तरुण के स्वप्न
मेरी समझ से (क)
- —सुभाषचंद्र बोस के लिए
- ★देश के तरुण वर्ग के लिए
- —चित्तरंजन दास के लिए
- —भारतवासियों के लिए
यह उद्बोधन युवक-सम्मेलन में दिया गया है और बोस कहते हैं “हे मेरे तरुण भाइयो!”। देशबंधु चित्तरंजन दास के स्वप्न के उत्तराधिकारी वे स्वयं तथा वे युवा हैं जिन्हें वे संबोधित कर रहे हैं — अर्थात् ‘हम’ का अभिप्राय देश का तरुण वर्ग है। (व्यापक अर्थ में भारतवासी भी, पर प्रत्यक्ष संबोधन युवाओं को है।)
- —आर्थिक असमानता से
- —स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से
- ★श्रम और कर्म की मर्यादा से
- —जातिभेद से
बोस के आदर्श समाज में आर्थिक विषमता, जातिभेद और स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकार समाप्त करने हैं। राष्ट्र का स्वप्न श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा से साकार होगा — जहाँ परिश्रम का सम्मान हो और आलसी-अकर्मण्य के लिए स्थान न रहे।
- ★हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है
- —हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है
- ★उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है
- —उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है
‘उत्तराधिकारी’ का अर्थ है — किसी के बाद उसकी विरासत पाने और आगे बढ़ाने वाला। अतः चित्तरंजन दास के स्वप्न को संजोकर रखना और उसे पूरा करने के लिए स्वयं कर्म करना — दोनों इसमें निहित हैं। केवल चर्चा करना या स्वप्न देखना पर्याप्त नहीं।
- ★राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी
- —तरुणों का साहस बढ़ेगा
- —राष्ट्र स्वाधीन बनेगा
- —राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा
जब सबको शिक्षा और उन्नति के समान अवसर मिलेंगे, तो हर व्यक्ति योग्य व कर्मठ बनकर राष्ट्र-निर्माण में योगदान देगा — इससे राष्ट्र की श्रम-शक्ति (उत्पादक क्षमता) में वृद्धि होगी।
मिलकर करें मिलान
पंक्तियों पर चर्चा
(क) “उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।”
ऐसा समाज जिसमें आर्थिक असमानता न हो — अमीर और गरीब के बीच भारी खाई न हो; सबके पास जीवन-निर्वाह के समान साधन व अवसर हों। यह आर्थिक समानता का आदर्श है।
(ख) “वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।”
देशबंधु चित्तरंजन दास का स्वाधीन-संपन्न समाज का स्वप्न ही उनकी शक्ति का स्रोत (उत्स) और निरंतर बहने वाले आनंद का झरना (निर्झर) था। उस स्वप्न ने उन्हें ऊर्जा और प्रसन्नता — दोनों दीं।
(ग) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।”
ऐसा समाज जहाँ व्यक्ति राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व मानसिक — हर दृष्टि से स्वतंत्र हो; किसी भी प्रकार के बंधन, भय या सामाजिक दबाव से मुक्त रहकर सम्मान से जी सके।
सोच-विचार के लिए
एक नया सर्वांगीण स्वाधीन, संपन्न और आत्मनिर्भर राष्ट्र, जिसमें —
- व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो, समाज के दबाव से न मरे;
- जातिभेद का स्थान न हो;
- नारी मुक्त होकर पुरुषों के समान अधिकार पाए;
- आर्थिक विषमता न हो, सबको शिक्षा व उन्नति का समान अवसर मिले;
- श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा हो, आलसी-अकर्मण्य के लिए स्थान न रहे;
- विजातीय (विदेशी) प्रभाव से मुक्त, विश्व के समक्ष आदर्श समाज व राष्ट्र बने।
अपने इसी स्वप्न (आदर्श स्वाधीन-संपन्न समाज व राष्ट्र) की प्रतिष्ठा/प्राप्ति को। इस सत्य के लिए वे हर त्याग, हर संकट और प्राण देना भी ‘वह मरण है स्वर्ग समान’ मानते थे। यही स्वप्न उनके क्षुद्र जीवन को सार्थक बनाता है।
क्योंकि राष्ट्र की उन्नति श्रम और कर्म पर निर्भर है। आदर्श समाज में प्रत्येक व्यक्ति को परिश्रम करके अपना और देश का योगदान देना है। आलसी व निकम्मे लोग प्रगति में बाधक बनते हैं, इसलिए कर्मशील समाज में उनके लिए स्थान नहीं — श्रम की मर्यादा बनाए रखने हेतु बोस ने ऐसा कहा।
- मन लगाकर शिक्षा ग्रहण करे और ईमानदारी से परिश्रम करे।
- जाति, धर्म, लिंग का भेद मिटाकर समानता व भाईचारा बढ़ाए।
- नारी का सम्मान और समान अवसर सुनिश्चित करे।
- आत्मनिर्भर भारत / स्वदेशी को बढ़ावा दे, नवाचार करे।
- आलस्य व नशे से दूर रहकर समाज-सेवा व पर्यावरण-रक्षा में जुटे।
- भ्रष्टाचार का विरोध कर देश के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाए।
अनुमान और कल्पना से
- राजनीतिक — विदेशी (अंग्रेजी) शासन की गुलामी से।
- सामाजिक — जातिभेद, ऊँच-नीच, रूढ़ियों व कुप्रथाओं से।
- आर्थिक — गरीबी और आर्थिक विषमता से।
- धार्मिक — अंधविश्वास व धार्मिक भेदभाव से।
- मानसिक/वैचारिक — भय और गुलाम मानसिकता से; तथा स्त्रियों के लिए लैंगिक असमानता से।
उस समय समाज में नारी को पुरुष के समान अधिकार व अवसर प्राप्त नहीं थे — वह शिक्षा, संपत्ति और निर्णयों में पीछे थी। बोस मानते थे कि समाज के आधे भाग (नारी) की समान भागीदारी के बिना सच्चा सर्वांगीण-स्वाधीन राष्ट्र संभव नहीं; इसीलिए उन्होंने नारी-मुक्ति व समान अधिकार पर विशेष बल दिया।
दिव्यांगजन, वंचित/पिछड़े व आदिवासी वर्ग, अत्यंत निर्धन परिवार, वृद्धजन, अनाथ व असहाय बच्चे — जिन्हें समानता तक पहुँचने के लिए अतिरिक्त सहयोग, सुविधा व अवसर की आवश्यकता है। (अपने विचार जोड़ें)
उस काल के सामाजिक परिवेश में सार्वजनिक सभाओं/युवक-सम्मेलनों में अधिकतर पुरुष/युवक ही उपस्थित होते थे; स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी सीमित थी और तत्कालीन भाषा-शैली में ‘भाइयो’ सामान्य संबोधन था। (यह एक विडंबना भी है कि नारी-समानता की बात करने वाले बोस का संबोधन परिस्थितिवश ‘भाइयो’ तक रहा।)
युवा वर्ग उत्साह, जोश और प्रेरणा से भर उठा होगा — तालियों की गड़गड़ाहट और ‘जय हिंद’ के नारे गूँजे होंगे। अनेक युवाओं ने इस स्वप्न को अपना ध्येय बनाकर देश-सेवा व स्वतंत्रता-संग्राम में कूदने का संकल्प लिया होगा।
शीर्षक
क्योंकि यह उद्बोधन तरुणों (युवाओं) को संबोधित है और उनमें एक आदर्श स्वाधीन-संपन्न समाज व राष्ट्र का स्वप्न जगाता है। बोस यही स्वप्न युवाओं को उपहारस्वरूप सौंपते हैं ताकि वे उसे साकार करें। इस प्रकार शीर्षक विषय-वस्तु से पूर्णतः मेल खाता है।
जैसे “नए भारत का स्वप्न”, “स्वप्न का उपहार”, “युवाओं के नाम संदेश”, “आदर्श राष्ट्र की कल्पना”। मैं “नए भारत का स्वप्न” रखूँगा क्योंकि यह बोस द्वारा कल्पित स्वाधीन-संपन्न आदर्श राष्ट्र को सीधे दर्शाता है। (आप अपना नाम व तर्क लिखें।)
विषय — शिक्षा का महत्व, अनुशासन व समय-प्रबंधन, स्वच्छता, पर्यावरण-रक्षा, एकता व सहयोग, नशा-मुक्ति। शीर्षक — “हमारा संकल्प” / “बेहतर कल की ओर”। (अपनी पसंद चुनें व कारण लिखें।)
भाषा की बात
| विशेषता / गुण | शब्द |
|---|---|
| अखंड | सत्य |
| सर्वांगीण / स्वाधीन / संपन्न | समाज |
| स्वाधीन / आदर्श | राष्ट्र |
| क्षुद्र | जीवन |
| असीम | शक्ति |
| अपार | आनंद |
जैसे — शाश्वत सत्य, समतामूलक समाज, सशक्त राष्ट्र, सार्थक जीवन, अदम्य शक्ति, शुद्ध आनंद। ये विशेषण इन शब्दों के सकारात्मक व आदर्श गुणों को और स्पष्ट करते हैं। (अपने शब्द व कारण लिखें।)
विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग
| शब्द (स्तंभ 1) | विपरीतार्थक (स्तंभ 2) |
|---|---|
| 1. स्वीकार | अस्वीकार |
| 2. सार्थक | निरर्थक |
| 3. विषमता | समानता |
| 4. क्षुद्र | विशाल / वृहत / विराट / महान |
| 5. संपन्न | विपन्न |
| 6. अकर्मण्य | कर्मण्य / कर्मठ |
| 7. मरण | जीवन |
- स्वीकार/अस्वीकार — उसने प्रस्ताव तो स्वीकार किया, पर अनुचित शर्तें अस्वीकार कर दीं।
- सार्थक/निरर्थक — परिश्रम से जीवन सार्थक बनता है, आलस्य से निरर्थक।
- विषमता/समानता — समाज में आर्थिक विषमता मिटाकर समानता लानी होगी।
- क्षुद्र/विशाल — क्षुद्र स्वार्थ त्यागकर विशाल हृदय अपनाओ।
- संपन्न/विपन्न — संपन्न लोगों को विपन्न वर्ग की सहायता करनी चाहिए।
- अकर्मण्य/कर्मण्य — समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं, अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।
- मरण/जीवन — देश के लिए मरण भी सामान्य जीवन से कहीं श्रेष्ठ है।
आपकी बात
विद्यालय — स्वच्छ, अनुशासित व सबके लिए समान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा। राज्य — सबको रोज़गार, अच्छी सड़कें-अस्पताल-विद्यालय, अपराध-मुक्त। देश — आत्मनिर्भर, भ्रष्टाचार-मुक्त, जहाँ हर नागरिक शिक्षित, सुखी और समान हो। (अपने स्वप्न लिखें।)
- संविधान व कानून का पालन तथा अपने कर्तव्यों का निर्वाह।
- जागरूक नागरिक बनकर मतदान करना।
- एकता व भाईचारा बनाए रखना; विभाजनकारी ताकतों/अफवाहों का विरोध।
- राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा और स्वदेशी को बढ़ावा।
- ईमानदारी, परिश्रम और देश-सेवा की भावना।
मिलान कीजिए — स्वतंत्रता सेनानी
चित्तरंजन दास (देशबंधु चित्तरंजन दास) — जिन्हें पाठ में बोस के राजनीतिक गुरु तथा जिनके स्वप्न का उत्तराधिकारी बताया गया है।
सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास
- संविधान — समानता, मौलिक अधिकार, सबको मताधिकार (नारी को भी)।
- पंचवर्षीय योजनाएँ व बैंकों का राष्ट्रीयकरण; हरित क्रांति।
- शिक्षा का अधिकार (RTE), सर्व शिक्षा अभियान, छात्रवृत्तियाँ।
- आरक्षण व पिछड़े-वंचित वर्गों के कल्याण की योजनाएँ।
- महिला सशक्तीकरण — बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पंचायत आरक्षण।
- आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत।
- ISRO/रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (अंतरिक्ष, BrahMos आदि)।
स्त्री सशक्तीकरण
- पुरुषों के समान मताधिकार व समान वेतन का अधिकार।
- शिक्षा प्रोत्साहन — बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, निःशुल्क/रियायती शिक्षा व छात्रवृत्ति।
