परियोजना | class 12th | Important question Hindi

Class 12 Hindi परियोजना

परियोजना कार्य-1

कोई युवा पुरुष अपने घर से बाहर निकलकर बाहरी संसार में अपनी स्थिति जमाता है, तब पहली कठिनता उसे मित्र चुनने में पड़ती है। यदि उसकी स्थिति बिलकुल एकांत और निराली नहीं रहती तो उसकी जान-पहचान के लोग धड़ाधड़ बढ़ते जाते हैं और थोड़े ही दिनों में कुछ लोगों से उसका हेल-मेल हो जाता है। यही हेल-मेल बढ़ते-बढ़ते मित्रता के रूप में परिणत हो जाता है। मित्रों के चुनाव की उपयुक्तता पर उसके जीवन की सफलता निर्भर हो जाती है, क्योंकि संगति का गुप्त प्रभाव हमारे आचरण पर बड़ा भारी होता है।

हम लोग ऐसे समय में समाज में प्रवेश करके अपना कार्य आरंभ करते हैं, जबकि हमारा चित्त कोमल और हर तरह का संस्कार ग्रहण करने के लिए रहता है। हमारे भाव अपरिमार्जित और हमारी प्रवृत्ति अपरिपक्व रहती है। हम लोग कच्ची मिट्टी की मूर्ति के समान रहते हैं, जिसे जो जिस रूप में चाहे, उस रूप में ढाले-चाहे राक्षस बनाए, चाहे देवता। ऐसे लोगों का साथ करना हमारे लिए बुरा है, जो हमसे अधिक दृढ़ संकल्प के हैं, क्योंकि हमें उनकी हर बात बिना विरोध के मान लेनी पड़ती है।

पर ऐसे लोगों का साथ करना और भी बुरा है, जो हमारी ही बात को ऊपर रखते हैं, क्योंकि ऐसी दशा में न तो हमारे ऊपर कोई नियंत्रण रहता है और न हमारे लिए कोई सहारा रहता है। दोनों अवस्थाओं में जिस बात का भय रहता है, उसका पता युवकों को प्रायः बहुत कम रहता है। यदि विवेक से काम लिया जाए तो यह भय नहीं रहता, पर युवा पुरुष प्रायः विवेक से कम काम लेते हैं। कैसे आश्चर्य की बात है कि लोग एक घोड़ा लेते हैं तो उसके सौ गुण-दोष को परख कर लेते हैं, पर किसी को मित्र बनाने में उसके पूर्व आचरण और स्वभाव आदि का कुछ भी विचार और अनुसंधान नहीं करते।

वे उसमें सब बातें अच्छी-ही-अच्छी मानकर अपना पूरा विश्वास जमा देते हैं। हँसमुख चेहरा, बातचीत का ढंग, थोड़ी चतुराई या साहस – ये ही दो-चार बात किसी में देखकर लोग चटपट उसे अपना बना लेते हैं। हम लोग यह नहीं सोचते कि मैत्री का उद्देश्य क्या है, क्या जीवन के व्यवहार में उसका कुछ मूल्य भी है। यह बात हमें नहीं सूझती कि यह ऐसा साधन है, जिससे आत्मशिक्षा का कार्य बहुत सुगम हो जाता है। एक प्राचीन विद्वान का वचन है, “विश्वासपात्र मित्र से बड़ी भारी रक्षा रहती है।

जिसे ऐसा मित्र मिल जाए उसे समझना चाहिए कि खज़ाना मिल गया।” विश्वासपात्र मित्र जीवन की एक औषध है। हमें अपने मित्रों से यह आशा रखनी चाहिए कि वे उत्तम संकल्पों से हमें दृढ़ करेंगे, दोषों और त्रुटियों से हमें बचाएँगे, हमारे सत्य, पवित्रता और मर्यादा के प्रेम को पुष्ट करेंगे, जब हम कुमार्ग पर पैर रखेंगे, तब वे हमें सचेत करेंगे, जब हम हतोत्साहित होंगे, तब हमें उत्साहित करेंगे। सारांश यह है हमें उत्तमतापूर्वक जीवन-निर्वाह करने में हर तरह से सहायता देंगे।

सच्ची मित्रता में उत्तम वैद्य की-सी निपुणता और परख होती है, अच्छी-से-अच्छी माता का-सा धैर्य और कोमलता होती है। ऐसी ही सहायता करने का प्रयत्न प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। छात्रावस्था में मित्रता की धुन सवार रहती है। मित्रता हृदय से उमड़ी रहती है। पीछे के जो स्नेह-बंधन होते हैं, उनमें न तो उतनी उमंग रहती है न उतनी खिन्नता। बाल-मैत्री में जो मग्न करनेवाला आनंद होता है, वह और कहाँ? कैसी मधुरता और कैसी अनुरक्ति होती है, कैसा अपार संवास होता है!

हृदय से कैसे-कैसे उद्गार निकलते हैं! भविष्य के संबंध में कैसी लुभानेवाली कल्पनाएँ मन में रहती हैं। कितनी बातें लगती हैं और कितनी जल्दी मानना है। ‘सहपाठी की मित्रता’ इस उक्ति में हृदय के कितने भारी उथल-पुथल का भाव भरा हुआ है। किंतु जिस प्रकार युवा पुरुष की मित्रता स्कूल के एक की मित्रता से दृढ, शांत और गंभीर होती है, उसी प्रकार हमारी अवस्था के मित्र बाल्यावस्था के मित्रों से कई बातों में भिन्न होते हैं। मैं जानता हूँ कि मित्र चाहते हुए बहुत-से लोग मित्र के आदर्श की कल्पना करते होंगे।

पर इस कल्पित आदर्श से तो हमारा काम जीवन में चलता नहीं। सुंदर प्रतिभा, मनभावनी चाल और स्वच्छंद प्रकृति, दो-चार बातें देखकर मित्रता की जाती है, पर जीवन-संग्राम में साथ चले मित्रों में इनसे कुछ अधिक बातें चाहिए। मित्र केवल उसे नहीं कहो, जिसके गुणों की तो हम प्रशंसा करें, पर जिससे हम स्नेह न कर सकें, जिससे अपने छोटे-छोटे काम ही हम निकालते जाएँ, पर भीतर-ही-भीतर घृणा करते रहें। मित्र सच्चे पथ-प्रदर्शक के समान होना चाहिए, जिस पर हम पूरा विश्वास कर सकें।

मित्र भाई के समान होना चाहिए, जिसे हम अपना प्रीति-पात्र बना सकें। हमारे और हमारे मित्र के बीच सच्ची सहानुभूति होनी चाहिए। ऐसी सहानुभूति जिससे एक के हानि-लाभ को दूसरा अपना हानि-लाभ समझे।। मित्र का कर्तव्य इस प्रकार बताया गया है, “उच्च और महान कार्यों में इस प्रकार सहायता देना, मन बढ़ाना और साहस दिलाना कि तुम अपनी-अपनी सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ।” यह कर्तव्य उसी से पूरा होगा, जो दृढ़ चित्त और सत्य-संकल्प का हो।

इससे हमें ऐसे ही मित्रों की खोज में रहना चाहिए जिनमें हमसे अधिक आत्मबल हो। हमें उनका पल्ला उसी तरह पकड़ना चाहिए, जिस तरह सुग्रीव ने राम का पल्ला पकड़ा था। मित्र हों तो प्रतिष्ठित और शुद्ध हृदय के हों, मृदुल और पुरुषार्थी हों, शिष्ट और सत्यनिष्ठ हों, जिससे हम अपने को उनके भरोसे पर छोड़ सकें और यह विश्वास कर सकें कि उनसे किसी प्रकार का धोखा न होगा। जो बात ऊपर मित्रों के संबंध में कही गई है, वही जान-पहचानवालों के संबंध में भी ठीक है।

जो हमारे जीवन को उत्तम और आनंदमय बनाने में कुछ सहायता दे सकते हों, यद्यपि उतनी नहीं जितनी गहरे मित्र दे सकते हैं। मनुष्य का जीवन थोडा है, उसमें खोने के लिए समय नहीं। यदि क, ख और ग हमारे लिए कुछ नहीं कर सकते हैं, न कोई बुद्धिमानी या विनोद की बातचीत कर सकते हैं, न कोई अच्छी बात बतला सकते हैं, न सहानुभूति द्वारा हमें ढाढ़स बँधा सकते हैं, न हमारे आनंद में सम्मिलित हो सकते हैं, न हमें कर्तव्य का ध्यान दिला सकते हैं, तो ईश्वर हमें उनसे दूर ही रखे।

