तरुण के स्वप्न
मेरी समझ से (क)
- —सुभाषचंद्र बोस के लिए
- ★देश के तरुण वर्ग के लिए
- —चित्तरंजन दास के लिए
- —भारतवासियों के लिए
यह उद्बोधन युवक-सम्मेलन में दिया गया है और बोस कहते हैं “हे मेरे तरुण भाइयो!”। देशबंधु चित्तरंजन दास के स्वप्न के उत्तराधिकारी वे स्वयं तथा वे युवा हैं जिन्हें वे संबोधित कर रहे हैं — अर्थात् ‘हम’ का अभिप्राय देश का तरुण वर्ग है। (व्यापक अर्थ में भारतवासी भी, पर प्रत्यक्ष संबोधन युवाओं को है।)
- —आर्थिक असमानता से
- —स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से
- ★श्रम और कर्म की मर्यादा से
- —जातिभेद से
बोस के आदर्श समाज में आर्थिक विषमता, जातिभेद और स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकार समाप्त करने हैं। राष्ट्र का स्वप्न श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा से साकार होगा — जहाँ परिश्रम का सम्मान हो और आलसी-अकर्मण्य के लिए स्थान न रहे।
- ★हमें उनके स्वप्नों को संजोकर रखना है
- —हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है
- ★उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है
- —उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है
‘उत्तराधिकारी’ का अर्थ है — किसी के बाद उसकी विरासत पाने और आगे बढ़ाने वाला। अतः चित्तरंजन दास के स्वप्न को संजोकर रखना और उसे पूरा करने के लिए स्वयं कर्म करना — दोनों इसमें निहित हैं। केवल चर्चा करना या स्वप्न देखना पर्याप्त नहीं।
- ★राष्ट्र की श्रम-शक्ति बढ़ेगी
- —तरुणों का साहस बढ़ेगा
- —राष्ट्र स्वाधीन बनेगा
- —राष्ट्र स्वप्नदर्शी होगा
जब सबको शिक्षा और उन्नति के समान अवसर मिलेंगे, तो हर व्यक्ति योग्य व कर्मठ बनकर राष्ट्र-निर्माण में योगदान देगा — इससे राष्ट्र की श्रम-शक्ति (उत्पादक क्षमता) में वृद्धि होगी।
मिलकर करें मिलान
पंक्तियों पर चर्चा
(क) “उस समाज में अर्थ की विषमता न हो।”
ऐसा समाज जिसमें आर्थिक असमानता न हो — अमीर और गरीब के बीच भारी खाई न हो; सबके पास जीवन-निर्वाह के समान साधन व अवसर हों। यह आर्थिक समानता का आदर्श है।
(ख) “वही स्वप्न उनकी शक्ति का उत्स बना और उनके आनंद का निर्झर रहा।”
देशबंधु चित्तरंजन दास का स्वाधीन-संपन्न समाज का स्वप्न ही उनकी शक्ति का स्रोत (उत्स) और निरंतर बहने वाले आनंद का झरना (निर्झर) था। उस स्वप्न ने उन्हें ऊर्जा और प्रसन्नता — दोनों दीं।
(ग) “उस समाज में व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो।”
ऐसा समाज जहाँ व्यक्ति राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व मानसिक — हर दृष्टि से स्वतंत्र हो; किसी भी प्रकार के बंधन, भय या सामाजिक दबाव से मुक्त रहकर सम्मान से जी सके।
सोच-विचार के लिए
एक नया सर्वांगीण स्वाधीन, संपन्न और आत्मनिर्भर राष्ट्र, जिसमें —
- व्यक्ति सब दृष्टियों से मुक्त हो, समाज के दबाव से न मरे;
- जातिभेद का स्थान न हो;
- नारी मुक्त होकर पुरुषों के समान अधिकार पाए;
