संगच्छध्वं संवदध्वम्
ऋग्वेदस्य प्रसिद्धं ‘संज्ञान-सूक्तम्’ (संघटन-सूक्तम्) आधृत्य रचितः अयं पाठः। अत्र सर्वेषां मन्त्राणाम् अर्थः, शब्दार्थाः, तथा पाठ्यपुस्तकस्य समग्राणि प्रश्नोत्तराणि सरलरूपेण प्रस्तुतानि सन्ति।
ऋग्वेदस्य ‘संज्ञान-सूक्तम्’ — त्रयः मन्त्राः
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥ १ ॥
पदच्छेदः
संगच्छध्वम् संवदध्वम् सम् वः मनांसि जानताम् देवाः भागम् यथा पूर्वे संजानानाः उपासते।
अन्वयः
(यूयम्) संगच्छध्वं संवदध्वं वः मनांसि संजानताम्। यथा पूर्वे देवाः भागं संजानानाः उपासते।
भावार्थः (सरलरूपेण)
हे मानवाः! तुम्हें सब मिलकर आगे बढ़ना चाहिए (संगच्छध्वम्), आपस में एक स्वर से — सहमतिपूर्वक — बोलना चाहिए (संवदध्वम्), तथा एक-दूसरे के मनोभावों को भली-भाँति समझना चाहिए (मनांसि जानताम्)। जिस प्रकार सृष्टि के आरम्भकाल में देवगण (ब्रह्माण्डीय शक्तियाँ) परस्पर उत्कृष्ट समन्वय के साथ अपने-अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करते थे, उसी प्रकार मनुष्यों को भी अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की उन्नति हेतु मिलकर, मतभेद त्यागकर कार्य करना चाहिए।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥
पदच्छेदः
समानः मन्त्रः समितिः समानी समानम् मनः सह चित्तम् एषाम् समानम् मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन वः हविषा जुहोमि।
अन्वयः
एषां मन्त्रः समानः, समितिः समानी, मनः समानं, चित्तं सह (अस्तु)। वः समानं मन्त्रम् अभिमन्त्रये वः समानेन हविषा जुहोमि।
भावार्थः (सरलरूपेण)
एक ही कार्य में लगे हुए इन सबका चिन्तन (विचार) परस्पर सौहार्दपूर्ण हो, इनका लक्ष्य (सभा/समिति) समान हो, मन एक-सा प्रसन्नतापूर्ण हो, तथा बुद्धिजन्य ज्ञान भी एकीभूत हो। हे मनुष्यो! तुम्हारे परस्पर विचार-विमर्श व संगठन के संकल्प को मैं दिव्यभाव से जोड़कर प्रकट करता हूँ, तथा तुम सबकी सामूहिक प्रार्थना द्वारा ज्ञान-यज्ञ सम्पन्न करता हूँ।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ ३ ॥
पदच्छेदः
समानी वः आकूतिः समाना हृदयानि वः समानम् अस्तु वः मनः यथा वः सु सह असति।
अन्वयः
(हे मानवाः!) वः आकूतिः समानी (अस्तु)। वः हृदयानि समाना (सन्तु)। यथा वः सह सु असति, (तथा) वः मनः समानम् अस्तु।
भावार्थः (सरलरूपेण)
हे मनुष्यो! तुम्हारा संकल्प समान हो, तुम्हारे हृदय परस्पर सामरस्यपूर्ण हों। जिस प्रकार तुम्हारा आपसी संगठन सुशोभन व उत्कृष्ट हो, उसी प्रकार तुम्हारा मन भी सामञ्जस्ययुक्त व एकरूप हो। इसी से ही परिवार, समाज, राष्ट्र व विश्व में सुख, शान्ति व मैत्रीभाव विराजमान रहते हैं, तथा जीवन में प्रसन्नता, उत्साह, आयु, आरोग्य, विजय, समृद्धि, धर्म, ज्ञानप्राप्ति व आत्मतृप्ति प्राप्त होती है।
वयं शब्दार्थान् जानीमः
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| संगच्छध्वम् | मिलित्वा गच्छत | मिलकर चलो | May you walk together |