आजकल जान-पहचान बढाना कोई बड़ी बात नहीं है। कोई भी युवा पुरुष ऐसे अनेक युवा पुरुषों को पा सकता है, जो उसके साथ थियेटर चले जाएँगे, नाचरंग में जाएँगे, सैर-सपाटे में जाएँगे, भोजन का निमंत्रण स्वीकार करेंगे। यदि ऐसे जान-पहचान के लोगों से कुछ हानि न होगी, तो लाभ भी न होगा। पर यदि हानि होगी तो बड़ी भारी होगी। कुसंग का ज्वर सबसे भयानक होता है। यह केवल नीति और सद्वृत्ति का ही नाश नहीं करता, बल्कि बुद्धि का भी क्षय करता है।

किसी युवा पुरुष की संगति यदि बुरी होगी तो वह उसके पैरों में बँधी चक्की के समान होगी, जो उसे दिन-रात अवनति के गड्ढे में गिराती जाएगी और यदि अच्छी होगी तो सहारा देने वाली बाहु के समान होगी, जो उसे निरंतर प्रगति की ओर उठाती जाएगी। इंग्लैंड के एक विद्वान को युवावस्था में राज-दरबारियों में जगह नहीं मिली। इस पर जिंदगी भर वह अपने भाग्य को सराहता रहा। बहुत-से लोग इसे अपना बड़ा भारी दुर्भाग्य समझते, पर वह अच्छी तरह जानता था कि वहाँ वह बुरे लोगों की संगति में पड़ता जो उसकी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक होते।

बहुत-से लोग ऐसे होते हैं, जिनके घड़ी भर के साथ से सद्बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, क्योंकि उनके ही बीच में ऐसी-ऐसी बातें कही जाती हैं जो कानों में न पड़नी चाहिए, चित्त पर ऐसे प्रभाव पड़ते हैं, जिससे उसकी पवित्रता का नाश होती है। बुराई अटल भाव धारण करके बैठती है। बुरी बातें हमारी धारणा में बहुत दिनों तक टिकती हैं। इस बात को प्रायः सभी लोग जानते हैं कि भद्दे व फूहड़ गीत जितनी जल्दी ध्यान में चढ़ते हैं, उतनी जल्दी कोई गंभीर या अच्छी बात नहीं।

एक बार एक मित्र ने मुझसे कहा कि उसने लड़कपन में कहीं से बुरी कहावत सुनी थी, जिसका ध्यान वह लाख चेष्टा करता है कि न आए, पर बार-बार आता है। जिन भावनाओं को हम दूर रखना चाहते हैं, जिन बातों को हम याद करना नहीं चाहते, वे बार-बार हृदय में उठती हैं और बेधती हैं। अतः तुम पूरी चौकसी रखो, ऐसे लोगों को साथी न बनाओ जो अश्लील, अपवित्र और फूहड़ बातों से तुम्हें हँसाना चाहें। सावधान रहो। ऐसा न हो कि पहले-पहल तुम इसे एक बहुत सामान्य बात समझो और सोचो कि एक बार ऐसा हुआ, फिर ऐसा न होगा।

अथवा तुम्हारे चरित्रबल का ऐसा प्रभाव पड़ेगा कि ऐसी बातें बकने वाले आगे चलकर स्वयं ही सुधर जाएँगे। नहीं, ऐसा नहीं होगा। जब एक बार मनुष्य अपना पैर कीचड़ में डाल देता है, तब फिर यह नहीं देखता कि वह कहाँ और कैसी जगह पैर रखता है। धीरे-धीरे उन बुरी बातों में अभ्यस्त होते-होते तुम्हारी घृणा कम हो जाएगी। पीछे तुम्हें उनसे चिढ़ न मालूम होगी, क्योंकि तुम यह सोचने लगोगे कि चिढ़ने की बात ही क्या है।

तुम्हारा विवेक कुंठित हो जाएगा और तुम्हें भले-बुरे की पहचान न रह जाएगी। अंत में होते-होते तुम भी बुराई के भक्त बन जाओगे। अतः हृदय को उज्ज्वल और निष्कलंक रखने का सबसे अच्छा उपाय यही है कि बुरी संगति की छूत से बचो। एक पुरानी कहावत है-
“काजल की कोठरी में कैसो ही सयानो जाय।
एक लीक काजल की लागि है पै लागि है।”

प्रश्नः 1.
बाहरी संसार में उतरने पर नौजवानों के समक्ष पहली कठिनाई क्या आती है?
उत्तरः

जब कोई नौजवान अपने घर से बाहर निकलकर बाहरी संसार में अपनी स्थिति जमाता है तो उसे पहली कठिनाई इस बात की आती है कि वह किसे अपना मित्र बनाए।

प्रश्नः 2.
आजकल कैसे लोगों के साथ सरलता से जान-पहचान हो जाती है?
उत्तरः

आजकल ऐसे लोगों के साथ सरलता से जान-पहचान हो जाती है जो साथ थियेटर देखने जाएँ, नाचरंग में जाएँ, सैर सपाटे में जाएँ, भोजन का निमंत्रण स्वीकार करें।

प्रश्नः 3.
हमसे अधिक दृढ़ संकल्प वाले लोगों का साथ हमारे लिए क्यों बुरा हो सकता है?
उत्तरः

जब हमारे साथ ऐसे व्यक्ति होते हैं जो हमसे अधिक दृढ़ संकल्प वाले होते हैं तो हमें उनकी हर बात बिना विरोध के माननी पड़ती है।

प्रश्नः 4.
छात्रावास और उसके बाद की मित्रता में क्या अंतर होता है?
उत्तरः
छात्रावास की मित्रता में उमंग और आनंद होता है, मधुरता और अनुरिक्त होती है। उसमें जल्दी रूठने और मान जाने प्रवृत्ति होती है। इसके विपरीत बाद की मित्रता में न उतनी उमंग होती है और न उतनी खिन्नता। युवा पुरुष की मित्रता स्कूल के बालक की मित्रता से दृढ़, शांत और गंभीर होती है।

प्रश्नः 5.
अपने से अधिक आत्मबल रखने वाले व्यक्ति को मित्र बनाने से क्या लाभ है?
उत्तरः

अपने से अधिक आत्मबल रखने वाले व्यक्ति को मित्र बनाने से यह लाभ है कि वह उच्च और महान कार्यों में इस प्रकार सहायता देगा कि तुम अपनी सामर्थ्य से बाहर काम कर जाओ।

प्रश्नः 6.
राजदरबार में जगह न मिलने पर इंग्लैंड का एक विद्वान अपने भाग्य को क्यों सराहता रहा?
उत्तरः

जब इंग्लैंड के एक विद्वान को राजदरबार में जगह नहीं मिली तो वह अपने भाग्य को सराहता रहा क्योंकि वह जानता था कि राजदरबार में उसे बुरे लोगों की संगति में पड़ना पड़ता, जिससे उसके आध्यात्मिक विकास में बाधा पड़ती।

प्रश्नः 7.
सच्ची मित्रता में वैद्य की-सी निपुणता और परख और माता का-सा धैर्य और कोमलता होती है-स्पष्ट कीजिए।
उत्तरः

एक निपुण वैद्य की पारखी दृष्टि से कोई भी रोग छिप नहीं पाता और वह उसका उचित उपचार करके रोगी को स्वस्थ कर देता है। अच्छा मित्र भी अपने मित्र की कमियों को बड़ी आसानी से परख लेता है और उन्हें दूर करने का प्रयास करता है। माता भी अपने बच्चे की भलाई का ध्यान रखती है और धैर्य एवं कोमलता के साथ वह बालक को सही मार्ग पर चलाती है। अच्छा मित्र भी वैसे ही करता है।

प्रश्नः 8.
मित्र का चुनाव करते समय हमें किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तरः

मित्र बनाते समय हमें निम्नलिखित सावधानियाँ रखनी चाहिए

  1. मित्र बनाते समय खूब सोच-विचार लेना चाहिए।
  2. सुंदर प्रतिभा, मनभावनी चाल और स्वच्छंद प्रकृति के लोगों को मित्र नहीं बनाना चाहिए।
  3. परस्पर सच्ची सहानुभूति प्रकट करने वालों को मित्र बनाना चाहिए।
  4. विश्वासपात्र होना चाहिए।
  5. हमें ऐसे मित्र कभी नहीं बनाने चाहिए जो हमारी झूठी प्रशंसा करता हो और मन से घृणा करता हो।
  6. हमें ऐसे मित्रों का परित्याग कर देना चाहिए जो हमें कुमार्ग की ओर ले जाएँ और हमारे दोषों को दूर न करें।
  7. सभी प्रकार के अवगुणों को छिपाने वाले और गुणों को प्रकट करने वाले को मित्र बनाना चाहिए।

परियोजना कार्य-2

आज से करीब डेढ हज़ार साल पहले पाटलिपुत्र नगर नंद, मौर्य और गुप्त सम्राटों की राजधानी था। दूर-दूर तक इस नगर की कीर्ति फैली हुई थी। राजधानी होने के कारण देशभर के प्रतिष्ठित पंडित यहाँ एकत्र होते थे। प्रख्यात नालंदा विश्वविद्यालय में दूसरे देशों के विद्यार्थी भी विशेष अध्ययन के लिए पहुँचते थे। उस समय पाटलिपुत्र नगर ज्योतिष के अध्ययन के लिए मशहूर था। एक दिन सवेरे से ही गंगा, सोन और गंडक नदियों के संगम की ओर लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। उस दिन अपराह्न में सूर्य को ग्रहण लगने वाला था।

लोगों में यह प्रचारित था कि “राहु नाम का राक्षस सूर्य को निगल जाता है, तब ग्रहण लगता है। ग्रहण के समय उपवास रखना चाहिए, खूब दान-पुण्य करना चाहिए। तभी इस राक्षस के चंगुल से सूर्य-देवता को जल्दी-से-जल्दी मुक्ति मिलती है।” मगर पाटलिपुत्र नगर से थोड़ी दूर के आश्रम में कुछ दूसरा ही माहौल था। टीले पर बसे उस आश्रम के लंबे-चौड़े आँगन में ताँबे, पीतल और लकड़ी के तरह-तरह के यंत्र रखे हुए थे। उनमें से कुछ यंत्र गोल थे, कुछ कटोरे-जैसे, कुछ वर्तुलाकार और कुछ शंकु की तरह के।

वस्तुतः वह एक वेधशाला थी। वहाँ के ज्योतिषियों ने हिसाब लगाकर पहले से ही भविष्यवाणी की थी कि ठीक किस समय ग्रहण लगेगा, कहाँ-कहाँ दिखाई देगा और कितने समय तक रहेगा। आज उन्हें देखना था कि उनका हिसाब ठीक निकलता है या नहीं। इसलिए सभी उत्सुकता से ग्रहण के क्षण का इंतज़ार कर रहे थे। मगर वहाँ पर एक तरुण विद्यार्थी जो अपने साथियों को समझा रहा था, “पृथ्वी की बड़ी छाया जब चंद्र पर पड़ती है, तो चंद्र ग्रहण होता है।

इसी प्रकार चंद्र जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में आता है और वह सूर्य को ढक लेता है, तब सूर्य ग्रहण होता है। आज भी ऐसा ही होने वाला है, कोई राहु नाम का राक्षस सूर्य को निगल जाता है—यह कथन पुराण की कथा है।” ग्रहणों की वैज्ञानिक व्याख्या करने वाले उस तरुण पंडित का नाम था—आर्यभट। ‘भट’ का मतलब है-योद्धा। सचमुच आर्यभट अज्ञान के विरुद्ध ज्ञान का युद्ध जीवन भर लड़ते रहे। आर्यभट दक्षिणापथ में गोदावरी तट क्षेत्र के अश्मक जनपद में पैदा हुए थे। इसलिए बाद में वे आश्मकाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए।

गणित एवं ज्योतिष के अध्ययन में उनकी गहरी रुचि थी। आर्यभट अपने विचार बेहिचक प्रस्तुत कर देते थे। ग्रहणों के बारे में ही नहीं, आकाश की दूसरी अनेक घटनाओं के बारे में भी उनके अपने स्वतंत्र विचार थे। उस ज़माने के लोग समझते थे कि हमारी पृथ्वी आकाश में स्थिर है और तारामंडल एवं सूर्य गतिशील। आर्यभट हमारे देश के पहले ज्योतिषी थे जिन्होंने साफ़ शब्दों में कहा है कि पृथ्वी स्थिर नहीं है। यह अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है।

तो फिर आकाश के तारे हमें चक्कर लगाते क्यों दिखाई देते हैं? पृथ्वी के चक्कर लगाने का पता हमें क्यों नहीं चलता? आर्यभट का उत्तर था- “समझ लो कि नदी में एक नाव है और वह धारा के साथ तेजी से आगे बढ़ रही है। तब उसमें बैठा हुआ आदमी किनारे की स्थिर वस्तुओं को उलटी दिशा में जाता हुआ अनुभव करता है। उसी तरह आकाश के तारों की बात है। पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है और इसके साथ हम भी घूमते रहते हैं, इसलिए आकाश में स्थित तारामंडल हमें पूर्व से पश्चिम की ओर जाता जान पड़ता है।

वस्तुतः तारामंडल स्थिर है और पृथ्वी अपनी धुरी पर चक्कर लगाती है। कोई भी ज्योतिषी इस मत को मानने के लिए तैयार नहीं होता था। यही कारण था कि आर्यभट का मत सही होने पर भी आगे की सदियों तक हमारे देश के बड़े-बड़े ज्योतिषी भी यही मानते रहे कि पृथ्वी स्थिर है। वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त जैसे महान ज्योतिषी भी ऐसे ही थे। आर्यभट की पुस्तक का नाम है – आर्यभटीय। पुस्तक पद्य में है। भाषा संस्कृत है। प्राचीन भारत में गणित और ज्योतिष का अध्ययन साथ-साथ होता था, इसलिए इन दोनों विषयों का विवेचन प्रायः एक ही ग्रंथ में कर दिया जाता था।

पुस्तक के चार भाग हैं-दशगीतिका, गणित, कालक्रिया और गोल। आर्यभटीय में कुल 121 श्लोक हैं। प्रत्येक श्लोक में दो पंक्तियाँ हैं। उस समय तक भारत में गणित और ज्योतिष से संबंधित जितनी महत्त्वपूर्ण बातें खोजी गई थीं, उन सबको आर्यभट ने अत्यंत संक्षेप में अपनी पुस्तक में प्रस्तुत कर दिया है। पुराना ज्ञान ही नहीं, उन्होंने अपनी नई खोजी हुई बातें भी पुस्तक में रखी हैं। आर्यभटीय भारतीय गणित-ज्योतिष का पहला ग्रंथ है जिसमें इसके रचनाकार और रचनाकाल के बारे में स्पष्ट सूचना मिलती है।

ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में संसार को प्राचीन भारत की सबसे बड़ी देन है-शून्य सहित केवल दस अंक संकेतों से ही संख्याओं को व्यक्त करना। इस दाशमिक स्थानमान अंक-पद्धति की खोज आर्यभट से तीन-चार सदियों पहले हो चुकी थी। आर्यभट इस नई अंक पद्धति से परिचित थे। उन्होंने अपने ग्रंथ के आरंभ में वृंद (1000000000) अर्थात अरब तक ही दशगुणोत्तर संख्या-संज्ञाएँ देकर लिखा है कि इनमें प्रत्येक स्थान पिछले स्थान से दस गुणा है।

प्राचीन भारत में गणित-ज्योतिष के ग्रंथ भी पद्य में लिखे जाते थे, इसलिए उनमें ख (0), पृथ्वी (1), (2), ऋतु (6) जैसे शब्दों से संख्याओं को व्यक्त किया जाता था। इन शब्दांकों को उनके क्रम में लिखने का नियम था; जैसे खचतुष्ट-रदअर्णव (चार शून्यदाँत-सागर) का अर्थ होता था-4320000. आर्यभट अपने ग्रंथ को बहुत छोटा बनाना चाहते थे, वे अपने विचारों को कम-से-कम शब्दों में प्रस्तुत करना चाहते थे।

आर्यभट ने अक्षरों को संख्यामान प्रदान किए। जैसे-क् = 1, ख् = 2, ग् = 3 इत्यादि। अ, इ, उ आदि स्वरों को उन्होंने एक, सौ, दस हज़ार जैसे शतगुणोत्तर मान दिए। इस तरह उन्होंने व्यंजनों और स्वरों के मेलजोल से बड़ी से बड़ी संख्या को संक्षेप में लिखने का एक नया तरीका खोज निकाला। इस नई अक्षरांक पद्धति को अपनाकर आर्यभट बड़ी-बड़ी संख्याओं को छोटे-छोटे शब्दों में प्रस्तुत करने में समर्थ हुए, जैसे-उपर्युक्त संख्या

