Class 9 Hindi (Ganga) Chapter 8 | Raidas Ke Pad | NCERT Solutions रैदास के पद

पद (रैदास) — संपूर्ण प्रश्नोत्तर हल | EduGrown
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पद — रैदास

संपूर्ण प्रश्नोत्तर एवं व्याकरण हल · काव्य खंड · कक्षा गंगा (हिंदी)

संत रैदास (रविदास)
कवि — संत रैदास (रविदास) जन्म: काशी (वाराणसी) · जीवन-काल: 15वीं शताब्दी (सन् 1388–1518) · निर्गुण संत-काव्य परंपरा के कवि
रैदास के दोनों पद — सचित्र पाठ
रैदास के दोनों पद — सचित्र पाठ (दीपक, मोर, चकोर, चंद्र व कमल के अलंकरण सहित)
🎯

मेरे उत्तर मेरे तर्क

सटीक उत्तर चुनिए और कारण भी समझिए
1“अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?
  • (क) नाम उच्चारण की कठिनाई
  • (ख) नाम रटकर याद करना
  • (ग) आराध्य का नाम जपना
  • (घ) मित्रों का नाम रटना
🧠 तर्क

‘राम रट’ का अर्थ है राम-नाम का निरंतर जप/स्मरण। भक्त को राम के नाम की ऐसी गहरी लगन लग गई है कि अब वह छूट ही नहीं सकती। अतः यह आराध्य का नाम जपने का भाव है — न कि उच्चारण की कठिनाई या केवल रटकर याद करना।

2“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?
  • (क) एकाकार और समरूप
  • (ख) तरल और तीव्र सुगंध
  • (ग) आश्रय और आश्रित
  • (घ) द्रव और ठोस
🧠 तर्क

जैसे चंदन को पानी में घिसने पर उसकी सुगंध पानी के अंग-अंग में समा जाती है, वैसे ही भक्त आराध्य में पूरी तरह घुल-मिल जाना चाहता है। दोनों एक हो जाते हैं — इसलिए यह संबंध एकाकार और समरूप होने का है।

3“तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?
  • (क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।
  • (ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।
  • (ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।
  • (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
🧠 तर्क

दीपक (आराध्य) और बाती (भक्त) के मिलने पर ही ज्योति जलती है, जो दिन-रात प्रकाश देती है। अर्थात् भक्त और आराध्य का मेल ही जीवन को आलोकित/प्रकाशमय करता है। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

4“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौं” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?
  • (क) परोपकारी भक्ति भाव
  • (ख) आराध्य से अटूट संबंध
  • (ग) सांसारिक मोह
  • (घ) कर्मकांड पर बल
🧠 तर्क

भक्त कहता है — हे राम, यदि तुम मुझसे नाता तोड़ भी दो, तब भी मैं तुमसे नाता नहीं तोड़ूँगा; तुम्हें छोड़कर और किससे जुड़ूँ? यह आराध्य के प्रति अटूट, अडिग व एकनिष्ठ संबंध को दर्शाता है।

5“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?
  • (क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।
  • (ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।
  • (ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।
  • (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
🧠 तर्क

भक्त को तीर्थ या व्रत न करने की कोई चिंता/शंका (अंदेसा) नहीं है, क्योंकि उसे केवल प्रभु के चरण-कमलों का एक ही भरोसा है। बाह्य कर्मकांडों से अधिक उसके लिए आराध्य के चरणों में ही सच्चा आश्रय है।

6सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?
  • (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
  • (ख) “जाकी जोति बरै दिन राती”
  • (ग) “तुम दीपक, हम बाती”
  • (घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”
🧠 तर्क

“जहाँ-जहाँ जाऊँ, वहीं तुम्हारी ही पूजा है; तुम-सा कोई दूसरा देव नहीं” — इस पंक्ति से ईश्वर के हर जगह विद्यमान, सर्वव्यापक होने की अवधारणा स्पष्ट होती है।

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अर्थ और भाव

पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए
“प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
📖 अर्थ व भाव