| संवदध्वम् | एकस्वरेण वदत | सहमतिपूर्वक बोलें | May you speak in one voice |
| समवेतस्वरेण | सम्मिलितस्वरेण | सम्मिलित ध्वनि से | By chanting in unison |
| मनांसि | चित्तानि | मनों को | Minds |
| जानताम् | जानन्तु | जानें | May you know |
| देवाः | ब्रह्माण्डीय-शक्तयः | सृष्टि की मूलभूत शक्तियाँ | Cosmic / celestial forces |
| संजानानाः | एकमनसः भूत्वा | एक विचार वाले होकर | Being amicable |
| उपासते | सेवन्ते | श्रद्धापूर्वक कर्तव्य निर्वहण | Devotedly performing |
| अभ्युदयम् | अभिवृद्धिः | लौकिक उन्नति | Elevation and prosperity |
| मन्त्रः | विचारः | चिन्तन | Contemplation |
| समितिः | समाना प्राप्तिः | समान सिद्धि | Common resolutions |
| अभिमन्त्रये | संस्कृत्य प्रचारयामि | अभिमन्त्रित करके प्रचारित करता हूँ | Consecrate and propagate |
| हविषा | प्रार्थनापूर्वकेण समर्पणेन | प्रार्थनापूर्वक यज्ञाहुति द्वारा | By oblatory prayers |
| जुहोमि | ज्ञानकर्ममयं यज्ञं साधयामि | दिव्य यज्ञ कर्म को साधता हूँ | Performing divine offerings |
| आकूतिः | सङ्कल्पः | संकल्प | Resolution |
| सुसहासति | सुसंघटितः भवेत् | सुसंघटित हो | May you be united |
| संहिता | मूलमन्त्रपाठः | मूल वैदिक मन्त्र पाठ | Original Vedic text |
| ब्रह्मणा | सृष्टिकर्त्रा | सृष्टि के निर्माता परमात्मा के द्वारा | By the creator of universe |
| निरवहन् | निर्वाहम् अकुर्वन् | निर्वाह किया | Took responsibility |
पाठ्यांश (चित्रकथा) प्रश्नोत्तराणि — In-text Q&A
प्र.क्रीडोत्सवे विद्यार्थिनः विजयं कस्मात् प्राप्तवन्तः? तथा प्रतिद्वन्द्विदलः कस्मात् पराजितः?
प्र.आचार्यमहोदयस्य मतेन विजयप्राप्त्यर्थं किं किम् आवश्यकम्?
प्र.आचार्य! कस्मात् वेदात् गृहीतः एष सन्देशः? कः च अस्य अभिप्रायः?
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सम्पूर्ण उत्तराणि
संज्ञानसूक्तं स्वरं पठत स्मरत लिखत च।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥ १ ॥
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि ॥ २ ॥
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति ॥ ३ ॥
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत
कसर्वेषां मनः कीदृशं भवेत्?
खसङ्गच्छध्वं संवदध्वम् इत्यस्य कः अभिप्रायः?
गसर्वे किं परित्यज्य ऐक्यभावेन जीवेयुः?
घअस्मिन् पाठे का प्रेरणा अस्ति?
रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
कपरमेश्वरः सर्वत्र व्याप्तः अस्ति।
खवयम् ईश्वरं नमामः।
गवयम् ऐक्यभावेन जीवामः।
घईश्वरस्य प्रार्थनया शान्तिः प्राप्यते।
ङअहं समाजाय श्रमं करोमि।
चअयं पाठः ऋग्वेदात् सङ्कलितः।
छवेदस्य अपरं नाम श्रुतिः।
जमन्त्राः वेदेषु भवन्ति।
पट्टिकातः शब्दान् चित्वा अधोलिखितेषु मन्त्रेषु रिक्तस्थानानि पूरयत
देवा भागं यथा पूर्वे सं जानाना उपासते।
समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति।