प्रश्नः 1.
पटना शहर के प्राचीन नाम क्या-क्या थे?
उत्तरः

पटना शहर को पहले पाटलिपुत्र कहा जाता था। यहाँ फूल बहुत अधिक होते थे, अतः इसका नाम कुसुमपुर भी था।

प्रश्नः 2.
प्राचीन काल में पाटलिपुत्र नगर की प्रसिद्धि के क्या कारण थे?
उत्तरः

प्राचीन काल में पाटलिपुत्र नगर नंद, मौर्य और गुप्त सम्राटों की राजधानी रहा था। वह बहुत बड़ा नगर था। राजधानी होने के कारण देशभर के प्रतिष्ठित पंडित यहाँ एकत्र होते थे। प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय भी पटना के समीप ही था।

प्रश्नः 3.
गंगा, सोन और गंडक नदियों के संगम पर लोग क्यों इकट्ठे हुए थे?
उत्तरः

उस दिन अपराहन में सूर्यग्रहण पड़ने वाला था। ग्रहण के अवसर पर नदियों के संगम और ऐसे ही स्थानों पर स्नान करने की मान्यता रही है। इसलिए लोग उन नदियों के संगम पर इकट्ठे हो रहे थे, ताकि ग्रहण के अवसर पर वे वहाँ स्नान कर सकें।

प्रश्नः 4.
लोगों में सूर्यग्रहण के बारे में क्या धारणा थी?
उत्तरः

लोगों में सूर्यग्रहण के बारे यह धारणा थी कि राहु नाम का राक्षस सूर्य को निगल जाता है, तब ग्रहण लगता है। ग्रहण के समय उपवास रखना चाहिए, खूब दान-पुण्य करना चाहिए, तभी इस राक्षस के चंगुल से सूर्य देवता को जल्दी-से-जल्दी मुक्ति मिलती है।

प्रश्नः 5.
पाटलिपुत्र नगर से दूर टीले पर स्थित आश्रम की क्या विशेषता थी?
उत्तरः

पाटलिपुत्र नगर से थोड़ी दूर टीले पर स्थित आश्रम में भी बड़ी चहल-पहल थी। लेकिन वह चहल-पहल कुछ दूसरे प्रकार की थी। यह आश्रम एक वेधशाला थी। टीले पर बसे उस आश्रम के लंबे-चौड़े आँगन में ताँबे, पीतल और लकड़ी के तरह-तरह के यंत्र रखे हुए थे। उनमें से कुछ यंत्र गोल थे, कुछ कटोरे जैसे, कुछ वर्तुलाकार और कुछ शंकु की तरह के थे। यहाँ ज्योतिष अपना अनुमान लगाते हैं।

प्रश्नः 6.
आश्रम की वेधशाला में ज्योतिषी और विद्यार्थी क्यों एकत्र हुए थे?
उत्तरः

आश्रम की वेधशाला में उस दिन यंत्रों के इर्द-गिर्द कई प्रसिद्ध ज्योतिषी और बहुत-से विद्यार्थी एकत्र हुए थे। वहाँ के ज्योतिषियों ने हिसाब लगाकर पहले ही भविष्यवाणी की थी कि ठीक किस समय ग्रहण लगेगा, कहाँ-कहाँ दिखाई देगा और कितने समय तक रहेगा। आज उन्हें देखना था कि उनका हिसाब ठीक निकलता है या नहीं। इसीलिए वहाँ ज्योतिषी और विद्यार्थी एकत्र हुए थे।

प्रश्नः 7.
आर्यभट ने सूर्य और चंद्रग्रहण की क्या वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की?
उत्तरः

आर्यभट ने अपनी वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा, “पृथ्वी की बड़ी छाया जब चंद्र पर पड़ती है, तो चंद्र ग्रहण होता है। इसी प्रकार चंद्र जब पृथ्वी और सूर्य के बीच में आता है और वह सूर्य को ढक लेता है, तब सूर्यग्रहण होता है। कोई राहु नाम का राक्षस सूर्य को निगल जाता है-यह कथन पुराण की कथा है।”

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श्रवण एवं वाचन | class 12th | Important question Hindi

 Class 12 Hindi श्रवण एवं वाचन

भाषा का मौखिक प्रयोग ही भाषा का मूल रूप है। इसलिए बोलचाल को ही भाषा का वास्तविक रूप माना जाता है। मानव जीवन में लिखित भाषा की अपेक्षा मौखिक भाषा ही अधिक महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि हम अपने दैनिक जीवन के अधिकांश कार्य मौखिक भाषा द्वारा ही संपन्न करते हैं। हास-परिहास, वार्तालाप, विचार-विमर्श, भाषण, प्रवचन आदि कार्यों में मौखिक भाषा का उपयोग स्वयंसिद्ध है। सार्वजनिक जीवन में मौखिक अभिव्यक्ति का विशेष महत्त्व है। जो वक्ता मौखिक अभिव्यक्ति में अधिक कुशल होता है, वह श्रोताओं को अधिक प्रभावित करता है तथा अपना लक्ष्य सिद्ध कर लेता है।

सामाजिक संवाद में कुशल बनने के लिए प्रयोग और अभ्यास भी अनिवार्य है। बिना अभ्यास के आत्म-विश्वास डगमगाने लगता है। यह आवश्यक नहीं है कि अभ्यास के लिए स्थिति सामने लाई जाए क्योंकि शादी, मृत्यु आदि का अवसर कक्षा में नहीं लाया जा सकता। अतः छात्रों को अध्यापक की सहायता से काल्पनिक स्थिति बनाकर अभ्यास करना चाहिए।

(क) मानक उच्चारण के साथ शुद्ध भाषा का प्रयोग।
(ख) व्यावहारिक भाषा का प्रयोग।
(ग) विनीत और स्पष्ट भाषा का प्रयोग।
(घ) विषयानुरूप प्रभावपूर्ण भाषा का प्रयोग।

मौखिक अभिव्यक्ति के अनेक रूप हैं; जैसे-

  1. कविता पाठ
  2. कहानी कहना
  3. भाषण
  4. समाचार वाचन
  5. साक्षात्कार लेना व देना
  6. वर्णन करना
  7. वाद-विवाद
  8. परिचर्चा
  9. उद्घोषणा
  10. बधाई देना
  11. धन्यवाद
  12. संवेदना प्रकट करना
  13. आस-पड़ोस में संपर्क
  14. अतिथि का स्वागत।

कुछ महत्त्वपूर्ण रूपों पर यहाँ प्रकाश डाला जा रहा है-

1 कविता सुनाना

कविता सुनाना भी अपने-आप में एक कला है। यह कला कुछ लोगों में जन्म से पाई जाती है तो कुछ इसे अभ्यास द्वारा सीख सकते हैं। कवि सम्मेलनों में जाने तथा कवियों के सान्निध्य से कविता पाठ सुनकर अभ्यास किया जाए तो सीखने का कार्य सरल हो जाता है। कविता पाठ में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है-

