सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)
वीरवर, उसके पुत्र शक्तिधर, पत्नी वेदरता, पुत्री वीरवती — और अन्ततः स्वयं राजा शूद्रक — सभी अपना सर्वस्व देवी सर्वमङ्गला को अर्पित करने को तत्पर हो जाते हैं। त्याग व स्वामिभक्ति की इस अद्भुत परिणति के साथ ही कथा पूर्ण होती है। इस पाठ के सभी ७ अभ्यासों तथा वाच्य (कर्तृ-कर्म-भाव) के व्याकरण-नियमों के विस्तृत उत्तर नीचे दिए गए हैं।
कथा-प्रवाह-चित्रम् (Story Flow)
वीरवर घर पहुँचकर अपनी निद्रालस पत्नी वेदरता, पुत्र शक्तिधर तथा पुत्री वीरवती को जगाकर राजलक्ष्मी के साथ हुआ सम्पूर्ण संवाद सुनाता है। यह सुनते ही पुत्र शक्तिधर आनन्दपूर्वक कहता है कि वही अपने पिता को सबसे प्रिय वस्तु है, अतः स्वामी के जीवन की रक्षा हेतु उसे अर्पित किया जाए — देर करना उचित नहीं। पत्नी वेदरता तथा पुत्री वीरवती भी इस निर्णय का समर्थन करती हैं। सम्पूर्ण परिवार देवी सर्वमङ्गला के मन्दिर जाता है, जहाँ वीरवर पहले पुत्र को अर्पित करता है, फिर स्वयं को भी। यह देखकर पत्नी व पुत्री भी वही आचरण करती हैं। यह सब गुप्त रूप से अनुसरण करता राजा शूद्रक अपनी आँखों से देखता है। द्रवित होकर वह भी सोचता है — मेरे जैसे तुच्छ प्राणी तो जन्मते-मरते रहते हैं, परन्तु वीरवर जैसा कोई न हुआ न होगा! राजा भी अपना राज्य व जीवन देवी को अर्पित करने को तत्पर हो जाता है। अन्ततः देवी सर्वमङ्गला प्रत्यक्ष प्रकट होकर राजा का हाथ थामती है, उसके सत्त्वगुण व भृत्य-वात्सल्य से प्रसन्न होकर सबको पुनर्जीवित कर देती है। अगले दिन वीरवर पुनः द्वार पर सेवारत मिलता है, और विनम्रतापूर्वक राजा से कुछ भी असामान्य होने से इनकार करता है — तब राजा अत्यन्त प्रसन्न होकर उसे सम्पूर्ण कर्णाटप्रदेश प्रदान करता है।
भाषिक बिन्दु — वाच्यत्रयम् (कर्तृ-कर्म-भाव)
Grammar Note · The Three Voicesपरिचयः / Overview
संस्कृत में वाक्य-रचना तीन प्रकार की होती है — कर्तृवाच्यम् (Active Voice), कर्मवाच्यम् (Passive Voice) तथा भाववाच्यम् (Impersonal Voice)।
निम्नलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयानि स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
वीरवरो पत्नीं पुत्रं दुहितरञ्च प्राबोधयत्।
ततस्ते सर्वे सर्वमङ्गलाया आयतनं गताः।
वीरवरः वर्तनस्य निस्तारं पुत्रोत्सर्गेण अकरोत्।
राजा स्वप्रासादं प्राविशत्।
महीपतिः वीरवराय समग्रकर्णाटप्रदेशम् अयच्छत्।
अधोलिखितान् प्रश्नान् उत्तरत
वीरवरः किम् अवर्णयत् ?
प्राज्ञः धनानि जीवितञ्च केभ्यः उत्सृजेत् ?
केन सदृशः लोके न भूतो न भविष्यति ?
का अदृश्या अभवत् ?
सपरिवारः वीरवरः कुत्र गतवान् ?
अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत
धन्यः अहम् स्वामिजीवितरक्षार्थं विनियुक्तः। → शक्तिधराय
भगवति ! न मे प्रयोजनं राज्येन जीवितेन वा।
वत्स ! अनेन ते सत्त्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि।
धन्याहं यस्याः ईदृशो जनको भ्राता च।
तदेतत्परित्यक्तेन मम राज्येनापि किं प्रयोजनम् !
