संवादहीन
ताई और मिट्ठू — अकेलेपन में एक-दूसरे का सहारा बने दो प्राणी
मेरे उत्तर मेरे तर्क
- (क) परोपकार और त्याग
- (ख) ममता और स्नेह ✔
- (ग) करुणा और क्रोध
- (घ) जिज्ञासा और सहायता
ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी थी। वे उसके लिए नियमपूर्वक दाल-भात बनातीं, रोटी बचाकर रखतीं और एक पल का वियोग भी सहन न कर पातीं। यह गहरा ममता और स्नेह का बंधन ही उनके संबंध का मूल है।
- (क) अनुशासन और परंपरा
- (ख) उदासीनता और असावधानी
- (ग) आत्मगौरव और विद्रोह
- (घ) करुणा और नैतिकता ✔
जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति थे। पिंजरे में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होती और स्वयं को दोषी अनुभव करते। मिट्ठू को खुली हवा देना उनकी करुणा और नैतिक चेतना का प्रमाण है — वे किसी की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालना चाहते थे।
- (क) भोजन की खोज
- (ख) प्रेम की आकांक्षा
- (ग) स्वतंत्रता की चाह ✔
- (घ) पक्षियों में सम्मान की प्रवृत्ति
रोशनदान से बाहर की दुनिया देखते ही मिट्ठू उड़ गया और एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने लगा। पिंजरे का आदी होने के बावजूद खुला आकाश पाते ही उसने उड़ान भर ली — यह प्रत्येक प्राणी की सहज स्वतंत्रता की चाह को दर्शाता है।
- (क) सम्मान और प्रतिष्ठा में कमी आना
- (ख) परिवार से दूरी और संवाद का अभाव ✔
- (ग) आर्थिक विपन्नता और निर्धनता
- (घ) मिट्ठू के प्रति प्रेम और संवाद
ताई के पास घर-संपत्ति की कमी नहीं थी; उनका असली दुख था बहू-बेटों का शहर चले जाना और बातचीत करने वाले किसी अपने का न होना। सूने घर की ‘भाँय-भाँय’ उन्हें काटने को दौड़ती थी। इसलिए उनके दुख का मूल परिवार से दूरी और संवाद का अभाव था।
- (क) मजबूरी
- (ख) कर्मपरायणता
- (ग) अकेलापन ✔
- (घ) संवादधर्मिता
आधुनिक जीवन में पलायन के कारण बुजुर्ग अपने ही घरों में अकेले रह जाते हैं। ताई का जीवन इसी सच्चाई को दर्शाता है — यह कहानी समकालीन समाज में बढ़ते अकेलेपन की विसंगति को उजागर करती है।
मेरी समझ मेरे विचार
यहाँ ‘नैया’ ताई के शेष जीवन एवं वृद्धावस्था का प्रतीक है। बुढ़ापे का अकेलापन, सूना घर और कोई सहारा न होने के कारण ताई चिंतित रहती हैं कि उनका बाकी जीवन (नैया) कैसे कटेगा। यह वाक्य उनके मन की गहरी असुरक्षा और एकाकीपन को व्यक्त करता है।
यह वाक्य ताई के संपन्न परिवार के पतन और बिखराव की ओर संकेत करता है। बहू-बेटे शहर चले गए, बेटियाँ अपनी गृहस्थी में रम गईं और कारोबार संभालने वाला कोई न रहा। खेती-बाड़ी और कारोबार न रहने से नौकर-चाकर भी चले गए, और धीरे-धीरे सारी संपत्ति दूसरों (परायों) के हाथों में चली गई।
परिवार बिखर जाने के बाद ताई के पास अपना प्रेम लुटाने के लिए कोई न बचा था। ऐसे में गनपत द्वारा लाया गया प्यारा-सा तोता मिट्ठू ही उनके स्नेह का एकमात्र केंद्र बन गया। मिट्ठू उनके लिए संतान-तुल्य और संवाद का साथी था, इसलिए उनकी सारी दबी हुई ममता उसी पर बरस पड़ी।
