सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
इस पाठ में नातिनी व पितामही के संवाद के माध्यम से सुभाषितों का परिचय दिया गया है, तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के आठ प्रसिद्ध नीति-श्लोक (विष्णुपुराण, हितोपदेश, भर्तृहरि, चाणक्यनीति आदि से) प्रस्तुत हैं। अत्र संवाद, श्लोकव्याख्या, शब्दार्थाः, व्याकरणसूत्राणि तथा समग्राणि प्रश्नोत्तराणि प्रस्तुतानि सन्ति।
पाठ्यांश (संवाद) — नातिनी-पितामही संवादः
प्र.नातिनी पितामहीं किम् अभ्यर्थयति, पितामही च किम् उत्तरं ददाति?
प्र.नीतिश्लोकाः इति के, तथा सुभाषितानि इति किम् उच्यते?
प्र.सुभाषितपठनेन कः लाभः भवति इति नातिनी पृच्छति — पितामही किम् उत्तरयति?
प्र.सुभाषितपठनस्य महत्त्वं विषये पितामही आदौ किम् उपदिशति?
प्र.कथां श्रुत्वा नातिनी अन्ततः किं निश्चिनोति?
अष्टौ प्रसिद्धनीतिश्लोकाः — पदच्छेद, अन्वय, भावार्थ सहित
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥
पदच्छेदः
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्याः तु ते भारतभूमिभागे स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।
अन्वयः
भारतभूमिभागे (ये) भवन्ति ते धन्याः इति देवाः गीतकानि गायन्ति किल। स्वर्गापवर्गास्पद-मार्गभूते (भारतभूमिभागे) तु (देवाः) सुरत्वात् भूयः पुरुषाः (भवन्ति)।
भावार्थः
जो मनुष्य इस भारतभूमि पर जन्म लेते हैं, वे धन्य हैं — ऐसा गीत देवता गाते हैं। अतः हम सभी भारतीय भाग्यशाली हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति के मार्गस्वरूप इस भूखण्ड में देवता भी देवत्व छोड़कर मनुष्यरूप में जन्म लेने की इच्छा करते हैं।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥
पदच्छेदः
गुणी गुणम् वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः। बली बलम् वेत्ति न वेत्ति निर्बलः। पिकः वसन्तस्य गुणम् न वायसः। करी च सिंहस्य बलम् न मूषकः।
अन्वयः
गुणी गुणं वेत्ति। निर्गुणः (गुणं) न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः (बलं) न वेत्ति। पिकः वसन्तस्य गुणं वेत्ति, वायसः (वसन्तस्य गुणं) न वेत्ति। करी च सिंहस्य बलं वेत्ति। मूषकः (सिंहस्य बलं) न वेत्ति।
भावार्थः
गुणवान् व्यक्ति ही दूसरों के अच्छे गुणों को पहचान सकता है, परन्तु गुणहीन व्यक्ति दूसरों के गुणों को समझने में समर्थ नहीं होता। बलवान् ही दूसरे के बल को जान सकता है, निर्बल नहीं। वसन्त ऋतु आने पर कोयल उसके अनुरूप मधुर कूजन करती है, परन्तु कौआ मधुर स्वर में गा नहीं सकता। हाथी सिंह के बल को जानता है, परन्तु चूहा सिंह के बल को जान नहीं पाता। अतः योग्य व्यक्ति ही महत्त्व को जानने में समर्थ होता है, अयोग्य नहीं।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम् ॥
पदच्छेदः
भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एव एषः परोपकारिणाम्।
अन्वयः
तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति। घनाः नवाम्बुभिः दूरविलम्बिनः (भवन्ति)। सत्पुरुषाः समृद्धिभिः अनुद्धताः (भवन्ति)। परोपकारिणाम् एष एव स्वभावः (भवति)।
भावार्थः
