गीता सुगीता कर्तव्या
कुरुक्षेत्र में गीता-जयन्ती महोत्सव के अवसर पर पिता-पुत्र (रमेश) के संवाद के माध्यम से श्रीमद्भगवद्गीता के आठ प्रसिद्ध श्लोकों का परिचय दिया गया है। यहाँ संवाद, श्लोक-व्याख्या, शब्दार्थ, व्याकरण-सूत्र, गीता का परिचय (अठारह अध्याय) तथा समग्र प्रश्नोत्तर प्रस्तुत हैं।
पाठ्यांश (संवाद) — पिता-पुत्र संवादः
कुरुक्षेत्र में श्रीगीता-जयन्ती महोत्सव मनाया गया, जहाँ रमेश भी अपने पिता के साथ गया। कथावाचक ने वहाँ गीता के विषय में बताते हुए यह श्लोक कहा — “गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥” अर्थात् गीता को भली-भाँति (अच्छी तरह) पढ़ना चाहिए, अन्य विस्तृत शास्त्रों से क्या लाभ, जबकि गीता स्वयं भगवान् (पद्मनाभ) के मुखकमल से निकली हुई है।
प्र.यह श्लोक सुनकर रमेश ने अपने पिता से क्या पूछा?
प्र.गीता कस्य उपदेशः अस्ति, इति पिता कथं वर्णयति?
प्र.“सुगीता कर्तव्या” इत्यस्य कः आशयः, इति रमेशेन पृष्टे पिता किम् उत्तरति?
श्रीमद्भगवद्गीतायाः अष्टौ श्लोकाः — पदच्छेद, अन्वय, भावार्थ सहित
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
पदच्छेदः
दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः स्थितधीः मुनिः उच्यते।
अन्वयः
दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः मुनिः स्थितधीः (इति) उच्यते।
भावार्थः
जो मनुष्य आपत्ति (दुःख) के समय उद्वेग (व्याकुलता) का अनुभव नहीं करता, जो सुख प्राप्ति के प्रति भी निःस्पृह (इच्छारहित) रहता है, तथा जो इच्छा, आसक्ति, भय और क्रोध — इन सबसे मुक्त होता है, वह मौन (स्थिर) पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥
पदच्छेदः
क्रोधात् भवति सम्मोहः। सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः। बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।
अन्वयः
क्रोधात् सम्मोहः भवति। सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः (भवति)। स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः (भवति)। बुद्धिनाशात् (जनः) प्रणश्यति।
भावार्थः
मनुष्य को जब क्रोध आता है, तब क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है। अविवेक से वह स्वयं को भूल जाता है (आत्मविस्मृति)। क्या योग्य है और क्या अयोग्य, इसका विचार किए बिना ही वह क्रोध से व्यामोह को प्राप्त होता है। जब अधिक व्यामोह होता है, तब मनुष्य की स्मृति निष्क्रिय व नष्ट हो जाती है। स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट हो जाती है, और बुद्धि के नाश से वह मनुष्य विनाश को प्राप्त होता है।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
पदच्छेदः
तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम् ज्ञानिनः तत्त्वदर्शिनः।
अन्वयः
तद् प्रणिपातेन सेवया परिप्रश्नेन विद्धि। ते तत्त्वदर्शिनः ज्ञानिनः ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति।
भावार्थः
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं — हे अर्जुन! तुम गुरु के समीप जाकर यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करो। तुम विनम्र व जिज्ञासु होकर गुरु की सेवा करो। तत्त्वज्ञानी गुरु तुम्हें ज्ञान प्रदान करेंगे, क्योंकि जिन्होंने सत्य का दर्शन किया है, वे ही यथार्थ ज्ञानी होते हैं।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
पदच्छेदः
श्रद्धावान् लभते ज्ञानम् तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानम् लब्ध्वा पराम् शान्तिम् अचिरेण अधिगच्छति।
अन्वयः
संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते। तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।
भावार्थः
जो श्रद्धालु मनुष्य दिव्यज्ञान प्राप्त करने का निरन्तर प्रयास करता है, तथा जिसने अपनी इन्द्रियों को अपने वश में कर लिया है, वह मनुष्य दिव्यज्ञान प्राप्त करता है। ऐसा दिव्य ज्ञान प्राप्त करके वह पुरुष जीवन में अनन्त आनन्द प्राप्त करता है।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
पदच्छेदः
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणः एव च निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।