पहले जो ताई अपने लिए चूल्हा जलाने में भी आलस करती थीं, वही अब मिट्ठू के लिए अत्यंत सजग हो गईं। इससे पता चलता है कि —
- उनके जीवन में फिर से उद्देश्य और सक्रियता लौट आई।
- वे मिट्ठू की पसंद का ध्यान रखने लगीं — किसके खेत में मिर्चें तैयार हैं, किस पेड़ में अमरूद बचे हैं।
- यह उनके भीतर जागे गहरे वात्सल्य और देखभाल के भाव को दर्शाता है।
- मिट्ठू उनके सूने जीवन का केंद्र बन गया, जिससे उनकी उदासीनता उत्साह में बदल गई।
जगन मास्टर आदर्शवादी, संवेदनशील और स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति थे। उनके अपने कुछ नियम-सिद्धांत थे और वे किसी की स्वतंत्रता में बाधा नहीं डालना चाहते थे। उदाहरण —
- पिंजरे में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होती और वे स्वयं को दोषी अनुभव करते।
- उन्होंने मिट्ठू को खुली हवा का सुख देने के लिए पिंजरे का दरवाजा खोल दिया।
- ‘गीता-रहस्य’ पढ़ना उनके बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्वभाव को दर्शाता है।
परंतु उनका यही आदर्शवाद व्यावहारिक जीवन में संकट ले आया — मिट्ठू उड़ गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आदर्श और यथार्थ में टकराव होता है।
शीर्षक ‘संवादहीन’ सबसे अधिक ताई के लिए सार्थक है। परिवार के बिखर जाने के बाद मिट्ठू ही उनका एकमात्र ‘संवाद का माध्यम’ था। मिट्ठू के उड़ जाने पर एवजी (नकली) तोता उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं करता और चुप रहता है। इस प्रकार ताई का अंतिम सहारा भी छिन जाता है और वे पूरी तरह संवादहीन हो जाती हैं।
यह शीर्षक प्रतीकात्मक रूप से उस आधुनिक समाज की ओर भी संकेत करता है जहाँ रिश्ते होते हुए भी लोग आपस में संवादहीन हो गए हैं।
कभी वह घर पूत-परिवार, बहू-बेटियों, नौकर-चाकरों और गाय-ढोर से भरा-पूरा एवं रौनक से जगमगाता था। परंतु परिवार के शहर चले जाने और सब कुछ परायों के हाथ में चले जाने के बाद घर पूरी तरह वीरान हो गया। अब वहाँ केवल ताई और मिट्ठू बचे थे। निवासियों एवं चहल-पहल के अभाव में वह विशाल घर उजड़ा-वीरान खंडहर जैसा लगने लगा — इसलिए उसे ‘सूना खंडहर’ कहा गया।
मेरे प्रश्न
मेरे अनुभव मेरे विचार
जब मैं किसी यात्रा या शिविर में परिवार से दूर होता हूँ, तो बार-बार अपने माता-पिता और छोटे भाई-बहन की याद आती है। मन में चिंता रहती है कि घर में सब ठीक तो हैं। कभी अपने पालतू कुत्ते की भी याद सताती है कि उसने खाना खाया होगा या नहीं। यह चिंता मन को बेचैन कर देती है और बार-बार फोन करके हालचाल जानने का मन करता है — ठीक वैसे ही जैसे ताई बार-बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर मिट्ठू की चिंता करती थीं।
हाँ, पशु-पक्षियों में भी गहरी संवेदनाएँ होती हैं। वे प्रेम, भय, खुशी और दुख महसूस करते हैं। मेरे अनुभव में, मेरे घर का कुत्ता जब मुझे स्कूल से लौटते देखता है तो पूँछ हिलाकर, उछलकर अपनी खुशी जताता है, और जब मैं घर से बाहर जाता हूँ तो उदास होकर दरवाजे पर बैठ जाता है। इसी प्रकार ‘संवादहीन’ का मिट्ठू भी ताई के प्रश्नों का उत्तर देता और उसकी राम-कहानी का धैर्यवान श्रोता बनता था। इससे सिद्ध होता है कि पशु-पक्षी भी संवेदनशील प्राणी हैं।