- आर्थिक विषमता न हो, सबको शिक्षा व उन्नति का समान अवसर मिले;
- श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा हो, आलसी-अकर्मण्य के लिए स्थान न रहे;
- विजातीय (विदेशी) प्रभाव से मुक्त, विश्व के समक्ष आदर्श समाज व राष्ट्र बने।
अपने इसी स्वप्न (आदर्श स्वाधीन-संपन्न समाज व राष्ट्र) की प्रतिष्ठा/प्राप्ति को। इस सत्य के लिए वे हर त्याग, हर संकट और प्राण देना भी ‘वह मरण है स्वर्ग समान’ मानते थे। यही स्वप्न उनके क्षुद्र जीवन को सार्थक बनाता है।
क्योंकि राष्ट्र की उन्नति श्रम और कर्म पर निर्भर है। आदर्श समाज में प्रत्येक व्यक्ति को परिश्रम करके अपना और देश का योगदान देना है। आलसी व निकम्मे लोग प्रगति में बाधक बनते हैं, इसलिए कर्मशील समाज में उनके लिए स्थान नहीं — श्रम की मर्यादा बनाए रखने हेतु बोस ने ऐसा कहा।
- मन लगाकर शिक्षा ग्रहण करे और ईमानदारी से परिश्रम करे।
- जाति, धर्म, लिंग का भेद मिटाकर समानता व भाईचारा बढ़ाए।
- नारी का सम्मान और समान अवसर सुनिश्चित करे।
- आत्मनिर्भर भारत / स्वदेशी को बढ़ावा दे, नवाचार करे।
- आलस्य व नशे से दूर रहकर समाज-सेवा व पर्यावरण-रक्षा में जुटे।
- भ्रष्टाचार का विरोध कर देश के विकास में सक्रिय भागीदारी निभाए।
अनुमान और कल्पना से
- राजनीतिक — विदेशी (अंग्रेजी) शासन की गुलामी से।
- सामाजिक — जातिभेद, ऊँच-नीच, रूढ़ियों व कुप्रथाओं से।
- आर्थिक — गरीबी और आर्थिक विषमता से।
- धार्मिक — अंधविश्वास व धार्मिक भेदभाव से।
- मानसिक/वैचारिक — भय और गुलाम मानसिकता से; तथा स्त्रियों के लिए लैंगिक असमानता से।
उस समय समाज में नारी को पुरुष के समान अधिकार व अवसर प्राप्त नहीं थे — वह शिक्षा, संपत्ति और निर्णयों में पीछे थी। बोस मानते थे कि समाज के आधे भाग (नारी) की समान भागीदारी के बिना सच्चा सर्वांगीण-स्वाधीन राष्ट्र संभव नहीं; इसीलिए उन्होंने नारी-मुक्ति व समान अधिकार पर विशेष बल दिया।
दिव्यांगजन, वंचित/पिछड़े व आदिवासी वर्ग, अत्यंत निर्धन परिवार, वृद्धजन, अनाथ व असहाय बच्चे — जिन्हें समानता तक पहुँचने के लिए अतिरिक्त सहयोग, सुविधा व अवसर की आवश्यकता है। (अपने विचार जोड़ें)
उस काल के सामाजिक परिवेश में सार्वजनिक सभाओं/युवक-सम्मेलनों में अधिकतर पुरुष/युवक ही उपस्थित होते थे; स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी सीमित थी और तत्कालीन भाषा-शैली में ‘भाइयो’ सामान्य संबोधन था। (यह एक विडंबना भी है कि नारी-समानता की बात करने वाले बोस का संबोधन परिस्थितिवश ‘भाइयो’ तक रहा।)
युवा वर्ग उत्साह, जोश और प्रेरणा से भर उठा होगा — तालियों की गड़गड़ाहट और ‘जय हिंद’ के नारे गूँजे होंगे। अनेक युवाओं ने इस स्वप्न को अपना ध्येय बनाकर देश-सेवा व स्वतंत्रता-संग्राम में कूदने का संकल्प लिया होगा।
शीर्षक
क्योंकि यह उद्बोधन तरुणों (युवाओं) को संबोधित है और उनमें एक आदर्श स्वाधीन-संपन्न समाज व राष्ट्र का स्वप्न जगाता है। बोस यही स्वप्न युवाओं को उपहारस्वरूप सौंपते हैं ताकि वे उसे साकार करें। इस प्रकार शीर्षक विषय-वस्तु से पूर्णतः मेल खाता है।
