बाबा नागार्जुन का जन्म बिहार के तरौनी ज़िले में हुआ था। नागार्जुन जी का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा संस्कृति पाठशाला तथा उच्च शिक्षा वाराणसी और कोलकाता में हुई। इनकी प्रमुख काव्य कृतियां हैं – युगधारा, पथराई आंखें, तालाब की मछलियां, सतरंगे पंखों वाली, तुमने कहा था, रत्नगर्भा, पुरानी जूतियों का कोरस, हज़ार-हज़ार बांहों वाली आदि।
इनके द्वारा लिखे गए उपन्यासों का नाम है- बलचनामा, जमनिया का बाबा, कुंभी पाक, उग्रतारा, रविनाथ की चाची, वरुण के बेटे आदि।
विलक्षण प्रतिभा के धनी नागार्जुन को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। जो कुछ इस प्रकार हैं–
1. साहित्य अकादमी पुरस्कार
2. भारत भारती पुरस्कार
3. मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार
4. राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार
5. अकादमी दिल्ली का शिखर सम्मान आदि।
कवि नागार्जुन के लिखने का अंदाज़ ही कुछ अलग था। वे अपनी लेखनी में साधारण लोगों के दुखों को जगह देते थे। समाज के यथार्थ को अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त करते थे। शायद यही कारण है कि इनको ज़मीनी कलाकार भी कहा जाता था। वे मनुष्य के दर्द को महसूस करते थे एवं उनकी व्यथा को अपने लेखनी में स्थान देते थे। बाबा अपने पाठकों को समाज की असलियत से भी परिचित करवाते थे।
बाबा नागार्जुन न सिर्फ हिंदी भाषा में लिखा करते थे, बल्कि अरबी, फारसी, बांग्ला, संस्कृत एवं मैथिली भाषा में भी लिखा करते थे। वे बहु भाषा प्रेमी थे और बहु भाषा में ही इन्होंने कविताएं लिखी हैं, उपन्यास लिखे हैं।
कवि नागार्जुन घूमने-फिरने के शौकीन थे। जहां-जहां वे जाते थे, उस स्थान पर मन खोल कर घूमते थे एवं अपने भ्रमण के अनुभवों को अपनी कविता में स्थान देते थे। बाबा नागार्जुन के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने हिंदुस्तान के हर एक स्थान में घूमकर आनंद लिया है। इसके अलावा वे विदेशों में भी भ्रमण कर चुके हैं। नेपाल, भूटान एवं म्यांमार इनमें से प्रमुख हैं।
इस तरह, एकबार वे यात्रा करते-करते हिमालय प्रदेश में पहुंच गए। वहां की वादियां उन्हें बहुत भा गईं और उस पर ही कवि ने बादल को घिरते देखा है कविता लिख डाली।