाँच ऊन के फूल भी लगा दिए। 

चिड़िया की टोपी बहुत सुन्दर बनी थी। चिड़िया के मन में राजा से मिलने की इच्छा उत्पन्न हुई, तो वह राजा के महल की ओर उड़ चली। चिड़िया राजा के महल पहुँची, तो राजा छत पर मालिश करवा रहा था। चिड़िया ने राजा का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। राजा को क्रोध आ गया। उसने अपने सैनिकों को उस चिड़िया को मारने के लिये कहा पर सैनिकों ने उसे मारा नहीं राजा के कहने पर उसकी टोपी छीन ली।

राजा उसकी सुन्दर टोपी देखकर हैरान था कि उस चिड़िया के पास इतनी सुन्दर टोपी कहाँ से आई। राजा हैरान था की इतनी सुन्दर टोपी किसने बनाई। उसने अपने सेवकों द्वारा उस दर्ज़ी को बुलवाया। दर्जी ने टोपी सुन्दर बनने का कारण अच्छा कपड़ा बताया। इस प्रकार क्रमशः बुनकर, कोरी व धुनिया को बुलावा भेजा। उन्होंने बताया की उन्होंने बहुत अच्छा काम इसलिए किया है क्योंकि उन्हें मजदूरी बहुत अच्छी मिली थी।

चिड़िया ने राजा को कहा कि उसने सारा कार्य पूरी कीमत चुकाकर करवाया है। वह राजा पर आरोप लगाती है कि राजा कंगाल है, तभी प्रजा को बहुत सताता है, उन पर कर लगाता है और तभी उसने उसकी टोपी भी छीन ली है क्योंकि वह खुद इतनी अच्छी टोपी नहीं बनवा सकता। राजा को अपनी पोल खुलने का डर हो जाता है इसलिए वह चिड़िया की टोपी वापस कर देता है। चिड़िया राजा को डरपोक-डरपोक कहती हुई निकल जाती है।

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Chapter 17 बाज और साँप का सार notes class 8th hindi vasant

पाठ का सार –

निर्मल जी की इस कहानी के दो प्रमुख पात्र हैं – साँप और बाज़। साँप समुद्र किनारे पत्थरों में बनी अँधेरी गुफ़ा में रहता है। उसे इस बात की ख़ुशी है कि उसे न किसी से कुछ लेना है, न ही किसी को कुछ देना है। उसे उस स्थान पर कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। एक दिन एक घायल बाज उसकी गुफा में आ गिरता है। बाज साँप को बताता है कि उसका अंतिम पल आ गया है, पर उसने अपने जीवन के हर पल का आंनद उठाया है।

बाज साँप को कहता है कि आकाश में उड़ना आनन्ददायक होता है। बाज को साँप की गुफा की दुर्गन्ध अच्छी नहीं लगती। वह एक अंतिम बार उड़ान भरना चाहता है। साँप अपने को बचाने के प्रयास से तथा अंतिम इच्छा पूरी करने के लिये बाज को उड़ने के लिए प्रोत्साहित करता है, किन्तु उड़ने के प्रयास में बाज नदी में गिर जाता है और बहता हुआ समुद्र में गायब हो जाता है।

साँप हैरान होता है की आकाश में उड़ने का मजा क्या होता है जिसके लिये बाज ने अपने प्राण त्याग दिए। साँप के मन में भी उड़ने की इच्छा जागती है। वह उड़ने के लिये अपने शरीर को हवा में उछालता है, तो ज़मीन पर गिर जाता है, किन्तु बच जाता है । वह सोचता है आकाश में कुछ नहीं है, सुख तो ज़मीन में है। इसलिये वह फिर उड़ने का प्रयास नहीं करेगा।

साँप ने कुछ समय बाद सुना जैसे लहरें बाज को श्रद्धांजलि दे रहीं थी, जिसने वीरता से अपने प्राणों की बाजी लगा दी। लेखक कहते हैं वास्तव में जीवन उन्हीं का है जो उसे दाव पर लगा कर चलते हैं। जो मौत को सामने देख कर भी अपना रास्ता नहीं बदलते।

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Chapter 16 पानी की कहानी का सार notes class 8th hindi vasant

