Chapter 3 आवारा मसीहा | class 11th | Important Question for Hindi Antral

आवारा मसीहा पाठ के प्रश्न उत्तर

प्रश्न-1 ”उस समय वह सोच भी नहीं सकता था कि मनुष्य को दुख पहुँचाने के अलावा भी साहित्य का कोई उद्देश्य हो सकता है।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा ? आपके विचार से साहित्य के कौन-कौन से उद्देश्य हो सकते हैं ? 

उत्तर- 
”उस समय वह सोच भी नहीं सकता था कि मनुष्य को दुख पहुँचाने के अलावा भी साहित्य का कोई उद्देश्य हो सकता है।” — लेखक ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि विद्यालय में शरतचंद्र को सीता-वनवास, चारू-पाठ, सद्भाव-सद्गुण तथा प्रकांड व्याकरण जैसी साहित्यिक रचनाएँ पढ़नी पड़ती थी, जो उन्हें पसंद नहीं आता था | पंडित जी द्वारा रोज परीक्षा लिए जाने पर उन्हें मार भी पड़ता था | 

हमारे विचार से साहित्य के निम्नलिखित उद्देश्य हो सकते हैं —  

• साहित्य का उद्देश्य मनुष्य के लिए ज्ञान अर्जन के साथ-साथ उसके विवेक को बढ़ाना है | 

• साहित्य कहीं न कहीं मनुष्य के मनोरंजन का  साधन भी है | 

प्रश्न-2 पाठ के आधार पर बताइए कि उस समय के और वर्तमान समय के पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीकों में क्या अंतर और समानताएँ हैं ? आप पढ़ने-पढ़ाने के कौन से तौर-तरीकों के पक्ष में हैं और क्यों ? 

उत्तर- पाठ के आधार पर उस समय के और वर्तमान समय के पढ़ने-पढ़ाने के तौर-तरीकों में अंतर और समानताएँ निम्नलिखित हैं — 

• वैसे तो पूर्व और वर्तमान समय में अनुशासन का विशेष महत्व है | लेकिन पूर्व समय की अपेक्षा वर्तमान समय में व्यवहारिक या जीविका केंद्रित शिक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है | 

• पूर्व में बच्चों की समय-समय पर परीक्षाएँ ली जाती थीं, जो आज भी शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा है | इस तरह का दबाव बच्चों को पढ़ाई से दूर करता है और पढ़ाई का भय उनके मन में भर देता है | 

• पूर्व में पढ़ाई को अधिक महत्व दिया जाता था |  खेलकूद आदि को महत्वपूर्ण नहीं माना जाता था | 

प्रश्न-3 पाठ में अनेक अंश बाल सुलभ चंचलताओं, शरारतों को बहुत रोचक ढंग से उजागर करते हैं। आपको कौन सा अंश अच्छा लगा और क्यों? वर्तमान समय में इन बाल सुलभ क्रियाओं में क्या परिवर्तन आए हैं ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, वैसे तो यह पाठ बहुत सी बाल सुलभ चंचलताओं और शरारतों से भरा पड़ा है | परन्तु, शरतचंद्र का तितली पकड़ना, तालाब में नहाना, उपवन लगाना, पशु-पक्षी पालना, पिता के पुस्तकालय से पुस्तकें पढ़ना और पुस्तकों में दी गई जानकारी का प्रयोग करना जैसे अंश मुझे बहुत पसंद आया | क्योंकि शरतचंद्र जो कुछ भी सीखते थे, उसे अपने व्यावहारिक जीवन में भी लागू या प्रयोग करते थे | एक बार तो उन्होंने पुस्तक में साँप के वश में करने का मंत्र तक पढ़कर उसका प्रयोग कर डाला | 

आज के समय में बाल सुलभ क्रियाओं में बहुत परिवर्तन आएँ हैं | बच्चे आधुनिकता के प्रति ज्यादा आकर्षित हैं | उन्हें प्रकृति से कम और गेजेट्स से ज़्यादा लगाव है | आज घने इमारतों के बीच बच्चों को प्रकृति का वास्तविक वातावरण ही नहीं मिलता है | 

प्रश्न-4 नाना के घर किन-किन बातों का निषेध था ? शरत् को उन निषिद्ध कार्यों को करना क्यों प्रिय था ? 

उत्तर- प्रस्तुत पाठ के अनुसार, शरदचंद्र के नाना बेहद सख़्त-मिजाज़ी इंसान थे। उन्होंने बच्चों को बहुत सी बातें करने से मना कर रखा था | जैसे — पशु तथा पक्षियों को पालना, तालाब में नहाना, बाहर जाकर खेलना, उपवन लगाना, घूमना, पतंग, लट्टू, गिल्ली-डंडा तथा गोली इत्यादि खेलना | 

शरतचंद्र आजाद प्रवृत्ति का व्यक्ति था | नाना की सख़्ती और रोक-टोक उसे बंधन लगता था | वह बिल्कुल विद्रोही के समान तमाम बंधनों को तोड़ता था | वास्तव में, जिन चीज़ों पर उसके नाना रोक-टोक किया करते थे, वे सभी आयाम उसे प्रिय लगते थे | 

प्रश्न-5 आपको शरत् और उसके पिता मोतीलाल के स्वभाव में क्या समानताएँ नज़र आती हैं ? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए | 

उत्तर- 
शरत् और उसके पिता मोतीलाल के स्वभाव में जो समानताएँ नज़र आती हैं, वे निम्नलिखित हैं — 

• शरतचंद्र और उनके पिता दोनों आजाद प्रवृत्ति के व्यक्ति थे | इसलिए नाना के द्वारा लगाए गए बंधनों के बावजूद भी शरत कभी नहीं रुका | 
• शरत और उनके पिताजी दोनों साहित्य पढ़ने और लिखने के शौकीन थे | शरत ने पिता के पुस्तकालय की लगभग सभी पुस्तकें पढ़ ली थीं | 

प्रश्न-6 ”जो रुदन के विभिन्न रूपों को पहचानता है वह साधारण बालक नहीं है। बड़ा होकर वह निश्चय ही मनस्तत्व के व्यापार में प्रसिद्ध होगा।” अघोर बाबू के मित्र की इस टिप्पणी पर अपनी टिप्पणी कीजिए | 

उत्तर- 
प्रस्तुत पाठ के अनुसार, ”जो रुदन के विभिन्न रूपों को पहचानता है वह साधारण बालक नहीं है। बड़ा होकर वह निश्चय ही मनस्तत्व के व्यापार में प्रसिद्ध होगा।” — अघोर बाबू के मित्र ने यह टिप्पणी बालक शरतचंद्र के भाव की विभिन्नता को समझने की क्षमता के आधार पर की थी | अघोर बाबू के मित्र जानते थे कि साहित्य सृजन के लिए मनुष्य का अति संवेदनशील होना ज़रूरी है, जो गुण शरतचंद्र में विद्यमान था | बालक शरतचंद्र अपने आस-पास के वातावरण तथा परिवेश का सूक्ष्म निरीक्षण करने में दक्ष थे | अतः अघोर बाबू जानते थे कि जिस बालक में इस प्रकार की क्षमता इस समय मौजूद है, तो आगे चलकर यह बालक मनस्तत्व के व्यापार में प्रसिद्ध होगा। अघोर बाबू का उक्त कथन आगे चलकर सत्य साबित हुआ | बेशक, शरतचंद्र की प्रत्येक रचना अघोर बाबू की दूरदृष्टि को सत्य सिद्ध करता है | 

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Chapter 2 हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी | class 11th | Important Question for Hindi Antral

 हुसैन की कहानी अपनी जुबानी Class 11 Chapter 2 Important Question Answer

प्रश्न 1. लेखक ने अपने पाँच मित्रों के जो शब्द-चित्र प्रस्तुत किए हैं, उनसे उनके अलग-अलग व्यक्तित्व की झलक मिलती है। फिर भी वे घनिष्ठ मित्र हैं, कैसे?

उत्तर-लेखक ने अपने पाँच मित्रों के जो शब्द-चित्र प्रस्तुत किए हैं, उसके अनुसार पाँचों के स्वभाव अलग-अलग हैं, किंतु इससे उनकी मित्रता पर कभी फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उन सब में कलाकार की सोच विद्यमान थी| पाँचों की मित्रता स्वार्थ पर आधारित नहीं थी इसलिए वे घनिष्ठ मित्र थे।

प्रश्न 2. ‘प्रतिभा छुपाये नहीं छुपती’ कथन के आधार पर मकबूल फिदा हुसैन के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।

उत्तर-लेखक को अपने दादा से विशेष लगाव था जिसका प्रमाण इस घटना से मिलता है कि जब लेखक के दादाजी की मृत्यु हुई तो वह अपने दादाजी के कमरे में ही बंद रहने लगा। वह अपने दादाजी के बिस्तर पर उनकी भूरी अचकन ओढ़कर – इस प्रकार सोता था मानो वह अपने दादाजी से लिपटकर सोया हुआ है।

प्रश्न 3. ‘लेखक जन्मजात कलाकार है।’-इस आत्मकथा में सबसे पहले यह कहाँ उद्घाटित होता है?

उत्तर-“लेखक जन्मजात कलाकार है,” ‘इस बात का पता इस पाठ में उस समय चलता है जब बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल में जथा उस समय उसके ड्राइंग के शिक्षक मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैक बोर्ड पर सफेद चॉक से एक बड़ी-सी चिड़िया बनाई और लड़कों से कहा कि ‘अपनी-अपनी स्लेट पर इस चिड़िया की नकल करो।’ मकबूल फिदा हुसैन ने उस चिड़िया को बिल्कुल उसी तरह से बना दिया जैसे मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैक बोर्ड पर बनाई थी।

प्रश्न 4. दुकान पर बैठे-बैठे भी मकबूल के भीतर का कलाकार उसके किन कार्यकलापों से अभिव्यक्त होता है?

