बिरजू महाराज से साक्षात्कार
पूरे पाठ के सभी प्रश्नों के विस्तृत, सरल हल — साक्षात्कार से लेकर अभ्यास तक।
पाठ से
Intext — पाठ के भीतर दी गई सभी गतिविधियाँ(क) सबसे सही उत्तर के सामने तारा (★) लगाया गया है। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी सही हो सकते हैं।
(ख) आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
यह चर्चा का प्रश्न है। मित्रों के साथ बात कीजिए कि आपने प्रत्येक उत्तर किस पंक्ति के आधार पर चुना। इससे पता चलता है कि पाठ को ध्यान से पढ़ने पर हर उत्तर का प्रमाण पाठ में ही मिल जाता है, और चर्चा से समझ और पक्की होती है।
शब्दों का उनके सही संदर्भ/अवधारणा से मिलान:
| शब्द | सही संदर्भ या अवधारणा |
|---|---|
| कर्नाटक संगीत शैली | भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्यतः दक्षिण भारत में प्रचलित है; जल तरंगम, वीणा, मृदंग, मंडोलिन से संगत। (संदर्भ 2) |
| घराना | कलाकारों का एक समुदाय/कुटुंब जो संगीत-नृत्य की विशिष्ट शैली साझा करते हैं; परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रशिक्षण से आगे बढ़ती है। (संदर्भ 4) |
| शास्त्रीय संगीत | प्राचीन गायन-वादन-गीत-नृत्य-अभिनय परंपरा का अभिन्न अंग; शब्दों से अधिक सुरों का महत्व, नियमों की प्रधानता। (संदर्भ 1) |
| हिंदुस्तानी संगीत शैली | शास्त्रीय संगीत की एक शैली, मुख्यतः उत्तर भारत में प्रचलित; तबला, सारंगी, सितार, संतूर से संगत; प्रमुख राग छह। (संदर्भ 6) |
| कनछेदन | हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक; कान में सोने या चाँदी का तार पहनाने से संबंधित। (संदर्भ 3) |
| लोक नृत्य | किसी क्षेत्र विशेष में लोक द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक नृत्य; फसल-कटाई, उत्सवों पर किए जाते हैं। (संदर्भ 5) |
नमूना उत्तर:
- “संघर्ष से शिखर तक” — क्योंकि बिरजू महाराज ने आर्थिक कठिनाइयों के बीच कठिन साधना करके कथक के शिखर को छुआ।
- “लय के साधक : बिरजू महाराज” — क्योंकि उनके जीवन और कला का मूल आधार ‘लय’ है।
- “कथक सम्राट की कहानी” — क्योंकि पाठ उनके जीवन, कला और सोच को सामने लाता है।
मैंने ऐसा नाम इसलिए सोचा क्योंकि वह पाठ के मुख्य भाव (संघर्ष, साधना और लय) को एक ही पंक्ति में व्यक्त कर देता है।
चाचा का आशय था कि नौकरी करने पर बिरजू महाराज का ध्यान बँट जाएगा और उनकी नृत्य-प्रतिभा पूरी तरह विकसित नहीं हो पाएगी। किसी एक बड़े लक्ष्य को पाने के लिए पूरी एकाग्रता और समर्पण आवश्यक है।
नृत्य केवल शारीरिक क्रिया नहीं है। इसमें शरीर (मुद्राएँ), ध्यान (एकाग्रता) और तपस्या (कठोर अभ्यास/साधना) — तीनों का योग होता है। इसलिए नृत्य एक साधना है।
कथक में गर्दन की गति बहुत कोमल, नाजुक और सूक्ष्म होती है — ठीक वैसे जैसे दीपक की लौ हल्के-हल्के काँपती है। यह पंक्ति कथक की सुंदरता और भाव-भंगिमा की बारीकी को दर्शाती है।
उनके घर में कथक का पूरा माहौल था — उनके पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराज व लच्छू महाराज कथक के प्रसिद्ध कलाकार थे। इसी वातावरण में वे देख-देखकर कथक सीख गए और नवाब के दरबार में नाचने भी लगे थे।
गाना, बजाना और नाचना — तीनों संगीत के अंग हैं। संगीत में लय होती है और नृत्य की हर गति भी लय पर टिकी होती है। यदि नर्तक को सुर-ताल/लय की समझ नहीं होगी, तो वह पहचान ही नहीं पाएगा कि ‘लहरा’ (धुन) ठीक है या नहीं, और नृत्य के अंगों में सही प्रवेश नहीं कर पाएगा। लय ही नृत्य को सुंदरता और संतुलन देती है।