पानी की कहानी पाठ का सारांश 

 Pani ki Kahani Class 8 Summary 

कहानी की शुरुआत में लेखक ने बताया हैं कि बेर की झाड़ी से मोती-सी चमकती पानी की एक बूँद उनके हाथ में आ गई और उनकी दृष्टि उस बूँद पर पड़ते ही वह रुक गई। लेखक कहते हैं कि थोड़ी देर बाद उनकी हथेली से सितार के तारों की-सी झंकार सुनाई देने लगी । ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि पानी की वह बूँद दो भागों में बँट गई हैं और अब वो दोनों ही हिल – हिलकर यह स्वर उत्पन्न कर रही हैं। लेखक को ऐसा लगा मानो जैसे वो बोल रही हों।

लेखक ने यहां पर पानी की बूंदों का मानवीकरण किया है। उसके बाद लेखक उन बूंदों से बातें करने लगते हैं। ओस की बूँद अपने बारे में बताती है कि वह लेखक की हथेली पर बेर के पेड़ से आई है। वह लेखक को यह भी बताती हैं कि बेर के पेड़ की जड़ों के रोएँ उस जैसी असंख्य छोटी-छोटी बूंदों को धरती से खींच लेते हैं और फिर उनका उपयोग कर उन्हें बाहर फेंक देते हैं।

पानी की बूंद बेर के पेड़ से अत्यधिक नाराज थी। वह कहती हैं कि इस पेड़ को इतना बड़ा करने के लिए मेरी जैसी असंख्य बूंदों ने अपनी कुर्बानी दी हैं। लेखक उसकी बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे ।

उसके बाद बूँद , बेर के पेड़ की जड़ों द्वारा पानी को खींचा जाना और उनका प्रयोग अपना खाना बनाने के लिए करना और अंत में पेड़ के पत्तों के छोटे-छोटे छिद्रों से बाहर निकल आने की अपनी कहानी लेखक को बताती हैं। और साथ में यह भी बताती है कि सूरज के ढल जाने के कारण अब वह भाप बनकर उड़ नहीं सकती। इसीलिए वह सूरज के आने का इंतजार कर रही है। 

लेखक उसे आशवासन देते हैं कि अब वह उनकी हथेली पर बिल्कुल सुरक्षित हैं। इसके बाद पानी की वह छोटी सी बूँद लेखक को अपनी उत्पत्ति की कहानी बताती हैं।

बूँद कहती हैं कि जब हमारे पूरे ब्रह्मांड में उथल-पुथल हो रही थी। अनेक नये ग्रह और उपग्रह बन रहे थे यानि ब्रह्मांड की रचना हो रही थी , तब मेरे दो पूर्वज हद्रजन (हाइट्रोजन और ऑक्सीजन गैस) सूर्यमंडल में आग के रूप में मौजूद थे।और सूर्यमंडल लगातार अपने निश्चित मार्ग पर चक्कर काटता रहता था। 

लेकिन एक दिन अचानक ब्रह्मांड में ही बहुत दूर , सूर्य से लाखों गुना बड़ा एक प्रकाश-पिंड दिखाई पड़ा। यह पिंड बड़ी तेज़ी से सूर्य की ओर बढ़ रहा था। उसकी आकर्षण शक्ति से हमारा सूर्य भी काँप रहा था। ऐसा लग रहा था कि वह सूर्य से टकरा जाएगा।

मगर वह सूर्य से सहस्रों मील दूर से ही दूसरी दिशा की ओर निकल गया । परंतु उसकी भीषण आकषर्ण-शक्ति के कारण सूर्य का एक भाग टूटकर कई छोटे टुकड़ों में बंट गया। उन्हीं में से एक टुकड़ा हमारी पृथ्वी है। यह प्रारंभ में एक बड़ा आग का गोला थी।

लेखक ने बूँद से प्रश्न किया कि अगर पृथ्वी आग का गोला थी तो , तुम पानी कैसे बनी ? बूँद ने जबाब दिया । अरबों वर्षों में धीरे-धीरे पृथ्वी ठंडी होती चली गई और मेरे पूर्वजों ने आपस में रासायनिक क्रिया कर मुझे पैदा किया।