उत्तर-मकबूल फिदा हुसैन को पेंटिंग से बहुत लगाव था। जब कभी वह दुकान पर बैठते तो वहाँ भी कुछ-न-कुछ ड्राइंग बनाते रहते थे। पेंटिंग से उसका प्यार इतना अधिक था कि हिसाब की किताब में दस रुपये लिखता था तो ड्राइंग की कॉपी में बीस चित्र बना देता था। कान के सामने से अकसर चूँघट ताने गुजरने वाली एक मेहतरानी का स्केच, गेहूँ की बोरी उठाए मजदूर की पेंचवाली पगड़ी का स्केच, पठान की दाढ़ी और माथे पर सिजदे के निशान, बुरका पहने औरत और बकरी के बच्चे का वह स्केच बनाया करता था। अपनी पहली ऑयल पेंटिंग भी उसने दुकान पर रहकर ही बनायी थी।

प्रश्न 5. प्रचार-प्रसार के पुराने तरीकों और वर्तमान तरीकों में क्या फ़र्क आया है? पाठ के आधार पर बताएँ।

उत्तर-प्रचार-प्रसार के पुराने तरीकों और वर्तमान तरीकों में बहुत अंतर आया है। किसी वस्तु का प्रचार के लिए ढोल-नगाड़े आदि बजाकर उसके विषय में घोषणा की जाती थी। एक व्यक्ति रिक्शा, ताँगे आदि में बैठ जाता था और उस वस्तु का पोस्टर लगाकार ढोल बजाते हुए जोर-जोर से उसके विषय में बताता था। कुछ लोग घर-घर जाकर अपनी वस्तु का विज्ञापन किया करते थे। कई बार नुक्कड़ों पर नाटक आदि के माध्यम से भी वस्तु का विज्ञापन किया जाता था। अब किसी भी वस्तु का प्रसार-प्रचार अखबार, मैगजीन, रेडियो, टेलीविज़न, इंटरनेट और मोबाइल फोन ने विज्ञापन को कई गुना तीव्र एवं प्रभावशाली बना दिया है।

प्रश्न 6. कला के प्रति लोगों का नजरिया पहले कैसा था? उसमें अब क्या बदलाव आया है?

उत्तर-पहले लोग कला को राजे-महाराजे और अमीरों का शौक मानते थे। गरीब व्यक्ति तो इस विषय में सोच भी नहीं सकता था। उस समय कला आम आदमी का पेट नहीं भर सकती थी। यह केवल समय काटने का साधन थी।लेकिन समय बदला है। आज कला तथा कलाकार का सम्मान किया जाता है। अब तो शिक्षा में भी इसे अभिन्न बना दिया गया है। आज यह जीविका का मज़बूत साधन है। अब कलाकृतियाँ बड़े घरों की ही नहीं, आम घरों के दीवारों की शोभा बनने लगी हैं।

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Chapter 1 अंडे के छिलके | class 11th | Important Question for Hindi Antral

 अंडे के छिलके Class 11 Antral Chapter 1 Important Question Answer

प्रश्न 1. अंडे के छिलके को जुराब में, कोट की जेब में या नाली में फेंकना बिल्कुल ठीक नहीं! इस पर अपनी राय लिखिए।

उत्तर-अंडे के छिलके को जुराब में, कोट की जेब में या नाली में फेंकना बिल्कुल ठीक नहीं है| मेरे अनुसार अंडे के छिलके को कई ओर प्रयोग में भी लाया जा सकता है जैसे हम अंडे के छिलकों को अच्छे से साफ करके धो उन्हें पिस कर उनको त्वचा को साफ़ रखने लिए उपयोग कर सकते हैं| अंडे के छिलके से हम अपने पीले दांतों को चमका सकते है| अंडे के छिलके की हम खाद बना सकते है|

प्रश्न 2. ‘अण्डा खाना क्या कोई अपराध है?’ इस विषय पर निबंध लिखिये।

उत्तर-नहीं, अंडा खाना कोई अपराध की श्रेणी में नहीं आता| यह तो किसी के स्वाद के ऊपर निर्भर करता है कि वह क्या खाए| अंडा खाने से कई तरह के स्वास्थ्य लाभ भी हैं| अंडे में भरपूर मात्रा में कैरोटिनायड्स पाया जाता है जो आंखों के सेहत के लिए बेहद जरूरी है| अंडा खाने से मोतियाबिंद का खतरा नहीं रहता| अंडे में कोलीन पाया जाता है, जिससे याद्दाश्त तेज होती है और दिमाग एक्टिव रहता है| इसके अलावा अंडे में मौजूद विटामिन B-12 टेंशन को दूर करने में मदद करता है| इसमें कुछ ऐसे तत्व भी पाए जाते हैं जो डिप्रेशन दूर कर मूड अच्‍छा बनाते हैं|

अंडे के पीले वाले हिस्‍से में कॉलेस्‍ट्रोल काफी ज्‍यादा होता है| जिन लोगों को वजन बढ़ाना है उन्‍हें अंडे का पीला वाला हिस्‍सा खासतौर पर खाना चाहिए| उपवास के दौरान हमें इसे परहेज करना चाहिए और सात्विक भोजन को ही ग्रहण करना चाहिए| भगवद्गीता के अनुसार मांस, अंडे, खट्टे और तले हुए, मसालेदार और बासी या संरक्षित व ठंडे पदार्थ राजसी-तामसी प्रवृतियों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए उपवास के दौरान इनका सेवन नहीं किया जाना चाहिए।

प्रश्न 3. “पराया घर तो लगता ही है, भाभी” अपनी भाभी-भाई के कमरे में श्याम को पराएपन का अहसास क्यों होता है?

उत्तर-जब से श्याम की भाभी वीना आई है उसने कमरे का नक्शा ही बदल दिया है। पहले कमरे में सारी चीजें इधर-से उधर फैली रहती थीं, परंतु अब हर चीज व्यवस्थित ढंग से रखी रहती है। यही नहीं, अब इस कमरे में उसकी भाभी-भाई का अधिकार हो गया है। इसलिए श्याम को अब इस कमरे में पराएपन का अहसास होता है।

प्रश्न 4. एकांकी में अम्माँ की जो तसवीर उभरती है, अंत में वह बिलकुल बदल जाती है-टिप्पणी कीजिए।

उत्तर-एकांकी में अम्माँ जी की तसवीर रूढ़िवादी विचारोंवाली महिला के रूप में उभरती है। घर में परिवार के सभी सदस्यों में कुछ ऐसी आदतें हैं जो उनके अनुसार अम्माँ जी को बुरी लगती हैं, जैसे घर में अंडे खाना, चंद्रकांता जैसी पुस्तकें पढ़ना तथा सिगरेट पीना इत्यादि| इसलिए परिवार के सब सदस्य ये कार्य छिपकर करते हैं। एकांकी के अंत में माधव सबको यह बात बता देता है कि अम्मा को सब कुछ पहले से ही पता है-वीना और राधा का छुप-छुपकर चंद्रकांता संतति पढ़ना, श्याम का अपने कमरे में दूध में कच्चा अंडा डालकर पीना, गोपाल के कमरे में अंडे का आमलेट और हलवा बनना आदि-आदि। इससे अम्मा की वह छवि जो एकांकी के आरंभ में बनी हुई थी, अंत में पूरी तरह बदल जाती है। वह बहुत सुलझी हुई स्त्री लगती हैं|

प्रश्न 5. अंडे खाना, ‘चंद्रकांता संतति’ पढ़ना आदि किन्हीं संदर्भो में गलत नहीं है, फिर भी नाटक के पात्र इन्हें छिपकर करते हैं। क्यों? आप उनकी जगह होते तो क्या करते?

उत्तर-अंडे खाना, ‘चंद्रकांता संतति’ पढ़ना आदि पूरी तरह से गलत नहीं है, फिर भी नाटक के पात्र इन्हें छिपकर करते हैं। इसका कारण यह है कि आज भी मध्यमवर्गीय परिवारों की सोच काफी रूढ़िवादी है जिसके कारण ये सब चीज़ें आज भी उचित नहीं मानी जातीं और परिवार के सदस्य इसे छुप कर करते हैं| अंडा खाने में कोई बुराई नहीं बल्कि इससे कई तरह के स्वास्थ्य लाभ भी हैं परन्तु आज भी कई रूढ़िवादी परिवारों में यह मना है इसलिए कोई भी इन्हें परिवार के अन्य सदस्यों से छिपकर तथा अलग कमरों में बनाकर खाता है ताकि घर के बाकी सदस्यों को पता न चल सके। इसी तरह ‘चंद्रकांता संतति’ पढ़ने में कोई बुराई नहीं है। यह एक तिलस्म कथा है। चूँकि मध्यम परिवारों में पढ़ाई को ज्यादा महत्व दिया जाता है इसलिए ऐसी पुस्तकों को पढ़ने के लिए मना किया जाता है| परिवारों में बच्चों पर इस बात के लिए जोर दिया जाता है कि वे अपने कोर्स की पुस्तकें पढ़ें, न कि तिलस्मी कथाएँ।

यदि हम नाटक के पात्रों की जगह पर होते तो शायद हम भी कभी-कभी ऐसी पुस्तक पढ़ते, क्योंकि बचपन में ऐसी पुस्तकें काफी आकर्षक लगती हैं। हम ऐसी किताब को अपने कोर्स की पुस्तकों के बीच रखकर पढ़ते|

प्रश्न 6. राधा के चरित्र की ऐसी कौन सी विशेषताएँ हैं जिन्हें आप अपनाना चाहेंगे?

उत्तर-
• राधा कम पढ़ी-लिखी थी परन्तु उसे पढ़ना अच्छा लगता है इसलिए वह पढ़ती रहती है। वह किताबें मँगवा कर रखती थी और रात में जब सब सो जाते हैं, तो वह अपनी इस इच्छा को पूरा करती है।
• वह तेज दिमाग और हाजिर-जवाब है। वह बात को सँभालना जानती है। इसका पता तब चलता है जब अचानक ही अम्मा कमरे में उस समय आ जाती हैं, जब अंडे का हलवा बन रहा था। वह अपनी हाजिर जवाबी से अम्मा के शक को कुछ हद तक दूर करने में सफल हो पाती है।
• राधा अपने बड़ों का सम्मान करती है। वह अपनी सास से विनम्रतापूर्वक कहती है कि उस कमरे में कोई गलत काम नहीं हो रहा।

प्रश्न 7. अण्डे का छिलका अनुपयोगी या कूड़ा समझा जाता है तो फिर इसे कहाँ रखा जाना चाहिए? क्या स्वच्छता अभियान मिशन का इस पाठ से कोई संबंध है?