- मशीनें/यंत्र: कोई भी मशीन खोलकर उसके कल-पुर्जे देखना; ब्रीफकेस में पेचकस-औजार रखना; पंखा-फ्रिज ठीक करना (कहते थे — नर्तक न होता तो शायद इंजीनियर होता)।
- चित्रकारी: पेंटिंग बनाने का शौक; पिछले दो वर्षों में लगभग सत्तर चित्र बनाए।
- गायन-वादन: तबला, हारमोनियम (लहरा) बजाना, फिल्मी व अन्य गाने गाना।
- रचना: नृत्य-नाटिकाएँ और उनके लिए संगीत तैयार करना।
- यदि बच्चे की रुचि है तो उसे लय के साथ खेलने दें — इसे एक खेल की तरह लें, जिसमें संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग सीखने को मिलता है (बौद्धिक विकास के लिए महत्वपूर्ण)।
- लड़कियों के पास शिक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें; हुनर ऐसा खज़ाना है जिसे कोई छीन नहीं सकता।
2. पाठ से वे प्रसंग जिनसे पता चलता है कि —
वे कथक नर्तक होने के साथ-साथ गाते-बजाते (तबला, हारमोनियम) थे, संगीत व नृत्य-नाटिकाएँ रचते थे, चित्रकारी करते थे (~70 चित्र), और मशीनें ठीक कर लेते थे। ये सब उनकी बहुमुखी प्रतिभा के प्रमाण हैं।
“संघर्षों के दौर में मेरी सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ थीं।” उन्होंने कर्ज लेकर, पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर सोने-चाँदी के तार बेचकर गुजारा किया; बार-बार कहतीं — “खाने को चना मिले या कुछ भी न मिले, पर अभ्यास जरूर करो।” तालीम शुरू होने पर उन्होंने अपने दो कार्यक्रमों की कमाई भेंट के रूप में दी।
“मेरी बहनों को कथक नहीं सिखाया गया, पर मैंने अपनी बेटियों को खूब सिखाया।” वे कहते हैं कि लड़कियों के पास भी हुनर होना चाहिए ताकि वे आत्मनिर्भर बनें। उनकी शिष्या शोभना नारायण (आई.ए.एस. अफसर और अच्छी नर्तकी) का उल्लेख भी इसी सोच को दर्शाता है।
(क) मूल शब्द के आगे जुड़ने वाला अंश उपसर्ग और पीछे जुड़ने वाला अंश प्रत्यय कहलाता है।
| उपसर्ग (आगे) | प्रत्यय (पीछे) |
|---|---|
| अदृश्य = अ + दृश्य आवरण = आ + वरण प्रशिक्षण = प्र + शिक्षण |
सीमित = सीमा + इत सुंदरता = सुंदर + ता भारतीय = भारत + ईय सामूहिक = समूह + इक |
(ख) दो तबलों (उपसर्ग/प्रत्यय + मूल शब्द) की सहायता से बने नए शब्द
| मूल शब्द + अंश | नया शब्द |
|---|---|
| आ + गमन | आगमन |
| सु + नाम | सुनाम |
| सु + कर्म | सुकर्म |
| राष्ट्र + ईय | राष्ट्रीय |
| श्रम + इक | श्रमिक |
| संस्कृति + इक | सांस्कृतिक |
| साधारण + ता | साधारणता |
| मर्म + इक | मार्मिक |
| खंड + इत | खंडित |
| नाम + इत | नामित |
(ग) पाठ में से उपसर्ग/प्रत्यय से बने कुछ और शब्द + वाक्य
- आर्थिक — बाबूजी के देहांत के बाद परिवार को आर्थिक परेशानियाँ हुईं।
- प्रशिक्षण — गुरु से नियमित प्रशिक्षण लेना आवश्यक है।
- सामूहिक — लोक नृत्य एक सामूहिक कला है।
- शास्त्रीय — कथक भारत का एक शास्त्रीय नृत्य है।
- आत्मनिर्भर — हुनर व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाता है।
‘इतना’ हटाने पर वाक्य बनता है — “…कला में दम था कि डाकू…मग्न हो गए।” अब वाक्य से अतिशयता/बल का भाव कम हो जाता है। ‘इतना’ शब्द बताता है कि कला में दम इस हद तक था कि डाकू भी सब भूलकर मुग्ध हो गए — यह प्रभाव ‘इतना’ के बिना फीका पड़ जाता है।
विशेष प्रभाव देने वाले कुछ और शब्द (रेखांकित):