अयम् अपि सपरिवारो जीवतु।
उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत
कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रोत्सर्गेण।
नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति।
तेन पातितं स्वशिरः स्वकरस्थखड्गेन।
तदा ममायुःशेषेणापि जीवतु राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च।
तत्क्षणादेव देवी गताऽदर्शनम्।
महीपतिस्तस्मै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय।
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।
उदाहरणानुगुणम् अधोलिखितानां पदानां पदच्छेदं कुरुत
| पदम् | पदच्छेदः | |
|---|---|---|
| यद्येवमस्मत्कुलोचितम् | = | यदि-एवम्-अस्मत्-कुलोचितम् |
| सत्त्वोत्कर्षेण | = | सत्त्व-उत्कर्षेण |
| (क) गृहीतस्वामिवर्तनस्य | = | गृहीत-स्वामि-वर्तनस्य |
| (ख) निस्तारोपायः | = | निस्तार-उपायः |
| (ग) गृह्यतामेष | = | गृह्यताम्-एषः |
| (घ) स्वपुत्रोत्सर्गेण | = | स्व-पुत्र-उत्सर्गेण |
| (ङ) स्वकरस्थखड्गेन | = | स्व-कर-स्थ-खड्गेन |
| (च) तदेतत्परित्यक्तेन | = | तत्-एतत्-परित्यक्तेन |
| (छ) स्वशिरश्छेदनार्थमुत्क्षिप्तः | = | स्व-शिरः-छेदन-अर्थम्-उत्क्षिप्तः |
| (ज) मद्दर्शनाददृश्यताम् | = | मत्-दर्शनात्-अदृश्यताम् |
| (झ) तत्क्षणादेव | = | तत्-क्षणात्-एव |
| (ञ) लब्धजीवितः | = | लब्ध-जीवितः |
सन्धियुक्तपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत, तथा सन्धिच्छेदं कुरुत
| (क) पाठगत पदानि — सन्धि-निर्माणम् | |
|---|---|
| स्व + आवासम् | = स्वावासम् |
| तत् + श्रुत्वा | = तच्छ्रुत्वा |
| दुहितरम् + च | = दुहितरञ्च |
| धन्यः + अहम् | = धन्योऽहम् |
| जीवितम् + च + एव | = जीवितञ्चैव |
| विलम्बः + तात | = विलम्बस्तात |
| कः + अधुना | = कोऽधुना |
| न + आचरितव्यम् | = नाचरितव्यम् |
| धन्या + अहम् | = धन्याहम् |
| निस्तारः + उपायः | = निस्तार उपायः |
| वीरवरः + अवदत् | = वीरवरोऽवदत् |
| ततः + असौ | = ततोऽसौ |
| ततः + ते | = ततस्ते |
| (ख) सन्धि-विच्छेदः | ||
|---|---|---|
| शूद्रकोऽपि | शूद्रकः | + अपि |
| पुनर्भूपालेन | पुनः | + भूपालेन |
| महीपतिस्तस्मै | महीपतिः | + तस्मै |
| प्रायच्छत् | प्र | + अयच्छत् |
| नृपतिरपि | नृपतिः | + अपि |
| सर्वेषामदृश्य | सर्वेषाम् | + अदृश्य |
| वार्ताऽन्या | वार्ता | + अन्या |
| राज्यभङ्गस्ते | राज्यभङ्गः | + ते |
| गतिर्गन्तव्या | गतिः | + गन्तव्या |
| इत्युक्त्वा | इति | + उक्त्वा |
| नेदानीं | न | + इदानीम् |
| प्रीतास्मि | प्रीता | + अस्मि |
अधोलिखितानि कथनानि कथायाः घटनानुसारं लिखत
दिए गए वाक्य (यादृच्छिक क्रम में) :
- (क) सर्वं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
- (ख) पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नतया स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
- (ग) प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’ ?
- (घ) वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सर्वां च वार्ताम् अकथयत्।
- (ङ) वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन् ! न कापि वार्ता। सा नारी अदृश्या अभवत्।
- (च) भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः।
- (छ) वीरवरः परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत्।
सही घटनाक्रम :
- (घ) वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीञ्च प्राबोधयत्, सर्वां च वार्ताम् अकथयत्।
- (ख) पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नतया स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
- (छ) वीरवरः परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत्।
- (क) सर्वं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
- (च) भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः।
- (ग) प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’ ?
- (ङ) वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन् ! न कापि वार्ता। सा नारी अदृश्या अभवत्।
योग्यताविस्तरः — श्लोक-विश्लेषणम्
Enrichment · Full Shloka Analysis (for reference)धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
अन्वयः — प्राज्ञः धनानि जीवितम् च एव परार्थे उत्सृजेत्। विनाशे नियते सति सन्निमित्ते त्यागः वरम्।
भावार्थः — बुद्धिमान् व्यक्ति को परोपकार हेतु धन व जीवन दोनों त्यागने को सिद्ध रहना चाहिए, क्योंकि शरीर का नाश तो निश्चित है ही — अतः अच्छे कारण से किया गया त्याग ही श्रेष्ठ है।
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।
अनेन सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति॥
अन्वयः — मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च। लोके अनेन सदृशः न भूतः न भविष्यति च।
भावार्थः — मेरे जैसे तुच्छ जीव तो जन्म लेकर मर जाते हैं, परन्तु संसार में इस (वीरवर) के समान कोई न पहले हुआ, न आगे होगा — यह राजा शूद्रक के मन में उठा विचार है।
चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षण-च्छेदन-ताप-ताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
यो हि स्वधर्मनिरतः स तेजस्वी भवेदिह। विना स्वधर्मान्न सुखं स्वधर्मो हि परं तपः॥
Prepared for Class 8 Sanskrit (Dipakam) · Chapter 11 — सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) · All illustrations © NCERT, used for educational reference · @EDUGROWN