- मातृत्व अवकाश, संपत्ति में समान अधिकार।
- पंचायत/स्थानीय निकाय व कई स्थानों पर विधायी आरक्षण।
- घरेलू हिंसा व कार्यस्थल-उत्पीड़न से सुरक्षा कानून, हेल्पलाइन (1091/181)।
टुकड़ी का नाम — रानी झाँसी रेजिमेंट (Rani of Jhansi Regiment), जिसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया। भूमिका — यह पूर्णतः महिला सैनिकों की टुकड़ी थी जिसने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संग्राम, युद्ध-प्रशिक्षण व नर्सिंग कार्य किया। यह नारी-शक्ति और स्वतंत्रता-संग्राम में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी का प्रेरक प्रतीक बनी।
नारे और स्वतंत्रता सेनानी
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। | बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य तिलक) |
| करो या मरो | महात्मा गाँधी |
| मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा | चंद्रशेखर आजाद |
| इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद | भगत सिंह |
| पूर्ण स्वराज | पंडित जवाहरलाल नेहरू |
झरोखे से · शब्दार्थ · खोजबीन
मांडले जेल से अनिलचंद्र विश्वास को लिखे पत्र में बोस ने गृह व कुटीर उद्योग पर विचार रखे — बेंत का काम, मिट्टी के खिलौने, और विशेषकर सीप के बटन बनाना (बंगाल के गाँवों में घर-घर, स्त्री-पुरुष फुरसत में करते थे)। उनका मत था कि कम लागत में, थोड़े यंत्रों व कच्चे माल से यह काम शुरू कर गरीब परिवार अपनी आय बढ़ा सकते हैं; समिति सस्ता कच्चा माल जुटाकर तैयार वस्तुएँ बेच सके। यह स्वदेशी व आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का बीज था।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उत्तराधिकारी | किसी के बाद उसकी विरासत/संपत्ति पाने वाला, वारिस |
| उत्स | स्रोत, सोता, उद्गम |
| निर्झर | झरना, प्रपात |
| सर्वांगीण | सब अंगों/पक्षों में व्याप्त, चहुँमुखी |
| स्वाधीन | स्वतंत्र, आजाद, अपने ही अधीन |
| अकर्मण्य | कर्म के अयोग्य, आलसी, निकम्मा |
| क्षुद्र | छोटा, तुच्छ |
| अखंड | अटूट, संपूर्ण, बाधारहित |
| विजातीय | भिन्न जाति/वर्ग का, पराया (विदेशी) |
आदमी का अनुपात
कविता का केंद्रीय भाव
कविता दो व्यक्तियों से आरंभ होकर कमरा → घर → मोहल्ला → नगर → प्रदेश → देश → पृथ्वी → नक्षत्र → ब्रह्मांड तक फैलती है, और दिखाती है कि विराट ब्रह्मांड के सामने मानव कितना सूक्ष्म है। इतना छोटा होकर भी मनुष्य ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा व अविश्वास में लीन रहता है — गिनती से परे ‘दीवारें’ (भेद) खड़ी करता है, स्वयं को दूसरों का स्वामी बताता है, और एक छोटे-से कमरे तक में ‘दो दुनिया’ रच डालता है। कवि क्रोध नहीं, बल्कि करुणा व कोमल व्यंग्य से मनुष्य को उसके छोटेपन का बोध कराते हैं ताकि वह विनम्र बने और दीवारें गिराए।
मेरी समझ से (क)
- —पृथ्वी पर सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण
- ★ब्रह्मांड की तुलना में अत्यंत सूक्ष्म
- —सूर्य, चंद्र आदि सभी नक्षत्रों से बड़ा
- —समस्त प्रकृति पर शासन करने वाला
कमरे से ब्रह्मांड तक फैलते क्रम में पृथ्वी ही ‘करोड़ों में एक छोटी’ है — तो मानव उससे भी असंख्य गुना छोटा। अतः ब्रह्मांड की विशालता के सामने मानव का स्थान अत्यंत सूक्ष्म है।
