घर की याद
📖 पृष्ठभूमि
यह कविता भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भाग लेने के कारण मिली तीन वर्ष की जेल की सज़ा के दौरान लिखी थी। कारावास में बैठा कवि, बाहर हो रही लगातार बारिश को देखकर अपने घर और परिवार को बहुत याद करता है। पूरी कविता कवि के मन में उठ रहे भावों की एक यात्रा है — रात की बारिश से शुरू होकर, सुबह होने तक की।
🌧️ कविता की शुरुआत — बारिश और बेचैनी
कविता की शुरुआत में रातभर लगातार पानी गिरता रहता है और कवि का प्राण-मन भी उसी तरह घिरता (बेचैन होता) रहता है। सुबह हो जाने पर भी उसे ठीक से पता नहीं चलता, क्योंकि बादलों की अँधेरी अब भी घनी है। बारिश की झर-झर, पत्तों की हरा-हर, हवा की सर-सर और काँपते प्राणों का थर-थर — इन ध्वनि-शब्दों से कवि अपनी बेचैनी और अकेलेपन को जीवंत कर देता है।
बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर”
👪 परिवार के सदस्यों की स्मृति
कवि पाँच भाई-बहनों में सबसे छोटा (पाँचवाँ) है — चार भाई और चार बहनें हैं। जेल में बैठा वह एक-एक कर सबकी याद में डूब जाता है:
माँ अनपढ़ है, पर उसका स्नेह इतना गहरा है कि उसकी गोद में सिर रखते ही हर दुख दूर हो जाता था। उसे लिखना नहीं आता, इसलिए वह कवि को पत्र नहीं भेज सकती — यह बात कवि को बहुत कचोटती है।
पिताजी भोले पर बहादुर हैं — वज्र जैसे कठोर शरीर, पर हृदय मक्खन जैसा कोमल (“वज्र-भुज नवनीत-सा उर”)। बुढ़ापा उन पर हावी नहीं हुआ; वे अब भी दौड़ सकते हैं, खिलखिला सकते हैं। कवि कल्पना करता है कि जेल में गीता-पाठ करते, दंड-बैठक लगाते और मुद्गर हिलाते हुए जब वे नीचे उतरेंगे तो उनकी आँखों में आँसू होंगे — पाँचवें बेटे की याद में।
चार भाई, चार बहनें — खेलते या खड़े होंगे, कवि की याद में उनकी नज़रें भी नम होंगी। कवि स्वयं को “अभागा” कहता है क्योंकि पिताजी के जो लाड़ले बेटे उसे पहले प्यारे लगते थे, आज वही उन्हें भारी (हेटे) लगते होंगे — क्योंकि उसी की वजह से पूरा परिवार दुखी है।
☁️ सावन के बादल — संदेशवाहक
कविता का सबसे मार्मिक भाग वह है जहाँ कवि सावन के बादलों को अपना दूत बनाता है। वह उनसे विनती करता है कि वे उसके घर जाकर बरसें, पर परिवार को यह न बताएँ कि वह जेल में दुखी है। वह चाहता है कि घरवाले यही समझें कि वह मस्त, स्वस्थ और व्यस्त है — ताकि सबका धीरज बना रहे और कोई शोक न करे।
उन्हें कहना लिख रहा हूँ, उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ।
… और कहना मस्त हूँ मैं, कातने में व्यस्त हूँ मैं।”
वह बार-बार दोहराता है — “हाय रे, ऐसा न कहना… कह न देना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ” — यानी उसकी असली मानसिक पीड़ा और अकेलापन घरवालों से छिपाना चाहता है, ताकि वे चिंता न करें। यही मनुष्य के त्याग और साहस को दर्शाता है।
🌦️ अंत — शांत होता मन
कविता के अंत में बारिश थम जाती है, आकाश साफ होने लगता है और एक पंछी बोलने लगता है। यह प्रकृति का शांत होना कवि के मन की बेचैनी के धीरे-धीरे शांत होने का प्रतीक है — पर भीतर की तड़प, “इतनी तृषा” का प्रश्न, अब भी बना रहता है।
- रचनाकार: भवानीप्रसाद मिश्र (जन्म 1913, होशंगाबाद)
- कविता कब व क्यों लिखी: 1942 में जेल में, परिवार को संदेश देने हेतु
- केंद्रीय भाव: परिवार की स्मृति, घर से दूर रहने की पीड़ा, त्याग व साहस
- सावन के बादल: संदेशवाहक/दूत का प्रतीक
- माँ की छवि: स्नेहमयी और दृढ़ (अनपढ़ पर भावनात्मक रूप से मज़बूत)
- पिता की छवि: “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — कठोर शरीर, कोमल हृदय
- शैली की विशेषता: पंक्तियों का दोहराव, ध्वन्यात्मक शब्द (झरा-झर, थर-थर, सर-सर) — नाद सौंदर्य
- प्रमुख उक्ति: “दुख डटकर ठेलता हूँ” — संघर्षशील स्वभाव का प्रतीक
- पुरस्कार/रचनाएँ: ‘बुनी हुई रस्सी’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार; अन्य रचनाएँ — गीत-फ़रोश, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ
