अन्नाद् आनन्दं प्रति
भृगु–वरुण संवादः · पञ्चकोष-विकासः — सम्पूर्ण-प्रश्नोत्तराणि
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
पाठ्यपुस्तक-अभ्यासः — प्रश्न १ से ८ तक
उदाहरणम् — अन्नेन शरीरं वर्धते।
- अन्नेन शरीरं वर्धते।
- प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्।
- प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
- प्राणात् एव इमानि भूतानि जायन्ते।
- मनसा समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
- विज्ञानेन / बुद्धितत्त्वेन विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
- मनः एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
सूत्रम्: रिक्तस्थानानि पाठस्य पञ्च-कोष-क्रमम् अनुसरन्ति — अन्न → प्राण → मन → विज्ञान। यः कोषः येन क्रियते, तस्य कारणपदं रिक्तस्थाने आगच्छति।
-
भृगोः जिज्ञासा कस्मिन् विषये आसीत्?
भृगोः जिज्ञासा ब्रह्मविषये आसीत्।
-
भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय किम् आचरितम्?
भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय तपः आचरितम्।
-
भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण किं ज्ञातवान्?
भृगुः प्रथमं तपसा अन्नं ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान् (अन्नं वै ब्रह्म)।
-
मनसः के जायन्ते?
मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते।
-
प्राणिनः कस्मात् जायन्ते?
प्राणिनः अन्नात् जायन्ते।
-
इन्द्रियाणि केन सञ्चाल्यन्ते?
इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते।
-
शरीरं कुत्र प्रतिष्ठितम् अस्ति?
शरीरं प्राणे प्रतिष्ठितम् अस्ति।
-
केन विना स्मृतिशक्तेर्विकासो न भवति?
बुद्धितत्त्वेन (विज्ञानेन) विना स्मृतिशक्तेर्विकासो न भवति।
-
भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ज्ञातवान्?
भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्।
अन्नमयकोषः — अन्नेन यानि वर्धन्ते (आयुः · बलम् · ओजः · तेजः …)
उदाहरणम् — प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति → सत्यम्
- प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति। — सत्यम्
- अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम्। — सत्यम्
- प्राणिनः मनसः जायन्ते इति कथनम् अस्ति। — असत्यम्
प्राणिनः अन्नात्/प्राणात् जायन्ते, न तु मनसः।
- अन्नेन शरीरं वर्धते इति। — सत्यम्
- मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति। — असत्यम्
बुद्धिः एव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति, न तु मनः।
- भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽस्ति। — सत्यम्
- भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान्। — सत्यम्
- विना योगे तृतीया विभक्तिर्भवति। — सत्यम्
‘विना’ योगे प्रायः तृतीया विभक्तिः प्रयुज्यते (यथा — धनेन विना)।
| क्रमः | पदम् | उचितं क्रियापदम् | वाक्यम् |
|---|---|---|---|
| (क) | प्राणिनः | ३. जायन्ते | प्राणिनः जायन्ते। |
| (ख) | शरीरम् | ४. वर्धते | शरीरं वर्धते। |
| (ग) | तपः | २. कुरुताम् | तपः कुरुताम्। |
| (घ) | पितरं | ५. ब्रूते | पितरं ब्रूते। |
| (ङ) | यत्नः | १. क्रियताम् | यत्नः क्रियताम्। |
