🪶 उपायं चिन्तयेत्
प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् 🪶
कथा-सारः (कथा का सार)
एक बालक को मार्ग में गिरा हुआ धन मिलता है और वह उससे खिलौने खरीदना चाहता है। उसकी माता समझाती हैं कि पराया धन तिनके के समान त्याज्य है और उसे उसके स्वामी को लौटा देना चाहिए। बालक पूछता है — “अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति?” इसी का उत्तर देने के लिए माता पञ्चतन्त्र की यह कथा सुनाती हैं।
किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नामक दो मित्र रहते थे। पापबुद्धि ने सोचा कि वह मूर्ख तथा निर्धन है, अतः धर्मबुद्धि के सहारे विदेश जाकर धन कमाएगा और बाद में उसे ठगकर सुखी हो जाएगा। दोनों गुरुजनों की आज्ञा लेकर विदेश गए और बहुत धन कमाया।
गाँव के पास आकर पापबुद्धि की सलाह पर दोनों ने अधिकांश धन एक वृक्ष के नीचे भूमि में गाड़ दिया और थोड़ा-सा लेकर घर चले गए। परन्तु रात्रि में पापबुद्धि अकेले जाकर सारा धन निकाल लाया और गड्ढा फिर से भर दिया।
कुछ दिन बाद जब दोनों धन लेने गए तो घड़ा खाली मिला। पापबुद्धि ने सिर पीटते हुए धर्मबुद्धि पर ही चोरी का झूठा आरोप लगाया और न्यायालय (धर्माधिकारी) के पास ले गया। न्यायाधीश ने कहा कि साक्षी के अभाव में वनदेवता ही न्याय करेगी। पापबुद्धि ने अपने पिता को वृक्ष के कोटर में छिपाकर वनदेवता बनकर झूठ बोलने को कहा।
जब कोटर से आवाज़ आई कि “धर्मबुद्धि ने धन लिया”, तो धर्मबुद्धि ने युक्ति से वृक्ष-कोटर में आग लगा दी। अधजला पिता बाहर निकला और बोला कि यह सब पापबुद्धि का किया हुआ है — और मर गया। अन्ततः पापबुद्धि दण्डित हुआ और धर्मबुद्धि की प्रशंसा हुई।
— बुद्धिमान् को उपाय के साथ-साथ उसके परिणाम (हानि) पर भी विचार करना चाहिए।
अन्तर्पाठ प्रश्न (In-text)
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| अटव्याम् | वने | जंगल में | In the forest |
| अपायम् | विघ्नम् | समस्या / संकट | Problem |
| अहनि | दिवसे | दिन के समय | During the day |
| आपः | जलम् | जल | Water |
| उत्फुल्ललोचनाः | उत्फुल्लानि लोचनानि येषां ते | आश्चर्य से फटी आँखों वाले | With surprise |
| खनित्वा | खननं कृत्वा | खोदकर | Having dug |
| द्यौः | आकाशः | आकाश | Sky |
| धरणीपीठे | धरण्याः पीठे | धरती पर | On the earth |
| निक्षिप्य | स्थापयित्वा | रखकर | Having kept |
| निशीथे | अर्धरात्रे | आधी रात में | At midnight |
| परिवेष्ट्य | आवृत्य | घेरकर | Encircling |
| प्रहृष्टमनाः | प्रहृष्टं मनः यस्य सः | प्रसन्न मन वाला | Joyful minded |
| भाण्डम् | पात्रम् | घड़े को | Pot |
| यास्यति | गमिष्यति | जाएगा | Will go |
| वञ्चयित्वा | वञ्चनं कृत्वा | ठगकर | Having deceived |
| वीक्षन्ते | पश्यन्ति | देखते हैं | See |
| व्रजति | गच्छति | जाता है | He goes |
| लोष्ठवत् | पाषाणखण्डवत् | पत्थर के टुकड़े के समान | Like a stone |
| स्फुटितेक्षणः | स्फुटिते ईक्षणे यस्य सः | नष्ट हुई आँखों वाला | One with damaged eyes |
अभ्यासः — अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥
यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥
| वाक्यम् | कः (वक्ता) | कं प्रति (श्रोता) |
|---|---|---|
| (क) वत्स! द्रुतं वद येन तद्द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्। | पापबुद्धेः पिता | पापबुद्धिं प्रति |
| (ख) प्रातःकाले युवाम् अस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। | धर्माधिकारी | धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च प्रति |
| (ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। | पापबुद्धिः | धर्मबुद्धिं प्रति |
| (घ) भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद। | धर्मबुद्धिः | पापबुद्धिं प्रति |
| (ङ) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। | पापबुद्धेः पिता | सर्वान् जनान् प्रति |
| भूतकालिकम् | वर्तमानकालिकम् |
|---|---|
| (क) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। | राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डयन्ति। |
| (ख) पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादितवान्। | पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादयति। |
| (ग) पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगतवान्। | पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगच्छति। |
| (घ) अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्। | अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् वदति। |
| (ङ) सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः। | सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसन्ति। |
| पदम् / विग्रहः | विग्रहः / पदम् |
|---|---|
| (क) गुरुजनाज्ञया | गुरुजनानाम् आज्ञया |
| (ख) वनदेवता | वनस्य देवता |
| (ग) वित्ताभावात् | वित्तस्य अभावात् |
| (घ) बुद्धिप्रभावेण | बुद्धेः प्रभावेण |
| (ङ) धरणीपीठे | धरण्याः पीठे |
| (च) राजकुले | राज्ञः कुले |
- (घ) कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म।
- (ख) ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।
- (ङ) यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ।
- (ग) द्वावपि गत्वा तत्स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।
- (क) भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति।
- (च) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।
- पुस्तकालय से पञ्चतन्त्र की पुस्तक लेकर कोई एक कथा पढ़िए; उसका सारांश संस्कृत में लिखकर कक्षा में सुनाइए। (जैसे — “सिंहः मूषकश्च”, “कः कस्य मित्रम्” आदि।)
- अध्यापक की सहायता से किसी एक कथा पर आधारित लघु-नाटक कक्षा में प्रस्तुत कीजिए — पात्रों के संवाद सरल संस्कृत में रखें।