उत्तर-अण्डे का छिलके को हमें सूखे कूड़ेदान में डालना चाहिए| स्वच्छता अभियान के तहत जब सफाईवाला कचरा लेने आये तो गिला और सूखा कचरा अलग अलग डालना चाहिए|

प्रश्न 9. कमरे में कौन सी चीज कहाँ रखनी चाहिए? जैसे जंपर, कोट, कपड़ा, जूता, कापी-किताब, कूड़ा-करकट (अण्डे के छिलके) आदि।

उत्तर-जंपर, कोट, कपड़ा, जूता, कापी-किताब जैसी चीज़ों को हमें कमरें में रखनी चाहिए|

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Chapter 4 भारतीय कलाएँ | class 11th | Important Question for Hindi Vitan

भारतीय कलाएँ वितान क्लास 11

1. कला और भाषा के अंतसंबंध पर आपकी क्या राय है? लिखकर बताएँ।

उत्तर– कला और भाषा के बीच अन्योन्याश्रय संबंध है। सृष्टि के प्रारंभ से ही भाषा की अनुपलब्धता के बावजूद मनुष्य, अपने मन में उठने वालेभावों और विचारों को चित्र के रूप में अभिव्यक्त करने लगा। सिंधु घाटी सभ्यता में मिले चित्र और प्रागैतिहासिक काल में मिले प्राचीन चित्रकला के साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं। बुद्धि के विकास यानी ज्ञान का दायरा बढ़ने पर भाषा का जन्म हुआ। अब ताम्र पत्र, अभिलेख और कागजपर चित्रांकन होने लगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भाषा के उद्भव और विकास में कला का अभिन्न योगदान है। दोनों का परस्पर घनिष्ठ संबंध है।

2. भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति में आप किस तरह का संबंध पाते हैं?

उत्तर– भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति में घनिष्ठ संबंध है। विविधता उत्सवधर्मी देश भारत की विशिष्ट पहचान है। भारत के अलग-अलगराज्यों की अपनी-अपनी विशिष्ट कलाएँ हैं। भारतीय कलाओं को भारतीय संस्कृति में मनाए जाने वाले त्योहारों, उत्सवों से अलग नहीं किया जासकता। भारतीय कलाएँ जन्मोत्सव से लेकर शादी-ब्याह, पूजा तथा खेती-बाड़ी से भी जुड़ी हैं। मनुष्य के जीवन से जुड़ी होने के कारण ही भारत की ये विशिष्ट कलाएँ भारतीय संस्कृति के विरासत के प्रति हमें उत्साह और विश्वास से भर देती हैं।

3. शास्त्रीय कलाओं का आधार जनजातीय और लोक कलाएँ हैं- अपनी सहमति और असहमति के पक्ष में तर्क दें।

उत्तर– शास्त्रीय कलाओं का आधार जनजातीय और लोक कलाएँ हैं- मैं इस कथन से पूर्णतया सहमत हूँ जनजातीय और लोककला की कलांतर में जाकर शास्त्रीय कलाओं का आधार बनी। प्रारंभिक दौर में सभी कलाओं का संबंध लोक या समूह से था। आगे जाकर साहित्य, चित्र, संगीत, नृत्य कलाएँ राजाओं और विभिन्न शासकों के संरक्षण में जाकर धीरे-धीरे शास्त्रीय नियमों में बँधी इस प्रकार महलों और मंदिरों से विकसित होती हुई ये कलाएँ शास्त्रीय स्वरूप ग्रहण करती गई कला की दृष्टि से स्वर्ण युग कहे जाने वाले गुप्त साम्राज्य जनजातीय और लोक कलाएँ अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में जनजातीय और लोक कलाओं का शास्त्रीय स्वरूप बना, जो कला की दृष्टि से अब तक का सबसे महत्वपूर्ण शास्त्र है।

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Chapter 3 आलो आँधारि | class 11th | Important Question for Hindi Vitan

आलो आँधारि (अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न)

प्रश्न 1:
‘आलो-आँधारि’ पाठ के आधार पर तातुश का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर –

तातुश सज्जन प्रवृत्ति के अधेड़ अवस्था के शिक्षक हैं, वे दयालु हैं तथा करुण भाव से युक्त हैं। जब बेबी उनके घर काम करने आई तो उन्होंने उसके काम की प्रशंसा की। वे उसे अपनी बेटी के समान समझते थे। वे उसे कदम-कदम पर प्रोत्साहित करते थे। बेबी की पढ़ने के प्रति रुचि देखकर वे कॉपी व पेन देते हैं तथा उसे लिखने के लिए प्रेरित करते हैं। वे उसके बच्चों को स्कूल में भेजने की व्यवस्था करते हैं। उसका घर टूट जाने के बाद उसे अपने घर में जगह देते हैं। वे उसके बड़े लड़के को ढूँढ़कर उससे मिलवाते हैं तथा बाद में अच्छी जगह पर उसे काम दिलवाते हैं। जब कभी बेबी के बच्चे बीमार होते हैं तो उनका इलाज भी करवाते थे। तातुश बेबी के लेखन को अपने मित्रों के पास भेजते थे। वे कोई ऐसी बात नहीं करते थे जिससे बेबी को ठेस लगे। ऐसे चरित्र समाज में दुर्लभ होते हैं तथा आदर्श रूप प्रस्तुत करते हैं।

प्रश्न 2:
बेबी के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर –

‘आलो-आँधारि’ रचना की प्रमुख पात्र बेबी है। यह उसकी आत्मकथा है उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

(क) परित्यक्ता-बेबी की शादी अपने से दुगुनी उम्र के व्यक्ति के साथ हुई। उसे ससुराल में सदा प्रताड़ना मिली। वह किसी दूसरी महिला के साथ रहने लगा था। अंत में वह अपने पति को छोड़कर अलग रहने लगी और घरेलू कामकाज करके निर्वाह करने लगी। उसे अनेक तरह की सामाजिक कठिनाइयों का सामना करना पडा।

(ख) साहसी व परिश्रमी-बेबी पति के अत्याचारों को सहन न करके उससे अलग किराए के मकान में रहने लगी। वह लोगों के घरों में काम करके गुजारा करने लगी। वह दिन-रात काम करती थी। तातुश के घर का अत्यधिक काम वह शीघ्रता से कर लेती थी। वह हर स्थिति का सामना करती है। घर तोड़े जाने के बाद वह रात खुले आसमान के नीचे गुजारती है।

(ग) अध्ययनशील-बेबी को पढ़ने-लिखने का चाव था। तातुश की पुस्तकों की अलमारियाँ साफ करते समय वह उन पुस्तकों को खोलकर देखती थी। तातुश ने उसे ‘आमार मेये बेला’ पुस्तक पढ़ने के लिए दी तथा बाद में कॉपी व पेन भी लिखने के लिए दिया। तातुश की प्रेरणा से उसने लिखना शुरू किया।

(घ) स्नेहमयी माता-बेबी अपने बच्चों के भविष्य की बहुत चिंता करती है। वह उन्हें पढ़ाना-लिखाना चाहती है। तातुश की मदद से वह दो बच्चों को स्कूल भेजती है। वह बड़े लड़के के लिए भी व्याकुल रहती है जो किसी के घर काम करता है। तातुश उसे घर लाते हैं। निष्कर्षत: बेबी साहसी, परिश्रमी, अध्ययनशील व स्नेहमयी चरित्र की है।

प्रश्न 3:
सजने-सँवरने के बारे में बेबी की क्या राय थी?

उत्तर –

कोलकाता की शर्मिला दीदी ने लेखिका को अपने घर आने का निमंत्रण दिया तथा सजने-सँवरने आदि की बात कही। सजने-सँवरने की बात पर लेखिका को हैरानी होती है। बचपन से ही उसे सजने का शौक नहीं था। उसे ये काम फालतू के लगते थे। उसने देखा कि लड़कियाँ व बहुएँ घंटों शीशे के सामने खड़ी होकर श्रृंगार करती हैं। वे नयी साड़ी पहनती हैं ताकि पति उनकी तारीफ करे। वे दूसरों से प्रशंसा भी चाहती हैं। कई प्रकार के गहने पहनकर वे घूमने जाती हैं। लेखिका स्वयं को औरों से अलग मानती है। वह तो शादी के बाद भी इन चीजों से दूर रही। उसने सीधी तरह कंघी करके माँग से सिंदूर लगाना ही सीखा था।

प्रश्न 4:
शर्मिला दी और बेबी के संबंधों के बारे में बताइए।

उत्तर –

शर्मिला दी कोलकाता में रहती थीं। वह बेबी को हिंदी में चिट्ठियाँ लिखती थीं। उनकी चिट्ठियों में अलग तरह की ही बात होती थी। बेबी सोचती थी कि वे भी तो घर के काम के लिए कोई लड़की रखी होंगी। क्या वह उसके साथ भी वैसा ही व्यवहार करती होंगी जैसा मेरे साथ। उसे तो वह किसी के घर काम करने वाली लड़की की तरह नहीं देखतीं और चिट्ठियाँ भी अपनी बाँधवी की तरह लिखती हैं। तातुश उसकी चिट्ठयों को पढ़कर सुनाते तो वह अपनी टूटी-फूटी बांग्ला में उन्हें लिख लेती थी। उदास होने पर वह इन्हें पढ़ती तथा प्रसन्न होती थी।

प्रश्न 5:
‘बेबी के लिए तातुश के हृदय में माया है।’-स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

तातुश ने बेबी को काम पर रखा। वे उसके बच्चों के बारे में पूछते हैं तथा उन्हें स्कूल में भेजने के लिए उसे प्रेरित करते हैं। वे बच्चों के स्कूल में प्रवेश के लिए बेबी की मदद करते हैं। जब बेबी उन्हें दूसरे घर में काम तलाशने के लिए कहती तो वे उसे दूसरी कोठी में काम न करने की सलाह देते थे। वे कहते तो कुछ न थे, परंतु कुछ ऐसा सोचा करते थे कि बेबी को महसूस होता था कि वे बेबी के प्रति माया रखते हैं, कभी-कभी वे बरतन पोंछ रहे होते थे तो कभी जाले ढूँढ़ रहे होते थे।

प्रश्न 6:
सुनील ने बेबी की सहायता कैसे की?

उत्तर –

सुनील तीस-बत्तीस साल का युवक था जो एक कोठी में ड्राइवर का काम करता था। बेबी ने उसे कहीं काम दिलवाने के लिए कह रखा था, जब सुनील को पता चला कि बेबी को डेढ़ सप्ताह से कोई काम नहीं मिला तो वह उसे तातुश के घर ले गया। उनसे बातचीत करके उसने बेबी को उनके घर का काम दिलवा दिया।

प्रश्न 7: तातुश ने बेबी को क्या दिया? उस पर बेबी की क्या प्रतिक्रिया थी?

उत्तर –

तातुश ने बेबी की पढ़ने-लिखने में रुचि देखी तो उसने उसे पेन व कॉपी दी तथा लिखने को कहा। उसने कहा कि होश सँभालने के बाद से अब तक की जितनी भी बातें तुम्हें याद आएँ, सब इस कॉपी में रोज थोड़ा-थोड़ा लिखना। पेन-कॉपी लेकर बेबी सोचने लगी कि इसका तो कोई ठिकाना नहीं कि जो लिखेंगी, वह कितना गलत या सही होगा। तातुश ने पूछा तो वह चौंक पड़ी। उसने कहा कि सोच रही थी कि लिख सकूंगी या नहीं।

प्रश्न 8:
लेखिका को लेखन के लिए किन-किन लोगों ने उत्साहित किया?

उत्तर –

लेखिका को लेखन के लिए सबसे पहले तातुश ने प्रेरित किया। उन्होंने ही उसका परिचय कोलकाता और दिल्ली के लोगों से करवाया। इसके अतिरिक्त कोलकाता के जेठू आनंद, अध्यापिका शर्मिला आदि पत्र लिखकर उसे प्रोत्साहित करते थे। दिल्ली के रमेश बाबू उनसे फोन पर बातें करते थे।

प्रश्न 9:
तातुश के घर बेबी सुखी थी, फिर भी उदास हो जाती थी। क्यों?

उत्तर –

तातुश के घर पर बेबी को बहुत सुविधाएँ व सहायता मिली, परंतु उसे अपने बड़े लड़के की याद आती थी। उसकी सूचना दो महीने से नहीं आई थी। जो लोग उसके लड़के को लेकर गए थे, उनके दिए पते पर वह लड़का नहीं रहता था। उसने कुछ दूसरे लोगों से पूछा तो किसी ने संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। इसलिए वह कभी-कभी उदास हो जाती थी।

प्रश्न 10:
मोहल्लेवासियों का लेखिका के प्रति कैसा रवैया था?

उत्तर –

लेखिका अकेली रहती थी, इस कारण मोहल्लेवासियों का रवैया अच्छा नहीं था। वे उसे हर समय परेशान करते थे। महिलाएँ उससे तरह-तरह के सवाल करती थीं। कुछ पुरुष उसके साथ बात करने की कोशिश करते थे तो कुछ उसे ताने देते थे। औरतें उसके अकेले रहने का कारण पूछती थीं। लोग पानी के बहाने उसके घर के अंदर तक आ जाते थे। वे उससे अजीबो-गरीब सवाल पूछते जिनके जवाब लोकलिहाज से परे थे। दुखी होकर उसने मकान बदलने का फैसला किया।

प्रश्न 11: बेबी को अपनी माँ की मृत्यु का समाचार कैसे मिला?

उत्तर –

एक दिन बेबी के पिता उससे मिलने आए। उसने अपनी माँ के बारे में पूछा तो उन्होंने इधर-उधर की बातें करनी आरंभ कर दीं, फिर बताया कि उसकी माँ तो छह-सात महीने पहले ही दुनिया छोड़ गई है। उसके भाइयों ने उसे नहीं बताया। बेबी सिसक-सिसक कर रोने लगी।

प्रश्न 12:
बेबी ने पार्क में घूमना क्यों छोड़ दिया?

उत्तर –

तातुश के कहने पर बेबी बच्चों को पार्क में घुमाने ले जाती थी। वहाँ अनेक बंगाली औरतें भी थीं। वे उससे उसके पति के बारे में तथा यहाँ अकेली रहने के बारे में तरह-तरह के सवाल पूछती थीं। बेबी को इन बातों का जबाव देना तथा पुरानी बातों को फिर से दोहराना अच्छा नहीं लगता था। पार्क में आने वाले बंगाली लड़के भी उद्दंडतापूर्ण व्यवहार करते थे। इन सब कारणों से उसने पार्क में घूमना छोड़ दिया।

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Chapter 2 राजस्थान की रजत बूँदें | class 11th | Important Question for Hindi Vitan

राजस्थान की रजत बूँदें (अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न)

प्रश्न 1:
कुंई की निर्माण प्रक्रिया पर प्रकाश डालिए।

उत्तर –

मरुभूमि में कुंई के निर्माण का कार्य चेलवांजी यानी चेजार करते हैं। वे खुदाई व विशेष तरह की चिनाई करने में दक्ष होते हैं। कुंई बनाना एक विशिष्ट कला है। चार-पाँच हाथ के व्यास की कुंई को तीस से साठ-पैंसठ हाथ की गहराई तक उतारने वाले चेजारो कुशलता व सावधानी के साथ पूरी ऊँचाई नापते हैं। चिनाई में थोड़ी-सी भी चूक चेजारो के प्राण ले सकती है। हर दिन थोड़ी-थोड़ी खुदाई होती है, डोल से मलवा निकाला जाता है और फिर आगे की खुदाई रोककर अब तक हो चुके काम की चिनाई की जाती है ताकि मिट्टी धँसे नहीं।

बीस-पच्चीस हाथ की गहराई तक जाते-जाते गर्मी बढ़ती जाती है और हवा भी कम होने लगती है। तब ऊपर से मुट्ठी-भरकर रेत तेजी से नीचे फेंकी जाती है ताकि ताजा हवा नीचे जा सके और गर्म हवा बाहर आ सके। चेजार सिर पर काँसे, पीतल या किसी अन्य धातु का एक बर्तन टोप की तरह पहनते हैं ताकि ऊपर से रेत, कंकड़-पत्थर से उनका बचाव हो सके। किसी-किसी स्थान पर ईट की चिनाई से मिट्टी नहीं रुकती तब कुंई को रस्से से बाँधा जाता है। ऐसे स्थानों पर कुंई खोदने के साथ-साथ खींप नामक घास का ढेर लगाया जाता है। खुदाई शुरू होते ही तीन अंगुल मोटा रस्सा बनाया जाता है।

एक दिन में करीब दस हाथ की गहरी खुदाई होती है। इसके तल पर दीवार के साथ सटाकर रस्से का एक के ऊपर एक गोला बिछाया जाता है और रस्से का आखिरी छोर ऊपर रहता है। अगले दिन फिर कुछ हाथ मिट्टी खोदी जाती है और रस्से की पहली दिन जमाई गई कुंडली, दूसरे दिन खोदी गई जगह में सरका दी जाती है। बीच-बीच में जरूरत होने पर चिनाई भी की जाती है। कुछ स्थानों पर पत्थर और खींप नहीं मिलते। वहाँ पर भीतर की चिनाई लकड़ी के लंबे लट्ठों से की जाती है लट्ठे अरणी, बण, बावल या कुंबट के पेड़ों की मोटी टहनियों से बनाए जाते हैं। इस काम के लिए सबसे अच्छी लकड़ी अरणी की है, परंतु इन पेड़ों की लकड़ी न मिले तो आक तक से भी काम किया जाता है। इन पेड़ों के लट्ठे नीचे से ऊपर की ओर एक-दूसरे में फँसाकर सीधे खड़े किए जाते हैं। फिर इन्हें खींप की रस्सी से बाँधा जाता है। यह बँधाई कुंडली का आकार लेती है। इसलिए इसे साँपणी कहते हैं। खड़िया पत्थर की पट्टी आते ही काम रुक जाता है और इस क्षण नीचे धार लग जाती है। चेजारो ऊपर आ जाते हैं कुंई बनाने का काम पूरा हो जाता है।

प्रश्न 2:
कुंई का मुँह छोटा क्यों रखा जाता है? स्पष्ट करें?

उत्तर –

कुंई का मुँह छोटा रखा जाता है। इसके तीन कारण प्रमुख हैं

1. रेत में जमी नमी से पानी की बूंदें धीरे-धीरे रिसती हैं। दिनभर में एक कुंई में मुश्किल से दो-तीन घड़े पानी जमा होता है। कुंई के तल पर पानी की मात्रा इतनी कम होती है कि यदि कुंई का व्यास बड़ा हो तो कम मात्रा का पानी ज्यादा फैल जाएगा। ऐसी स्थिति में उसे ऊपर निकालना संभव नहीं होगा। छोटे व्यास की कुंई में धीरे-धीरे रिस कर आ रहा पानी दो-चार हाथ की ऊँचाई ले लेता है।

2. कुंई के व्यास का संबंध इन क्षेत्रों में पड़ने वाली तेज गर्मी से भी है। व्यास बड़ा हो तो कुंई के भीतर पानी ज्यादा फैल जाएगा और भाप बनकर उड़ने से रोक नहीं पाएगा।

3. कुंई को और उसके पानी को साफ रखने के लिए उसे ढककर रखना जरूरी है। छोटे मुँह को ढकना सरल होता है। कुंई पर लकड़ी के ढक्कन, खस की पट्टी की तरह घास-फूस या छोटी-छोटी टहनियों से बने ढक्कनों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 3:
‘राजस्थान में जल संग्रह के लिए बनी कुंई किसी वैज्ञानिक खोज से कम नहीं है।” स्पष्ट करें।

उत्तर –

यह बात बिल्कुल सही है कि राजस्थान में जल संग्रह के लिए बनी कुंई किसी वैज्ञानिक खोज से कम नहीं है। मरुभूमि में चारों तरफ अथाह रेत है। वर्षा भी कम होती है। भूजल खारा होता है। ऐसी स्थिति में जल की खोज, उसे निकालना आदि सब कुछ वैज्ञानिक तरीके से हो सकता है। मरुभूमि के भीतर खड़िया की पट्टी को खोजने में भी पीढ़ियों का अनुभव काम आता है। जिस स्थान पर वर्षा का पानी एकदम न बैठे, उस स्थान पर खड़िया पट्टी पाई जाती है। कुंई के जल को पाने के लिए मरुभूमि के समाज ने खूब मंथन किया तथा अनुभवों के आधार पर पूरा शास्त्र विकसित किया।

कुंई खोदने में वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है। चेजारो के सिर पर धातु का बर्तन उसे चोट से बचाता है। ऊपर से रेत फेंकने से ताजा हवा नीचे जाती है तथा गर्म हवा बाहर निकलती है, फिर कुंई की चिनाई भी पत्थर, ईट, खींप की रस्सी या अरणी के लट्ठों से की जाती है। यह खोज आधुनिक समाज को चमत्कृत करती है।

प्रश्न 4 :कुंई की खुदाई किससे की जाती है?

उत्तर –

कुंई का व्यास बहुत कम होता है। इसलिए इसकी खुदाई फावड़े या कुल्हाड़ी से नहीं की जा सकती। बसौली से इसकी खुदाई की जाती है। यह छोटी डंडी का छोटे फावड़े जैसा औजार होता है जिस पर लोहे का नुकीला फल तथा लकड़ी का हत्था लगा होता है।

प्रश्न 5:
कुंई की खुदाई के समय ऊपर जमीन पर खड़े लोग क्या करते हैं?

उत्तर –

कुंई की खुदाई के समय गहराई बढ़ने के साथ-साथ गर्मी बढ़ती जाती है। उस गर्मी को कम करने के लिए ऊपर जमीन पर खड़े लोग बीच-बीच में मुट्ठी भर रेत बहुत जोर के साथ नीचे फेंकते हैं। इससे ऊपर की ताजी हवा नीचे की तरफ जाती है और गहराई में जमा दमघोंटू गर्म हवा ऊपर लौटती है। इससे चेलवांजी को गर्मी से राहत मिलती है।

प्रश्न 6:
खड़िया पत्थर की पट्टी कहाँ चलती है?

उत्तर –

मरुभूमि में रेत का विस्तार व गहराई अथाह है। यहाँ अधिक वर्षा भी भूमि में जल्दी जमा हो जाती है। कहीं-कहीं मरुभूमि में रेत की सतह के नीचे प्राय: दस-पंद्रह हाथ से पचास-साठ हाथ नीचे खड़िया पत्थर की एक पट्टी चलती है। यह पट्टी लंबी-चौड़ी होती है, परंतु रेत में दबी होने के कारण दिखाई नहीं देती।

प्रश्न 7:
खड़िया पत्थर की पट्टी का क्या फायदा है?

उत्तर –

खड़िया पत्थर की पट्टी वर्षा के जल को गहरे खारे भूजल तक जाकर मिलने से रोकती है। ऐसी स्थिति में उस क्षेत्र में बरसा पानी भूमि की रेतीली सतह और नीचे चल रही पथरीली पट्टी के बीच अटक कर नमी की तरह फैल जाता है।

प्रश्न 8:
खड़िया पट्टी के अलग-अलग क्या नाम हैं?

उत्तर –

खड़िया पट्टी के कई स्थानों पर अलग-अलग नाम हैं। कहीं यह चारोली है तो कहीं धाधड़ी, धड़धड़ी, कहीं पर बिट्टू रो बल्लियो के नाम से भी जानी जाती है तो कहीं इस पट्टी का नाम केवल ‘खड़ी’ भी है।

प्रश्न 9:
कुंई के लिए कितने रस्से की जरूरत पड़ती है?

उत्तर –

लेखक बताता है कि लगभग पाँच हाथ के व्यास की कुंई में रस्से की एक ही कुंडल का सिर्फ एक घेरा बनाने के लिए लगभग पंद्रह हाथ लंबा रस्सा चाहिए। एक हाथ की गहराई में रस्से के आठ-दस लपेटे लग जाते हैं। इसमें रस्से की कुल लंबाई डेढ़ सौ हाथ हो जाती है। यदि तीस हाथ गहरी कुंई की मिट्टी को थामने के लिए रस्सा बाँधना पड़े तो रस्से की लंबाई चार हजार हाथ के आसपास बैठती है।

प्रश्न 10:
रेजाणीपानी की क्या विशेषता है? ‘रेजा’ शब्द का प्रयोग किसलिए किया जाता है?

उत्तर –

रेजाणीपानी पालरपानी और पातालपानी के बीच पानी का तीसरा रूप है। यह धरातल से नीचे उतरता है, परंतु पाताल में नहीं मिलता। इस पानी को कुंई बनाकर ही प्राप्त किया जाता है। ‘रेजा’ शब्द का प्रयोग वर्षा की मात्रा नापने के लिए किया जाता है। यह माप धरातल में समाई वर्षा को नापता है। उदाहरण के लिए यदि मरुभूमि में वर्षा का पानी छह अंगुल रेत के भीतर समा जाए तो उस दिन की वर्षा को पाँच अंगुल रेजा कहेंगे।

प्रश्न 11:
कुंई से पानी कैसे निकाला जाता है?

उत्तर –

कुंई से पानी चड़स के द्वारा निकाला जाता है। यह मोटे कपड़े या चमड़े की बनी होती है। इसके मुँह पर लोहे का वजनी कड़ा बँधा होता है। आजकल ट्रकों की फटी ट्यूब से भी छोटी चड़सी बनने लगी है। चडस पानी से टकराता है तथा ऊपर का वजनी भाग नीचे के भाग पर गिरता है। इस तरह कम मात्रा के पानी में भी वह ठीक तरह से डूब जाती है। भर जाने के बाद ऊपर उठते ही चड़स अपना पूरा आकार ले लेता है।

प्रश्न 12:
गहरी कुंई से पानी खींचने का क्या प्रबंध किया जाता है?

उत्तर –

गहरी कुंई से पानी खींचने के लिए उसके ऊपर घिरनी या चकरी लगाई जाती है। यह गरेडी, चरखी या फरेड़ी भी कहलाती है। ओड़ाक और चरखी के बिना गहरी व संकरी कुंई से पानी निकालना कठिन काम होता है। ओड़ाक और चरखी चड़सी को यहाँ-वहाँ टकराए बिना सीधे ऊपर तक लाती है। इससे वजन खींचने में भी सुविधा रहती है।

प्रश्न 13:
गोधूलि के समय कुंइयों पर कैसा वातावरण होता है?

उत्तर –

गोधूलि बेला में प्राय: पूरा गाँव कुंइयों पर आता है। उस समय-मेला सा लगता है। गाँव से सटे मैदान में तीस-चालीस कुंइयों पर एक साथ घूमती घिरनियों का स्वर गोचर से लौट रहे पशुओं की घंटियों और रंभाने की आवाज में समा जाता है। दो-तीन घड़े भर जाने पर डोल और रस्सियाँ समेट ली जाती हैं।

प्रश्न 14:
राजस्थान के रेत की विशेषता बताइए।

उत्तर –

राजस्थान में रेत के कण बारीक होते हैं। वे एक-दूसरे से चिपकते नहीं है। आमतौर पर मिट्टी के कण एक-दूसरे से चिपक जाते हैं तथा मिट्टी में दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों से नमी गर्मी में वाष्प बन जाती है। रेत के कण बिखरे रहते हैं। अत: उनमें दरारें नहीं पड़तीं और अंदर की नमी अंदर ही रहती है। यह नमी ही कुंइयों के लिए पानी का स्रोत बनती है।

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Chapter 1 भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ – लता मंगेशकर | class 11th | Important Question for Hindi Vitan

भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ : लता मंगेशकर (अति महत्त्वपूर्ण प्रश्न)

प्रश्न 1:
शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में क्या अंतर है?

उत्तर –

शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत-दोनों का लक्ष्य आनंद प्रदान करना है, फिर भी दोनों में अंतर है। शास्त्रीय संगीत में गंभीरता अपेक्षित होती है। यह इसका स्थायी भाव है, जबकि चित्रपट संगीत का गुणधर्म चपलता व तेज लय है। शास्त्रीय संगीत में ताल अपने परिष्कृत रूप में पाया जाता है, जबकि चित्रपट संगीत का ताल प्राथमिक अवस्था का ताल होता है शास्त्रीय संगीत में तालों का पूरा ध्यान रखा जाता है, जबकि चित्रपट संगीत में आधे तालों का उपयोग होता है। चित्रपट संगीत में गीत और आघात को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है, सुलभता तथा लोच को अग्र स्थान दिया जाता है। शास्त्रीय संगीत की उत्तम जानकारी होना आवश्यक है। तीन-साढ़े तीन मिनट के गाए हुए चित्रपट के किसी गाने का और एकाध खानदानी शास्त्रीय गायक की तीन-साढे तीन घटे की महफिल का कलात्मक व आनंदात्मक मूल्य एक ही है।

प्रश्न 2:
कुमार गंधर्व ने लता मंगेशकर को बेजोड़ गायिका माना है। क्यों?

उत्तर –

लेखक ने लता मंगेशकर को बेजोड़ गायिका माना है। उनके मुकाबले कोई भी गायिका नहीं है। नूरजहाँ अपने समय की प्रसिद्ध चित्रपट संगीत की गायिका थी, परंतु लता ने उसे बहुत पीछे छोड़ दिया। वे पिछले पचास वर्षों से एकछत्र राज कायम किए हुए हैं। इतने लंबे समय के बावजूद उनका स्वर पहले की तरह कोमल, सुरीला व मनभावन है। उनकी अन्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. उनके गायन में जो गानपन है, वह अन्य किसी गायिका में नहीं मिलता।

2. उच्चारण में शुद्धता व नाद का संगम तथा भावों में जो निर्मलता है, वह अन्य गायिकाओं में नहीं है।

3. उनकी सुरीली आवाज ईश्वर की देन है, परंतु लता जी ने उसे अपनी मेहनत से निखारा है।

4. वे शास्त्रीय संगीत से परिचित हैं, परंतु फिर भी सुगम संगीत में गाती हैं।

4. उनके गानों को सुनकर देश-विदेश में लोग दीवाने हो उठते हैं। 

5. उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने आम व्यक्ति की संगीत अभिरुचि को परिष्कृत किया है।

प्रश्न 3:
लता मंगेशकर ने किस तरह के गीत गाए हैं? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।

उत्तर –

लता मंगेशकर ने चित्रपट संगीत में मुख्यतया करुण व श्रृंगार रस के गाने गाए हैं। उन्होंने अनेक प्रयोग किए हैं उन्होंने राजस्थानी, पंजाबी, बंगाली व मराठी लोकगीतों को अपनाया है। लता जी ने पंजाबी लोकगीत, रूक्ष और निर्जल राजस्थान में बादल की याद दिलाने वाले गीत, पहाड़ों की घाटियों में प्रतिध्वनित होने वाले पहाड़ी गीत गाए हैं। ऋतु चक्र समझने वाले और खेती के विविध कामों का हिसाब लेने वाले कृषि गीत और ब्रजभूमि के सहज मधुर गीतों को फिल्मों में लिया गया है। उन्होंने मुग्ध श्रृंगार की अभिव्यक्ति करने वाले गाने बड़ी उत्कटता से गाए हैं।

प्रश्न 4:
लेखक लता के संगीत से कब स्वयं को जुड़ा महसूस करने लगे?