समय आने पर वृक्षों में फल लगते हैं, तो फलों के भार से वे झुक जाते हैं। इसी प्रकार नये जल से भरे बादल भी झुककर धरती के निकट आते हैं और वृष्टि करते हैं। संसार में बहुत से परोपकारी लोग होते हैं — वे समृद्धि (सम्पन्नता) के समय भी अभिमान नहीं दिखाते, अपितु सहृदय व विनम्र रहकर सदैव परोपकार में तत्पर रहते हैं। महर्षि व्यास ने भी कहा है — ‘परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्’ (परोपकार पुण्य के लिए, दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए होता है)।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा ॥
पदच्छेदः
यथा चतुर्भिः कनकम् परीक्ष्यते निघर्षण-च्छेदन-ताप-ताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा।
अन्वयः
यथा निघर्षण-छेदन-ताप-ताडनैः चतुर्भिः (उपायैः) कनकं परीक्ष्यते। तथा कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा (च) चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते।
भावार्थः
जैसे स्वर्णकार सोने की शुद्धता जानने के लिए पहले उसे कसौटी पर घिसता है, फिर काटता है, फिर आग में तपाता है, और अन्त में स्वर्णखण्ड पर आघात करता है — इन चार विधियों से सोने की पूर्ण शुद्धता ज्ञात होती है। उसी प्रकार पुरुष (व्यक्ति) की भी चार बातों से परीक्षा होनी चाहिए — वह किस कुल में जन्मा है, उसका स्वभाव कैसा है, वह किन गुणों से युक्त है, और वह कैसे कर्मों से सर्वत्र सम्मानित होता है — इन चार कसौटियों पर परखकर ही उसके व्यक्तित्व को जाना जा सकता है।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥
पदच्छेदः
अष्टौ गुणाः पुरुषम् दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यम् च दमः श्रुतम् च। पराक्रमः च अबहुभाषिता च दानम् यथाशक्ति कृतज्ञता च।
अन्वयः
प्रज्ञा कौल्यं दमः श्रुतं पराक्रमः अबहुभाषिता च यथाशक्ति दानं कृतज्ञता च (इत्येते) अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति।
भावार्थः
आठ गुणों से युक्त मनुष्य समाज में सदा सम्मान प्राप्त करता है — विशेष ज्ञान (प्रज्ञा), कुलीनता, इन्द्रिय-संयम, शास्त्रों का ज्ञान, पराक्रम, मित (कम व सार्थक) भाषण, सामर्थ्य के अनुसार दानशीलता, तथा कृतज्ञता — ये आठ गुण हैं। मनुष्य इन उत्तम गुणों का आश्रय लेकर ही सम्मानित होता है। इसीलिए कहा गया है — ‘गुणवान् पूज्यते नरः’ (गुणवान् मनुष्य ही पूजित होता है)।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति ॥
पदच्छेदः
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः। वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम्। धर्मः सः नो यत्र न सत्यम् अस्ति। सत्यम् न तद् यद् छलम् अभ्युपैति।
अन्वयः
सा सभा न (अस्ति), यत्र वृद्धाः न सन्ति। ते वृद्धाः न (सन्ति), ये धर्मं न वदन्ति। सः धर्मः न (अस्ति), यत्र सत्यं न अस्ति। तत् सत्यं न (अस्ति), यत् छलम् अभ्युपैति।
भावार्थः
वह सभा (सभा नहीं) कहलाने योग्य नहीं जिसमें वृद्ध (अनुभवी, ज्ञानवृद्ध) लोग न हों। वे वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न कहें। वह धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो। और वह सत्य नहीं जो छलयुक्त हो। सारांशतः — सफल वही सभा है जहाँ आयु व ज्ञान से वृद्ध लोग हों, जो धर्म पर आधारित सत्य वचन बोलें, न कि छलपूर्ण बात।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् ॥
पदच्छेदः
दुर्जनेन समम् सख्यम् प्रीतिम् च अपि न कारयेत्। उष्णः दहति च अङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्।
अन्वयः
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं च अपि न कारयेत्। उष्णः अङ्गारः दहति, शीतः च करं कृष्णायते।
भावार्थः