इस प्रश्न के दोनों पक्ष हैं —
उचित होने के तर्क: गाँववाले ताई से बहुत प्रेम करते थे और जानते थे कि असली मिट्ठू को न पाने पर उन्हें गहरा सदमा लगेगा। उनकी भावनाओं को आघात से बचाने के लिए ही यह सहानुभूतिपूर्ण उपाय सोचा गया।
अनुचित होने के तर्क: किसी को धोखे या भ्रम में रखना दीर्घकाल में सही नहीं है। सच्चाई अंततः सामने आ ही जाती है — जैसे एवजी तोते के चुप रहने पर ताई को संदेह हो ही गया। सहारा और प्रेम देकर सच्चाई बताना अधिक उचित होता।
मेरा मत: भावनाओं की रक्षा का उद्देश्य अच्छा था, पर स्थायी समाधान सच्चाई के साथ करुणा से बताना ही होता।
हाँ, एक बार मैंने सोचा था कि परीक्षा में गणित का प्रश्नपत्र बहुत कठिन आएगा, इसलिए मैं घबराया हुआ था। पर जब पेपर मिला तो वह मेरी अपेक्षा से आसान निकला और मैंने अच्छे अंक प्राप्त किए। ठीक उसी तरह जैसे ताई ने सोचा था कि मिट्ठू उन्हें देखते ही ‘राम राम सीताराम’ की रट लगा देगा, पर वहाँ बैठा एवजी तोता चुप ही रहा। जीवन में अक्सर हमारी अपेक्षाएँ और यथार्थ अलग होते हैं — यही जीवन की सच्चाई है।
हाँ, लंबे समय तक बंधन में रहने पर प्राणी उसके आदी हो जाते हैं। मिट्ठू पिंजरे में रहने का इतना अभ्यस्त हो गया था कि दरवाजा खुलने पर भी पहले बाहर आने की इच्छा नहीं दिखाई। हमारे आस-पास भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं — चिड़ियाघर या घर में पाले गए पक्षी अक्सर खुला छोड़ने पर भी दूर नहीं उड़ते; सर्कस के जानवर बँधी हुई दिनचर्या के आदी हो जाते हैं।
परंतु यह आदत उनकी स्वाभाविक स्वतंत्रता को दबा देती है। मौका मिलते ही उनकी मूल प्रवृत्ति (आजादी की चाह) जाग उठती है — जैसे मिट्ठू ने अंततः उड़ान भर ली।
आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए — आदर्श और यथार्थ का द्वंद्व
कहानी का सौंदर्य
| विशेष बिंदु | नया उदाहरण (कहानी से) |
|---|---|
| चित्रात्मकता (दृश्य बिंब) | “सुबह पौ फटने लगती, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं।” |
| संवादात्मकता | “मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?” — “कटेगी! कटेगी!! कटेगी!!!” |
| पुनरुक्ति | “मर जा! मर जा! मर जा!” / “हर हर गंगे! हर हर गंगे!!” |
| अतिशयोक्ति | “कंजूस के धन की तरह मिट्ठू को छिपाकर रखतीं।” |
| लोकधर्मी भाषा | “सूने घर की भाँय-भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।” |
| प्रश्नोत्तर शैली | “अब कैसे कटेगी?” — “कटेगी!” |
इस कहानी का अंत मुख्यतः दुखांत है और साथ ही इसे यथार्थवादी एवं व्यंग्यात्मक अंत की श्रेणी में भी रखा जा सकता है।
- दुखांत: ताई का एकमात्र सहारा मिट्ठू उड़ जाता है और वे फिर से अकेली, संवादहीन रह जाती हैं।
- यथार्थवादी: अंत जीवन की कठोर सच्चाई जैसा है — अपेक्षा और वास्तविकता में अंतर।
- व्यंग्यात्मक: जो जगन मास्टर मिट्ठू को आजादी देना चाहते थे, उन्हीं की लापरवाही से ताई का साथी हमेशा के लिए खो जाता है; एवजी तोता ताई को धोखा नहीं दे पाता।
