स्वदेश
कवि — गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ (1883–1972)
पाठ से
मेरी समझ से
- ○सामाजिकता से
- ✓संवेदनहीनता से★
- ✓कठोरता से★
- ○नैतिकता से
पत्थर कठोर और भावशून्य होता है। उसमें कोई संवेदना या कोमलता नहीं होती। कवि कहना चाहता है कि जिस व्यक्ति के हृदय में अपने देश के प्रति प्रेम नहीं है, वह हृदय पत्थर के समान कठोर और संवेदनहीन है। इसीलिए ‘संवेदनहीनता’ और ‘कठोरता’ दोनों सही उत्तर हैं।
- ○देश की प्रगति
- ✓देश के प्रति प्रेम★
- ○देश की सुरक्षा
- ○देश की स्वतंत्रता
पूरी कविता में बार-बार यह टेक (पंक्ति) दोहराई गई है — “जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” कवि का सारा बल इसी बात पर है कि हृदय में देश के प्रति प्रेम होना चाहिए। प्रगति, सुरक्षा व स्वतंत्रता तो इसी प्रेम के परिणाम हैं, परन्तु कविता का मुख्य भाव देश-प्रेम ही है।
- ○देश के प्राकृतिक संसाधनों के लिए
- ○देश की शासन व्यवस्था के लिए
- ✓देश के समस्त नागरिकों के लिए★
- ○देश के सभी प्राणियों के लिए
कवि कहता है कि इस देश के सभी नागरिक ही इसके राजा-रानी हैं। अर्थात् यह देश किसी एक का नहीं, बल्कि हम सबका अपना है और इसकी देखभाल व उन्नति का दायित्व हम सब नागरिकों पर है।
- ○जिसमें साहस की कमी है
- ○जिसमें स्नेह का भाव नहीं है
- ✓जिसमें देश-प्रेम का भाव नहीं है★
- ○जिसमें स्फूर्ति और उमंग नहीं है
कविता की मूल टेक है — “वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।” अतः कवि के अनुसार वही हृदय पत्थर के समान है जिसमें देश-प्रेम (स्वदेश का प्यार) का भाव नहीं है।
मैंने ये उत्तर इसलिए चुने क्योंकि वे कविता के मूल भाव से सीधे जुड़ते हैं — पत्थर का अर्थ है कठोरता व संवेदनहीनता; कविता की हर पंक्ति देश-प्रेम की ओर संकेत करती है; तथा ‘हम’ शब्द देश के सभी नागरिकों के स्वामित्व को दर्शाता है। कुछ साथियों ने “स्नेह का भाव नहीं” भी चुना होगा, जो आंशिक रूप से सही है, परन्तु कविता का केंद्रीय बल ‘देश-प्रेम’ पर है, इसलिए मेरा उत्तर अधिक उपयुक्त है।
मिलकर करें मिलान
पंक्तियों पर चर्चा
कवि कहता है कि यह बात निश्चित और निःसंदेह है कि प्राण (जान) एक न एक दिन इस संसार से चले ही जाएँगे — अर्थात् मृत्यु अटल है। जैसे ‘काल रूपी दीपक’ निरंतर जलता रहता है और परवाने (पतंगे) उस पर जलकर मर मिटते हैं, वैसे ही मनुष्य का जीवन भी क्षणभंगुर है। इसलिए कवि प्रेरणा देता है कि जब मरना निश्चित ही है, तो क्यों न देश के लिए जीवन समर्पित करके सार्थक मृत्यु को गले लगाया जाए।
कवि कहता है कि देश की उन्नति और रक्षा का सारा दायित्व हमारे अपने हाथों में है। इसके लिए हमें तोप-तलवार जैसे हथियारों की आवश्यकता नहीं — हमारा साहस, परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति ही हमारे सच्चे अस्त्र-शस्त्र हैं। अंत में कवि फिर दोहराता है कि जिस हृदय में देश का प्यार नहीं, वह तो पत्थर के समान निर्जीव व कठोर है।
जिस हृदय में कोमल भावनाएँ, प्रेम, करुणा और संवेदना का प्रवाह (रस-धार) नहीं बहता, वह हृदय जीवित होते हुए भी पत्थर के समान निर्जीव है। सच्चा मनुष्य वही है जिसका हृदय भावनाओं से परिपूर्ण हो और जिसमें अपने देश के प्रति गहरा प्रेम हो।
सोच-विचार के लिए
‘राजा-रानी’ देश के सभी नागरिकों को कहा गया है। ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि यह देश हम सबका अपना है, इस पर हमारा अधिकार है और हम ही इसके स्वामी हैं। जैसे राजा-रानी अपने राज्य की देखभाल व रक्षा करते हैं, वैसे ही प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने देश की उन्नति व रक्षा का दायित्व निभाए।