अर्थ — हे प्रभु, तुम घने बादल हो और मैं मोर हूँ — जैसे मोर बादल को देखकर प्रसन्न होकर नाचता है; और जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को टकटकी लगाकर निहारता रहता है, वैसे ही मैं तुम्हें निहारता रहता हूँ।

भाव — इसमें भक्त का आराध्य के प्रति अनन्य प्रेम व मिलन की तड़प प्रकट होती है। जैसे मोर बादल पर और चकोर चाँद पर मुग्ध रहता है, वैसे ही भक्त आराध्य के दर्शन के लिए व्याकुल और पूर्णतः समर्पित है।

“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
📖 अर्थ व भाव

अर्थ — मुझे तीर्थ-यात्रा या व्रत न करने की कोई चिंता/शंका नहीं है, क्योंकि मुझे तो बस तुम्हारे चरण-कमलों का एक ही भरोसा/सहारा है।

भाव — भक्त बाह्य आडंबरों (तीर्थ, व्रत) को महत्व नहीं देता; उसकी सच्ची भक्ति व अडिग आस्था केवल आराध्य के चरणों में है — यही उसका एकमात्र आश्रय है। रैदास यहाँ मन की शुद्धता व सच्चे समर्पण को कर्मकांड से ऊपर रखते हैं।

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मेरी समझ मेरे विचार

1“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौं” — रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
✒️ उत्तर

इस पंक्ति में भक्त की आराध्य के प्रति अडिग व एकनिष्ठ श्रद्धा झलकती है। भक्त कहता है कि चाहे प्रभु उससे संबंध तोड़ दें, फिर भी वह कभी प्रभु से नाता नहीं तोड़ेगा — क्योंकि प्रभु के सिवा वह और किससे जुड़े?

इससे यह स्पष्ट होता है कि सच्चा भक्त किसी लाभ या प्रतिफल के लिए भक्ति नहीं करता; उसका प्रेम निःस्वार्थ, बिना शर्त व अटूट होता है। यह एकतरफ़ा नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण की भक्ति है, जिसमें भक्त अपने आराध्य पर पूरी तरह आश्रित व विश्वस्त रहता है।

2रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
✒️ उत्तर

रैदास ने तीर्थ व व्रत जैसे बाह्य कर्मकांडों के स्थान पर प्रभु के चरणों की सच्ची भक्ति, मन की शुद्धता और नाम-स्मरण को भक्ति का प्रमुख आधार माना है।

मेरे विचार से भक्ति के आधार —

  • सच्चा प्रेम व पूर्ण समर्पण
  • मन की पवित्रता व सच्चाई
  • सेवा-भाव व करुणा
  • नाम-स्मरण व ध्यान
  • सभी प्राणियों के प्रति समानता का भाव
3दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है?
✒️ उत्तर
पदप्रतीक / उपमाएँ
पद (1)चंदन – पानी; घन (बादल) – मोर; चंद्र – चकोर; दीपक – बाती; मोती – धागा; सोना – सुहागा; स्वामी – दास
पद (2)चरन-कमल (रूपक); मन को हरि से जोड़ना व संसार से तोड़ना; “तुम सा देव ओर नहिं दूजा”

इन सभी उपमाओं से भक्त और आराध्य के अटूट, अभिन्न व प्रेमपूर्ण संबंध को व्यक्त किया गया है — जिसमें भक्त सदा आश्रित व समर्पित है।

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कविता का सौंदर्य (अलंकार)

विधा से संवाद
📖 अलंकार — परिभाषा व उदाहरण
अलंकारपहचानउदाहरण (पाठ से)
अनुप्रासएक ही व्यंजन वर्ण की एक से अधिक बार आवृत्ति“चितवत ंद कोरा” (‘च’ की आवृत्ति)
उपमाकिसी प्रसिद्ध वस्तु की समानता के आधार पर वर्णन (जैसे/सम)जैसे सोने मिलत सुहागा”; “जैसे चितवत चंद चकोरा”
रूपकउपमेय में उपमान का आरोप कर अभेद स्थापित करना“चरन कमल” (चरणों में कमल का आरोप)