- —पृथ्वी और सूर्य
- —देश और नगर
- —घर और कमरा
- ★मानव और ब्रह्मांड
शीर्षक ही ‘आदमी का अनुपात’ है और कविता में स्पष्ट कहा गया — ‘यह है अनुपात आदमी का विराट से’। अतः तुलना मानव और ब्रह्मांड (विराट) के बीच है।
- —त्याग, ज्ञान और प्रेम में
- —सेवा और परोपकार में
- ★ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा में
- —उदारता, धर्म और न्याय में
कविता में सीधे कहा गया है कि इतना छोटा होकर भी आदमी ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास में लीन रहता है।
- ★वह अपनी सीमाओं और दुर्बलताओं को नहीं समझता।
- —वह दूसरों पर शासन स्थापित करना चाहता है।
- —वह प्रकृति के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है।
- ★वह अपने छोटेपन को भूल अहंकारी हो जाता है।
मनुष्य ब्रह्मांड के सामने अपनी लघुता/सीमाएँ भूलकर अहंकारी हो जाता है — ‘अपने को दूजे का स्वामी बताता है’। इसलिए अपने छोटेपन को भूल अहंकारी बनना (व अपनी सीमाओं को न समझना) ही उसका सबसे बड़ा दोष है।
पंक्तियों पर चर्चा
(क) “अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही।”
असंख्य नक्षत्रों (तारों) के बीच पृथ्वी एक बहुत छोटा-सा ग्रह है — करोड़ों ग्रहों में से बस एक। यह पृथ्वी (और उस पर रहने वाले मानव) की अल्पता को दर्शाता है।
(ख) “संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है / अपने को दूजे का स्वामी बताता है।”
मनुष्य अनगिनत (असंख्य) कृत्रिम दीवारें — जाति, धर्म, ऊँच-नीच, भेदभाव — खड़ी करता रहता है और अहंकार में स्वयं को दूसरों का मालिक घोषित करता है। यह उसके भेदभाव व अहं पर व्यंग्य है।
(ग) “देशों की कौन कहे / एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है।”
देशों के बीच भेद तो दूर की बात, मनुष्य की संकीर्णता ऐसी है कि वह एक छोटे-से कमरे तक में ‘दो दुनिया’ (मतभेद/अलगाव) रच डालता है — यानी जहाँ साथ रहना है वहाँ भी फूट डाल देता है।
मिलकर करें मिलान
अनुपात — विराटता के लिए गुण
क्यों: सहअस्तित्व, सौहार्द, सहनशीलता व समावेशिता मनुष्य के हृदय को विशाल बनाते हैं और दीवारें गिराते हैं — इन्हीं गुणों से वह संकुचित ‘कमरे’ से निकलकर ‘ब्रह्मांड जैसा विस्तार’ पा सकता है। (अपने चुने गुणों का कारण साझा कीजिए।)
सोच-विचार के लिए
अहं, ईर्ष्या, स्वार्थ, घृणा और अविश्वास के कारण। वह दूसरों को अपने से अलग व छोटा मानता है, स्वयं को श्रेष्ठ/स्वामी समझता है — इसी संकीर्ण सोच से जाति, धर्म, ऊँच-नीच की कृत्रिम ‘दीवारें’ खड़ी करता चला जाता है।
“करोड़ों में एक ही” (पृथ्वी) — यह प्रतिदिन याद दिलाएगा कि हमारी यह धरती कितनी अनोखी व दुर्लभ है, इसे सहेजना और सबके साथ मिल-जुलकर रहना हमारा कर्तव्य है। (आप अपनी पसंद की पंक्ति व कारण लिख सकते हैं।)
इस कविता का भाव कोमल व्यंग्य के साथ करुणा व चिंता का है। कवि मनुष्य को नीचा नहीं दिखाते, बल्कि स्नेहपूर्वक उसके अहं व संकीर्णता पर हलका व्यंग्य करते हुए चिंता प्रकट करते हैं कि इतना छोटा होकर भी वह भेद क्यों फैलाता है — उद्देश्य सुधार है, निंदा नहीं।