विषयों से संवाद
लेखक ने जानबूझकर इस पात्र का नाम नहीं दिया, ताकि यह केवल एक व्यक्ति न रहकर समाज की उन अनेक स्त्रियों का प्रतीक बन जाए जिनकी अपनी अलग पहचान को नजरअंदाज कर दिया जाता है और जिन्हें ‘किसी की पत्नी’ के रूप में ही जाना जाता है।
यह तत्कालीन सामाजिक यथार्थ की ओर भी संकेत करता है, जहाँ स्त्रियों को प्रायः उनके नाम से नहीं, बल्कि पति या परिवार से जोड़कर पहचाना जाता था। इस प्रकार यह नामहीनता एक गहरे सामाजिक भाव को व्यक्त करती है।
आयोजन क्यों: कुंभ मेला हिंदू धर्म की एक धार्मिक तीर्थयात्रा है जो 12 वर्षों में चार बार आयोजित होती है। यह प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में बारी-बारी से, पवित्र नदियों के तट पर आयोजित होता है। पवित्र संगम/नदी में स्नान को पाप-नाशक एवं मोक्षदायक माना जाता है, इसलिए करोड़ों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं।
पिछली बार: सबसे हाल का महाकुंभ मेला 13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) के त्रिवेणी संगम पर आयोजित हुआ था।
अगला आयोजन: अगला कुंभ मेला 2027 में नासिक, महाराष्ट्र में 17 जुलाई से 17 अगस्त तक होगा, और उसके बाद 2028 में उज्जैन में।
ताई अपने गाँव से कुछ संगी-साथियों के साथ बस द्वारा पास के रेलवे स्टेशन पहुँचीं। वहाँ से रेलगाड़ी का टिकट लेकर वे प्रयागराज के लिए रवाना हुईं। रास्ते में सबने मिलकर घर से लाए पूड़ी-सब्जी और अचार खाया। प्रयागराज पहुँचकर वे एक धर्मशाला में ठहरीं। अगली सुबह संगम पर पवित्र स्नान किया, गंगा-पूजन किया और कुछ दान-पुण्य भी किया। यात्रा भर मिट्ठू की याद उन्हें सताती रही, फिर भी तीर्थ का पुण्य पाकर उनका मन संतुष्ट हुआ।
- देखना: रंग-बिरंगे झूले, सजी हुई दुकानें, उमड़ती भीड़ और चमकती रोशनी।
- सुनना: लाउडस्पीकर पर बजते गीत, झूलों की चरमराहट, बच्चों की किलकारियाँ और विक्रेताओं की आवाजें।
- सूँघना: जलेबी, समोसे और भुने चने की भीनी-भीनी खुशबू।
- छूना: मिट्टी के खिलौने, चूड़ियाँ और गरम-गरम पकवान।
- स्वाद: मीठी जलेबी, चटपटी चाट और कुल्फी का अनोखा आनंद।
पूरे वातावरण में श्रद्धा, उल्लास और उत्सव का भाव छाया रहता है।
सृजन
गाँव क्यों छोड़ा: शहरों में रोजगार, अच्छी शिक्षा, बेहतर चिकित्सा और सुविधाजनक जीवन की तलाश में ताई के बहू-बेटों ने गाँव छोड़ा होगा। गाँव में खेती-कारोबार में कमी और भविष्य की अनिश्चितता भी इसका कारण रही होगी।
छोड़ते समय की सोच: उनके मन में अपने पुश्तैनी घर और बुजुर्गों को छोड़ने का दुख रहा होगा, साथ ही नए जीवन की उम्मीद और चिंता का मिश्रित भाव भी। उन्होंने सोचा होगा कि शहर में बस जाने पर परिवार का भविष्य बेहतर होगा।
स्वयं को तैयार करना: उन्होंने यह सोचकर मन समझाया होगा कि समय और जीवन की आवश्यकताएँ बदल रही हैं, और प्रगति के लिए कठिन निर्णय लेने ही पड़ते हैं। इस प्रकार यह कहानी ‘पलायन’ की समकालीन समस्या को उजागर करती है।