  • सर्वप्रथम ऐसी कविता का चयन करें जो अपनी रुचि के अनुसार हो, जिसे आप अपने हृदय से पसंद करते हों, क्योंकि ऐसी कविता में ही आप उन भावों को भर सकते हैं, जो आपके दिल से निकलते हैं।
  • कविता को पूर्णत: कठस्थ कर लें। कंठस्थ कविता से ही लय बनती है।
  • उस कविता का बार-बार अभ्यास करें।
  • कंठस्थ कविता को नज़दीकी लोगों को सुनायें।
  • एकांत कमरे में शीशे के सामने खड़े होकर अपने हाव-भाव को कविता की प्रवृत्ति के अनुसार बनायें।
  • जो शब्द या वाक्य आपके प्रवाह में बाधक हों, उन्हें बदल कर उनके स्थान पर पर्यायवाची रख दें।
  • शब्द परिवर्तन से कविता के अर्थ में परिवर्तन नहीं आना चाहिए।
  • उच्चारण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  • कविता सुनाते समय मुक्त कंठ से कविता का उच्चारण करें।
  • श्रोता की रुचि व आराम का विशेष ध्यान रखें।
  • श्रोताओं के हाव-भाव पढ़ने का प्रयत्न करें।
  • भावों के अनुसार स्वरों में उतार-चढ़ाव होना भी आवश्यक है। हास्य, व्यंग्य व करुणा के भावों के अनुसार वाणी का उतार चढ़ाव अधिक प्रभावशाली बन जाता है।
  • कविता रुक-रुक कर सुनाई जानी चाहिए, ताकि श्रोतागण उसका पूरा आनंद ले सकें।
  • श्रोतागण के आनंद को उनके द्वारा दी गई दाद/तालियों से समझा जा सकता है। ऐसे अवसरों पर कविता की उस पंक्ति को दोबारा दोहराया जाना चाहिए।
  • जिन पंक्तियों पर आप श्रोता का ध्यान आकर्षित करना चाहते हों, उन पंक्तियों को दोहराना चाहिए।
  • कविता को गाकर भी सुनाया जा सकता है।
  • कविता का चयन अवसरानुकूल होना चाहिए।
  • कविता को भावपूर्ण हृदय से सुनाकर श्रोतागण को भाव-विभोर करना ही श्रेष्ठ कविता का वाचन होता है।
  • अवसरानुकूल कविता की प्रस्तुति से श्रोताओं का भाव-विभोर हो जाना निश्चित है, क्योंकि हृदय से निकली आवाज मन को अवश्य बाँधती है।

अभ्यास प्रश्न

1. निम्नलिखित कविताओं का कक्षा में प्रभावशाली ढंग से वाचन कीजिए-

(1) झाँसी की रानी की समाधि पर

इस समाधि में छिपी हुई है
एक राख की ढेरी।
जलकर जिसने स्वतंत्रता की
दिव्य आरती फेरी॥

यह समाधि, यह लघु समाधि है
झाँसी की रानी की।
अंतिम लीलास्थली यही है
लक्ष्मी मर्दानी की॥

यहीं कहीं पर बिखर गई वह
भग्न विजय-माला-सी।
उसके फूल यहाँ संचित हैं
है यह स्मृति-शाला-सी॥

वार पर वार अंत तक
लड़ी वीर बाला-सी।
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर
चमक उठी ज्वाला-सी॥

बढ़ जाता है मान वीर का
रण में बलि होने से।
मूल्यवती होती सोने की
भस्म यथा सोने से॥

रानी से भी अधिक हमें अब
यह समाधि है प्यारी।
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की
आशा की चिनगारी॥

इससे भी सुंदर समाधियाँ
हम जग में हैं पाते।
उनकी गाथा पर निशीथ में
क्षुद्र जंतु ही गाते॥

पर कवियों की अमर गिरा में
इसकी अमिट कहानी।
स्नेह और श्रद्धा से गाती
है वीरों की बानी॥ सहे

बुंदेले हरबोलों के मुख
हमने सुनी कहानी।
खूब लड़ी मर्दानी वह थी
झाँसी वाली रानी॥

यह समाधि, यह चिर समाधि
है झाँसी की रानी की।
अंतिम लीलास्थली यही है
लक्ष्मी मर्दानी की॥

-सुभद्रा कुमारी चौहान

(2) निज रक्षा का अधिकार रहे जन-जन को,
सबकी सुविधा का भार किंतु शासन को।
मैं आर्यों का आदर्श बताने आया।
जन-सम्मुख धन को तुच्छ जताने आया।
सुख-शांति-हेतु मैं क्रांति मचाने आया,
विश्वासी का विश्वास बचाने आया,
मैं आया उनके हेतु कि जो तापित हैं,
जो विवश, विकल, बल-हीन, दीन शापित हैं।
हो जाएँ अभय वे जिन्हें कि भय भासित हैं,
जो कौणप-कुल से मूक-सदृश शासित हैं।
मैं आया, जिसमें बनी रहे मर्यादा,
बच जाय प्रबल से, मिटे न जीवन सादा।
सुख देने आया, दुःख झेलने आया,
संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया
मैं मनुष्यत्व का नाट्य खेलने आया।
मैं यहाँ एक अवलंब छोड़ने आया,
गढ़ने आया हूँ, नहीं तोड़ने आया।
मैं यहाँ जोड़ने नहीं, बाँटने आया,
जगदुपवन में झंखाड़ छाँटने आया।
मैं राज्य भोगने नहीं, भुगाने आया।
हंसों को मुक्ता-मुक्ति चुगाने आया,
भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया।
नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया।
संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।
अथवा आकर्षण पुण्यभूमि का ऐसा,
अवतरित हुआ मैं, आप उच्च फल जैसा।

-मैथिलीशरण गुप्त

2. कहानी कहना

कहानी कहना या सुनाना भी एक कला है। एक अच्छा कहानी लिखने वाला अच्छा कहानी सुनाने वाला भी हो, यह आवश्यक नहीं। यह कला अभ्यास के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।

विद्यार्थियों को यदि इस कला से अवगत कराया जाए तो उनमें इस गुण का विकास किया जा सकता है। एक अच्छे कहानीकार में निम्नलिखित गुणों का होना अत्यंत आवश्यक होता है-

1. जिस कहानी को सुनाना हो उसका सार कहानी सुनाने वाले के दिमाग में बिलकुल स्पष्ट होना चाहिए।

2. उसे सारी घटनाएँ याद होनी चाहिए जिससे वह कहानी को उलट-पलट कर न सुना दे। क्योंकि ऐसा होने पर कहानी का रस ही समाप्त हो जाता है।

3. कहानी सुनाते समय कहानी के पात्रों, तिथियों, स्थानों का नाम पूर्ण रूपेण याद होना चाहिए। केवल अनुमान लगाकर सुनाई गई कहानी अपनी वास्तविकता खो देती है।

4. भाषा और संवाद भी कहानी की जान होते हैं। भाषा का स्तर उम्र, बौद्धिक स्तर आदि के अनुकूल होने पर ही कहानी प्रभावशाली बन पाती है। संवादों में बचपना या परिपक्वता सामने बैठे श्रोतागण के अनुसार होने पर ही कहानी में रुचि जाग्रत हो सकती है।

5. कहानी को रोचक बनाने के लिए संवाद व वर्णन-दोनों का उचित मात्रा में प्रयोग किया जाना चाहिए। जिस प्रकार भोजन में उचित मात्रा में तेल, मसाले आदि डाले जाएँ तो भोजन रुचिकर बनता है ठीक उसी प्रकार संवाद और वर्णन का सही मेल ही कहानी में जान डाल सकता है।

6. कहानी सुनाते समय श्रोता के हाव-भाव को पढ़ना भी कहानीकार का मुख्य कार्य होता है, क्योंकि श्रोता की रुचि और अरुचि का पता उनके हाव-भाव से लगाकर अपनी कहानी को अधिक रोचक या सरल बनाकर सुनाने पर ही श्रोता की वाह-वाही लूटी जा सकती है।

7. कहानी सुनाने वाले की आवाज़ में एक विशिष्ट आकर्षण होना भी अत्यंत आवश्यक होता है। कहानीकार की आवाज़ का केवल मधुर होना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि उसका बुलंद होना भी जरूरी होता है। यदि आखिरी पंक्ति में बैठा श्रोता उसकी आवाज़ नहीं सुन पा रहा है तो वह कहानी उसके लिए रुचिकर कैसे हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि कहानी सुनाने वाला चिल्ला-चिल्लाकर कहानी सुनाए। ऐसा करने पर श्रोतागण के सिर में दर्द भी हो सकता है और अरुचिवश वे वहाँ से उठकर भी जा सकते हैं।

8. कहानी को रोचक बनाने के लिए अच्छे मुहावरों व सूक्तियों के द्वारा भाषा को लच्छेदार बनाना भी आवश्यक होता है। सीधी, सरल भाषा ज्यादा देर तक श्रोताओं को नहीं बाँध सकती है।

9. लच्छेदार भाषा के साथ कहानी कहने वाले की आवाज़ में उतार-चढ़ाव होना भी अत्यंत आवश्यक होता है। आवाज़ का जादू अच्छे-अच्छों के होश उड़ा देता है। एक-सी आवाज़ में कही गई कहानी श्रोता को बाँधने में असफल होती है। लेकिन आवाज़ में उतार-चढ़ाव आवश्यकता के अनुसार ही होना चाहिए अन्यथा अर्थ का अनर्थ होते देर नहीं लगती। 406

