Chapter 18 श्रीकांत वर्मा | CLASS 11TH HINDI | REVISION NOTES ANTRA

हस्तक्षेप कविता क्लास 11 अंतरा पाठ 18 – श्रीकांत वर्मा

कवि श्रीकांत वर्मा का जीवन परिचय-
कवि श्रीकांत वर्मा का जन्म 18 दिसंबर 1931 को बिलासपुर मध्य प्रदेश में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा बिलासपुर में ही हुई। सन् 1956 में नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. करने के बाद, उन्होंने एक पत्रकार के रूप में अपना सहित्यिक जीवन शुरू किया।

इन्हें निम्नलिखित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है:-
=>तुलसी पुरस्कार
=>आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी पुरस्कार
=>शिखर सम्मान
=>कुमारन आशान पुरस्कार

इनकी प्रमुख रचनाएं हैं – जलसाघर, मगध, भटका मेघ, माया-दर्पण, झाड़ी संवाद, घर, दूसरे के पैर, जिरह, अपोलो का रथ, फैसले का दिन, बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में।

इनकी काव्यगत विशेषताएं निम्नलिखित हैं:-
=>श्रीकांत वर्मा जी को कम शब्दों में अधिक कहने में महारथ हासिल है।
=>उन्होंने आधुनिक जीवन के यथार्थ का नाटकीय चित्र प्रस्तुत किया है।
=>भाषा आम बोलचाल वाली, सरल व सरस है।
=>तत्सम-तद्भव शब्दों का प्रयोग किया है।

हस्तक्षेप कविता का सारांश – Hastakshep Poem Summary

इस कविता में कवि ने मगध की सत्ता की निरंकुशता एवं क्रूरता का वर्णन करते हुए दर्शाया है कि वहां ऐसा आतंकपूर्ण वातावरण हो गया है, जिससे लोग भयभीत और भौंचक्के हो गए हैं। कवि सत्ताधारी वर्ग पर अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग करते हुए कहते हैं, मगध के लोग यह सोचते हैं कि मगध में शांति रहनी ही चाहिए। शांति भंग होने के डर से कोई छींक तक नहीं मार रहा है। मगध के अस्तित्व के लिए शांति का होना अत्यंत आवश्यक है।

निरंकुश शासन व्यवस्था में लोगों पर कितना ही अत्याचार क्यों न हो जाए, कोई चीख-पुकार नहीं कर सकता। ऐसा करना शासन के विरुद्ध समझा जाएगा। शासन व्यवस्था में व्यवधान हो जाएगा। मगध सिर्फ नाम का मगध है, रहने के लिए मगध नहीं है।

कवि कहता है कि तुम विरोध से कितना ही बचो, परन्तु तुम उसके स्पष्ट विरोध से बच नहीं पाओगे। जब कोई विरोध नहीं करता, तो शहर के बीच से गुज़रता मुर्दा यह प्रश्न करता है कि मनुष्य क्यों मरता है अर्थात् अत्याचार बढ़ने पर दबा-कुचला वर्ग भी निरंकुश सत्ता पर उंगली उठा सकता है।

कुल-मिलाकर कवि ने हस्तक्षेप कविता में आम व्यक्ति को गलत निर्णयों के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया है। कवि आम जनता का आह्वान करते हुए कहते हैं कि सत्ता के गलत निर्णयों के विरुद्ध विद्रोह करते हुए डरना नहीं चाहिए।

व्यवस्था को जनतांत्रिक बनाने के लिए समय-समय पर उसमें हस्तक्षेप की जरूरत होती है, वरना व्यवस्था निरंकुश हो जाती है। इस कविता में ऐसे ही तंत्र का वर्णन है, जहां किसी भी प्रकार के विरोध के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। कवि बताता है कि हस्तक्षेप तो मुर्दा भी कर जाता है। फिर जिंदा लोग चुप बैठे रह जाएंगे, यह कैसे संभव है।

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