अन्वयः
(यः) सर्वभूतानाम् अद्वेष्टा मैत्रः च करुणः एव निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी (अस्ति, सः एव मम प्रियः भवति)।
भावार्थः
हे अर्जुन! जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, जो ईर्ष्यारहित होकर समस्त प्राणियों के प्रति मित्रभाव व दयालु होता है, जो ममत्वरहित, अहंकारविहीन, सुख-दुःख में समभाव रखने वाला व क्षमाशील होता है — ऐसा पुरुष भगवान् का अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
पदच्छेदः
सन्तुष्टः सततम् योगी यतात्मा दृढनिश्चयः मयि अर्पितमनोबुद्धिः यः मद्भक्तः सः मे प्रियः।
अन्वयः
यः योगी सततं सन्तुष्टः यतात्मा दृढनिश्चयः मयि (च) अर्पितमनोबुद्धिः (भवति), सः मद्भक्तः मे प्रियः (भवति)।
भावार्थः
हे पार्थ! जो निरन्तर सन्तुष्ट रहता है, अर्थात् किसी भी वस्तु के अभाव से कभी असन्तुष्ट नहीं होता, जो मन व इन्द्रियों को जीतकर संयमी होता है, जो अपनी बुद्धि से परमेश्वर के स्वरूप को स्थिर रूप से समझता है, तथा जो अपना मन व बुद्धि ईश्वर को समर्पित करता है — वह मनुष्य मेरा अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
पदच्छेदः
यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च यः हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः यः सः च मे प्रियः।
अन्वयः
यस्मात् लोकः न उद्विजते, यः च लोकात् न उद्विजते, यः च हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः सः मे प्रियः (भवति)।
भावार्थः
हे अर्जुन! जिस मनुष्य से कोई भी अन्य मनुष्य या प्राणी उद्विग्न नहीं होता, तथा जो स्वयं भी किसी अन्य से उद्विग्न नहीं होता, तथा जो हर्ष, ईर्ष्या, भय व चिन्ता से रहित होता है — वह मेरा अत्यन्त प्रिय भक्त होता है।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
पदच्छेदः
अनुद्वेगकरम् वाक्यम् सत्यम् प्रियहितम् च यत् स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव वाङ्मयम् तपः उच्यते।
अन्वयः
यद् वाक्यम् अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियहितं च (तथा) स्वाध्यायाभ्यसनं च एव वाङ्मयं तपः उच्यते।
भावार्थः
जो भाषण उद्वेगरहित (व्याकुलता न फैलाने वाला), सत्य, प्रियकर व हितकर हो, वह वाङ्मय तप कहलाता है। शास्त्रों का स्वाध्याय व उनका अभ्यास ‘वाचिक तप’ कहा जाता है। अतः विद्यार्थियों को स्मरण रखना चाहिए — “प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः, तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचनेन का दरिद्रता।” अर्थात् प्रिय वचन बोलने से सब प्राणी प्रसन्न होते हैं, अतः वही बोलना चाहिए — वचन बोलने में कैसी दरिद्रता (कंजूसी)?
वयं शब्दार्थान् जानीमः
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| महोत्सवः | पर्व | त्यौहार | Festival |
| कथावाचकः | उपन्यासकः | कथा वाचक | The narrator |
| सुगीता | गानमयी | अच्छी तरह से गाई जाने वाली | Melodious song |
| युद्धपराङ्मुखम् | युद्ध-विमुखम् | युद्ध विमुख | The war-averse |
| अमृततुल्याः | अमृतेन सदृशाः | अमृत के समान | Like nectar |
| अनुद्विग्नमनाः | यस्य मनः विचलितं न भवति | अविचलित मन वाला | Person of tranquil mind |
| विगतस्पृहः | अनुरागरहितः | आसक्ति रहित | Detached |
| वीत-राग-भय-क्रोधः | वीतः रागः भयं क्रोधः यस्य | वासना, भय और क्रोध से रहित | Free from attachment, fear and anger |
| स्थितधीः | स्थिरमतिमान् | स्थिर मन वाला | Steady-minded |
| मुनिः | यतिः | तपस्वी | The sage |
| सम्मोहः | किंकर्तव्यविमूढता | कर्तव्य-अकर्तव्य का अविवेक | Delusion |
| स्मृतिविभ्रमः | स्मृतिनाशः | स्मरणशक्ति का नाश होना | Loss of memory |
| श्रद्धावान् | श्रद्धालुः | श्रद्धा से युक्त | Devoted |
| संयतेन्द्रियः | इन्द्रियसंयमी | संयमित इन्द्रियों वाला | One who has controlled his senses |
| प्रणिपातेन | नमस्कारेण | प्रणाम के द्वारा | By bowing down |
| परिप्रश्नेन | पुनः पुनः प्रश्नकरणेन | प्रश्नों के द्वारा | By questioning (with humility) |
| उपदेक्ष्यन्ति | उपदेशं प्रदास्यन्ति | उपदेश देंगे | They will preach |