आधारः: कर्तृपदस्य वचनानुसारं क्रियापदं चीयते — ‘प्राणिनः’ (बहुवचनम्) → जायन्ते; ‘शरीरम्’ (एकवचनम्) → वर्धते।
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः | वर्तते | वर्तेते | वर्तन्ते |
| मध्यमः | वर्तसे | वर्तेथे | वर्तध्वे |
| उत्तमः | वर्ते | वर्तावहे | वर्तामहे |
(वर्तते = प्रदत्तम् उदाहरणम्।)
सर्वे एते आत्मनेपदि-धातवः। प्रत्ययाः — प्रथमः: ते/एते/न्ते · मध्यमः: से/एथे/ध्वे · उत्तमः: ए/आवहे/आमहे
| धातुः / रूपम् | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| लभ् (लभते) | लभते · लभसे · लभे | लभेते · लभेथे · लभावहे | लभन्ते · लभध्वे · लभामहे |
| जन् (जायते) | जायते · जायसे · जाये | जायेते · जायेथे · जायावहे | जायन्ते · जायध्वे · जायामहे |
| भाष् (भाषते) | भाषते · भाषसे · भाषे | भाषेते · भाषेथे · भाषावहे | भाषन्ते · भाषध्वे · भाषामहे |
| विद् (विद्यते) | विद्यते · विद्यसे · विद्ये | विद्येते · विद्येथे · विद्यावहे | विद्यन्ते · विद्यध्वे · विद्यामहे |
| मुद् (मोदते) | मोदते · मोदसे · मोदे | मोदेते · मोदेथे · मोदावहे | मोदन्ते · मोदध्वे · मोदामहे |
| सेव् (सेवते) | सेवते · सेवसे · सेवे | सेवेते · सेवेथे · सेवावहे | सेवन्ते · सेवध्वे · सेवामहे |
| सह् (सहते) | सहते · सहसे · सहे | सहेते · सहेथे · सहावहे | सहन्ते · सहध्वे · सहामहे |
| शुभ् (शोभते) | शोभते · शोभसे · शोभे | शोभेते · शोभेथे · शोभावहे | शोभन्ते · शोभध्वे · शोभामहे |
| यत् (यतते) | यतते · यतसे · यते | यतेते · यतेथे · यतावहे | यतन्ते · यतध्वे · यतामहे |
| वृध् (वर्धते) | वर्धते · वर्धसे · वर्धे | वर्धेते · वर्धेथे · वर्धावहे | वर्धन्ते · वर्धध्वे · वर्धामहे |
| मन् (मन्यते) | मन्यते · मन्यसे · मन्ये | मन्येते · मन्येथे · मन्यावहे | मन्यन्ते · मन्यध्वे · मन्यामहे |
| द्युत् (द्योतते) | द्योतते · द्योतसे · द्योते | द्योतेते · द्योतेथे · द्योतावहे | द्योतन्ते · द्योतध्वे · द्योतामहे |
| रुच् (रोचते) | रोचते · रोचसे · रोचे | रोचेते · रोचेथे · रोचावहे | रोचन्ते · रोचध्वे · रोचामहे |
| कम्प् (कम्पते) | कम्पते · कम्पसे · कम्पे | कम्पेते · कम्पेथे · कम्पावहे | कम्पन्ते · कम्पध्वे · कम्पामहे |
| याच् (याचते) | याचते · याचसे · याचे | याचेते · याचेथे · याचावहे | याचन्ते · याचध्वे · याचामहे |
| स्पर्ध् (स्पर्धते) | स्पर्धते · स्पर्धसे · स्पर्धे | स्पर्धेते · स्पर्धेथे · स्पर्धावहे | स्पर्धन्ते · स्पर्धध्वे · स्पर्धामहे |
| लज्ज् (लज्जते) | लज्जते · लज्जसे · लज्जे | लज्जेते · लज्जेथे · लज्जावहे | लज्जन्ते · लज्जध्वे · लज्जामहे |
| क्षि (क्षीयते) | क्षीयते · क्षीयसे · क्षीये | क्षीयेते · क्षीयेथे · क्षीयावहे | क्षीयन्ते · क्षीयध्वे · क्षीयामहे |
प्रत्येकं कोष्ठके क्रमशः प्रथमः · मध्यमः · उत्तमः पुरुषः दर्शितः।
वन्द् व कृ इति प्रदत्ते; अधः मुद् (मोदताम्) व वृध् (वर्धताम्) इति पूरयितव्ये।
| वन्द्-धातुः (लोट्) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः | वन्दताम् | वन्देताम् | वन्दन्ताम् |
| मध्यमः | वन्दस्व | वन्देथाम् | वन्दध्वम् |
| उत्तमः | वन्दै | वन्दावहै | वन्दामहै |
| कृ-धातुः (लोट्) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः | कुरुताम् | कुर्वाताम् | कुर्वताम् |
| मध्यमः | कुरुष्व | कुर्वाथाम् | कुरुध्वम् |