‘संसार-संग’ चलने का अर्थ है — समय और समाज के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ना, प्रगति करना तथा मिल-जुलकर रहना। जो व्यक्ति समय व समाज के साथ नहीं चलता, वह पीछे छूट जाता है और लोग उसे भुला देते हैं। इसी कारण संसार उसका नहीं हो पाता — अर्थात् समाज में उसका कोई महत्व या स्थान नहीं रह जाता।
‘पसीजना’ का अर्थ है — द्रवित होना, हृदय का पिघलना। कवि कहता है कि जिस व्यक्ति का हृदय अपने देश के दुख-दर्द को देखकर पिघलता नहीं, जो देश के लिए कोई करुणा या प्रेम महसूस नहीं करता, वह व्यक्ति इस धरती (भू) पर केवल बोझ है। ऐसे संवेदनहीन व्यक्ति का जीवित रहना निरर्थक है।
देश-प्रेम का अर्थ केवल सीमा पर युद्ध करना नहीं है। अपने देश की मिट्टी, संस्कृति, भाषा और प्राकृतिक संसाधनों से प्रेम करना, देश की उन्नति में योगदान देना, स्वच्छता बनाए रखना, नियमों का पालन करना, ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाना, ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना — यह सब देश-प्रेम के ही रूप हैं। संक्षेप में, अपने आचरण से देश को बेहतर बनाना ही सच्चा देश-प्रेम है।
इस आह्वान गीत की मुख्य विशेषताएँ हैं —
• ओज व जोश से भरी भाषा जो पाठक के मन में देश-प्रेम जगाती है।
• ‘नहीं’ शब्द की पुनरावृत्ति तथा टेक का बार-बार दोहराव, जिससे भाव गहराता है।
• तुकांत व लयात्मकता (सार-पार-भार, रानी-पानी आदि) से गेयता आई है।
• प्रश्न-शैली का प्रयोग, जो पाठक को सोचने व झकझोरने के लिए प्रेरित करती है।
• सरल खड़ी बोली में बलिदान, साहस व आत्मविश्वास का संदेश।
अनुमान और कल्पना से
यहाँ ‘खजाने’ से तात्पर्य भारत की प्राकृतिक संपदा (सोना, खनिज, रत्न, उपजाऊ भूमि, नदियाँ, वन) तथा ज्ञान-संपदा (वेद, शास्त्र, विज्ञान, कला व संस्कृति) से है। भारत ने सदियों से विश्व को अनेक बहुमूल्य रत्न — चाहे वे ज्ञान के हों या प्रकृति के — खुले हृदय से दिए हैं। इसीलिए कहा गया कि इस देश ने ‘खजाने खोल दिए हैं’।
‘उगे-बढ़े’ शब्द देश के नागरिकों (हम सब मनुष्यों) के लिए कहा गया है। हम इसी देश की मिट्टी में जन्मे, इसी का अन्न-जल पाकर पले-बढ़े। यह कहकर कवि यह भाव जगाना चाहता है कि जिस धरती ने हमें जीवन व पोषण दिया, उसके प्रति हमारे मन में गहरा लगाव और कृतज्ञता का भाव होना ही चाहिए।
पत्थर कठोर, भावहीन और संवेदनाशून्य होता है। जिस हृदय में देश-प्रेम और कोमल भावनाएँ नहीं हैं, वह भी पत्थर जैसा ही कठोर व निर्जीव होता है। इस तुलना (रूपक) द्वारा कवि संवेदनहीन हृदय पर तीखा कटाक्ष करता है और देश-प्रेम के महत्व को और अधिक प्रभावशाली ढंग से उभारता है।
पत्थर कहता है — “जब मैं नदी में था तो नदी की धारा मुझे बदलती भी थी, रगड़-रगड़कर मुझे चिकना बनाती थी। मैं इधर-उधर लुढ़कता रहता था। फिर एक दिन किसी ने मुझे उठाकर भवन की नींव में रख दिया। मैं कठोर हूँ, चुपचाप सबका भार सहता हूँ, पर बोल नहीं सकता।”
मैं उससे कहूँगा — “हे पत्थर! तुम कठोर ज़रूर हो, पर इमारतों की नींव बनकर तुम बहुत उपयोगी हो। फिर भी मैं चाहूँगा कि मनुष्य का हृदय तुम्हारे जैसा कठोर कभी न बने; उसमें तो प्रेम, करुणा और अपने देश के लिए संवेदना का प्रवाह सदा बहता रहना चाहिए।”
संरक्षण की आवश्यकता वाले संसाधन — जल, वन व पेड़-पौधे, वन्य-जीव, नदियाँ, स्वच्छ वायु, उपजाऊ मिट्टी, ऐतिहासिक स्मारक/धरोहरें, ऊर्जा (बिजली) तथा खनिज।
क्यों — ये सभी संसाधन सीमित हैं और प्रदूषण व अति-उपयोग के कारण तेज़ी से घट रहे हैं। इन्हें बचाना पर्यावरण-संतुलन, देश की सुंदरता-पहचान तथा आने वाली पीढ़ियों के सुखद भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।