| तत्त्वदर्शिनः | दार्शनिकाः | तत्त्वज्ञानी | Those who have realized the Truth |
| विद्धि | जानीहि | तुम जानो | (Let you) know |
| अद्वेष्टा | द्वेषरहितः | द्वेष न करने वाला | One who never hates |
| सर्वभूतानाम् | सर्वेषां प्राणिनाम् | सभी प्राणियों का | Of all beings |
| मैत्रः | मैत्रीपूर्णः | मित्रता के भाव वाला | Friendly |
| करुणः | दयार्द्रचित्तः | करुणावान् | Compassionate |
| निर्ममः | ममत्व-भावनारहितः | ममत्व की भावना से विहीन | Free from the sense of ‘mine’ |
| निरहङ्कारः | गर्वहीनः | अहंकार रहित | Egoless |
| समदुःखसुखः | दुःखेषु सुखेषु च समानभावशीलः | सुख और दुःख में समान भाव वाला | Same in pain and pleasure |
| क्षमी | क्षमावान् | क्षमाशील | Endowed with forbearance |
| उद्विजते | उद्वेगं गच्छति | उद्विग्न होता है | Agitated |
| लोकः | जगत् | संसार | The world |
| हर्षामर्षभयोद्वेगैः | आह्लाद-क्रोध-भय-चिन्तादिभिः | हर्ष, क्रोध, भय और चिन्ताओं से | From joy, impatience, fear and anxiety |
| यतात्मा | संयमी | यति, जिसने इन्द्रियों को वश में किया | Self-restrained |
| दृढनिश्चयः | दृढः निश्चयः यस्य सः | दृढ़ निश्चय वाला | Firmly resolute |
| अर्पितमनोबुद्धिः | अर्पितं मनः बुद्धिः च येन सः | मन और बुद्धि को अर्पित करने वाला | One who has offered mind and intellect |
| अनुद्वेगकरम् | न उद्वेगकरम् | व्याकुलता न करने वाला | Unoffending |
| अभ्यसनम् | अभ्यासः | अभ्यास | Practice |
| वाङ्मयम् | वाचिकम् | वाचिक | Verbal (penance) |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सम्पूर्ण उत्तराणि
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत
ककीदृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते?
खकीदृशः जनः स्थितधीः उच्यते?
गजनः कथं प्रणश्यति?
घजनः कथम् उत्तमां शान्तिं प्राप्नोति?
ङउपदेशप्राप्तये त्रयः उपायाः के भवन्ति?
कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि पूरयत
अधोलिखितानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत
पाठानुसारं समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत
उदाहरणानुसारं पदानि स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत
समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत
श्रीमद्भगवद्गीतायाः विषये पञ्च वाक्यानि लिखत
२. गीता महाभारतस्य भीष्मपर्वणि वर्णिता अस्ति।
३. गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (७००) श्लोकाः च सन्ति।
४. गीतायाः उपदेशाः जीवने सर्वदा उपयोगिनः सन्ति।
५. गीतायाः रचयिता महर्षिः वेदव्यासः अस्ति।
परियोजनाकार्यम्
१कक्षायां श्रीमद्भगवद्गीतानुगुणं ‘स्थितधीः’ इति विषयम् अधिकृत्य ‘मम जीवनलक्ष्यम्’ इत्यस्मिन् विषये परिचर्चां स्थापयतु।
२विविध-धर्माणां धर्मग्रन्थानां नामानि विलिख्य कस्यचित् एकस्य धर्मग्रन्थस्य विवरणं लिखत।
अत्र इदम् अवधेयम्
सप्तमी व पञ्चमी विभक्तेः प्रयोगः
आधारे सप्तमी विभक्तेः प्रयोगः भवति। यथा —
उत्पीठिकायां पुस्तकम् अस्ति। दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः भवेत्। सुखेषु विगतस्पृहः भवेत्।
उत्पत्ति-अर्थे कारणार्थे वा पञ्चमी-विभक्तेः प्रयोगः भवति। यथा —
क्रोधात् सम्मोहः भवति। सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः भवति। स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः भवति।
श्रीमद्भगवद्गीता — परिचयः
भगवतः श्रीकृष्णस्य अर्जुनाय प्रदत्तानां जीवनमूल्यसम्बद्धानाम् उपदेशानां सङ्कलनात्मकः ग्रन्थः अस्ति श्रीमद्भगवद्गीता। महर्षिः वेदव्यासः महाभारतस्य भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतां वर्णितवान्। गीतायाम् अष्टादश अध्यायाः सप्तशतं (७००) श्लोकाः च सन्ति।
भगवद्गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा-जल-लव-कणिका पीता।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा, तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ॥
कर्तव्यदीक्षां च समत्वशिक्षां, ज्ञानस्य भिक्षां शरणागतिञ्च।
ददाति गीता करुणार्द्रभूता, कृष्णेन दत्ता जगतां हिताय ॥