एक दिन आकाश में वही हरे पंख चमके… असली मिट्ठू अमराइयों में घूमते-घूमते अपने पुराने आँगन की ओर लौट आया। उसने पिंजरे में बैठे एवजी तोते को देखा और गर्दन टेढ़ी करके बोला, “तू कौन है? यह मेरी ताई है, मेरा घर है!” एवजी तोता घबराकर इधर-उधर ताकने लगा।
तभी ताई आँगन में आईं। जैसे ही मिट्ठू ने उन्हें देखा, वह ‘हर हर गंगे! राम राम सीताराम!’ की रट लगाकर पंख फड़फड़ाने लगा। ताई की आँखें भर आईं — “मेरा मिट्ठू! तू लौट आया रे!” मिट्ठू उड़कर उनके कंधे पर आ बैठा।
उस दिन के बाद ताई ने मिट्ठू को कभी पिंजरे में बंद नहीं किया। मिट्ठू दिनभर पेड़ों पर उड़ता-फिरता और शाम को ताई के पास लौट आता। आजादी और अपनापन — दोनों साथ-साथ चलने लगे, और बड़े घर का सूनापन फिर से प्रेम और संवाद से गूँज उठा।
यह एक साक्षात्कार-गतिविधि है। अपने दादा/दादी या किसी बुजुर्ग से बातचीत करके उनके बचपन के अनुभव अपनी पुस्तिका में लिखें। नमूना —
⚠ तोता गुम है ⚠
हमारा प्यारा हरे रंग का पहाड़ी तोता ‘मिट्ठू’ दिनांक ___ को घर से उड़ गया है। उसकी पहचान —
• हरे पंख, लाल चोंच, गर्दन टेढ़ी करने की आदत।
• ‘राम राम सीताराम’, ‘हर हर गंगे’ बोलता है।
• अत्यंत बातूनी एवं समझदार है।
जो भी सज्जन इसे ढूँढ़कर सुरक्षित लौटाएगा, उसे उचित इनाम दिया जाएगा। यह एक वृद्धा की भावनाओं से जुड़ा है — कृपया मानवता दिखाएँ।
संपर्क: जगन मास्टर, गाँव — ____ (पता/फोन)।
व्याकरण की बात
| मुहावरा | अर्थ |
|---|---|
| अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना | अपनी प्रशंसा स्वयं करना |
| आसमान के तारे तोड़ना | असंभव कार्य करना |
| बिल्ली के भाग्य से छींका टूटना | बिना मेहनत अचानक लाभ होना |
| साँप-छछूँदर की गति | दुविधा में फँस जाना |
| घोड़े बेचकर सोना | निश्चिंत होकर सोना |
| गधे को बाप बनाना | स्वार्थवश किसी की चापलूसी करना |
| कौए की आँख होना | बहुत तेज दृष्टि होना |
| ऊँट के मुँह में जीरा | आवश्यकता से बहुत कम मिलना |
| शेर बनना | निडर/उग्र हो जाना |
| ध्वनि-शब्द | नया वाक्य |
|---|---|
| फड़फड़ाहट | चिड़िया पंखों की फड़फड़ाहट के साथ उड़ गई। |
| खड़खड़ाहट | हवा से खिड़की में खड़खड़ाहट होने लगी। |
| सरसराहट | पत्तों की सरसराहट से जंगल गूँज उठा। |
| गड़गड़ाहट | बादलों की गड़गड़ाहट सुनकर बच्चे डर गए। |
| टपटपाहट | छत से पानी की टपटपाहट रातभर सुनाई देती रही। |
| झनझनाहट | चूड़ियों की झनझनाहट से कमरा भर गया। |
| शब्द-युग्म | अर्थ | वाक्य |
|---|---|---|
| वक्त-बेवक्त | समय-असमय, किसी भी समय | वह वक्त-बेवक्त बिना बताए घर आ जाता है। |
| नियम-सिद्धांत | उसूल और आदर्श | हर सफल व्यक्ति के अपने नियम-सिद्धांत होते हैं। |
| शादी-ब्याह | विवाह संबंधी आयोजन | गाँव में शादी-ब्याह के अवसर पर सब मिलकर उत्सव मनाते हैं। |
| तीज-त्योहार | पर्व और उत्सव | तीज-त्योहार पर पूरा परिवार एकत्र हो जाता है। |
शब्द-युग्म के प्रकार: पुनरुक्त (बार-बार), सजातीय (उठना-बैठना), समानार्थक (दिन-प्रतिदिन), विपरीतार्थक (दिन-रात)।
खोजबीन शब्दों की
| पूछा गया | शब्द/वाक्यांश |
|---|---|
| ‘तंग’ का विपरीतार्थक | ढीली |