“आठ-आठ सिपाहियों का पहरा”, “अम्मा बार-बार कहतीं”, “फिल्मी गाने खूब गाता था”, “नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा”, “कतई नहीं करता”, “अभ्यास ज़रूर करो”, “सबसे बड़ी सहयोगी”।
पाठ से आगे
Exercise — पाठ से आगे की सभी गतिविधियाँ व अभ्यास- चाचा-बाबूजी के खड़े होने के निराले अंदाज़ और भाव-भंगिमाओं को कथक में शामिल किया।
- टैगोर, त्यागराज आदि आधुनिक कवियों की रचनाओं पर नई कथक रचनाएँ बनाईं।
- पहले दृश्यों का विस्तृत वर्णन होता था; अब संकेत देकर (‘पनघट की गत देखो’) बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।
- पहले मंच नहीं होता था — फर्श पर चाँदनी (सफेद चादर) बिछती थी और दर्शक चारों ओर बैठते थे; अब मंच पर प्रस्तुति होती है।
- शृंगार में बदलाव (पहले चंदनलेप और पान से होंठ रंगना)।
परंपरा तो कायम रखी, पर प्रस्तुतीकरण को समय के अनुसार निखारा।
| आधार | लोक नृत्य | शास्त्रीय नृत्य |
|---|---|---|
| प्रकृति | सामूहिक (कई लोग साथ) | एक नर्तक अकेला ही काफ़ी |
| उद्देश्य | अपने मन-बहलाव व संतुष्टि, मनोरंजन | दर्शकों के लिए प्रस्तुति |
| अवसर | थकान दूर करने, उत्सव, फसल-कटाई | निश्चित शैली-नियमों पर आधारित मंच-प्रस्तुति |
| स्वरूप | अनौपचारिक | खास शैली व रूप निश्चित (साधना आवश्यक) |
शुरू में कथावाचक भी लोक नर्तक हुआ करता था; धीरे-धीरे शैली-रूप निश्चित होने पर वह शास्त्रीय नृत्य बन गया।
पाठ में हरिया गाँव के कथिकों की कला से जुड़ा यह लोकपद दिया है:
नौ कथिक नचावें तीन चोर।
जब तबला बोले धीन-धीन,
तब एक-एक पर तीन-तीन।
यह गतिविधि है — आप अपने क्षेत्र/भाषा का कोई प्रचलित लोकगीत (जैसे कोई त्योहार, फसल या विवाह का गीत) कक्षा में सुनाइए और बताइए कि वह किस अवसर पर गाया जाता है।
‘साक्षात्कार’ भेंटवार्ता जैसा लगता है, पर इसका एक निश्चित उद्देश्य और ढाँचा होता है। यह किसी नौकरी वाले साक्षात्कार से भिन्न, व्यक्तिपरक साक्षात्कार है जो व्यक्ति के जीवन, कामकाज, रुचि-अरुचि व विचार पाठकों तक लाता है।
- बिरजू महाराज के जीवन, कला व उपलब्धियों पर पूरी जानकारी/शोध जुटाया।
- क्रमबद्ध प्रश्नों की सूची बनाई (बचपन → गुरु → कथक का इतिहास → बदलाव → रुचियाँ)।
- बातचीत का ढाँचा तय किया; संवेदनशीलता और धैर्य रखा।
- समय, स्थान और रिकॉर्डिंग/लेखन की व्यवस्था की।
- आपकी सबसे यादगार प्रस्तुति कौन-सी रही?
- विदेशों में दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती थी?
- आपका पसंदीदा ताल कौन-सा है और क्यों?
- नए/युवा नर्तकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
प्रश्न सरल, सम्मानजनक और उनके जीवन-अनुभव पर केंद्रित होंगे, जैसे:
- आपका एक दिन कैसे बीतता है?
- इस काम में सबसे बड़ी कठिनाई क्या है और आप उसे कैसे संभालते हैं?
- इस काम में आपको सबसे अच्छा क्या लगता है?
- आप अपने बच्चों के लिए क्या सपने देखते हैं?
- कथक ब्रजभूमि की रासलीला से उत्पन्न, ‘कथिक’ (कथावाचक) शब्द से बना एक शास्त्रीय नृत्य है।
- यह लय, ताल और भाव-भंगिमा पर आधारित है; कथिक कथाओं को नाच व अभिनय से कहते थे।
- इसके प्रमुख घराने हैं — लखनऊ, जयपुर और बनारस।
- तबलावादक और नर्तक की जुगलबंदी इसका मुख्य आकर्षण है।
🎶 कथक संध्या 🎶
हमारे विद्यालय में भव्य कथक नृत्य कार्यक्रम!
📅 दिनांक: __ | 🕕 समय: __ | 📍 स्थान: विद्यालय सभागार
लय, ताल और भाव-भंगिमा का अद्भुत संगम देखिए। प्रवेश निःशुल्क — सभी सादर आमंत्रित हैं!