उत्तर –

लेखक वर्षों पहले बीमार थे। उस समय उन्होंने रेडियो पर अद्वतीय स्वर सुना। यह स्वर सीधे उनके हृदय तक जा पहुँचा। उन्होंने तन्मयता से पूरा गीत सुना। उन्हें यह स्वर आम स्वरों से विशेष लगा। गीत के अंत में जब रेडियो पर गायिका के नाम की घोषणा हुई तो उन्हें मन-ही-मन संगति पाने का अनुभव हुआ। वे सोचने लगे कि सुप्रसिद्ध गायक दीनानाथ मंगेशकर की अजब गायकी एक दूसरा स्वरूप लिए उन्हीं की बेटी की कोमल आवाज में सुनने को मिली है।

प्रश्न 5:
लता के नूरजहाँ से आगे निकल जाने का क्या कारण है?

उत्तर –

लता मंगेशकर प्रसिद्ध गायिका नूरजहाँ के बहुत बाद में आई, परंतु शीघ्र ही उनसे आगे निकल गई। नूरजहाँ के गीतों में मादक उत्तान था जो मनुष्य को जीवन से नहीं जोड़ता था। लता के स्वरों में कोमलता, निर्मलता व मुग्धता थी। जीवन के प्रति दृष्टिकोण उनके गीतों की निर्मलता में दिखता है।

प्रश्न 6:
कुमार गंधर्व ने लता मंगेशकर के गायन को चमत्कार की संज्ञा क्यों दी है?

उत्तर –

चित्रपट संगीत के क्षेत्र में लता बेताज सम्राज्ञी हैं। और भी कई पार्श्र्व गायक-गायिकाएँ हैं, पर लता की लोकप्रियता इन सबसे अधिक है। उनकी लोकप्रियता का शिखर अचल है। लगभग आधी शताब्दी तक वे जन-मन पर छाई रही हैं। भारत के अलावा परदेश में भी लोग उनके गाने सुनकर पागल हो उठते हैं। यह चमत्कार ही है जो प्रत्यक्ष तौर पर देखा जा रहा है। ऐसा कलाकार शताब्दियों में एकाध ही उत्पन्न होता है।

प्रश्न 7:
शास्त्रीय गायकों पर लेखक ने क्या टिप्पणी की है?

उत्तर –

लेखक कहता है कि शास्त्रीय गायक आत्मसंतुष्ट प्रवृत्ति के हैं। उन्होंने संगीत के क्षेत्र में अपनी हुकुमशाही स्थापित कर रखी है। उन्होंने शास्त्र शुद्धता को जरूरत से ज्यादा महत्त्व दे रखा है। वे रागों की शुद्धता पर जोर देते हैं।

प्रश्न 8:
चित्रपट संगीत के विकसित होने का क्या कारण है?

उत्तर –

चित्रपट संगीत के विकसित होने का कारण उसकी प्रयोग धर्मिता है। यह संगीत आम आदमी की समझ में आ रहा है। इस संगीत को सुरीलापन, लचकदारी आदि ने लोकप्रिय बना दिया है। इन्होंने शास्त्रीय संगीत की रागदानी भी अपनाई है, वहीं राजस्थानी, पहाड़ी, पंजाबी, बंगाली, लोकगीतों को भी अपनाया है। दरअसल यह विभिन्नता में एकता का प्रचार कर रहा है। इसके माध्यम से लोग अपनी संस्कृति से परिचित हो रहे हैं।

प्रश्न 9:
लता की गायकी से संगीत के प्रति आम लोगों की सोच में क्या परिवर्तन आया है?

उत्तर –

लता की गायकी के कारण चित्रपट संगीत अत्यधिक लोकप्रिय हुआ है। अब वे संगीत की सूक्ष्मता को समझने लगे हैं। वे गायन की मधुरता, मस्ती व गानपन को महत्व देते हैं। आज के बच्चे पहले की तुलना में सधे हुए स्वर से गाते हैं। लता ने नई पीढ़ी के संगीत को संस्कारित किया है। आम लोगों का संगीत के विविध प्रकारों से परिचय हो रहा है।

प्रश्न 10:
कुमार गंधर्व ने लता जी की गायकी के किन दोषों का उल्लेख किया है?

उत्तर –

कुमार गंधर्व का मानना है कि लता जी की गायकी में करुण रस विशेष प्रभावशाली रीति से व्यक्त नहीं होता। उन्होंने करुण रस के साथ न्याय नहीं किया। दूसरे, लता ज्यादातर ऊँची पट्टी में ही गाती हैं जो चिल्लाने जैसा होता है।

प्रश्न 11:
शास्त्रीय संगीत की तीन-साढ़े तीन घंटे की महफिल और चित्रपट संगीत के तीन मिनट के गान का आनंदात्मक मूल्य एक क्यों माना गया है?

उत्तर –

लेखक ने शास्त्रीय संगीत की तीन-साढे तीन घटे की महफिल और चित्रपट संगीत से तीन मिनट के गान का आनंदात्मक मूल्य एक माना है इन दोनों का लक्ष्य श्रोताओं को आनंदमग्न करना है। तीन मिनट के गाने में स्वर, लय व शब्दार्थ की त्रिवेणी बहती है। इसमें श्रोताओं को भरपूर आनंद मिलता है।

प्रश्न 12:
लय कितने प्रकार की होती है?

उत्तर –

लय तीन प्रकार की होती है-

1. विलंबित लय– यह धीमी होती है।

2. मध्य लय– यह बीच की होती है।

3. द्रुत लय– यह मध्य लय से दुगुनी तथा विलबित लय से चौगुनी तेज होती है।

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Chapter 20 निर्मला पुतुल | class 11th | Important Question for Hindi Aroh

आओ, मिलकर बचाएँ Class 11 Chapter 20 Important Question Answer निर्मला पुतुल

कविता के साथ

प्रश्न 1: ‘माटी का रंग’ प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?

उत्तर –कवयित्री ने ‘माटी का रंग’ शब्द का प्रयोग करके यह बताना चाहा है कि संथाल क्षेत्र के लोगों को अपनी मूल पहचान को नहीं भूलना चाहिए। वह इस क्षेत्र की सांस्कृतिक विशेषताएँ बचाए रखना चाहता है। क्षेत्र की प्रकृति, रहन-सहन, अक्खड़ता, नाच गाना, भोलापन, जुझारूपन, झारखंडी भाषा आदि को शहरी प्रभाव से दूर रखना ही कवयित्री का उद्देश्य है।

प्रश्न 2: भाषा में झारखंडीपन से क्या अभिप्राय है?

उत्तर –इसका अभिप्राय है-झारखंड की भाषा की स्वाभाविक बोली, उनका विशिष्ट उच्चारण। कवयित्री चाहती है कि संथाली लोग अपनी भाषा की स्वाभाविक विशेषताओं को नष्ट न करें।

प्रश्न 3: दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?

उत्तर –दिल का भोलापन अर्थात् मन का साफ़ होना-इस पर कविता में इसलिए बल दिया गया है कि अच्छा मनुष्य और वह आदिवासी जिस पर शहरी कलुष का साया नहीं पड़ा वह भोला तो होता ही है, साथ-साथ उसे शहरी कही जानेवाली सभ्यता का ज्ञान नहीं तो वह अपने साफ़ मन से जो कहता है वह अक्खड़ दृष्टिकोण से कहता है। शक्तिशाली संथालों का मौलिक गुण है-जूझना, सो उसे बनाए रखना भी जरूरी है।

प्रश्न 4: प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?

उत्तर –इस कविता में आदिवासी समाज में जड़ता, काम से अरुचि, बाहरी संस्कृति का अंधानुकरण, शराबखोरी, अकर्मण्यता, अशिक्षा, अपनी भाषा से अलगाव, परंपराओं को पूर्णत: गलत समझना आदि बुराइयाँ आ गई हैं। आदिवासी समाज स्वाभाविक जीवन को भूलता जा रहा है।

प्रश्न 5: ‘इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है’-से क्या आशय है?

उत्तर –‘इस दौर में भी’ का आशय है कि वर्तमान परिवेश में पाश्चात्य और शहरी प्रभाव ने सभी संस्कारपूर्ण मौलिक तत्वों को नष्ट कर दिया है, परंतु कवयित्री निराश नहीं है, वह कहती है कि हमारी समृद्ध परंपरा में आज भी बहुत कुछ शेष है। आओ हम उसे मिलकर बचा लें। यही इस समय की माँग है। लोगों का विश्वास, उनकी टूटती उम्मीदों को जीवित करना, सपनों को पूरा करना आदि को सामूहिक प्रयासों से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 6: निम्नलिखित पंक्तियों के काव्य-सौंदर्य को उदघाटित कीजिए

(क) ठंडी होती दिनचर्या में
जीवन की गर्माहट

(ख) थोड़ा-सा विश्वास
थोडी-सी उम्मीद
थोड़े-से सपने
आओ, मिलकर बचाएँ।

उत्तर –
(क) इस पंक्ति में कवयित्री ने आदिवासी क्षेत्रों से विस्थापन की पीड़ा को व्यक्त किया है। विस्थापन से वहाँ के लोगों की दिनचर्या ठंडी पड़ गई है। हम अपने प्रयासों से उनके जीवन में उत्साह जगा सकते हैं। यह काव्य पंक्ति लाक्षणिक है इसका अर्थ है-उत्साहहीन जीवन। ‘गर्माहट’ उमंग, उत्साह और क्रियाशीलता का प्रतीक है। इन प्रतीकों से अर्थ गांभीर्य आया है। शांत रस विद्यमान है। अतुकांत अभिव्यक्ति है।

(ख) इस अंश में कवयित्री अपने प्रयासों से लोगों की उम्मीदें, विश्वास व सपनों को जीवित रखना चाहती है। समाज में बढ़ते अविश्वास के कारण व्यक्ति का विकास रुक-सा गया है। वह सभी लोगों से मिलकर प्रयास करने का आहवान करती है। उसका स्वर आशावादी है। ‘थोड़ा-सा’ ; ‘थोड़ी-सी’ व ‘थोड़े-से’ तीनों प्रयोग एक ही अर्थ के वाहक हैं। अत: अनुप्रास अलंकार है। उर्दू (उम्मीद), संस्कृत (विश्वास) तथा तद्भव (सपने) शब्दों का मिला-जुला प्रयोग किया गया है। तुक, छद और संगीत विहीन होते हुए कथ्य में आकर्षण है। खड़ी बोली का प्रयोग दर्शनीय है।

प्रश्न 7: बस्तियों को शहर की किस आबो-हवा से बचाने की आवश्यकता है?