10. जोश और उत्साह की बात बताते समय चेहरे की प्रसन्नता तथा आवाज़ की बुलंदी तथा दुख भरी घटना सुनाते समय भाव-विभोर हो मंद आवाज़ में कही गई बात सीधी श्रोता के दिल में उतर जाती है।

11. भाव-विभोर होकर कहानी सुनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि आपकी आवाज़ सामने बैठे श्रोताओं की आखिरी पंक्ति तक पहुँचनी चाहिए।

12. कहानी की रोचकता को बनाये रखने के लिए जिज्ञासा का बना रहना अत्यंत ज़रूरी है। श्रोता के मन में यदि हर पल यह जिज्ञासा बनी रहे कि अब आगे क्या होगा तो कहानी सुनने का आनंद दुगुना हो जाता है। कहानी सुनाने वाले के द्वारा इस जिज्ञासा को बनाए रखना अति आवश्यक होता है।

13. कहानी बहुत अधिक लंबी नहीं होनी चाहिए अन्यथा श्रोता बोरियत का अनुभव करने लगते हं।

14. कहानी किसी उद्देश्य से परिपूर्ण हो यह भी अति आवश्यक है। निश्चित निष्कर्ष को लेकर सुनाई गई कहानी अधिक रुचिकर होती है।

15. कहानी में हास्य-व्यंग्य का पुट होना चाहिए।

16. कहानी में मार्मिक संवाद अनिवार्य है।

अभ्यास प्रश्न

1. निम्नलिखित कहानियों को कक्षा में रोचक ढंग से सुनाइए

1. एक बार राजा भोज को सपने में व्यक्ति का रूप धारण कर स्वयं ‘सत्य’ ने दर्शन दिए। राजा के पूछने पर सत्य ने बताया “मैं सत्य हूँ जो अंधों की आँखें खोलता हूँ और मृग-तृष्णा में भटके हुओं का भ्रम मिटाता हूँ। यदि तुझमें साहस है तो मेरे साथ चल मैं तेरे भी मन की जाँच कर लूँ।” चूँकि राजा भोज को अपने सत्कर्मों का बहुत अहंकार था इसलिए वह तुरंत ही इसके लिए सहमत हो गया। सत्य उसे अपने साथ मंदिर के उस ऊँचे दरवाजे पर ले गया, जहाँ से एक सुंदर बाग दिखाई देता था।

उस बाग में तीन पेड़ लगे हुए थे। सत्य ने राजा से पूछा ‘क्या तुम बता सकते हो कि ये पेड़ किसके हैं?’ राजा ने प्रसन्नता से भरकर उत्तर दिया – “ये तीनों ही पेड़ मेरे पुण्य कर्म का प्रतिफल हैं। लाल-लाल फलों से लदा हुआ पेड़ मेरे दान का है। पीले फल मेरे न्याय और सफ़ेद फल मेरे तप का प्रभाव दिखलाते हैं।” सत्य ने राजा से कहा, “चल, उन पेड़ों के पास चलकर छूकर देखते हैं।” सत्य ने जैसे ही पहले वृक्ष को छुआ तो क्या देखता है कि सारे फल उसी तरह पृथ्वी पर गिरे जिस प्रकार आसमान से ओले गिरते हैं।

दूसरे पेड़ों को भी छूने पर वही हाल हुआ जो प्रथम का हुआ था। राजा की आँखें नीची हो गईं और उसने सत्य से इसका कारण पूछा। सत्य ने कहा “प्रथम पेड़ के फल इसलिए गिर गये क्योंकि तूने जो कुछ भी किया वह ईश्वर की भक्ति या जीवों के प्रेम से वशीभूत होकर नहीं किया। तूने अपने आपको भुलाने और मिथ्या प्रशंसा पाने के लिए यह सब किया था।” पीले फलों से युक्त पेड़ के संदर्भ में सत्य ने कहा, “जिस न्याय की तू बात करता है वह न्याय तूने मात्र अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए किया है।

तू अच्छी तरह से जानता है कि न्याय किसी राज्य की जड़ है और जिस राज्य में न्याय नहीं, वह तो बे-नींव का घर है, जो बुढ़िया के दाँतों की तरह हिलता है, अब गिरा, तब गिरा।” सफ़ेद फल जो कि राजा के अनुसार उसके तप के फल थे के बारे में सत्य ने कहा, “ये फल तप ने नहीं, बल्कि अहंकार ने लगा रखे थे। तेरी ईश्वर की भक्ति, जीवों के प्रति दया, वंदना, विनती सभी इसलिए की गई थी – मानों ईश्वर तुम्हारे बहकावे में आकर स्वर्ग का राजा बना दे।

“अंत में, सत्य ने कहा “मनुष्य तो केवल कर्मों के अनुसार दूसरे मनुष्य की भावना का विचार करता है और ईश्वर मनुष्य के मन की भावना के अनुसार उसके कर्मों का हिसाब लेता है। अतः इन पेड़ों के फल उसी व्यक्ति के हिस्से में आते हैं जो शुद्ध हृदय, निष्कपट, निरहंकार होकर अपना कर्तव्य समझते हुए अपना कार्य करता है। ईश्वर. उसी का निवेदन स्वीकार करते हैं जो नम्रता और श्रद्धा के साथ सच्चे मन से प्रार्थना करता है।”

2.  एक बार मंथरक नाम के जुलाहे के सब उपकरण, जो कपड़ा बुनने के काम आते थे, टूट गए। उपकरणों को फिर से बनाने के लिए लकड़ी की ज़रूरत थी। लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी लेकर वह समुद्र तट पर स्थित वन की ओर चल दिया। समुद्र के किनारे पहुँचकर उसने एक वृक्ष देखा और सोचा कि इसकी लकड़ी से उसके सब उपकरण बन जाएँगे। यह सोचकर वह वृक्ष के तने में कुल्हाड़ी मारने को ही था कि वृक्ष की शाखा पर बैठे हुए एक देव ने उससे कहा – “मैं वृक्ष पर सुख से रहता हूँ और समुद्र की शीतल हवा का आनंद लेता हूँ! तुम्हें वृक्ष को काटना उचित नहीं, दूसरे के सुख को छीनने वाला कभी सुखी नहीं होता

जुलाहे ने कहा – “मैं भी लाचार हूँ। लकड़ी के बिना मेरे उपकरण नहीं बनेंगे, कपड़ा नहीं बुना जाएगा, जिससे मेरे कुटुंबी मर जाएंगे। इसलिए अच्छा यही है कि तुम किसी और वृक्ष का आश्रय लो, मैं इस वृक्ष की शाखाएँ काटने को विवश हूँ।
देव ने कहा – “मंथरक! मैं तुम्हारे उत्तर से प्रसन्न हूँ। तुम कोई भी एक वर माँग लो, मैं उसे पूरा करूँगा। केवल इस वृक्ष को मत काटो।
मंथरक बोला – “यदि यही बात है तो मुझे कुछ देर का अवकाश दो। मैं अभी घर जाकर अपनी पत्नी से और मित्र से सलाह करके तुमसे वर मागूंगा।
देव ने कहा – “मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा।
गाँव पहुँचने के बाद मंथरक की भेंट अपने एक मित्र नाई से हो गई। उसने उससे पूछा – “मित्र! एक देव मुझे वरदान दे रहा है। मैं तुमसे पूछने आया हूँ कि कौन-सा वरदान माँगा जाए?
नाई ने कहा – “यदि ऐसा है तो राज्य माँग ले। मैं तेरा मंत्री बन जाऊँगा, हम सुख से रहेंगे।”

तब मंथरक ने अपनी पत्नी से सलाह लेने के बाद वरदान का निश्चय लेने की बात नाई से कही। नाई ने स्त्रियों के साथ ऐसी मंत्रणा करना नीति विरुद्ध बतलाया। उसने सम्मति दी कि स्त्रियाँ प्रायः स्वार्थ-परायण होती हैं। अपने सुख-साधन के अतिरिक्त उन्हें कुछ भी सूझ नहीं सकता। अपने पुत्र को भी जब वे प्यार करती हैं, तो भविष्य में उसके द्वारा सुख की कामनाओं से ही करती हैं। मंथरक ने फिर भी पत्नी से सलाह लिए बिना कुछ भी न करने का विचार प्रकट किया। घर पहुँचकर वह पत्नी से बोला – “आज मुझे एक देव मिला है वह एक वरदान देने को उद्यत है। नाई की सलाह है कि राज्य माँग लिया जाए। तू बता कि कौन-सी चीज़ माँगी जाए?