अन्य पंक्तियाँ — ‘प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती’ तथा ‘तुम मोती, हम धागा’ में भी आराध्य-भक्त की समानता दर्शाने वाली सुंदर उपमाएँ हैं; इन्हें आप अनुप्रास/उपमा/रूपक के अंतर्गत पहचान सकते हैं।

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कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ

विशेषता दर्शाती पंक्तियाँ
✒️ उत्तर
विशेषताउदाहरण
अनन्य भक्ति भाव“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौं, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।” (दिया गया)
सरल और लोकधर्मी भाषा“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।”
उपमा और तुलना“प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।”
लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता“प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।” (पानी–समानी, बाती–राती जैसी तुक)
दृढ़ निष्ठा और आस्था“सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।”
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विषयों से संवाद

1रैदास व कबीर निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर इसके क्या कारण हो सकते हैं?
✒️ उत्तर
  • उस समय समाज में जाति-भेद, छुआछूत व ऊँच-नीच की भावना प्रबल थी।
  • मंदिर-प्रवेश व पूजा-पाठ पर कुछ वर्गों का एकाधिकार था; वंचित वर्गों को इनसे दूर रखा जाता था।
  • कर्मकांड, बाह्य आडंबर व पुरोहितवाद समाज पर हावी थे।
  • संतों ने निराकार (निर्गुण) भक्ति पर बल देकर संदेश दिया कि ईश्वर मूर्ति या मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि मन की शुद्धता व सच्चे प्रेम में बसता है — और वह सबके लिए समान रूप से सुलभ है।

इस प्रकार निराकार भक्ति ने जाति-भेद का खंडन किया तथा समानता, प्रेम व भाईचारे को बढ़ावा दिया — क्योंकि यह हर जाति व वर्ग को समान अधिकार देती थी।

2“सोने मिलत सुहागा” — सुहागा का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ लिखिए।
🔬 उत्तर
  • रासायनिक नाम — सोडियम टेट्राबोरेट / सोडियम बोरेट (बोरैक्स); रासायनिक सूत्र — $Na_2B_4O_7 \cdot 10H_2O$
  • यह एक प्राकृतिक खनिज है।
  • सोना/धातु गलाते समय इसे ‘फ्लक्स’ के रूप में मिलाया जाता है; यह धातु की अशुद्धियों (ऑक्साइड) को हटाकर सोने को शुद्ध व चमकदार बनाता है।
  • इसका उपयोग सोल्डरिंग (धातु जोड़ने), काँच व साबुन बनाने आदि में भी होता है।

कवि ने इसी गुण के आधार पर उपमा दी है — जैसे सुहागा सोने में मिलकर उसे निखारता है, वैसे ही भक्ति आराध्य से जोड़कर भक्त के जीवन को निखार देती है।

🔡

व्याकरण — शब्दों की बात

1पदों में से संज्ञा व सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण लिखिए।
✒️ उत्तर

संज्ञा — राम, चंदन, दीपक अन्य: मोती, धागा, चरन, रैदास

सर्वनाम — तुम, हम, मैं अन्य: जो, सबन

2दिए गए शब्दों के स्थान पर आप/आपके आस-पास के लोग किन शब्दों का प्रयोग करते हैं?
✒️ उत्तर
पद में प्रयुक्त शब्दप्रचलित/मानक शब्द
मोरामोर, मयूर
चकोराचकोर
बातीबत्ती
रातीरात, रात्रि
सोनेसोना, स्वर्ण
तीरथतीर्थ
बरतव्रत, उपवास
🖋️

सृजन

रचनात्मक लेखन
1समूह बनाकर दोनों पदों को गाकर/पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।
✒️ संकेत

पदों की लय व तुक (पानी–समानी, बाती–राती, धागा–सुहागा) पर ध्यान देते हुए मधुर स्वर में सामूहिक गायन कीजिए। एक पंक्ति एक समूह गाए, दूसरी पंक्ति दूसरा समूह — इससे गेयता और भी निखर उठेगी।