उत्तर –शहरों में भावनात्मक जुड़ाव, सादगी, भोलापन, विश्वास और खिलखिलाती हुई हँसी नहीं है। इन कमियों से बस्तियों को बचाना बहुत जरूरी है। शहरों के प्रभाव में आकर ही दिनचर्या ठंडी होती जा रही है और जीवन की गर्माहट घट रही है। जंगल कट रहे हैं और आदिवासी लोग भी शहरी जीवन को अपना रहे हैं। बस्ती के आँगन भी सिकुड़ रहे हैं। नाचना-गाना, मस्ती भरी जिंदगी को शहरी प्रभाव से बचाना ज़रूरी है।

कविता के आस-पास

प्रश्न 1: आप अपने शहर या बस्ती की किन चीजों को बचाना चाहेंगे?

उत्तर –हम अपने शहर की ऐतिहासिक धरोहर को बचाना चाहेंगे।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: आओ, मिलकर बचाएँ-कविता का प्रतिपाद्य लिखिए।

उत्तर –इस कविता में दोनों/पक्षों का यथार्थ चित्रण हुआ है। बृहतर संदर्भ में यह कविता समाज में उन चीजों को बचाने की बात करती है जिनका होना स्वस्थ सामाजिक परिवेश के लिए जरूरी है। प्रकृति के विनाश और विस्थापन के कारण आज आदिवासी समाज संकट में है, जो कविता का मूल स्वरूप है। कवयित्री को लगता है कि हम अपनी पारंपरिक भाषा, भावुकता, भोलेपन, ग्रामीण संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। प्राकृतिक नदियाँ, पहाड़, मैदान, मिट्टी, फसल, हवाएँ-ये सब आधुनिकता का शिकार हो रहे हैं। आज के परिवेश में विकार बढ़ रहे हैं, जिन्हें हमें मिटाना है। हमें प्राचीन संस्कारों और प्राकृतिक उपादानों को बचाना है। वह कहती है कि निराश होने की बात नहीं है, क्योंकि अभी भी बचाने के लिए बहुत कुछ बचा है।

प्रश्न 2: लेखिका के प्रकृतिक परिवेश में कौन-से सुखद अनुभव हैं?

उत्तर –लेखिका ने संथाल परगने के प्राकृतिक परिवेश में निम्नलिखित सुखद अनुभव बताए हैं-

1. जगल की ताजा हवा
2. नदियों का निर्मल जल
3. पहाडीं की शांति
4. गीतों की मधुर धुनें
5. मिट्टी की स्वाभाविक सुगंध
6. लहलहाती फसलें कीजिए

प्रश्न 3: बस्ती को बचाएँ डूबने से-आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –बस्ती के डूबने का अर्थ है-पारंपरिक रीति-रिवाजों का लोप हो जाना और मौलिकता खोकर विस्थापन की ओर बढ़ना। यह चिंता का विषय है। आदिवासियों की संस्कृति का लुप्त होना बस्ती के डूबने के समान है।

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Chapter 19 पाश | class 11th | Important Question for Hindi Aroh

सबसे ख़तरनाक Class 11 Aroh Chapter 19 Important Question Answer पाश

कविता के साथ

प्रश्न 1: कवि ने किस आशय से मेहनत की लूट, पुलिस की मार, गद्दारी-लोभ को सबसे खतरनाक नहीं माना।

उत्तर –कवि ने मेहनत की लूट, पुलिस की मार, गद्दारी लोभ को सबसे खतरनाक नहीं माना क्योंकि इन तीनों में मीन में आशा व उम्मीद की किरण बची रहती है। इनका प्रभाव सीमित होता है। इन क्रियाओं में प्रतिरोधक क्षमता बनी रहती है। इन स्थितियों को बदला जा सकता है। जिस समाज में पारस्परिक सौहाद्र, प्रेम, दया, करुणा आदि भावनाएँ समाप्त हो जाएंगी, वह मृत हो जाएगा।

प्रश्न 2: ‘सबसे खतरनाक’ शब्द के बार-बार दोहराए जाने से कविता में क्या असर पैदा हुआ?

उत्तर –‘सबसे खतरनाक’ शब्द के बार-बार, दोहराए जाने से पाठकों का ध्यान खतरनाक बातों की तरफ अधिक आकर्षित होता है। वे समाज की स्थितियों पर गंभीरता से विचार करते हैं। यह शब्द उस विभीषिका की ओर संकेत करता है जो समाज को निर्जीव कर रही है। इसके बार-बार प्रयोग से कथ्य प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुआ है।

प्रश्न 3: कवि ने कविता में कई बातों को ‘बुरा है’ न कहकर ‘बुरा तो है’ कहा है। ‘तो’ के प्रयोग से कथन की भंगिमा में क्या बदलाव आया है, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –कवि ने बैठे बिठाए पकड़े जाना, सहमी चुप में जकड़ने, कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाने आदि को बुरा तो है कहा है। ‘बुरा’ शब्द प्रत्यक्ष आरोप लगाता है, परंतु ‘तो’ लगाने से सारा जोर ‘तो’ पर चला जाता है। इसका अर्थ है। कि स्थितियाँ खराब अवश्य है, परंतु उनमें सुधार की गुंजाइश है। साथ ही, यह चेतावनी भी देता है कि अगर इन्हें नहीं सुधारा गया तो भविष्य में हालात और बिगड़ेंगे।

प्रश्न 4: ‘मुर्दा शांति से भर जाना और हमारे सपनों का मर जाना’-इनको सबसे खतरनाक माना गया है। आपकी दृष्टि में इन बातों में परस्पर क्या संगति है और ये क्यों सबसे खतरनाक है?

उत्तर –‘मुर्दा शांति से भर जाना’ का अर्थ है-निष्क्रिय होना, जड़ हो जाना या प्रतिक्रिया शून्य हो जाना। ऐसी स्थिति बहुत खतरनाक है। ऐसा व्यक्ति सामाजिक अन्याय के खिलाफ संघर्ष नहीं कर पाता। उसके मन में किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। वह जीवित होते हुए भी मृत के समान होता है। ‘हमारे सपनों का मर जाना’ का अर्थ है-कुछ करने की इच्छा समाप्त होना। मनुष्य कल्पना करके ही नए-नए कार्य करता है तथा विकसित होता है। सपनों के मर जाने से हम यथास्थिति को स्वीकार करके स्थिर एवं विचारशून्य हो जाते हैं।

प्रश्न 5: सबसे खतरनाक वह घड़ी होती है/अपनी कलाई पर चलती हुई भी जो/आपकी निगाह में रुकी होती है। इन पंक्तियों में ‘घड़ी’ शब्द की व्यंजना से अवगत कराइए।

उत्तर –‘घड़ी’ शब्द के दो अर्थ मिलते हैं। पहला अर्थ जीवन से जुड़ा हुआ है। जीवन घड़ी की तरह चलता रहता है। वह कभी नहीं रुकता। मनुष्य की चाह समाप्त होने पर ही वह जड़ हो जाता है। दूसरा अर्थ है-दिनचर्या यदि व्यक्ति समय के अनुसार स्वयं को बाँध लेता है तो वह यांत्रिक हो जाता है। वह ढर्रे पर चलता है। उसके जीवन में नया कुछ करने का अवकाश नहीं होता।

प्रश्न 6: वह चाँद सबसे खतरनाक क्यों होता है, जो हर हत्याकांड के बाद/आपकी आँखों में मिचों की तरह नहीं गड़ता है?

उत्तर –‘चाँद’ सौंदर्य का प्रतीक है, परंतु हत्याकांड के बाद कोई प्राणी सौंदर्य की कल्पना नहीं कर सकता। हत्या होने पर आम व्यक्ति के मन में आक्रोश उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य को चाँद आनंद प्रदान करने वाला नहीं लगता। जो लोग ऐसी स्थिति में आनंद लेने की कोशिश करते हैं तो ऐसी संवेदनशून्यता वास्तव में खतरनाक है।

कविता के आस-पास

प्रश्न 1: कवि ने ‘मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती’, से कविता का आरंभ करके फिर इसी से अंत क्यों किया होगा?

उत्तर –कवि ने ‘मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती’ से कविता का आरंभ करके इसी पर अंत किया क्योंकि कवि का ध्येय ‘खतरनाक’ व ‘सबसे खतरनाक’ स्थितियों में अंतर बताना है। कुछ स्थितियाँ खतरनाक होती हैं, परंतु उन्हें सुधारा जा सकता है कुछ दशाएँ कवि ने बताई हैं। यदि वे समाज में आ जाती हैं तो मानवता पर ही प्रश्न चिह्न लग जाता है। ऐसी स्थितियों से समाज को बचना चाहिए।

प्रश्न 2: कवि द्वारा उल्लिखित बातों के अतिरिक्त समाज में अन्य किन बातों को आप खतरनाक मानते हैं?

उत्तर –कवि द्वारा उल्लिखित बातों के अतिरिक्त हम समाज में निम्नलिखित बातों को खतरनाक मानते हैं

1. स्त्रियों का अपमान, शोषण तथा फिर उनका मजाक उड़ाना।
2. संकटग्रस्त मित्र या जानकार की मदद से दूर भागना।
3. सांप्रदायिकता
4. आतकवाद
5. निरर्थक महत्त्वाकाक्षा
6. देशद्रोह

प्रश्न 3: समाज में मौजूद खतरनाक बातों को समाप्त करने के लिए आपके क्या सुझाव हैं?