पैदा होते समय मैं भाप के रूप में पृथ्वी के चारों ओर घूमती थी। फिर धीरे धीरे ठोस ब़र्फ में बदल गई । फिर लाखों वर्षों बाद सूर्य की किरणें पड़ने और गर्म जल धारा से मिलने के कारण मैं पानी में परिवर्तित समुद्र में पहुंच गई।

बूँद कहती हैं कि नमक से भरे समुद्र में बहुत ही अनोखा नजारा था।वहाँ एक से एक अनोखे जीव भरे पड़े थे। जैसे रेंगने वाले घोंघे , जालीदार मछलियाँ , कई-कई मन भारी कछुवे और हाथों वाली मछलियाँ आदि।और समुद्र की अधिक गहराई में जगंल , छोटे ठिंगने व मोटे पत्ते वाले पेड़ भी उगे थे। वहाँ पर पहाडिय़ाँ , गुफायें और घाटियाँ भी थी। जहाँ आलसी और अँधे अनेक जीव रहते थे। 

बूँद लेखक को आगे बताती है कि समुद्र के अन्दर से बाहर आना भी आसान काम नहीं था। उसने समुद्र से बाहर आने के लिए कई कोशिशें की। कभी चट्टानों में घुसकर बाहर निकलने की कोशिश की तो , कभी धरती के अंदर ही अंदर किसी सुरक्षित जगह से बाहर निकलने की कोशिश। ऐसी तमाम कोशिशों के बाद अंततः ज्वालामुखी के निकट पहुंच गई।

ज्वालामुखी की गर्मी के कारण वह फिर से भाप में परिवर्तित हो आसमान में उड़ चली। फिर बादल रूप में परिवर्तित होकर दोबारा बरस कर जमीन में आ गिरी। जमीन में आने के पश्चात नदी के रूप में बहने लगी। तभी एक नगर के पास एक नल द्वारा उसे खींच लिया गया।

महीनों तक नलों में धूमने के बाद एक दिन नल के टूटे हिस्से से बाहर निकल आयी और बेर के पेड़ के पास अटक गयी। अब सुबह होने तक का इंतजार कर रही है ताकि वह दोबारा भाप बन सके। और सूर्योदय होते ही ओस की बूँद धीरे-धीरे घटी और देखते-देखते ही लेखक की हथेली से गायब हो गई।

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Chapter 15 सूर के पद का सार notes class 8th hindi vasant

सूरदास के पद अर्थ सहित – Surdas Ke Pad Class 8 Explanation

(1)
मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।
तू जो कहति बल बेनी ज्यौं, ह्वै है लाँबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै, नागिनी सू भुइँ लोटी।
काँचौ दूध पियावत पचि पचि, देति न माखन रोटी।
सूरज चिरजीवौ दौ भैया, हरि हलधर की जोटी।
सूरदास के पद अर्थ सहित: कवि सूरदास जी अपने इस पद में कान्हा जी के बचपन की एक लीला का वर्णन किया है। इसके अनुसार, यशोदा माता कान्हा को दूध पिलाने के लिए कहती हैं कि इससे उनकी छोटी-सी चोटी, लंबी और मोटी हो जाएगी। कान्हा इसी विश्वास में काफी दिन दूध पीते रहते हैं। एक दिन उन्हें ध्यान आता है कि उनकी चोटी तो बढ़ ही नहीं रही है।

तब वो यशोदा माँ से कहते हैं, माँ मेरी चोटी कब बढ़ेगी? मुझे दूध पीते हुए इतना समय हो गया है, लेकिन ये तो अब भी छोटी ही है। आपने तो कहा था कि दूध पीने से मेरी चोटी किसी बेल की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी। फिर उसे कंघी से काढ़ा जाएगा, गूंथा जाएगा, फिर नहाते समय वो किसी नागिन की तरह लहराएगी। फिर कान्हा अपनी माँ से शिकायत करते हैं कि उन्होंने चोटी का लालच देकर उन्हें कच्चा दूध पिलाया है, जबकि उन्हें तो माखन-रोटी पसंद है। 

अंतिम पंक्ति में कवि सूरदास कान्हा और बलराम की जोड़ी ओर मुग्ध होकर उनकी लंबी उम्र की कामना करते हैं।