| उत्तमः | करवै | करवावहै | करवामहै |
| १. मुद् (मोदताम्) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः | मोदताम् | मोदेताम् | मोदन्ताम् |
| मध्यमः | मोदस्व | मोदेथाम् | मोदध्वम् |
| उत्तमः | मोदै | मोदावहै | मोदामहै |
| २. वृध् (वर्धताम्) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमः | वर्धताम् | वर्धेताम् | वर्धन्ताम् |
| मध्यमः | वर्धस्व | वर्धेथाम् | वर्धध्वम् |
| उत्तमः | वर्धै | वर्धावहै | वर्धामहै |
क्रियापदानि: लभताम्, सेवताम्, जयताम्, भाषताम्, विद्यताम्, सहताम्, यतताम्, याचताम्, स्पर्धताम्, लज्जताम्, कुरुताम्
| धातुः | एकवचनम् (प्र·म·उ) | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| लभ् | लभताम् · लभस्व · लभै | लभेताम् · लभेथाम् · लभावहै | लभन्ताम् · लभध्वम् · लभामहै |
| सेव् | सेवताम् · सेवस्व · सेवै | सेवेताम् · सेवेथाम् · सेवावहै | सेवन्ताम् · सेवध्वम् · सेवामहै |
| जय् (जि) | जयताम् · जयस्व · जयै | जयेताम् · जयेथाम् · जयावहै | जयन्ताम् · जयध्वम् · जयामहै |
| भाष् | भाषताम् · भाषस्व · भाषै | भाषेताम् · भाषेथाम् · भाषावहै | भाषन्ताम् · भाषध्वम् · भाषामहै |
| विद् | विद्यताम् · विद्यस्व · विद्यै | विद्येताम् · विद्येथाम् · विद्यावहै | विद्यन्ताम् · विद्यध्वम् · विद्यामहै |
| सह् | सहताम् · सहस्व · सहै | सहेताम् · सहेथाम् · सहावहै | सहन्ताम् · सहध्वम् · सहामहै |
| यत् | यतताम् · यतस्व · यतै | यतेताम् · यतेथाम् · यतावहै | यतन्ताम् · यतध्वम् · यतामहै |
| याच् | याचताम् · याचस्व · याचै | याचेताम् · याचेथाम् · याचावहै | याचन्ताम् · याचध्वम् · याचामहै |
| स्पर्ध् | स्पर्धताम् · स्पर्धस्व · स्पर्धै | स्पर्धेताम् · स्पर्धेथाम् · स्पर्धावहै | स्पर्धन्ताम् · स्पर्धध्वम् · स्पर्धामहै |
| लज्ज् | लज्जताम् · लज्जस्व · लज्जै | लज्जेताम् · लज्जेथाम् · लज्जावहै | लज्जन्ताम् · लज्जध्वम् · लज्जामहै |
| कृ | कुरुताम् · कुरुष्व · करवै | कुर्वाताम् · कुर्वाथाम् · करवावहै | कुर्वताम् · कुरुध्वम् · करवामहै |
उदाहरणम् — सः अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवते। → भवान् सदा अन्नम् ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्।
| लट्-लकारः (मूलवाक्यम्) | नूतनं कर्तृपदम् | लोट्-लकारः (समाधानम्) |
|---|---|---|
| बालकः अन्नस्य निन्दां न कुरुते। | भवान् | भवान् अन्नस्य निन्दां न कुरुताम्। |
| मम जीवने यशो वर्धते। | तव | तव जीवने यशो वर्धताम्। |
| अहं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुर्वे। | त्वम् | त्वं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुरुष्व। |
| रमेशः सर्वदा सत्यं भाषते। | दिनेशः | दिनेशः सर्वदा सत्यं भाषताम्। |
| छात्रः लक्ष्यसिद्ध्ये कष्टं सहते। | अहम् | अहं लक्ष्यसिद्ध्ये कष्टं सहै। |
| साधवः सर्वदा रमन्ते। | भवन्तः | भवन्तः सर्वदा रमन्ताम्। |
| भवान् योगेन आरोग्यं लभते। | अहम् | अहं योगेन आरोग्यं लभै। |
| रमा सदा सत्कर्मणि यतते। | लता | लता सदा सत्कर्मणि यतताम्। |
| भक्तः ईश्वरं वन्दते। | त्वम् | त्वं ईश्वरं वन्दस्व। |
नियमः: कर्तृपदस्य पुरुषं वचनं च अनुसृत्य लोट्-रूपं चीयते — भवान्/सः → प्रथमपुरुषः, त्वम् → मध्यमपुरुषः, अहम् → उत्तमपुरुषः।
