व्याकरणम्
यह परिशिष्ट संस्कृत व्याकरण के चार स्तम्भों — उपसर्ग, प्रत्यय, विभक्ति तथा सन्धि — का सुव्यवस्थित, सोदाहरण संग्रह है। यहाँ पाठ्यपुस्तक की सम्पूर्ण सामग्री को स्पष्ट तालिकाओं, चित्रों व स्मरण-सुलभ रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उपसर्गः
| द्वाविंशतिः उपसर्गाः | |||
|---|---|---|---|
| प्र | परा | अप | सम् |
| अनु | अव | निस् | निर् |
| दुस् | दुर् | वि | आङ् |
| नि | अधि | अपि | अति |
| सु | उत् | अभि | प्रति |
| परि | उप | ||
- उपसर्गाः धातोः पूर्वं भवन्ति (उपसर्ग सदैव धातु से पहले लगते हैं)।
- उपसर्गकारणतः कदाचित् धातोः अर्थः परिवर्तते — यथा गच्छति → आगच्छति (जाना → आना)।
- कदाचित् उपसर्गः धातु के अर्थ को केवल उत्कर्ष (बढ़ावा) देता है, विपरीत अर्थ नहीं सूचित करता — यथा शोभते → सुशोभते।
- धातु से पहले दो-तीन उपसर्ग भी लग सकते हैं — यथा प्रति+आ+गच्छति = प्रत्यागच्छति।
- कभी-कभी उपसर्ग के कारण परस्मैपदी धातु आत्मनेपदी बन जाती है, और आत्मनेपदी धातु परस्मैपदी — यथा वि+जयति = विजयते; वि+रमते = विरमति।
उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते।
प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत्॥
प्रत्ययाः (कृत्-प्रत्ययाः)
जब एक ही कर्ता दो कार्य करता है, तब पूर्व-कार्य वाले क्रियापद में ‘क्त्वा’ प्रत्यय लगता है (हिन्दी में ‘कर के’ भाव)।
जब धातु उपसर्ग-युक्त होती है, तब क्त्वा-प्रत्यय के स्थान पर ‘ल्यप्’ प्रत्यय लगता है।
जब प्रथम क्रिया द्वितीय क्रिया का निमित्त (उद्देश्य) बनती है, तब निमित्तार्थक क्रियापद में ‘तुमुन्’ प्रत्यय लगता है (हिन्दी में ‘के लिए’ भाव)।
‘क्तवतु’ प्रत्यय भूतकालार्थ में प्रयुक्त होता है, तथा विशेषणवत् प्रयोग होता है — यह तीनों लिङ्गों में रूप बदलता है।
| धातु + क्तवतु | पुंलिङ्गः | स्त्रीलिङ्गः | नपुंसकलिङ्गः |
|---|---|---|---|
| हस् | हसितवान् | हसितवती | हसितवत् |
| श्रु | श्रुतवान् | श्रुतवती | श्रुतवत् |
| स्था | स्थितवान् | स्थितवती | स्थितवत् |
धातु-प्रत्यय महातालिका (22 धातवः)
| धातुः | लट्-लकारः | क्त्वा | ल्यप् | तुमुन् | क्तवतु (पुं॰) |
|---|---|---|---|---|---|
| पठ् | पठति | पठित्वा | सम्पठ्य | पठितुम् | पठितवान् |
| खाद् | खादति | खादित्वा | प्रखाद्य | खादितुम् | खादितवान् |
| हस् | हसति | हसित्वा | विहस्य | हसितुम् | हसितवान् |
| लिख् | लिखति | लिखित्वा | विलिख्य | लेखितुम् | लिखितवान् |
| पा | पिबति | पीत्वा | निपाय | पातुम् | पीतवान् |
| गम् | गच्छति | गत्वा | आगत्य | गन्तुम् | गतवान् |