(2)
तेरैं लाल मेरौ माखन खायौ।
दुपहर दिवस जानि घर सूनो ढ़ूँढ़ि ढँढ़ोरि आपही आयौ।
खोलि किवारि, पैठि मंदिर मैं, दूध दही सब सखनि खवायौ।
ऊखल चढ़ि, सींके कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढ़रकायौ।
दिन प्रति हानि होति गोरस की, यह ढ़ोटा कौनैं ढ़ँग लायौ।
सूर स्याम कौं हटकि न राखै तैं ही पूत अनोखौ जायौ।
सूरदास के पद अर्थ सहित: कवि सूरदास जी ने अपना यह पद कान्हा की माखनचोरी की लीला को समर्पित किया है। गोपियां यशोदा माँ के पास आकर कहती हैं –

‘हे यशोदा! तुम्हारे पुत्र कृष्ण ने हमारा मक्खन चोरी करके खा लिया है। दोपहर में वो घर को सूना देखकर घर में घुस गया और अपने दोस्तों के साथ मिलकर सारा दूध-दही खा गया।’

आगे गोपियाँ कहती हैं,

‘कान्हा ने ओखली पर चढ़कर छींके से मक्खन उतारा और खा-पीकर कुछ मक्खन ज़मीन पर भी फैला दिया। यशोदा, आपने ऐसा उत्पाती लड़का पैदा कर दिया है, जिसकी वजह से हमें हर रोज़ दूध-दही का नुकसान हो रहा है। आप उसे रोकती क्यों नहीं हो, क्या आपने ही एक अनोखे पुत्र को जन्म दिया है?’

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Chapter 14 अकबरी लोटा का सार notes class 8th hindi vasant

Akbari Lota Class 8 Summary

“अकबरी लोटा” कहानी के मुख्य पात्र लाला झाऊलाल का काशी के ठठेरी बाजार में एक मकान था। मकान के नीचे की दुकानों से उन्हें 100/-रुपया मासिक (महीने का) किराया मिलता था जिससे उनका गुजारा अच्छे से हो जाता था। आम तौर पर उनको पैसे की तंगी नही रहती थी।

लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब एक दिन अचानक उनकी पत्नी ने ढाई सौ रुपए (250/-) लालाजी से मांग लिए। मगर लालाजी के पास पत्नी को देने के लिए उस समय पैसे नहीं थे। इसलिए उन्होंने थोड़ा सा मुंह बनाकर पत्नी की तरफ देखा।

इस पर पत्नी ने अपने भाई से ढाई सौ रुपए मांग लेने की बात कही जिस पर लालाजी थोड़ा तिलमिला गए। उनकी इज्जत का भी सवाल था। इसीलिए उन्होंने अपनी पत्नी से एक सप्ताह के अंदर रुपए देने का वादा कर दिया। 

लालाजी ने अपनी पत्नी को पैसे देने का वादा तो कर दिया लेकिन घटना के चार दिन बीत जाने के बाद भी लालाजी पैसों का प्रबंध न कर सके। पांचवें दिन लालाजी ने अपनी इस परेशानी का ज़िक्र अपने मित्र पंड़ित बिलवासी मिश्रजी से किया । पंड़ित बिलवासी मिश्रजी ने लाला जी को आश्वस्त किया कि वह किसी न किसी प्रकार रुपयों का इंतजाम कर उनकी समस्या अवश्य हल कर देंगें ।

लेकिन जब 6 दिन बीत जाने के बाद भी पैसों का इंतजाम ना हो सका तो लालाजी अत्यधिक परेशान हो गए और अपनी छत पर जाकर टहलने लगे। अचानक उन्होंने अपनी पत्नी से पीने के लिए पानी मँगवाया। पत्नी भी एक बेढंगे से लोटे में पानी लेकर आ गई , जो लाला जी को बिल्कुल भी पसंद नहीं था।

खैर उन्होंने पत्नी से लोटा लिया और पानी पीने लगे। चिंता में वह लोटा अचानक उनके हाथ से छूट गया और नीचे गली में खड़े एक अंग्रेज अधिकारी को नहलाता हुआ उसके पैरों पर जोर से जा गिरा जिससे उसके पैर के अंगूठे में चोट आ गई।