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
धातुरूप-सारणी · उपनिषद्-श्लोकाः · ‘यस्तु क्रियावान्’ परियोजना-प्रश्नाः
| वन्द्-धातुः (लट्) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | वन्दते | वन्देते | वन्दन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वन्दसे | वन्देथे | वन्दध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वन्दे | वन्दावहे | वन्दामहे |
| कृ-धातुः (लट्) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | कुरुते | कुर्वाते | कुर्वते |
| मध्यमपुरुषः | कुरुषे | कुर्वाथे | कुरुध्वे |
| उत्तमपुरुषः | कुर्वे | कुर्वहे | कुर्महे |
| वन्द् — वाक्ये (देवं वन्द्) | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | भक्तः देवं वन्दते | भक्तौ देवं वन्देते | भक्ताः देवं वन्दन्ते |
| मध्यमपुरुषः | त्वं देवं वन्दसे | युवां देवं वन्देथे | यूयं देवं वन्दध्वे |
| उत्तमपुरुषः | अहं देवं वन्दे | आवां देवं वन्दावहे | वयं देवं वन्दामहे |
| क्रमः | एकवचनरूपम् | बहुवचनरूपम् |
|---|---|---|
| १ | बालकः उद्याने रमते | बालकाः उद्याने रमन्ते |
| २ | शिष्यः गुरुं सेवते | शिष्याः गुरुं सेवन्ते |
| ३ | रात्रौ चन्द्रः राजते | साधुपुरुषाः सर्वत्र राजन्ते |
| ४ | वृक्षः वायुना कम्पते | वृक्षाः वायुना कम्पन्ते |
| ५ | कण्ठे हारः शोभते | वृक्षे पुष्पाणि शोभन्ते |
| ६ | योगासनेन मानवः आरोग्यं लभते | योगासनेन मानवाः आरोग्यं लभन्ते |
| ७ | भिक्षुकः धनं याचते | भिक्षुकाः धनं याचन्ते |
| ८ | छात्रः गृहकार्यं कुरुते | छात्राः गृहकार्यं कुर्वते |
आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः॥— महाभारतम्, वनपर्व १३१/७
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥— हठयोगप्रदीपिका
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥— अमृतबिन्दु-उपनिषद् १/२
अशुद्धं कामसङ्कल्पं शुद्धं कामविवर्जितम्॥— अमृतबिन्दु-उपनिषद् १/१
धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव।— बृहदारण्यकोपनिषद् १/५/३
तत् कर्मणा करोति, यत् कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।— शतपथब्राह्मणम्
मनोमयकोषः — मनसः विषयाः (धृतिः · कामः · श्रद्धा …)
विज्ञानमयकोषः — बुद्धेः शक्तयः (विवेकः · तर्कः · अनुभवः …)
मानवः क्रमशः शरीरेण → प्राणेन → मनसा → बुद्ध्या → अध्यात्मशक्त्या पूर्णविकासं लभते। आदौ अन्नमयकोषस्य, ततः क्रमेण अन्येषां विकासः कर्तव्यः।
उक्तञ्च: आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः, सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः, स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः। — (छान्दोग्योपनिषद् ७/२६/२)
| सेव् (लट्) | एक. | द्वि. | बहु. |
|---|---|---|---|
| प्रथमः | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
| मध्यमः | सेवसे | सेवेथे | सेवध्वे |
| उत्तमः | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
| सेव् (लोट्) | एक. | द्वि. | बहु. |
|---|---|---|---|
| प्रथमः | सेवताम् | सेवेताम् | सेवन्ताम् |
| मध्यमः | सेवस्व | सेवेथाम् | सेवध्वम् |
| उत्तमः | सेवै | सेवावहै | सेवामहै |
एवमेव लभ् व यत् इत्यादीनां धातूनां रूपाणि अभ्यसनीयानि (द्रष्टव्यम् — प्र. ६ व प्र. ८)।