दुर्जन (दुष्ट व्यक्ति) के साथ मित्रता या प्रेम-सम्बन्ध नहीं करना चाहिए, क्योंकि दुर्जन विश्वास के योग्य नहीं होता — उसके मुख में मिठास परन्तु हृदय में कपट होता है। जैसे गरम कोयला हाथ को जला देता है, और यदि वही कोयला ठण्डा भी हो तो हाथ को काला (मैला) कर देता है — उसी प्रकार दुर्जन सदैव किसी न किसी रूप में अहित ही करता है। अतः विद्या से सुशोभित होने पर भी दुर्जन का त्याग करना चाहिए।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति ॥
पदच्छेदः
यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिः भवेत्। एवम् पुरुषकारेण विना दैवम् न सिध्यति।
अन्वयः
यथा हि एकेन चक्रेण रथस्य गतिः न भवेत्, एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।
भावार्थः
रथ की गति दोनों चक्रों (पहियों) से ही सम्यक् रूप से सम्भव होती है — एक ही चक्र से रथ की गति सम्भव नहीं। उसी प्रकार पुरुषार्थ (परिश्रम) के बिना केवल भाग्य से फल की प्राप्ति नहीं होती। भाग्य होते हुए भी उद्योग (परिश्रम) से ही फल प्राप्त होता है। यहाँ यह ज्ञात होता है कि प्रयत्न और भाग्य — दोनों मानव-रूपी रथ के दो पहिये हैं। कहा भी गया है — ‘उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः’ (कार्य उद्यम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं)।
वयं शब्दार्थान् जानीमः
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| शृङ्खलितम् | अनुशासितम् | अनुशासित | Disciplined |
| गायन्ति | गानं कुर्वन्ति | गाते हैं | Sing |
| किल | निश्चयेन | निश्चय से | With determination |
| धन्याः | प्रशंसिताः | प्रशंसनीय | Praiseworthy |
| अपवर्गः | निर्वाणम् | मोक्ष | Liberation |
| भूयः | पुनः पुनः | बार-बार | Over and over again |
| सुरत्वात् | देवत्वात् | देवत्व से | From divinity |
| वेत्ति | जानाति | जानता है | Knows |
| निर्गुणः | गुणहीनः | गुण रहित | Without virtue |
| बली | बलवान् | बलशाली | Powerful |
| निर्बलः | बलरहितः | बलहीन | Weak |
| पिकः | कोकिलः | कोयल | Cuckoo |
| वायसः | काकः | कौआ | Crow |
| करी | गजः | हाथी | Elephant |
| नम्राः | अवनताः | झुके हुए | Bent |
| तरवः | पादपाः | वृक्ष | Trees |
| फलोद्गमैः | फलभारैः | फलों के भार से | With weight of fruits |
| अम्बुभिः | जलैः | जल से भरे हुए | Filled with water |
| दूरविलम्बिनः | दूरात् अधः अवनताः | दूर से नीचे झुके हुए | Come down from above |
| घनाः | मेघाः | बादल | Clouds |
| अनुद्धताः | गर्वशून्याः | अभिमान से रहित | Polite |
| सत्पुरुषाः | सज्जनाः | अच्छे लोग | Good people |
| समृद्धिभिः | प्रचुरैः धनैः | बहुत धन से | With abundance of wealth |
| कनकम् | सुवर्णम् | सोना | Gold |
| परीक्ष्यते | परीक्षितं भवति | उसकी परीक्षा की जाती है | Is tested |
| निघर्षणम् | घर्षणम् | घिसना | Rubbing |
| छेदनम् | कर्तनम् | काटना | Cutting |
| ताडनैः | प्रहारैः | प्रहार के द्वारा | By hitting |
| कुलेन | वंशेन | कुल से | By the family |
| शीलेन | स्वभावेन | स्वभाव से | By nature |
| कर्मणा | कार्येण | कार्य से | By work |
| दीपयन्ति | प्रकाशयन्ति | प्रकाशित करते हैं | Illuminate |
| प्रज्ञा | विशेषज्ञानम् | विशिष्ट बुद्धि | Extra-ordinary intelligence |
| कौल्यम् | कुलीनता | अच्छे कुल में जन्म | Birth in a good family |