पत्नी ने उत्तर दिया – “राज्य-शासन का काम बहुत कष्टप्रद है। संधि-विग्रह आदि से ही राजा को अवकाश नहीं मिलता। राजमुकुट प्रायः कांटों का ताज होता है। ऐसे राज्य से क्या लाभ जो सुख न दे!
मंथरक ने कहा – “प्रिये! तुम्हारी बात सच है। किंतु प्रश्न यह है कि राज्य न माँगा जाए तो क्या माँगा जाए?

मंथरक की पत्नी ने उत्तर दिया – “तुम अकेले दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो उसमें भी हमारा व्यय पूरा हो जाता है। यदि तुम्हारे हाथ दो की जगह चार हों और सिर भी एक की जगह दो हों तो कितना अच्छा हो। तब हमारे पास आज की अपेक्षा दुगुना कपड़ा हो जाएगा। इससे समाज में हमारा मान बढ़ेगा।”
मंथरक को पत्नी की बात जंच गई। समुद्र-तट पर जाकर वह देव से बोला – “यदि आप वर देना ही चाहते हैं तो यह वर दें कि मैं चार हाथ और दो सिर वाला हो जाऊँ।”
मंथरक के कहने के साथ ही उसका मनोरथ पूरा हो गया। उसके दो सिर और चार हाथ हो गए, किंतु इस बदली हालत में वह गाँव में आया तो लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया और राक्षस-राक्षस कहकर सब उस पर टूट पड़े।

3. भाषण कला

भाषण, भाषा के विभिन्न कौशलों की एक मिश्रित अभिव्यक्ति है। भाषण कौशल की प्रक्रिया में संरचनाओं का सुव्यवस्थित चयन, शब्दों की द्रुतगति से प्रवाहपूर्ण प्रयोग तथा एक निश्चित संख्या में उनको जोड़ना शामिल है। इसमें शब्द समूह और वाक्य साँचों का क्रमबद्ध प्रयोग होता है। भाषण कौशल को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है – एक उच्चारण और दूसरा अभिव्यक्ति। उच्चारण के अंतर्गत समस्त ध्वनि व्यवस्था के प्रायोगिक रूप का समावेश रहता है। विद्यार्थियों को चाहिए कि अपने भाषा को तैयार करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखें

  • भाषण ऐसा हो कि श्रोता उसमें रुचि ले सकें।
  • सदैव भाषण देते समय आरोह अवरोह का ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • भाषण विषयानुकूल तथा भावानुकूल होना चाहिए।
  • भाषण देते समय क्रियात्मक अभिनय का समावेश करना चाहिए।
  • भाषण में हास्य व्यंग्य का पुट होना भी आवश्यक होता है, जिससे श्रोतागण उसको रुचिपूर्वक सुन सकें।
  •  विषय का प्रस्तुतीकरण रोचक व नवीन ढंग से होना चाहिए, अर्थात् उसमें कुछ नयापन होना चाहिए।
  • भाषण में कठिन शब्दों का प्रयोग न करते हुए आम बोलचाल (हिंदुस्तानी) की भाषा का प्रयोग करना चाहिए ताकि लोग उसे आसानी से समझ सकें।
  • वक्ता को भाषा के विभिन्न प्रकार के नवीन शब्दों और भाषा के अन्य नवीन तथ्यों का सहज रूप से अभ्यास होना चाहिए।
  • वक्ता चित्रात्मक तथा प्रतीकात्मक शैली का प्रयोग कर भाषण को और भी अधिक प्रभावशाली बना सकता है।
  • विषय से संबंधित कोई विशिष्ट उक्ति या प्रसिद्ध कवि की कविताओं को यदि वक्ता अपने भाषण में जोड़ लेता है तो उसके भाषण में चार चाँद लग जाते हैं।
  • भाषण देते समय वक्ता को शब्दों के उच्चारण पर विशेष ध्यान देना चाहिए वरना अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है।
  • छोटे वाक्यों का प्रयोग करना वक्ता के लिए अधिक प्रभावशाली हो सकता है।
  • भाषण को तैयार कर यदि वक्ता उसे टेप पर पुनः सुनता है तो वह स्वयं अपनी गलतियों को पहचानकर उन्हें ठीक कर सकता है।
  • भाषण जोश और उत्साह से भरा होना चाहिए।
  • भाषण में संबोधन का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। श्रोतागण को किया गया संबोधन अत्यंत सहज व आत्मीय होना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रहे कि केवल सभापति या निर्णायक गण ही वहाँ उपस्थित नहीं हैं।
  • भाषण की शुरुआत पर वक्ता को विशेष ध्यान देना चाहिए। जितनी अधिक प्रभावशाली शुरुआत होगी उतनी ही अधिक श्रोताओंकी प्रशंसा व एकाग्रता वक्ता को मिलेगी।
  • भाषण का अंत कभी भी अधूरा नहीं रहना चाहिए। अर्थात् भाषण में पूर्णता होनी चाहिए। श्रोताओं को यह न लगे कि आप अपनी बात को स्पष्ट करने में असफल रहे हैं।
  • भाषण में परिपक्वता अवश्य होनी चाहिए अर्थात् उसमें विषय से हटकर कुछ भी न कहा गया हो तथा कम-से-कम शब्दों में अपनी बात को स्पष्ट किया गया हो।

4. साक्षात्कार लेना व देना

साक्षात्कार लेना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। साक्षात्कार लेने वाला व्यक्ति अभ्यर्थियों की योग्यता की पूर्ण जाँच करता है। वह अभ्यर्थी की हर क्रिया व प्रतिक्रिया को ध्यान से देखता व सुनता है। साक्षात्कार का कार्य शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ स्वभाव को भी जानना होता है।

साक्षात्कार लेते वक्त ध्यान रखने योग्य बातें-

  • अभ्यर्थी का आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए।
  • बातचीत का आरंभ परिचयात्मक होना चाहिए।
  • प्रश्नों की शुरुआत व्यक्तिगत जीवन से संबंधित सामान्य प्रश्नों से करनी चाहिए।
  • साक्षात्कार-कर्ता के प्रश्न संक्षिप्त व स्पष्ट होने चाहिए।
  • अभ्यर्थी द्वारा दिए गए उत्तरों को अनसुना न कर ध्यान से सुनना चाहिए।
  • अभ्यर्थी द्वारा गलत या भ्रामक उत्तर देने पर एकाध स्पष्टीकरण लेना ही पर्याप्त है।
  • यदि अभ्यर्थी किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देता है तो उससे अगला प्रश्न पूछ लेना चाहिए।
  • साक्षात्कार को अधिक लंबा नहीं खींचना चाहिए।
  • यदि अभ्यर्थी उत्तर को लंबा खींच रहा हो तो आप बीच में यह कहकर अगला प्रश्न पूछ सकते हैं – ‘आपकी बात ठीक है। आप कृपया यह बताएँ कि ……।’
  • जिस पद हेतु साक्षात्कार लिया जा रहा है, उससे संबंधित एक-दो प्रश्न अवश्य करें।
  • अभ्यर्थी से आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

उदाहरण

उत्तर प्रदेश राज्य की प्रतिष्ठित न्यायिक सेवा परीक्षा में सिविल जज पद पर सातवें स्थान पर पहले प्रयास में ही चयनित होकर श्री कृष्ण चंद्र पांडेय ने एक महत्त्वपूर्ण सफलता अर्जित की है, प्रशांत दविवेदी ने उनका साक्षात्कार लिया, जो इस प्रकार है-

प्रशांत द्विवेदी – आपकी इस सफलता के लिए बधाई।
कृष्ण चंद्र – जी, धन्यवाद।
प्रशांत द्विवेदी – आपको अपने चयन की सूचना कैसे मिली?
कृष्ण चंद्र – मेरे मित्र हरि प्रकाश शुक्ल APO इलाहाबाद में कार्यरत, द्वारा मुरादाबाद ट्रेनिंग सेंटर पर फ़ोन द्वारा प्राप्त हुई।
प्रशांत द्विवेदी – चयन होने पर आपको कैसा लगा?