2पद की उपमाओं के आधार पर भक्त व आराध्य के बीच संवाद-लेखन कीजिए।
✒️ नमूना संवाद

भक्त — हे प्रभु! आप चंदन हैं और मैं जल; मुझे अपने अंग-अंग में ऐसे समा लीजिए कि मेरी अलग पहचान ही न रहे।

आराध्य — हे भक्त! जैसे दीपक बिना बाती के नहीं जलता, वैसे ही तेरे प्रेम के बिना मेरी ज्योति अधूरी है।

भक्त — तब तो मैं चकोर बनकर सदा आपके चंद्र-मुख को निहारता रहूँगा, कभी दृष्टि न हटाऊँगा।

आराध्य — और मैं मोती के धागे-सा तुझसे जुड़ा रहूँगा — हम कभी अलग नहीं होंगे।

3“जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौं” को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।
✒️ नमूना लघुकथा

सच्चा साथ

आरव और कबीर बचपन के पक्के दोस्त थे। एक दिन एक गलतफहमी के कारण कबीर ने गुस्से में आरव से कहा — “अब हमारी दोस्ती खत्म!” आरव चुप रहा। अगले ही दिन परीक्षा में कबीर की तबीयत बिगड़ गई और सब उसे अकेला छोड़ गए, पर आरव दौड़कर उसके पास पहुँचा, उसे संभाला और घर तक छोड़ आया। कबीर ने शर्मिंदा होकर पूछा — “मैंने तो दोस्ती तोड़ दी थी, फिर भी तुम आए?” आरव मुस्कुराया — “तुमने भले तोड़ दी हो, पर मैं नहीं तोड़ूँगा। सच्चा नाता एकतरफ़ा नहीं टूटता।” कबीर की आँखें भर आईं — उस दिन उसने जाना कि अटूट रिश्ते शर्तों पर नहीं, समर्पण पर टिकते हैं।

🪟

झरोखे से — नामदेव

रैदास व नामदेव के पदों की तुलना
✒️ चर्चा — अंतर व समानताएँ
दीपक व चंद्र का अलंकरण
दीपक-ज्योति व चंद्र — भक्ति का प्रतीक

समानताएँ —

  • दोनों निर्गुण/निराकार भक्ति के संत कवि हैं।
  • दोनों बाह्य आडंबरों व सामाजिक रूढ़ियों का विरोध करते हैं।
  • दोनों भक्त-आराध्य के अटूट प्रेम का चित्रण उपमाओं से करते हैं (गाय-बछड़ा, मीन-पानी, चंद-चकोर आदि)।
  • दोनों की भाषा सरल व लोकधर्मी है तथा समानता-प्रेम का संदेश देती है।

अंतर —

  • भाषा — रैदास की भाषा ब्रजभाषा (अवधी/राजस्थानी/उर्दू-फ़ारसी मिश्रित) है; नामदेव की भाषा पर मराठी का प्रभाव है।
  • भाव — रैदास के पदों में दास्य-भाव व समर्पण प्रमुख है; नामदेव के पदों में विरह व व्याकुलता (बछड़े बिन गाय, पानी बिन मछली) की तड़प अधिक मुखर है।
  • गुरु-महिमा — नामदेव के पदों में सद्गुरु द्वारा ‘अलख’ के दर्शन कराने की महिमा विशेष रूप से आती है।
🔎

खोजबीन

रैदास के जीवन व पदों के बारे में
📎 संदर्भ-कड़ियाँ

रैदास के जीवन व पदों को और गहराई से जानने के लिए पुस्तकालय व इंटरनेट का उपयोग कीजिए —

रैदास का जन्म काशी में हुआ; उन्होंने बाह्य आडंबरों का खंडन कर मन की शुद्धता व आंतरिक भक्ति को सच्चा धर्म माना। उनकी रचनाएँ ‘रैदास बानी’ में संकलित हैं और कुछ रचनाएँ ‘आदि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी’ में भी शामिल हैं — जो आज भी समानता, प्रेम व भाईचारे का संदेश देती हैं।

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