| दमः | इन्द्रियसंयमः | इन्द्रियों का संयम | Control over senses |
| श्रुतम् | शास्त्रज्ञानम् | शास्त्रों का ज्ञान | Knowledge of scriptures |
| पराक्रमः | साहसः | वीरता | Bravery |
| अबहुभाषिता | मितभाषिता | कम और सार्थक बोलना | Speaking less but meaningfully |
| छलम् | कपटता | छलना | Cheating |
| अभ्युपैति | प्राप्नोति | प्राप्त करता है | Associates |
| दुर्जनेन | दुष्टजनेन | दुष्ट व्यक्ति से | With wicked people |
| समम् | सह | साथ | With |
| सख्यम् | मैत्री | मित्रता | Friendship |
| दहति | ज्वलयति | जलाता है | Burns |
| अङ्गारः | दग्धकाष्ठः | अङ्गारा | Charcoal |
| कृष्णायते | मलिनं करोति | काला करता है | Blackens |
| दैवम् | भाग्यम् | भाग्य | Luck |
| सिध्यति | सिद्धं भवति | फलता है | Fruitifies |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सम्पूर्ण उत्तराणि
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत
पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत
कतरवः कदा नम्राः भवन्ति?
खसमृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति?
गसत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति?
घसत्यम् कदा सत्यम् न भवति?
ङदैवं कदा न सिध्यति?
स्तम्भयोः मेलनं कुरुत
अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत
समुचितं विकल्पं चिनुत (बहुविकल्पीय प्रश्नाः)
(क) “गायन्ति देवाः किल गीतकानि” — इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः?
उत्तरम्: (ii) भारतभूमेः गौरवम्
(ख) “गुणी गुणं वेत्ति” — इत्यत्र कः गुणं न जानाति?
उत्तरम्: (ii) निर्गुणः
(ग) “पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” — इत्यस्य तात्पर्यं किम्?
उत्तरम्: (i) पिकः मधुरं गायति न वायसः
(घ) “भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” — इत्यस्य अर्थः कः?
उत्तरम्: (iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति
(ङ) “न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” — इत्यत्र सभायाः महत्त्वं किम्?
उत्तरम्: (iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः
(च) दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम्?
उत्तरम्: (iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति
परियोजनाकार्यम्
१अन्तर्जालात् पुस्तकेभ्यश्च विंशतिसुभाषितानां सङ्ग्रहं कुरुत।
• विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
• अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्।
• सत्यमेव जयते नानृतम्।
एवं अन्यानि १७ सुभाषितानि अपि सङ्कलनीयानि।
२किमपि नीतिवाक्यम् अधिकृत्य पञ्चवाक्यानि संस्कृतेन लिखत।
२. यः नित्यं श्रमं करोति सः जीवने अवश्यं सफलः भवति।
३. आलस्यं मनुष्यस्य शत्रुः इति उच्यते।
४. परिश्रमी जनाः सर्वदा समाजे सम्मानं प्राप्नुवन्ति।
५. अतः अस्माभिः सर्वदा श्रमशीलैः भवितव्यम्।
३पाठे आगतानि सुभाषितानि कण्ठस्थीकृत्य कक्षायां श्रावयत।
अत्र इदम् अवधेयम्
छन्दः, सन्धिः व समासः
संस्कृतश्लोकेषु प्रतिपद्यं (प्रत्येक श्लोके) पादचतुष्टयम् (चार पाद/चरण) भवति। छन्दोबद्ध-सस्वरगानशैली अपि अस्ति। श्लोकेषु सन्धिसमासयुक्तपदानि भवन्ति। यथा —
नम्रास्तरवः = नम्राः + तरवः। (विसर्गसन्धिः)
अभ्युपैति = अभि + उप + एति। (स्वरसन्धिः)
अनुद्धताः = न उद्धताः (नञ् तत्पुरुषसमासः)।
यथाशक्ति = शक्तिम् अनतिक्रम्य (अव्ययीभावः समासः)।