| त्यज् | त्यजति | त्यक्त्वा | परित्यज्य | त्यक्तुम् | त्यक्तवान् |
| नी | नयति | नीत्वा | आनीय | नेतुम् | नीतवान् |
| कृ | करोति | कृत्वा | अनुकृत्य | कर्तुम् | कृतवान् |
| घ्रा | जिघ्रति | घ्रात्वा | आघ्राय | घ्रातुम् | घ्रातवान् |
| स्था | तिष्ठति | स्थित्वा | प्रस्थाय | स्थातुम् | स्थितवान् |
| नम् | नमति | नत्वा | प्रणम्य | नन्तुम् | नतवान् |
| स्मृ | स्मरति | स्मृत्वा | संस्मृत्य | स्मर्तुम् | स्मृतवान् |
| लुण्ठ् | लुण्ठति | लुण्ठित्वा | विलुण्ठ्य | लुण्ठितुम् | लुण्ठितवान् |
| ज्ञा | जानाति | ज्ञात्वा | विज्ञाय | ज्ञातुम् | ज्ञातवान् |
| क्षाल् | क्षालयति | क्षालयित्वा | प्रक्षाल्य | क्षालयितुम् | क्षालितवान् |
| दा | ददाति | दत्त्वा | प्रदाय | दातुम् | दत्तवान् |
| दृश् | पश्यति | दृष्ट्वा | प्रदृश्य | द्रष्टुम् | दृष्टवान् |
| प्रच्छ् | पृच्छति | पृष्ट्वा | प्रपृच्छ्य | प्रष्टुम् | पृष्टवान् |
| ग्रह् | गृह्णाति | गृहीत्वा | सङ्गृह्य | ग्रहीतुम् | गृहीतवान् |
| वद् | वदति | उदित्वा | प्रोद्य | वदितुम् | उदितवान् |
| क्रीड् | क्रीडति | क्रीडित्वा | प्रक्रीड्य | क्रीडितुम् | क्रीडितवान् |
विभक्तिः
Case Endings — Karaka, Sambandha, Sambodhana, Upapada(क) कारक-विभक्तिः
कर्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च।
अपादानाधिकरणे इत्याहुः कारकाणि षट्॥
| क्र. | कारकम् | परिभाषा | विभक्तिः | उदाहरणम् |
|---|---|---|---|---|
| १ | कर्ता | जो क्रिया को सम्पन्न करता है | प्रथमा | रामः गच्छति। |
| २ | कर्म | क्रिया-सम्पादन में कर्ता को जो सर्वाधिक इष्ट हो | द्वितीया | रामः वनं गच्छति। |
| ३ | करणम् | क्रिया-सम्पादन में सर्वाधिक सहायक साधन | तृतीया | रामः पुष्पकविमानेन अयोध्यां गच्छति। |
| ४ | सम्प्रदानम् | दान-कर्म द्वारा जिससे सम्बन्ध स्थापित हो | चतुर्थी | गुरुः शिष्याय ज्ञानं ददाति। |
| ५ | अपादानम् | जहाँ से पदार्थ का पृथक्करण हो | पञ्चमी | वृक्षात् पत्रं पतति। |
| ६ | अधिकरणम् | क्रिया के कारक का आधार | सप्तमी | छात्राः विद्यालये पठन्ति। |
(ख) सम्बन्ध-विभक्तिः
कारक से भिन्न स्व-स्वामि-भाव आदि सम्बन्ध शेष कहलाता है, जहाँ षष्ठी विभक्ति प्रयुक्त होती है।
(ग) सम्बोधन-विभक्तिः
जब किसी को सम्बोधित किया जाता है, तब सम्बोधन-विभक्ति होती है। यह प्रथमा-विभक्ति का ही रूपान्तर है — केवल एकवचन में भेद होता है; द्विवचन व बहुवचन में प्रथमा-विभक्ति जैसा ही रूप रहता है।
| शब्दः | एकवचने | द्विवचने | बहुवचने |
|---|---|---|---|
| राम | हे राम ! | हे रामौ ! | हे रामाः ! |
| सीता | हे सीते ! | हे सीते ! | हे सीताः ! |
(घ) उपपद-विभक्तिः