अंग्रेज अधिकारी का गुस्सा होना लाजमी था सो वह गुस्से से लाल पीला होकर , गालियां देता हुआ लालाजी के घर में घुस गया। ठीक उसी समय पंड़ित बिलवासी मिश्र जी भी वहां पर प्रकट हो गए। उन्होंने क्रोधित अंग्रेज अधिकारी को आराम से एक कुर्सी में बैठाया और झूठा गुस्सा दिखा कर लालाजी से नाराज होने का नाटक करने लगे।

अंग्रेज अधिकारी से थोड़ी देर बात करने के बाद , वो उस अंग्रेज अधिकारी के सामने उस बेढंगे से लोटे को खरीदने में दिलचस्पी दिखाने लगे और उस अंग्रेज अधिकारी के सामने उस बेढंगे व बदसूरत लोटे को ऐतिहासिक व बादशाह अकबर का लोटा बता कर उसका गुणगान करने लगे। उसे बेशकीमती व मूल्यवान बताने लगे।

लोटे की इतनी प्रशंसा सुनकर अंग्रेज अधिकारी भी लोटे को खरीदने के लिए लालायित हो उठा। बस इसका ही फायदा पंड़ित बिलवासी मिश्रजी ने उठाया और रुपयों की बाजी लगानी शुरू कर दी। दोनों बाजी लगाते गये और अंत में पंड़ित बिलवासी मिश्र ने 250/- रूपये की बाजी लगा दी लेकिन अंग्रेज भी लोटे को लेने के लिए अत्यधिक लालायित था। इसीलिए उसने 500/- रूपये की बाजी लगा दी। 

अब पंड़ितजी ने बड़ी होशियारी से अपनी लाचारी दिखाते हुए अंग्रेज अधिकारी से कहा कि उनके पास तो सिर्फ 250/- रूपये ही हैं। इसीलिए अधिक दाम चुकाने के कारण वो उस लोटे के हकदार हैं । अंग्रेज अधिकारी ने लाला से उस लोटे को खुशी – खुशी खरीद लिया।

अंग्रेज अधिकारी ने पंड़ित बिलवासी मिश्र को बताया कि वह उस अकबरी लोटे को ले जाकर अपने पड़ोसी मेजर डग्लस को दिखाएगा क्योंकि मेजर डग्लस के पास एक “जहाँगीरी अंडा” है जिसकी वह खूब तारीफ करता है।

अंग्रेज के जाने के बाद पंड़ितजी ने लालाजी को पैसे दिए जिससे लालाजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पंड़ितजी को बहुत – बहुत धन्यवाद दिया। जब पंडित जी अपने घर जाने लगे तो लालाजी ने उनसे ढाई सौ रुपयों के बारे में पूछा लिया। मगर पंडित जी “ईश्वर ही जाने” कह कर अपने घर को चल दिए। 

रात में पंड़ितजी ने अपनी पत्नी के संदूक से अपने मित्र की मदद के लिये निकाले ढाई सौ रुपयों को वापस उसी तरह , उसी संदूक में रख दिया और चैन की नींद सो गए।

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Chapter 13 जहाँ पहिया है का सार notes class 8th Hindi vasant

जहाँ पहिया है पाठ का सार
जहाँ पहिया है पाठ का सारांश
jahan pahiya hai summary

जहां पहिया है पाठ में जमीला बीवी नामक एक युवती, जिसने साइकिल चलाना शुरू किया था, उससे लेखक की बात हुई तो उसने कहा-“यह मेरा अधिकार है, अब हम कहीं भी जा सकती हैं। अब हमें बस का इंतजार नहीं करना पड़ता। मुझे पता है कि जब मैंने साइकिल चलाना शुरू किया तो लोग फ़ब्तियों कसते थे, लेकिन मैंने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया।” फातिमा एक विद्यालय में अध्यापिका है। वह शाम को आधे घंटे के लिए किराए पर साइकिल लेकर चलाती है। इस विषय में फातिमा ने बताया-“साइकिल चलाने में एक खास तरह की आज़ादी हैं। हमें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। मैं कभी इसे नहीं छोड़ेगी।” इस प्रकार की बातों से स्पष्ट होता है कि पुडुकोट्टई की स्त्रियों में साइकिल के प्रति कितना गहरा प्रेम है और समाज के प्रति कितना रोष।