यहाँ ‘दीवारें उठाना’ प्रतीकात्मक है — इसका अर्थ ईंट-पत्थर की दीवार नहीं, बल्कि मन में बनाई गई भेद की दीवारें — जाति, धर्म, अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, स्वार्थ व अविश्वास से उपजी दूरियाँ, जो मनुष्यों को आपस में बाँट देती हैं।
- स्वच्छता अभियान/आपदा-राहत — लोग मिलकर सहयोग करें तो बाढ़/भूकंप जैसी आपदाओं में अनगिनत जानें बचती हैं।
- सहिष्णुता से विविध धर्म-संस्कृति के लोग शांति से साथ रहते हैं — भारत की एकता-में-विविधता इसका प्रमाण है।
- श्रमदान/सामुदायिक कार्य से गाँवों में तालाब, सड़कें, विद्यालय बने — अकेले संभव नहीं था।
इसके विपरीत ईर्ष्या-घृणा केवल झगड़े व विनाश लाती हैं।
अनुमान और कल्पना
मैं मनुष्य की ईर्ष्या, स्वार्थ, घृणा, अहंकार व भेदभाव की आदतें बदलूँगा — ताकि वह प्रेम, सहयोग व समानता से रहे, युद्ध-झगड़े बंद हों और पृथ्वी सुंदर-शांत बने। प्रदूषण फैलाने की आदत भी बदलूँगा। (अपने उत्तर लिखें।)
अपने घर को — क्योंकि वहाँ परिवार का प्यार, माँ का बनाया खाना और अपनापन है; तथा अपनी पृथ्वी को, जो ‘करोड़ों में एक ही’ है। (व्यक्तिगत उत्तर लिखें।)
“मैं अपने कमरे से निकलकर बादलों के ऊपर उड़ चला… नगर, देश और फिर नीली पृथ्वी एक छोटे-से गोले-सी दिखने लगी। चंद्रमा को पार कर मैं तारों के बीच पहुँचा, जहाँ असंख्य रंग-बिरंगे ग्रह घूम रहे थे…” (अपनी कल्पना से आगे बढ़ाएँ।)
“मैं ब्रह्मांड में एक नन्हा-सा कण हूँ — असंख्य तारों और ग्रहों के बीच एक सूक्ष्म बिंदु। फिर भी मेरे भीतर सोचने, प्रेम करने और सृजन करने की शक्ति है। इसी कारण छोटा होकर भी मेरा अस्तित्व अनमोल है, और मुझे अहं छोड़कर विनम्रता से जीना चाहिए।” (अपने शब्दों में लिखें।)
ऐसे व्यक्ति को जो दयालु, समझदार व शांतिप्रिय हो (जैसे कोई वैज्ञानिक, शिक्षक या डॉक्टर) — ताकि वह पृथ्वी का अच्छा प्रतिनिधित्व करे, मेल-मिलाप बढ़ाए और सहयोग से समस्या हल करे। (अपना उत्तर व कारण लिखें।)
झगड़े, धोखा व भेदभाव रुक जाएँगे; लोग एक-दूसरे की सहायता करेंगे, सब बराबरी से रहेंगे, अपराध घटेंगे और चारों ओर प्रेम, विश्वास व शांति का वातावरण बनेगा।
चित्र: विशाल तारों-भरे आकाश में एक नन्हा मानव। प्रतीक: छोटा बिंदु ⟷ बड़ी आकाशगंगा; टूटती हुई दीवार। शब्द: “करोड़ों में एक — फिर भी अनोखा”, “दीवारें गिराओ, हृदय बढ़ाओ”।
सृष्टि → जगत, संसार, ब्रह्मांड, प्रकृति, रचना, जीव-जंतु, नक्षत्र।
पृथ्वी → धरती, भूमि, वसुधा, धरा, ग्रह, संसार, जमीन।
सृजन
सीढ़ीनुमा क्रम बनाइए: कमरा → घर (पास-पड़ोस की विशेष बात) → नगर (कोई प्रसिद्ध स्थान) → देश (विविधता) → पृथ्वी → ब्रह्मांड। नीचे लिखें — “मैं इस चित्र में सबसे नीचे/छोटे स्तर पर हूँ, क्योंकि विराट सृष्टि के सामने मैं एक छोटा-सा अंश हूँ।” (ऊपर दिया गया रेखाचित्र इसका नमूना है।)
“अनगिनत तारों से भरे इस विशाल ब्रह्मांड के एक कोने में, एक छोटे-से नीले ग्रह पर रहता था मानव — इतना छोटा कि ब्रह्मांड उसे देख भी न पाता, फिर भी सपनों से इतना बड़ा कि वह तारों तक पहुँचना चाहता था…” (आगे बढ़ाइए।)
बिना दीवार की दुनिया में कोई जाति-धर्म, अमीर-गरीब या ऊँच-नीच का भेद न होगा। सब एक-दूसरे पर विश्वास करेंगे, मिल-बाँटकर रहेंगे, झगड़े-युद्ध न होंगे — चारों ओर खुलापन, प्रेम और शांति होगी।
कविता की रचना
- बहुत छोटी-छोटी पंक्तियाँ; अधिकतर पंक्तियों का अंतिम शब्द ‘में’।