- नृत्य का सजीव ध्वनि-वर्णन (ऑडियो कमेंट्री) हो, ताकि वे मुद्राओं व कथा को ‘सुनकर’ समझ सकें।
- घुँघरू व तबले की ध्वनि स्पष्ट सुनाई दे; बैठने की व्यवस्था आगे की पंक्ति में हो।
- कार्यक्रम-विवरण ब्रेल में उपलब्ध हो; एक सहायक साथ रहे।
- प्रस्तुति से पहले नृत्य की कथा संक्षेप में समझा दी जाए।
डायरी में छिपे संगीत के तालों के नाम शब्द-पहेली में से ढूँढ़े गए (नारंगी घेरे वाले अक्षर):
| ती | झ | रू | ल | भ | ति |
| न | च | प | क्ष्मी | क | ल |
| म | ल | क | ह | र | वा |
| ल | इ | झू | म | रा | ड़ा |
| दी | प | चं | दी | दा | त |
| ड़ | च | क | र | द | ढ़ |
| ए | म | ल | घ | रा | क |
बिरजू महाराज ने भारत के जिन प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों का उल्लेख किया, उनका संक्षिप्त परिचय:
| नृत्य शैली | राज्य/क्षेत्र | मुख्य बात |
|---|---|---|
| भरतनाट्यम | तमिलनाडु | सबसे प्राचीन रूप; मंदिर नर्तकों की एकल प्रस्तुति ‘सादिर’ से संबंध। |
| कथकली | केरल/दक्षिण भारत | रामायण-महाभारत की कथाएँ; पुरुष मंडली द्वारा; भाव-भंगिमा व आँख-भौंह संचालन प्रमुख। |
| कथक | उत्तर भारत (लखनऊ आदि) | ब्रज की रासलीला से उत्पन्न; घरानों का विकास; तबला-नर्तक की जुगलबंदी। |
| कुचिपुड़ी | आंध्र प्रदेश | प्रार्थना से आरंभ; कर्नाटक संगीत की संगत; तरंगम प्रस्तुति से समापन। |
| मणिपुरी | मणिपुर (उत्तर-पूर्व) | शिव-पार्वती का दैवीय नृत्य; ‘लाई हरोबा’ त्योहार; हाथ के हाव-भाव व पैरों की गति। |
| ओडिसी | ओडिशा | ‘सोदा नृत्य’ से नाम; त्रिभंग मुद्रा (शरीर का तीन मोड़) मुख्य आकर्षण। |
| मोहिनीअट्टम | केरल | घुमावदार कोमल आंगिक अभिनय; ‘मुंडू’ पोशाक; परंपरागत रूप से केवल स्त्रियाँ। |
यह समूह-गतिविधि है। ऊपर दी गई “नृत्य की छटाएँ” तालिका आपके काम आएगी। मानचित्र में इस तरह अंकित कर सकते हैं:
| राज्य | शास्त्रीय नृत्य | प्रसिद्ध लोक नृत्य |
|---|---|---|
| तमिलनाडु | भरतनाट्यम | कुम्मी, करगाट्टम |
| केरल | कथकली, मोहिनीअट्टम | तिरुवातिरा |
| उत्तर प्रदेश | कथक | राई, चरकुला |
| आंध्र प्रदेश | कुचिपुड़ी | धिम्सा |
| मणिपुर | मणिपुरी | थांग-ता |
| ओडिशा | ओडिसी | घुमरा |
| पंजाब | — | भांगड़ा, गिद्धा |
| गुजरात | — | गरबा, डांडिया |
भारतीय नृत्य, संगीत और बिरजू महाराज को और जानने के लिए ये इंटरनेट कड़ियाँ देखी जा सकती हैं:
▶ भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य संगत▶ कथक परिचय — भाग 7
▶ पंडित बिरजू महाराज
यह प्रेरक पूरक-पाठ बताता है कि दृढ़ इच्छाशक्ति से हर बाधा पार की जा सकती है:
- सुधा चंद्रन ने पाँच वर्ष की आयु से ‘कला-सदन’ में कथक/भरतनाट्यम सीखना शुरू किया और जल्दी ही प्रतिभाशाली नर्तकी बनीं।
- 2 मई 1981 को एक बस दुर्घटना में उनका दायाँ पैर घुटने के नीचे से काटना पड़ा — किसी भी नर्तकी के लिए यह जीवन का अंत जैसा था।
- डॉ. पी.सी. सेठी ने उनके लिए विशेष ‘जयपुर फुट’ (कृत्रिम पैर) बनाया। कठोर अभ्यास से — कटे पैर से खून रिसने पर भी — उन्होंने फिर से नृत्य करना सीखा।
- 28 जनवरी 1984 को उन्होंने दुबारा सार्वजनिक प्रदर्शन किया और सफल रहीं; तेलुगु फिल्म ‘मयूरी’ (हिंदी में ‘नाचे मयूरी’) में अपना ही जीवन जीवंत कर 33वें राष्ट्रीय फिल्म समारोह में विशेष पुरस्कार पाया।
संदेश: “प्रयास करो तो सब कुछ संभव है” — साहस और अभ्यास से असंभव भी संभव हो जाता है।
— रामाज्ञा तिवारी