पुडुकोट्टई जिले में साइकिल की पूरी तरह से धूम मची हुई है अर्थात् जिले में चारो तरफ साइकिल की ही चर्चा हो रही है। अब हर क्षेत्र एवं व्यवसाय से जुड़ी महिलाएँ इसका खूब प्रयोग कर रही हैं; फिर चाहे वे खदानों, स्कूलों, होटलों, आँगनबाड़ी आदि क्षेत्रों में ही क्यों न काम कर रही हों। दोपहर का खाना पहुँचाने वाली औरतें इसका भरपूर प्रयोग कर रही हैं। इसी संदर्भ में साइकिल आंदोलन की एक नेता का कहना है-“मुख्य बात यह है कि इस आंदोलन ने महिलाओं को बहुत आत्मविश्वास प्रदान किया। महत्त्वपूर्ण यह है कि इसने पुरुषों पर उनकी निर्भरता कम कर दी है।” अब साइकिल एक संपूर्ण सवारी बन चुकी है। सड़क पर माँ, उसका बच्चा और पीछे ढेर-सा सामान लादे हुए साइकिल चलाती महिला का दृश्य देखा जा सकता है।

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Chapter 12 सूरदास चरित का सार notes Class 8 Hindi Vasant

Sudama Charit Class 8 Meaning in Hindi – सुदामा चरित कविता का भावार्थ

सीस पगा न झगा तन में प्रभु, जानै को आहि बसै केहि ग्रामा।
धोति फटी-सी लटी दुपटी अरु, पाँय उपानह की नहिं सामा॥
द्वार खड्यो द्विज दुर्बल एक, रह्यौ चकिसौं वसुधा अभिरामा।
पूछत दीन दयाल को धाम, बतावत आपनो नाम सुदामा॥

सुदामा चरित भावार्थ: इस पद में कवि ने सुदामा के श्रीकृष्ण के महल के द्वार पर खड़े होकर अंदर जाने की इजाज़त मांगने का वर्णन किया है।

श्रीकृष्ण का द्वारपाल आकर उन्हें बताता है कि द्वार पर बिना पगड़ी, बिना जूतों के, एक कमज़ोर आदमी फटी सी धोती पहने खड़ा है। वो आश्चर्य से द्वारका को देख रहा है और अपना नाम सुदामा बताते हुए आपका पता पूछ रहा है।

से बेहाल बेवाइन सों पग, कंटक-जाल लगे पुनि जोये।
हाय! महादुख पायो सखा तुम, आये इतै न किते दिन खोये॥
देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करिके करुनानिधि रोये।
पानी परात को हाथ छुयो नहिं, नैनन के जल सौं पग धोये॥ 

सुदामा चरित भावार्थ: द्वारपाल के मुँह से सुदामा के आने का ज़िक्र सुनते ही श्रीकृष्ण दौड़कर उन्हें लेने जाते हैं। उनके पैरों के छाले, घाव और उनमें चुभे कांटे देखकर श्रीकृष्ण को कष्ट होता है, वो कहते हैं कि मित्र तुमने बड़े दुखों में जीवन व्यतीत किया है। तुम इतने समय मुझसे मिलने क्यों नहीं आए? सुदामा जी की दयनीय दशा देखकर श्रीकृष्ण रो पड़ते हैं और पानी की परात को छुए बिना, अपने आंसुओं से सुदामा जी के पैर धो देते हैं।

कछु भाभी हमको दियौ, सो तुम काहे न देत।
चाँपि पोटरी काँख में, रहे कहौ केहि हेत॥

आगे चना गुरु-मातु दिये त, लिये तुम चाबि हमें नहिं दीने।
श्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सों, चोरि कि बानि में हौ जू प्रवीने॥
पोटरि काँख में चाँपि रहे तुम, खोलत नाहिं सुधा-रस भीने।
पाछिलि बानि अजौं न तजी तुम, तैसइ भाभी के तंदुल कीने॥

