भगवान् धन्वन्तरिः शुकरूपं धृत्वा सर्वश्रेष्ठं वैद्यं अन्विष्यन् भारतवर्षे भ्रमति। अन्ततः आचार्यः वाग्भटः एव उत्तमं उत्तरं ददाति — हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्। इस पाठ के सभी इनटेक्स्ट व अभ्यास प्रश्नों के विस्तृत व सटीक उत्तर नीचे दिए गए हैं।
पाठ का प्रारम्भिक संवाद-चित्रम् (पाठ्यपुस्तक से) — उष्ण भोजन व आयुर्वेद-नियमों पर परिवार-संवाद
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कथा-प्रवाह-चित्रम् (Story Flow)
धन्वन्तरिः शुकरूपेण भारतवर्षे कथं भ्रमति, इति सचित्रं दर्शितम्
Dhanvantari’s search for the ideal physician — from failed attempts to Vagbhata’s correct answer
महर्षिः भगवान् धन्वन्तरिः — जो आयुर्वेद के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं — यह जानने हेतु कि भारतवर्ष के वैद्य विभिन्न व्याधियों का शमन कैसे करते हैं, एक मनोहर शुक (तोते) का रूप धारण कर प्रतिग्राम भ्रमण करने लगे। वे अनेक प्रख्यात वैद्यों के घर के पास बैठकर बार-बार “कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्?” (कौन नीरोग है?) यह प्रश्न पूछते रहे, परन्तु किसी ने भी इस पक्षी-वाणी पर ध्यान नहीं दिया। अन्त में वे आचार्य वाग्भट की कुटिया के प्रांगण में पहुँचे। वाग्भट ने मधुर वाणी सुनकर तुरन्त उत्तर दिया — “हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्” अर्थात् जो हितकर, सीमित मात्रा में, तथा ऋतु के अनुकूल भोजन करता है, वही सदा स्वस्थ रहता है। सन्तुष्ट होकर धन्वन्तरि ने अपना असली स्वरूप प्रकट किया और वाग्भट को आयुर्वेद पर ग्रन्थ-रचना का आशीर्वाद दिया।
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अधोलिखितान् प्रश्नान् एकपदेन उत्तरत
Answer the following questions in one word
प्रश्न (क)
शुकरूपं कः धृतवान् ?
उत्तरम् : भगवान् धन्वन्तरिः (शुकरूपं धृतवान्)।
व्याख्या : पाठ के आरम्भ में स्पष्ट कहा गया है — “भगवान् धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा प्रतिग्रामम् अभ्रमत्।” अर्थात् आयुर्वेद के अधिष्ठाता देव धन्वन्तरि ने ही सुन्दर तोते का रूप धारण किया था।
व्याख्या : भ्रमण करते समय शुकरूपी धन्वन्तरि अनेक प्रसिद्ध वैद्यों के घर के पास वाले वृक्ष पर बैठकर “कोऽरुक्” शब्द बोलते थे, किन्तु किसी वैद्य ने ध्यान नहीं दिया।
व्याख्या : अन्य वैद्यों से निराश होकर धन्वन्तरि अन्ततः प्रसिद्ध वैद्य वाग्भट की कुटिया के पास पहुँचे, जहाँ उनके प्रश्न का समुचित उत्तर मिला।
प्रश्न (घ)
ऋतवः कति सन्ति ?
उत्तरम् : ऋतवः षट् (६) सन्ति।
व्याख्या : पाठ में वर्णित है — “ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः चेति षट् ऋतवः भवन्ति।” अर्थात् वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त तथा शिशिर — ये छह ऋतुएँ होती हैं।
व्याख्या : जब आश्चर्यचकित शिष्यों ने आचार्य वाग्भट से शुक के “कोऽरुक्” कहने का अर्थ पूछा, तब वाग्भट ने अपने शिष्यों को यह रहस्य बताया कि वह शुक स्वयं भगवान् धन्वन्तरि थे।
The six seasons (ऋतवः) referred to in the ऋतुभुक् principle
व्याख्या : चिकित्सा में व्यस्त वाग्भट ने जब मीठी “कोऽरुक्” ध्वनि सुनी, तो वे तुरन्त आँगन में आकर चारों दिशाओं में देखने लगे कि यह ध्वनि कहाँ से आ रही है।
व्याख्या : उस मनोहर शुक को कोई साधारण पक्षी न समझकर देवविशेष मानते हुए वाग्भट ने तुरन्त उसे मीठे फल भेंट किए। परन्तु शुक ने वे फल ग्रहण न करके पुनः “कोऽरुक्” प्रश्न दोहराया।
व्याख्या : शुक-रहस्य जानने के बाद भी शिष्यों की जिज्ञासा शान्त नहीं हुई, अतः उन्होंने आचार्य वाग्भट से इन तीन शब्दों के गूढ़ार्थ के विषय में पुनः प्रश्न किया, जिसके उत्तर में वाग्भट ने महर्षि चरक के तीन श्लोक सुनाए।
प्रश्न (घ)
भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते संक्षेपेण किं प्रदत्तवान् ?