जैसे “नए भारत का स्वप्न”, “स्वप्न का उपहार”, “युवाओं के नाम संदेश”, “आदर्श राष्ट्र की कल्पना”। मैं “नए भारत का स्वप्न” रखूँगा क्योंकि यह बोस द्वारा कल्पित स्वाधीन-संपन्न आदर्श राष्ट्र को सीधे दर्शाता है। (आप अपना नाम व तर्क लिखें।)
विषय — शिक्षा का महत्व, अनुशासन व समय-प्रबंधन, स्वच्छता, पर्यावरण-रक्षा, एकता व सहयोग, नशा-मुक्ति। शीर्षक — “हमारा संकल्प” / “बेहतर कल की ओर”। (अपनी पसंद चुनें व कारण लिखें।)
भाषा की बात
| विशेषता / गुण | शब्द |
|---|---|
| अखंड | सत्य |
| सर्वांगीण / स्वाधीन / संपन्न | समाज |
| स्वाधीन / आदर्श | राष्ट्र |
| क्षुद्र | जीवन |
| असीम | शक्ति |
| अपार | आनंद |
जैसे — शाश्वत सत्य, समतामूलक समाज, सशक्त राष्ट्र, सार्थक जीवन, अदम्य शक्ति, शुद्ध आनंद। ये विशेषण इन शब्दों के सकारात्मक व आदर्श गुणों को और स्पष्ट करते हैं। (अपने शब्द व कारण लिखें।)
विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग
| शब्द (स्तंभ 1) | विपरीतार्थक (स्तंभ 2) |
|---|---|
| 1. स्वीकार | अस्वीकार |
| 2. सार्थक | निरर्थक |
| 3. विषमता | समानता |
| 4. क्षुद्र | विशाल / वृहत / विराट / महान |
| 5. संपन्न | विपन्न |
| 6. अकर्मण्य | कर्मण्य / कर्मठ |
| 7. मरण | जीवन |
- स्वीकार/अस्वीकार — उसने प्रस्ताव तो स्वीकार किया, पर अनुचित शर्तें अस्वीकार कर दीं।
- सार्थक/निरर्थक — परिश्रम से जीवन सार्थक बनता है, आलस्य से निरर्थक।
- विषमता/समानता — समाज में आर्थिक विषमता मिटाकर समानता लानी होगी।
- क्षुद्र/विशाल — क्षुद्र स्वार्थ त्यागकर विशाल हृदय अपनाओ।
- संपन्न/विपन्न — संपन्न लोगों को विपन्न वर्ग की सहायता करनी चाहिए।
- अकर्मण्य/कर्मण्य — समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं, अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है।
- मरण/जीवन — देश के लिए मरण भी सामान्य जीवन से कहीं श्रेष्ठ है।
आपकी बात
विद्यालय — स्वच्छ, अनुशासित व सबके लिए समान, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा। राज्य — सबको रोज़गार, अच्छी सड़कें-अस्पताल-विद्यालय, अपराध-मुक्त। देश — आत्मनिर्भर, भ्रष्टाचार-मुक्त, जहाँ हर नागरिक शिक्षित, सुखी और समान हो। (अपने स्वप्न लिखें।)
- संविधान व कानून का पालन तथा अपने कर्तव्यों का निर्वाह।
- जागरूक नागरिक बनकर मतदान करना।
- एकता व भाईचारा बनाए रखना; विभाजनकारी ताकतों/अफवाहों का विरोध।
- राष्ट्रीय संपत्ति की रक्षा और स्वदेशी को बढ़ावा।
- ईमानदारी, परिश्रम और देश-सेवा की भावना।
मिलान कीजिए — स्वतंत्रता सेनानी
चित्तरंजन दास (देशबंधु चित्तरंजन दास) — जिन्हें पाठ में बोस के राजनीतिक गुरु तथा जिनके स्वप्न का उत्तराधिकारी बताया गया है।
सर्वांगीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास
- संविधान — समानता, मौलिक अधिकार, सबको मताधिकार (नारी को भी)।
- पंचवर्षीय योजनाएँ व बैंकों का राष्ट्रीयकरण; हरित क्रांति।
- शिक्षा का अधिकार (RTE), सर्व शिक्षा अभियान, छात्रवृत्तियाँ।
- आरक्षण व पिछड़े-वंचित वर्गों के कल्याण की योजनाएँ।
- महिला सशक्तीकरण — बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पंचायत आरक्षण।
- आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत।
- ISRO/रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता (अंतरिक्ष, BrahMos आदि)।
स्त्री सशक्तीकरण
- पुरुषों के समान मताधिकार व समान वेतन का अधिकार।
- शिक्षा प्रोत्साहन — बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, निःशुल्क/रियायती शिक्षा व छात्रवृत्ति।
- मातृत्व अवकाश, संपत्ति में समान अधिकार।
- पंचायत/स्थानीय निकाय व कई स्थानों पर विधायी आरक्षण।
- घरेलू हिंसा व कार्यस्थल-उत्पीड़न से सुरक्षा कानून, हेल्पलाइन (1091/181)।
टुकड़ी का नाम — रानी झाँसी रेजिमेंट (Rani of Jhansi Regiment), जिसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया। भूमिका — यह पूर्णतः महिला सैनिकों की टुकड़ी थी जिसने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र संग्राम, युद्ध-प्रशिक्षण व नर्सिंग कार्य किया। यह नारी-शक्ति और स्वतंत्रता-संग्राम में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी का प्रेरक प्रतीक बनी।
नारे और स्वतंत्रता सेनानी
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी |
|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है। | बाल गंगाधर तिलक (लोकमान्य तिलक) |
| करो या मरो | महात्मा गाँधी |
| मैं आजाद हूँ, आजाद रहूँगा और आजाद ही मरूँगा | चंद्रशेखर आजाद |
| इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद | भगत सिंह |
| पूर्ण स्वराज | पंडित जवाहरलाल नेहरू |
झरोखे से · शब्दार्थ · खोजबीन
मांडले जेल से अनिलचंद्र विश्वास को लिखे पत्र में बोस ने गृह व कुटीर उद्योग पर विचार रखे — बेंत का काम, मिट्टी के खिलौने, और विशेषकर सीप के बटन बनाना (बंगाल के गाँवों में घर-घर, स्त्री-पुरुष फुरसत में करते थे)। उनका मत था कि कम लागत में, थोड़े यंत्रों व कच्चे माल से यह काम शुरू कर गरीब परिवार अपनी आय बढ़ा सकते हैं; समिति सस्ता कच्चा माल जुटाकर तैयार वस्तुएँ बेच सके। यह स्वदेशी व आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का बीज था।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| उत्तराधिकारी | किसी के बाद उसकी विरासत/संपत्ति पाने वाला, वारिस |
| उत्स | स्रोत, सोता, उद्गम |
| निर्झर | झरना, प्रपात |
| सर्वांगीण | सब अंगों/पक्षों में व्याप्त, चहुँमुखी |
| स्वाधीन | स्वतंत्र, आजाद, अपने ही अधीन |
| अकर्मण्य | कर्म के अयोग्य, आलसी, निकम्मा |
| क्षुद्र | छोटा, तुच्छ |
| अखंड | अटूट, संपूर्ण, बाधारहित |
| विजातीय | भिन्न जाति/वर्ग का, पराया (विदेशी) |