- छोटे से बड़े की ओर बढ़ता शब्द-दोहराव (कमरा→घर→मोहल्ला→नगर…)।
- प्रश्न शैली व कोमल व्यंग्य; अतिशयोक्ति (संख्यातीत शंख)।
- सरल भाषा, फिर भी गहरा भाव; प्रतीकों का प्रयोग (दीवार, दो दुनिया)।
कविता का सौंदर्य
- कमरे से ब्रह्मांड तक का क्रमिक विस्तार (कमरा→घर→…→ब्रह्मांड)।
- ‘अनगिन नक्षत्र’, ‘लाखों ब्रह्मांड’, ‘हर ब्रह्मांड में कितनी ही पृथ्वियाँ’ जैसी असीमता।
- ‘परिधि नभ गंगा की’ — आकाशगंगा की अपार परिधि।
- ‘करोड़ों में एक ही पृथ्वी’ — संख्या के माध्यम से विराटता बनाम लघुता।
“… ऊँची-ऊँची दीवारें खड़ी करता है / अपने को सबसे बड़ा समझता है / एक आँगन में / कई बँटवारे बना डालता है।” (आप अपनी क्रियाएँ चुनकर रचना कीजिए।)
विशेषण और विशेष्य
| पंक्ति | विशेषण | विशेष्य |
|---|---|---|
| 1. दो व्यक्ति कमरे में | दो | व्यक्ति |
| 2. अनगिन नक्षत्रों में | अनगिन | नक्षत्रों |
| 3. लाखों ब्रह्मांडों में | लाखों | ब्रह्मांडों |
| 4. अपना एक ब्रह्मांड | एक (अपना) | ब्रह्मांड |
| 5. संख्यातीत शंख सी | संख्यातीत | शंख |
| 6. एक कमरे में | एक | कमरे |
| 7. दो दुनिया रचाता है | दो | दुनिया |
आपके प्रश्न (उदाहरण): ब्रह्मांड कितना बड़ा है? तारे कैसे बनते हैं? क्या और ग्रहों पर जीवन है? पृथ्वी जैसा कोई और ग्रह है?
आपकी बात
परीक्षा के समय पढ़ाई का बोझ अधिक और समय कम होना; या एक व्यक्ति पर बहुत-सा काम और सहायता के लिए कोई नहीं — यहाँ काम और समय/संसाधन का अनुपात बिगड़ जाता है।
- किसी को अनदेखा न करना, सबको साथ लेकर चलना।
- जरूरतमंद की सहायता करना, भेदभाव न करना।
- दूसरों की बात धैर्य से सुनना व सहनशीलता रखना।
- छोटी-छोटी बातों पर झगड़ने के बजाय मिल-जुलकर हल निकालना।
भाव — हमारी पृथ्वी अत्यंत दुर्लभ व अनमोल है, इसे सहेजना हमारा कर्तव्य है। उपाय: पेड़ लगाना, जल व बिजली बचाना, प्लास्टिक कम करना, प्रदूषण रोकना, स्वच्छता रखना और जीव-जंतुओं की रक्षा करना।
विनम्रता, सहानुभूति, समानता का भाव, सहयोग और सम्मान — इन गुणों को प्रबल करूँगा ताकि मैं किसी को स्वयं से छोटा या अधीन न समझूँ।
मेरी दीवारें — मंच पर बोलने का डर, नए लोगों से संकोच, असफलता का भय। योजना: छोटे-छोटे कदमों से अभ्यास, आत्मविश्वास बढ़ाना, बड़ों से मार्गदर्शन। समाज में भी जाति/धर्म/भेदभाव की दीवारें होती हैं — हम सबसे समान व्यवहार करके, मेल-जोल बढ़ाकर और भेदभाव का विरोध करके उन्हें गिराने में सहायता कर सकते हैं।
संख्यातीत शंख
झरोखे · कवि-परिचय · खोजबीन
जन्म — मध्य प्रदेश के अशोक नगर जनपद में (1919–1994)। आकाशवाणी में अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रहे। कविताओं के साथ नाटक, गीत, कहानी व निबंध भी लिखे। प्रमुख कृतियाँ — मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, मैं वक्त के हूँ सामने। प्रसिद्ध भावांतर गीत ‘होंगे कामयाब’ के रचयिता।
यह विश्वप्रसिद्ध गीत “We Shall Overcome” का हिंदी भावांतर (भावानुवाद) है। इसका मूल भाव है — आशा, एकता, निर्भयता और दृढ़ विश्वास कि मिलकर, हाथों में हाथ डालकर चलने से हम एक दिन अवश्य सफल होंगे और चारों ओर शांति होगी। (कॉपीराइट कारणों से यहाँ गीत की पंक्तियाँ नहीं दी जा रहीं — इसका आनंद पुस्तक/अधिकृत स्रोत में लीजिए।)