व्याख्या : अर्थात् सब लोग सुखी हों, सब नीरोग रहें, सब का कल्याण हो और कोई भी दुःख का भागी न बने — यह विश्व-कल्याणकारी प्रार्थना ऋषियों द्वारा प्रतिदिन की जाती है।
वाग्भट की कुटिया के प्रांगण में शुकरूपी धन्वन्तरि — “कोऽरुक्?” कहते हुए (पाठ्यपुस्तक से)
व्याकरण अभ्यासः — विशेष्य-विशेषण
Grammar · Adjective–Noun Agreement
पाठ का व्याकरण-नियम / Grammar Rule
विशेषणम् — जो पद किसी अन्य पद की विशेषता (गुण) बताता है, उसे विशेषण कहते हैं। यथा — ‘उत्तमाः’, ‘मनोहरम्’।
विशेष्यम् — जिस पद की विशेषता बताई जाए, वह विशेष्य पद है। यथा — ‘उत्तमाः वैद्याः’ में ‘वैद्याः’ विशेष्य-पद है।
🔹 विशेष्य का जो लिङ्ग होता है, वही लिङ्ग विशेषण का भी होता है — यथा लौकिकः खगः (पुं॰)।
🔹 विशेष्य का जो वचन होता है, वही वचन विशेषण का भी होता है — यथा उत्तमाः वैद्याः (बहुवचन)।
🔹 विशेष्य की जो विभक्ति होती है, वही विभक्ति विशेषण की भी होती है — यथा मधुरां वाणीम् (द्वितीया)।
“यल्लिङ्गं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेष्यस्य । तल्लिङ्गं तद्वचनं सा च विभक्तिर्विशेषणस्यापि ॥”
Gender, number, and case of the विशेषण always match the विशेष्य it qualifies
४
पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत
Complete the table by picking the correct विशेषण / विशेष्य from the lesson
विशेषणम्
विशेष्यम्
विभिन्नानाम्
व्याधीनाम्
मनोहरम्
शुकरूपम्
विशाले
प्राङ्गणे
चिकित्सानिरतः
वाग्भटः
मधुराणि
फलानि
उत्तमस्य
वैद्यस्य
महर्षेः
चरकस्य
विशेषणम्
विशेष्यम्
प्रख्यातानाम्
वैद्याः
भवनपार्श्वस्थे
वृक्षे
मधुराम्
वाणीम्
लौकिकः
खगः
समुचितम्
उत्तरम्
प्रिय-
शिष्याः
सात्त्विकम्
भोजनम्
नारंगी अक्षरों में दिखाए गए पद ही रिक्त-स्थान की सही पूर्ति हैं — प्रत्येक विशेषण अपने विशेष्य के लिङ्ग, वचन तथा विभक्ति के अनुसार ही चुना गया है (नियम देखें ऊपर)।
जैसे — लौकिकः खगः (“यह लौकिक पक्षी नहीं है” — लौकिकः विशेषण, खगः विशेष्य), पूज्यः देवः (पूज्यः विशेषण, देवः विशेष्य), त्रीणि उत्तराणि (त्रीणि विशेषण अंकवाचक), विशाले प्राङ्गणे (विशाले विशेषण), मधुरया गिरा (मधुरया विशेषण) — इसी प्रकार शेष पद भी पाठ के वाक्यों के आधार पर वर्गीकृत किए गए हैं।
व्याख्या : यह श्लोक दैनिक दिनचर्या का वर्णन करता है — प्रातःकाल उठकर व्यायाम, दाँतों की सफाई, स्वच्छ जल से स्नान तथा भूख लगने पर ही भोजन — ये चारों नियम वाक्य में उल्लिखित बिन्दुओं से पूर्णतः मेल खाते हैं।
व्याख्या : यह श्लोक “ऋतुभुक्” सिद्धान्त से सम्बद्ध है — ऋतु के अनुकूल भोजन करने से ही बल और वर्ण (शारीरिक कान्ति) की वृद्धि होती है, जैसा वाक्य में कहा गया है।
आचार्य वाग्भट अपने शिष्यों को हितभुक्-मितभुक्-ऋतुभुक् का रहस्य समझाते हुए (पाठ्यपुस्तक से)
भगवान् धन्वन्तरिः — आयुर्वेद के अधिष्ठाता देव, जिन्होंने शुकरूप धारण किया था (पाठ्यपुस्तक से)