सुदामा चरित भावार्थ: सुदामा जी की अच्छी आवभगत करने के बाद कान्हा उनसे मजाक करने लगते हैं। वो सुदामा जी से कहते हैं कि ज़रूर भाभी ने मेरे लिए कुछ भेजा होगा, तुम उसे मुझे दे क्यों नहीं रहे हो? तुम अभी तक सुधरे नहीं। जैसे, बचपन में जब गुरुमाता ने हमें चने दिए थे, तो तुम तब भी चुपके से मेरे हिस्से के चने खा गए थे। वैसे ही आज तुम मुझे भाभी का दिया उपहार नहीं दे रहे हो।

वह पुलकनि वह उठ मिलनि, वह आदर की बात।
यह पठवनि गोपाल की, कछू ना जानी जात॥
घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज।
कहा भयौ जो अब भयौ, हरि को राज-समाज॥
हौं कब इत आवत हुतौ, वाही पठ्यौ ठेलि।
कहिहौं धनि सौं जाइकै, अब धन धरौ सकेलि॥

सुदामा चरित भावार्थ: इस पद में सुदामा के वापिस घर की तरफ लौटने का वर्णन है। वो सोचते हैं कि मैं मदद की उम्मीद लेकर श्रीकृष्ण के पास आया, लेकिन श्रीकृष्ण ने तो मेरी कोई मदद ही नहीं की। लौटते समय निराश और खिन्न सुदामा जी के मन में कई विचार घूम रहे थे, वो सोच रहे थे कि कृष्ण को समझना किसी के वश में नहीं है। एक तरफ तो उसने मुझे इतना आदर-सम्मान दिया, वहीं दूसरी तरफ मुझे बिना कुछ दिए लौटा दिया। 

मैं तो यहां आना ही नहीं चाहता है, वो तो मेरी धर्मपत्नी ने मुझे जबरदस्ती द्वारका भेज दिया। ये कृष्ण तो खुद बचपन में ज़रा-से मक्खन के लिए पूरे गाँव के घरों में घूमता था, इससे मदद की आस लगाना ही बेकार था।

वैसेइ राज-समाज बने, गज-बाजि घने, मन संभ्रम छायौ।
वैसेइ कंचन के सब धाम हैं, द्वारिके के महिलों फिरि आयौ।
भौन बिलोकिबे को मन लोचत सोचत ही सब गाँव मँझायौ।
पूछत पाँड़े फिरैं सबसों पर झोपरी को कहूँ खोज न पायौ॥

सुदामा चरित भावार्थ: जब सुदामा अपने गाँव पहुंचते हैं, तो उन्हें आसपास सबकुछ बदला-बदला दिखता है। सामने बड़े महल, हाथी-घोड़े, गाजे-बाजे आदि देखकर सुदामा जी सोचते हैं कि कहीं मैं रास्ता भटककर फिर से द्वारका नगरी तो नहीं आ पहुंचा हूँ? मगर, थोड़ा ध्यान से देखने पर वो समझ जाते हैं कि ये उनका अपना गाँव ही है। फिर उन्हें अपनी झोंपड़ी की चिंता सताती है, वो बहुत लोगों से पूछते हैं, मगर अपनी झोंपड़ी को ढूँढ नहीं पाते।

कै वह टूटि-सि छानि हती कहाँ, कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग में पनही न हती कहँ, लै गजराजहु ठाढ़े महावत॥
भूमि कठोर पै रात कटै कहाँ, कोमल सेज पै नींद न आवत।
कैं जुरतो नहिं कोदो सवाँ प्रभु, के परताप तै दाख न भावत॥

सुदामा चरित भावार्थ: जब सुदामा जी को श्रीकृष्ण की महिमा समझ आती है, तो वो उनकी महिमा गाने लगते हैं। वो सोचते हैं कि कहाँ तो मेरे सिर पर टूटी झोंपड़ी थी, अब सोने का महल मेरे सामने खड़ा है। कहाँ तो मेरे पास पहनने को जूते नहीं थे, अब मेरे सामने हाथी की सवारी लेकर महावत खड़े हैं। कठोर ज़मीन की जगह मेरे पास नरम बिस्तर हैं। पहले मेरे पास दो वक्त खाने को चावल भी नहीं होते थे, अब मनचाहे पकवान हैं। ये सब प्रभु की कृपा से ही संभव हुआ है, उनकी लीला अपरम्पार है। 

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