| एक मुहावरा (वाक्यांश) | पसीना-पसीना होना |
| एक क्रिया | पुकारते (सँभालते / तौलना) |
| एक संज्ञा | धोती (बाग, पेड़, डाल, पंख) |
| एक सर्वनाम | वह |
| एक विशेषण | ढीली |
| एक कारक (चिह्न) | ‘से’ (एक पेड़ से दूसरे पेड़) / ‘को’ |
| एक कर्ता | वह / मिट्ठू |
अर्थ के आधार पर वाक्य
| वाक्य का भेद | कहानी से उदाहरण |
|---|---|
| 1. विधानवाचक | जगन मास्टर ने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया। |
| 2. निषेधवाचक | मिट्ठू ने कोई हरकत नहीं की। |
| 3. प्रश्नवाचक | मिट्ठू! अब कैसे कटेगी? |
| 4. विस्मयादिबोधक | ये गए! वो गए!! |
| 5. आज्ञावाचक | राम-राम कहो, सीताराम कहो। |
| 6. इच्छावाचक | जीते रहो बेटा, जुग-जुग जिओ! |
| 7. संदेहवाचक | ताई के सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा। |
| 8. संकेतवाचक | जब खेती-बाड़ी नहीं, कारबार नहीं, तो नौकर-चाकर किस दम पर टिकते! |
गतिविधियाँ, पहेली एवं भाषा संगम
यह समूह-गतिविधि है। प्रत्येक समूह एक भाव चुनकर बिना शब्दों के, केवल हाव-भाव से अभिनय करे —
- दुख: ताई का अकेले सूने घर में उदास बैठना, सिर झुकाना।
- स्नेह: ताई का मिट्ठू को दुलारना, रोटी खिलाना।
- आजादी: मिट्ठू का पंख फैलाकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर उड़ने की मुद्रा।
यदि मुझे उड़ने का मौका मिले तो मैं ऊँचे पर्वतों, हरे-भरे जंगलों और नदियों के ऊपर उड़ना चाहूँगा, ताकि प्रकृति की सुंदरता को पक्षी की दृष्टि से देख सकूँ। मैं अपने गाँव और प्रियजनों के ऊपर भी उड़कर उन्हें देखना चाहूँगा। उड़ने की यह स्वतंत्रता मुझे असीम आनंद और मुक्ति का अनुभव कराएगी — ठीक वैसे ही जैसे मिट्ठू को खुले आकाश में मिला।
यह वाक्य उन अनगिनत महिलाओं की ओर संकेत करता है जो परिवार की आवश्यकताओं को पहले रखती हैं और अपनी जरूरतों की अनदेखी कर देती हैं। इस गतिविधि में अपने घर की माँ/दादी/बहन से उनकी पसंद का भोजन पूछें और ध्यान दें कि वह महीने में कब-कब बनता है। प्रायः पता चलेगा कि उनकी पसंद का भोजन कभी-कभार ही बनता है। यह गतिविधि हमें सिखाती है कि हमें घर की महिलाओं की पसंद और भावनाओं का भी आदर करना चाहिए।
- तोता: हरे पंख लाल चोंच, बोले जो मीठी बानी — बताओ कौन? (तोता)
- ताई: सूने बड़े घर में रहती, मिट्ठू से करती बतियानी? (ताई)
- कुंभ: बारह वर्ष में चार बार लगता, संगम पर भारी मेला? (कुंभ)
- पिंजरा: सींखचों का घर है मेरा, पंछी रहता जिसमें कैद? (पिंजरा)
- कमरा: चार दीवारें एक छत, घर का छोटा-सा हिस्सा? (कमरा)
- गंगा: पतित-पावनी पवित्र धारा, जिसमें करते सब स्नान? (गंगा)
संविधान की आठवीं अनुसूची की कुछ भाषाओं में ‘तोता’ — हिंदी: तोता; संस्कृत: शुकः; पंजाबी: तोता; उर्दू: तोता; कश्मीरी: तोतॅ; सिंधी: तोतो; मराठी: पोपट; गुजराती: पोपट/सूडो; कोंकणी: पोपट; नेपाली: सुगा; बांग्ला: तोता; असमिया: भाटौ; मणिपुरी: तेनवा; ओड़िआ: शुआ; तेलुगु: चिलुक; तमिल: किळि; मलयालम: शुकम्/तत्त; कन्नड़: गिळि।
© संवादहीन — शेखर जोशी · प्रश्न-उत्तर समाधान · @edugrown
