Chapter-7 सप्तमः पाठः – उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् (Upayam Chintayet Praajnah Tatha Apayam Cha Chintayet) Quick Revision Notes | Class 9th Sanskrit (Sharada) Summary

📖 सप्तमः पाठः · कक्षा ९ संस्कृत

उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्

Handwritten-style Story Summary ✍️ (पञ्चतन्त्र आधारित पाठ)

1️⃣ पाठ का स्रोत

यह कथा पञ्चतन्त्र के प्रथम तन्त्र “मित्रभेदः” से ली गई है। लेखक — विष्णुशर्मा। इसमें एक माँ अपने बालक को नीतिशिक्षा देने के लिए यह कथा सुनाती है।

2️⃣ कथा-सार (Story Summary) — क्रमवार

🔹 एक बालक को रास्ते में गिरा हुआ धन मिलता है, वह खिलौने खरीदना चाहता है। माँ समझाती है कि दूसरे का धन तिनके के समान समझना चाहिए, और उसे लौटाना चाहिए।
🔹 माँ बालक को पञ्चतन्त्र की कहानी सुनाती है — किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे।
🔹 पापबुद्धि निर्धनता से दुःखी होकर धर्मबुद्धि को साथ लेकर धन कमाने अन्य देश जाने की योजना बनाता है — मन ही मन उसे बाद में ठगने का विचार भी रखता है।
🔹 गुरुजनों की आज्ञा लेकर दोनों परदेश जाते हैं और धर्मबुद्धि के प्रभाव से खूब धन कमाते हैं।
🔹 घर लौटते समय पापबुद्धि सलाह देता है कि सारा धन गहन वन में ज़मीन में गाड़ दिया जाए, थोड़ा साथ ले जाएँ। धर्मबुद्धि मान जाता है।
🔹 रात को पापबुद्धि चुपके से जाकर सारा धन निकाल लेता है और गड्ढा वापस भर देता है।
🔹 कुछ दिन बाद, पापबुद्धि अपने परिवार के लिए फिर धन लेने का बहाना बनाकर धर्मबुद्धि को साथ ले जाता है। खोदने पर गड्ढा खाली मिलता है!
🔹 पापबुद्धि उलटा धर्मबुद्धि पर ही चोरी का आरोप लगाता है और राजा तक जाने की धमकी देता है।
🔹 मामला धर्माधिकारी के पास जाता है। कोई साक्षी न होने से यह तय होता है कि वनदेवता निर्णय देगी।
🔹 पापबुद्धि छल से अपने ही पिता को शमी वृक्ष के खोखल (कोटर) में छिपा देता है ताकि वे वनदेवता बनकर धर्मबुद्धि को चोर बता दें।
🔹 अगले दिन जब पिता कोटर से बोलते हैं “धर्मबुद्धिना हृतम् एतद्धनम्” — सब चकित होते हैं। धर्मबुद्धि को शक होता है और वह उसी कोटर के चारों ओर आग लगा देता है
🔹 आग में झुलसकर पापबुद्धि का पिता बाहर निकलता है और सच बताकर मर जाता है — “यह सब पापबुद्धि का किया-धरा है”।
🔹 राजपुरुष पापबुद्धि को दण्ड देते हैं और धर्मबुद्धि की प्रशंसा करते हैं।
🏆 सीख (Moral): “उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञः तथा अपायं च चिन्तयेत्।”
बुद्धिमान व्यक्ति को कार्य करते समय लाभ (उपाय) के साथ-साथ हानि (अपाय) की भी पहले से चिन्ता/योजना करनी चाहिए। छल-कपट अंततः स्वयं का ही विनाश करता है।

3️⃣ महत्त्वपूर्ण श्लोक

मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥

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अर्थ — धर्मबुद्धि वाले लोग दूसरे की स्त्री को माता के समान, दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले के समान और सभी प्राणियों को अपने समान देखते हैं।

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4️⃣ व्याकरण बिंदु (Grammar Notes)

(अ) नित्यबहुवचनान्त शब्द

कुछ संस्कृत शब्द सदैव बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं — जैसे: आपः (जल), दाराः (पत्नी), लाजाः, अक्षतानि, गृहाः, प्राणाः, असवः, वर्षाः, समाः, सिकताः, कति, यति, तति आदि।

(ब) विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध

विशेषण और विशेष्य के बीच लिंग, विभक्ति और वचन तीनों में सामंजस्य (agreement) होना चाहिए। सर्वनाम शब्द भी विशेषण की तरह प्रयुक्त होते हैं (एनं धर्मबुद्धिम्, यः चौरः आदि)।

(स) तत्पुरुष समास (पुनरावृत्ति)

पूर्वपद की विभक्ति का लोप होकर एकपद बनता है — शरणम् आगतः = शरणागतः (द्वितीयातत्पुरुष), देशस्य भक्तः = देशभक्तः (षष्ठीतत्पुरुष) आदि।

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5️⃣ याद रखने योग्य शब्द (Vocabulary)

शब्दअर्थ
अटव्याम्वन में
अपायम्विघ्न/समस्या/संकट
खनित्वाखोदकर
निक्षिप्यरखकर
वञ्चयित्वाठग कर
उत्फुल्ललोचनाःआश्चर्य से फटी हुई आँखों वाले
प्रहृष्टमनाःप्रसन्न मन वाला

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