क्रियापद को छोड़कर अन्य किसी विशिष्ट पद के आश्रय से प्रवृत्त विभक्ति ‘उपपद-विभक्ति’ कहलाती है।
| उपपदम् | उदाहरणम् | विभक्तिः |
|---|---|---|
| परितः | ग्रामं परितः उद्यानम् अस्ति। | द्वितीया |
| उभयतः | मार्गम् उभयतः वृक्षाः सन्ति। | द्वितीया |
| सह | पिता पुत्रेण सह आगच्छति। | तृतीया |
| अलम् | अलं कोलाहलेन। | तृतीया |
| नमः | गुरवे नमः। | चतुर्थी |
| बहिः | ग्रामात् बहिः राजमार्गः अस्ति। | पञ्चमी |
| उपरि | मन्दिरस्य उपरि ध्वजः अस्ति। | षष्ठी |
| अधः | वृक्षस्य अधः बालकाः क्रीडन्ति। | षष्ठी |
सन्धिः
Euphonic Combination — Vowel and Consonant Sandhi(क) स्वर-सन्धिः
ए, ऐ, ओ, औ के बाद यदि कोई स्वर आए, तो इनके स्थान पर क्रमशः अय्, आय्, अव्, आव् हो जाते हैं।
| नियमः | परिणामः |
|---|---|
| ए + स्वरः | ⇒ अय् + स्वरः |
| ऐ + स्वरः | ⇒ आय् + स्वरः |
| ओ + स्वरः | ⇒ अव् + स्वरः |
| औ + स्वरः | ⇒ आव् + स्वरः |
पदान्त ‘ए, ओ’ के बाद यदि ‘अ’ आए, तो ‘ए+अ’ के स्थान पर पूर्वरूप (ए) तथा ‘ओ+अ’ के स्थान पर पूर्वरूप (ओ) एकादेश होता है — तथा ‘ऽ’ चिह्न लगाया जाता है।
(ख) व्यञ्जन-सन्धिः
स-कार का श-कार अथवा च-वर्ग से योग होने पर स-कार श-कार बनता है; त-वर्ग का श-कार/च-वर्ग से योग होने पर त-वर्ग च-वर्ग बनता है।
पदान्त वर्गीय व्यञ्जन (पञ्चम वर्ण छोड़कर) के बाद स्वर अथवा मृदु-व्यञ्जन आए, तो वह उसी वर्ग का तृतीय व्यञ्जन बन जाता है।
पदान्त में स्थित म् के बाद व्यञ्जन आए, तो म् अनुस्वार (ं) बन जाता है।
अनुस्वार के बाद वर्गीय व्यञ्जन आएँ, तो अनुस्वार के स्थान पर उसी वर्ग का पञ्चम वर्ण आदेश होता है (शब्द के मध्य में नित्य, पदान्त में विकल्प से)।
विकल्पेन: गृहं+गच्छ=गृहङ्गच्छ / गृहं गच्छ, त्वं+करोषि=त्वङ्करोषि / त्वं करोषि
‘ऋ’, ‘र’, ‘ष’ के बाद ‘न’ वर्ण आए, तो ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है — भले ही बीच में स्वर, ह्, य्, व्, कवर्ग या पवर्ग आ जाएँ।
स्वयं-अभ्यासः — त्वरित पुनरावृत्ति
Quick self-test to revise the above rulesवि+जयति उपसर्ग-योगेन किं भवति ?
सम्+पूज्+ल्यप् इति योजयित्वा पदं लिखत।
‘रामः वनं गच्छति’ अत्र ‘वनम्’ कः कारकः, का विभक्तिः ?
‘गुरवे नमः’ अत्र ‘नमः’ पदस्य कारणात् का विभक्तिः भवति ?
नमो + अस्तु इत्यस्य सन्धियुक्तं रूपं लिखत।
जगत्+ईशः इत्यस्य सन्धि-रूपं किं भवति, का सन्धिः ?
राम+अयनम् इत्यस्य सन्धि-रूपं लिखत, का सन्धिः ?
कृ+क्तवतु इति योजयित्वा त्रिषु लिङ्गेषु रूपाणि लिखत।
Prepared for Class 8 Sanskrit (Dipakam) · Appendix 1 — व्याकरणम् · Reference compiled from NCERT textbook content · @EDUGROWN