कविता की रचना
‘दाना-पानी’ और ‘राजा-रानी’ की भाँति तुक मिलाने से कविता में लय, संगीतात्मकता और मधुरता आ गई है। इससे कविता पढ़ने-सुनने में मधुर व प्रवाहपूर्ण लगती है, याद रखना आसान हो जाता है और भाव अधिक प्रभावशाली ढंग से मन तक पहुँचते हैं।
• तुकांत व अनुप्रास से लय।
• टेक की पुनरावृत्ति — “वह हृदय नहीं है पत्थर है”।
• ओजपूर्ण शब्दावली व सरल खड़ी बोली।
• प्रश्न-शैली — “क्या तोप नहीं तलवार नहीं?”।
• सुंदर बिंब/प्रतीक — काल-दीप, परवाने, पत्थर, खजाने।
• ‘है’ को पंक्ति के आरंभ में रखकर लयात्मकता।
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।
जो माटी का कर्ज़ न चुका सके,
ऐसा कोई किरदार नहीं॥
हम मिलकर देश सजाएँगे,
घर-घर ज्ञान का दीप जलाएँगे।
हर कोना स्वच्छ बनाएँगे,
यह वतन हमें है प्यारा रे॥
भाषा की बात
“जिस पर हैं मरते ज्ञानी भी, जिस पर है दुनिया दीवानी॥”
परिवर्तन: जब ‘है/हैं’ पंक्ति के आरंभ में आता है तो कविता में लयात्मकता व गेयता बढ़ जाती है और वह अधिक मधुर लगती है। यदि ‘है’ को अंत में रखें (“ज्ञानी भी मरते हैं जिस पर”) तो वह गद्य जैसी लगने लगती है तथा उसका काव्य-सौंदर्य कम हो जाता है।
धरा, पृथ्वी
प्रदीप, दीपक
दिल, जी
कृपाण, असि
संसार, जग
पाहन, पाषाण
मैं शीर्षक चुनूँगा — “वह हृदय नहीं है पत्थर है” अथवा “जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं”।
कारण: यही पंक्ति पूरी कविता की केंद्रीय भाव-रेखा (टेक) है और बार-बार दोहराई गई है। यह सीधे-सीधे देश-प्रेम के महत्व को व्यक्त करती है तथा पाठक के हृदय को झकझोरती है, इसलिए यह सबसे उपयुक्त शीर्षक होगा।
पाठ से आगे
आपकी बात
देश-प्रेम केवल झंडे को सलामी देने तक सीमित नहीं है। पौधों को पानी देना, सफ़ाई करना, बुज़ुर्गों व ज़रूरतमंदों की मदद करना, अनुशासन से कतार में लगना, खेल में देश का नाम रोशन करना और सैनिकों का सम्मान करना — ये सभी कार्य देश व समाज को बेहतर बनाते हैं, इसलिए ये देश-प्रेम हैं।
इसके विपरीत, सार्वजनिक स्थान को गंदा करना, स्मारकों को नुकसान पहुँचाना, नियम तोड़कर फूल तोड़ना तथा पानी-बिजली की बर्बादी करना देश के संसाधनों व सौंदर्य को हानि पहुँचाते हैं, इसलिए ये देश-प्रेम के विरुद्ध हैं।
हमारे अस्त्र-शस्त्र
यह कक्षा-गतिविधि है — सभी विद्यार्थी अपनी-अपनी भाषा में देश-प्रेम से संबंधित कविताओं/गीतों का संकलन करें और किसी एक गीत की संगीतात्मक प्रस्तुति दें।
उदाहरण देशभक्ति गीत: ‘सारे जहाँ से अच्छा’, ‘वंदे मातरम्’, ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’, ‘झंडा ऊँचा रहे हमारा’, ‘ऐ मेरे प्यारे वतन’।
तिरंगा झंडा — कब प्रसन्न और कब उदास
तिरंगा प्रसन्न होगा जब — मैंने मन लगाकर पढ़ाई की, स्वच्छता रखी, किसी ज़रूरतमंद की मदद की, सच बोला, समय का सदुपयोग किया, पानी-बिजली बचाई और राष्ट्रध्वज तथा बड़ों का सम्मान किया।
तिरंगा उदास होगा जब — मैंने गंदगी फैलाई, किसी से झगड़ा किया, झूठ बोला, समय व संसाधनों (पानी, बिजली) की बर्बादी की, या किसी सार्वजनिक संपत्ति/धरोहर को नुकसान पहुँचाया।
झरोखे से · साझी समझ
दोनों ही कविताएँ स्वतंत्रता-आंदोलन के समय राष्ट्रप्रेम जगाने के लिए लिखी गईं।
‘स्वदेश’ में कवि कहता है कि जिसके हृदय में देश का प्यार नहीं, वह पत्थर के समान है — यहाँ देश-प्रेम सीधे हृदय की भावना व बलिदान के रूप में व्यक्त हुआ है।
‘खादी गीत’ में देश-प्रेम स्वदेशी वस्त्र खादी के प्रति गर्व, अपनेपन व आत्मनिर्भरता के रूप में प्रकट हुआ है — खादी के धागे-धागे में माँ का मान, भाई का प्यार और नवजीवन की ज्योति का भाव भरा है।