उत्तर –समाज में मौजूद खतरनाक बातों को समाप्त करने के लिए हमारे सुझाव निम्नलिखित हैं

1. सत्ता शीर्ष को व्यवस्था ठीक करनी चाहिए।
2. आम आदमी को जागरूक होना होगा।
3. दुष्ट लोगों का विनाश ही समाधान है।
4. वैचारिक स्तर में बढ़ोतरी करनी होगी।
5. समाज को संवेदनशीलता रखनी होगी।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: ‘सबसे खतरनाक’ कविता का प्रतिपाद्य बताइए।

उत्तर –यह कविता पंजाबी भाषा से अनूदित है। यह दिनोदिन अधिकाधिक नृशंस और क्रूर होती जा रही दुनिया की विदूपताओं के चित्रण के साथ उस खौफनाक स्थिति की ओर इशारा करती है, जहाँ प्रतिकूलता से जूझने के संकल्प क्षीण पड़ते जा रहे हैं। पथरायी आँखों-सी तटस्थता से कवि की असहमति है। कवि इस प्रतिकूलता की तरफ विशेष संकेत करता है जहाँ आत्मा के सवाल बेमानी हो जाते हैं। जड़ स्थितियों को बदलने की प्यास के मर जाने और बेहतर भविष्य के सपनों के गुम हो जाने को कवि सबसे खतरनाक स्थिति मानता है।

प्रश्न 2: सपनों का मर जाना किस प्रकार खतरनाक है?

उत्तर –सपने जीवन में नए रंग भरते हैं। वे मनुष्य को नया कार्यक्षेत्र देते हैं। जब व्यक्ति के सपने मर जाते हैं तो उसके जीवन का उद्देश्य समाप्त हो जाता है। बिना उद्देश्य के कोई जीवन नहीं होता। इस तरह सपनों के मर जाने से व्यक्ति का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। यह स्थिति जीवन के लिए कभी अच्छी नहीं होती।

प्रश्न 3: कवि ने किन-किन स्थितियों को बुरा बताया है?

उत्तर –कवि ने निम्नलिखित स्थितियों को बुरा बताया है

1. मेहनत की लूट होना
2. पुलिस की मार पड़ना
3. बिना किसी दोष के गिरफ्तारी
4. डर से चुप होना
5. सही आवाज का दब जाना
6. विवशता से आक्रोश की दवा कर समय काटतें जाना;

प्रश्न 4: कवि ने वे कौन-कौन सी स्थितियाँ बताई हैं जो सबसे खतरनाक हैं?

उत्तर –कवि ने निम्नलिखित स्थितियों को सबसे खतरनाक बताया है

1. मुर्दे जैसी शांति का भर जाना।
2. सपनों का मर जाना।
3. तड़पकर अन्याय को सहन करना।
4. घड़ी का एक बिंदु पर ठहरना।
5. अन्याय देखकर संवेदनहीन होना।
6. ढरें पर जिंदगी चलना।
7. अत्याचार का आँखों में न गड़ना।
8. आत्मा की आवाज को अनसुना करना।

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Chapter 18 अक्कमहादेवी | class 11th | Important Question for Hindi Aroh

हे भूख! मत मचल, हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर Class 11 Chapter 18 Important Question Answer अक्कमहादेवी

कविता के साथ

प्रश्न 1: ‘लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियाँ बाधक होती हैं’-इसके संदर्भ में अपने तर्क दीजिए।

उत्तर –ज्ञानेंद्रियाँ मानव शरीर का महत्त्वपूर्ण अंग हैं जो अनुभव का साधन हैं। लक्ष्य प्राप्ति की जहाँ तक बात है, यदि वह ईश्वर प्राप्ति है तो वह एक ऐसी साधना के समान है जिसमें इंद्रियाँ बाधक हैं। इस समय भूख, प्यास, लालसा, कामना, प्रेम आदि का अनुभव हमें लक्ष्य से भटका देता है। इन सबका अनुभव इंद्रियाँ करवाती हैं। अतः वे ही बाधक हैं।

प्रश्न 2: ‘ओ चराचर! मत चूक अवसर’- इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –इस पंक्ति में अक्क महादेवी का कहना है कि प्राणियों ने जो जीवन प्राप्त किया है, उसे यदि वे शिव की भक्ति में लगाएँ तो उनका कल्याण हो जाएगा। समय बीत जाने के बाद कुछ नहीं मिलता। जीव इंद्रियों के वश में होकर सांसारिक मोह-माया में उलझा रहता है। वह इन चक्करों में उलझा रहा तो ईश्वर-प्राप्ति का अवसर चूक जाएगा।

प्रश्न 3: ईश्वर के लिए किस दृष्टांत का प्रयोग किया गया है? ईश्वर और उसके साम्य का आधार बताइए।

उत्तर –अक्क महादेवी दूसरे वचन में ईश्वर को जूही के फूल के समान बताती हैं। इन दोनों में साम्य का आधार यह है कि जिस प्रकार जूही का फूल श्वेत,सात्विक, कोमल और सुगंधयुक्त है, उसी प्रकार ईश्वर भी समस्त विश्व में सबसे सात्विक, कोमल हृदय हैं। जिस प्रकार जूही का पुष्प अपनी सुगंध बिखेरने में भेदभाव नहीं करता, उसी प्रकार ईश्वर भी अपनी कृपा सब पर समान रूप से बरसाते हैं।

प्रश्न 4: अपना घर से क्या तात्पर्य है? इसे भूलने की बात क्यों कही गई है?

उत्तर –अपना घर’ से तात्पर्य है-मोहमाया से युक्त जीवन। व्यक्ति इस घर में सभी से लगाव महसूस करता है। वह इसे बनाने व बचाने के लिए निन्यानवे के फेर में पड़ा रहता है। कवयित्री इसे भूलने की बात कहती है, क्योंकि घर की मोह-ममता को छोड़े बिना ईश्वर-भक्ति नहीं की जा सकती। घर का मोह छूटने के बाद हर संबंध समाप्त हो जाता है और मनुष्य एकाग्रचित होकर भगवान में ध्यान लगा सकता है।

प्रश्न 5: दूसरे वचन में ईश्वर से क्या कामना की गई है और क्यों?

उत्तर –दूसरे वचन में अक्कमहादेवी ईश्वर से कहती हैं कि मुझसे भीख मँगवाओ; मेरी यह दशा कर दो कि भीख में मिला भी गिर जाए और कुत्ता उसे झपट कर खा जाए। यह सब कामना करने के पीछे कवयित्री की स्वयं के अहंकार को शून्य बनाने की बात छिपी है। संसार द्वारा उपेक्षित और तिरस्कृत व्यवहार से हम ईश्वर की अनन्य भक्ति की ओर प्रवृत्त होते हैं।

कविता के आसपास

प्रश्न 1: क्या अक्क महादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है? चर्चा करें।

उत्तर –मीराबाई ने भक्ति में लीन होकर घर-परिवार और सांसारिक मोह त्याग दिया था, ठीक ऐसा ही व्यवहार अक्कमहादेवी ने भी किया था। इस दृष्टि से देखें तो मीरा की पंक्ति ‘तन की आस कबहू नहीं कीनी ज्यों रणमाँही सूरो’ अक्कमहादेवी पर पूर्णतः चरितार्थ होती है। पुस्तकालय से दोनों कवयित्रियों का साहित्य लें, तुलनात्मक पद एवं वचन पढ़कर कक्षा में चर्चा का आयोजन करें।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1: पहले वचन का प्रतिपादय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –प्रथम वचन में इंद्रियों पर नियंत्रण का संदेश दिया गया है। यह उपदेशात्मक न होकर प्रेम-भरा मनुहार है। वे चाहती हैं कि मनुष्य को अपनी भूख, प्यास, नींद आदि वृत्तियों व क्रोध, मोह, लोभ, अह, ईष्र्या आदि भावों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। वे लोगों को समझाती हैं कि इंद्रियों को वश में करने से शिव की प्राप्ति संभव है।

प्रश्न 2: दूसरे वचन का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –दूसरा वचन एक भक्त का ईश्वर के प्रति समर्पण है। चन्नमल्लिकार्जुन की अनन्य भक्त अक्कमहादेवी उनकी अनुकंपा के लिए हर भौतिक वस्तु से अपनी झोली खाली रखना चाहती हैं। वे ऐसी निस्पृह स्थिति की कामना करती हैं जिससे उनका स्व या अहंकार पूरी तरह से नष्ट हो जाए। वह ईश्वर को जूही के फूल के समान बताती हैं, वह कामना करती हैं कि ईश्वर उससे ऐसे काम करवाए जिनसे उसका अहकार समाप्त हो जाए। वह उससे भीख मैंगवाए, भले ही उसे भीख न मिले। वह उससे घर की मोह-माया छुड़वा दे। जब कोई उसे कुछ देना चाहे तो वह गिर जाए और उसे कोई कुत्ता छीनकर ले जाए। कवयित्री का एकमात्र लक्ष्य अपने परमात्मा की प्राप्ति है।

प्रश्न 3: कवयित्री मनोविकारों को क्यों दुकारती है?

उत्तर –कवयित्री का मानना है कि मनोविकार मनुष्य को सांसारिक मोह-माया में लिप्त रखते हैं। मोह से व्यक्ति वस्तु संग्रह करता है। क्रोध में वह विवेक खोकर हानि पहुँचाता है। लोभ मनुष्य से गलत कार्य करवाता है। अहंकार मानव को मदहोश कर देता है तथा वह स्वयं को महान समझने लगता है। ये सभी मनुष्य को ईश्वरीय भक्ति से दूर ले जाते हैं। इसी कारण मनुष्य का कल्याण नहीं होता।

प्रश्न 4: कवयित्री शिव का क्या संदेश लेकर आई है?

उत्तर –कवयित्री शिव की अनन्य भक्त है। वह संसार में शिव का संदेश प्रचारित करना चाहती है कि ईशभक्ति में ही प्राणी की मुक्ति है। शिव करुणामयी हैं तथा संसार का कल्याण करने वाले हैं। जो प्राणी सच्चे मन से उनकी भक्ति करता है, वे उसे मुक्ति प्रदान करते हैं। प्राणी को जीतन में ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता। अत: उसे इस अवसर को छोड़ाना नहीं चाहिए।

प्रश्न 5: अक्क महादेवी ईश्वर से भीख मैंगवाने की प्रार्थना क्यों करती है?

उत्तर –अक्कमहादेवी का मानना है कि व्यक्ति तभी भीख माँगता है जब उसका अहभाव समाप्त हो जाता है। वह निर्विकार हो जाता है। ऐसी दशा में ही ईश्वर भक्ति की जा सकती है। व्यक्ति निस्पृह होकर लोककल्याण की सोचने लगता है।

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