कृष्ण चंद्र – मुझे गलत सूचना मिली कि मैं असफल हो गया हूँ, लगभग आधे घंटे पश्चात् मुझे इस सफलता की सूचना प्राप्त हुई, इस प्रकार मैंने असफलता का दंश और सफलता की प्रसन्नता-दोनों का अनुभव किया।
प्रशांत द्विवेदी – आपको न्यायिक सेवा में जाने की प्रेरणा कैसे मिली?
कृष्ण चंद्र – बड़े बहनोई श्री नलिनीश शुक्ला, एडवोकेट ने मुझे प्रेरित किया कि मैं इसे अपना कैरियर बनाऊँ। उन्होंने मुझे सदैव इसके लिए प्रेरित किया, इसके अतिरिक्त मुझे विधि विभाग गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्ण विभागाध्यक्ष प्रो. उदय राज राय ने भी प्रेरित किया।
प्रशांत द्विवेदी – यह सफलता आपने कितने प्रयासों में अर्जित की?
कृष्ण चंद्र – यह मेरा पहला प्रयास था।
प्रशांत द्विवेदी – आपने इस परीक्षा के लिए तैयारी किस प्रकार की?

कृष्ण चंद्र – कुछ चुनिंदा बिंदुओं पर प्रामाणिक पुस्तकों से नोट्स बनाए; Bare Acts का सूक्ष्म अवलोकन किया, L-L.M में Interpretation of Statue एक विषय होने के कारण Bare Acts के सूक्ष्म निर्वचन पर ध्यान केंद्रित किया, विभिन्न धाराओं को Co-relate करके अध्ययन किया। मूलतः नोट्स की अपेक्षा किताबें मेरे अध्ययन का केंद्र-बिंदु रहीं। प्रो. रमेश चंद्र श्रीवास्तव जी के निर्देशन में एल-एल.एम. (फाइनल) में ‘हितग्राही में अनुयोजन का अधिकार’ विषय पर डिजर्टेशन लिखने के कारण मेरी लेखनी परिष्कृत हुई, इसका भी लाभ मुझे इस परीक्षा में मिला।
प्रशांत द्विवेदी – आपकी सफलता का मूल मंत्र क्या रहा?
कृष्ण चंद्र – आत्मविश्वास, दृढ़ निश्चय, कठिन परिश्रम, एकाग्रता एवं कभी न हार मानने वाली अदम्य जिजीविषा। इसके अलावा गुरुजनों का आशीर्वाद, मित्रों का प्रेम, प्रोत्साहन, पारिवारिक सहयोग भी इसमें सहायक हुए। प्रशांत द्विवेदी-साक्षात्कार में पूछे गए प्रश्न क्या थे?
कृष्ण चंद्र – साक्षात्कार 3 अगस्त, 20XX दिन शुक्रवार के दिन श्री के.बी. पांडेय (चेयरमैन, उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग) के बोर्ड में, बोर्ड के अन्य सदस्य

न्यायमूर्ति वी. के. राव एवं प्रोफेसर खान (अलीगढ़ विश्वविद्यालय) थे, साक्षात्कार लगभग 30 मिनट चला। बोर्ड का रवैया सहयोगात्मक था। साक्षात्कार का आरंभ प्रो. पांडेय ने किया एवं समापन प्रो० खान द्वारा हुआ। सामान्य परिचयात्मक प्रश्नों के अलावा मुझसे कई प्रश्न पूछे गए।
प्रशांत द्विवेदी – प्रतियोगिता दर्पण पत्रिका के विषय में आपके क्या विचार हैं?
कृष्ण चंद्र – यह पत्रिका सिविल सर्विस के परीक्षार्थियों के लिए रामबाण है। संविधान पर इसका अतिरिक्तांक न्यायिक परीक्षा के लिए अत्यंत उपयोगी है। यदि पत्रिका में कुछ विधिक लेख भी नियमित रूप से प्रकाशित होने लगे तो यह न्यायिक परीक्षा के लिए भी समान रूप से उपयोगी हो जाएगी।
प्रशांत द्विवेदी – आगामी प्रतियोगियों के लिए आप क्या परामर्श देंगे?
कृष्ण चंद्र – दृढ़ आत्मविश्वास के साथ गंभीर परिश्रमयुक्त सतत् एवं सुव्यवस्थित अध्ययन ही सफलता की सीढ़ी है। Revision is a must पढ़ें, पर स्वयं को Confuse होने से बचाए रखें, बस अर्जुन की तरह लक्ष्य पर एकाग्रचित रहें, अंतत: सफलता वरण करेगी ही।

साक्षात्कार देना

छात्रों को अनेक कार्यों के लिए साक्षात्कार देना होता है। कुछ में इसका डर बैठ जाता है। वस्तुतः साक्षात्कार परीक्षा जैसा होता है। इसमें अल्प समय में बहुत कुछ कहना होता है। अभ्यर्थी को दो कार्य करने होते हैं – स्वयं को परिचित कराना तथा साक्षात्कार मंडल को प्रभावित करना।

साक्षात्कार देने में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना होता है

  • साक्षात्कार देते वक्त सहज रहें।
  • अपनी बात को सरल ढंग से कहें।
  • साक्षात्कार में जाते समय वेशभूषा संतुलित होनी चाहिए।
  • साक्षात्कार पर जाने से पहले वरिष्ठ छात्रों से अभ्यास करें।
  • साक्षात्कार-कक्ष में प्रवेश करने से पहले मुख्य साक्षात्कार कर्ता की ओर मुख करके अंदर आने की अनुमति लें – “क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?”
  • अंदर आने की अनुमति मिलने के बाद आप संतुलित कदमों से उस कुरसी की ओर बढ़ें जहाँ अभ्यर्थी को बिठाया जाता है। इस क्रिया में आप अपना मुख साक्षात्कार मंडल की ओर रखें। मुसकराते हुए प्रमुख साक्षात्कार कर्ता और अन्य सभी को हाथ जोड़कर नमस्कार कहें। नमस्कार करते समय चेहरे पर विनय का भाव रखें। सम्मान प्रकट करने के लिए सिर तथा शरीर को हल्का-सा झुकाएँ।
  • आपके हाथ में फाइल या कुछ कागजात होंगे। इसलिए फाइल सहित नमस्कार करने का ढंग सीख लें।
  • साक्षात्कार के दौरान आप जिन प्रमाण-पत्रों, उपलब्धियों या कागज़ों-पुस्तकों को साक्षात्कार-मंडल को दिखाना चाहते हैं, उन्हें पहले से ही सुव्यवस्थित और ऊपर-ऊपर तैयार रखें। 9. जब तक कुरसी पर बैठने के लिए नहीं कहा जाए, तब तक खड़े रहें।
  • साक्षात्कार के दौरान स्वयं को चुस्त व तत्पर रखें।
  • प्रश्न को आराम व ध्यान से समझें।
  • पूछे गए प्रश्न का उत्तर एकदम न देकर समझकर देना चाहिए।
  • प्रश्न की प्रवृत्ति के अनुसार उत्तर देने में समय लगाना चाहिए।
  • आप किसी मुद्दे पर कितने ही विश्वासपूर्ण हों, परंतु अपनी बात पर अड़ना नहीं चाहिए।
  • यदि साक्षात्कार-कर्ता आपकी बात से असहमत हो तो आप अपनी बात कहते हुए उनके मत को भी सम्मान दें।
  • प्रश्न का उत्तर न देने पर स्पष्ट कहें – क्षमा कीजिए, मुझे इसका ज्ञान नहीं है।
  • सारी बातचीत में चेहरे पर घबराहट व तनाव नहीं आना चाहिए।
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पुस्तक समीक्षा | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

Class 12 Hindi पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा
आधुनिक काल में भले ही इंटरनेट का जोर हो, ई-बुक्स का प्रचार-प्रसार हो रहा है। इन सबके बावजूद, दुनियाभर में पुस्तकों की बिक्री बढ़ रही है। पुस्तकें ज्ञान का भंडार हैं। मुद्रित पुस्तक को पढ़ने के लिए समय की ज़रूरत होती है। पुस्तक पठन के लिए उम्र व स्थान का बंधन नहीं होता। किसी पुस्तक की समीक्षा हेतु निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना अनिवार्य है –

  1. पुस्तक का पूर्व अध्ययन करना चाहिए।
  2. पुस्तक के मुख्य-मुख्य बिंदुओं को नोट करना चाहिए।
  3. पुस्तक के शिल्प पक्ष का भी ज्ञान होना चाहिए।
  4. पुस्तक की अच्छाइयों के वर्णन के साथ-साथ कमियों को भी उजागर करना चाहिए।
  5. समीक्षा करते समय पूर्वाग्रह से दूर रहना चाहिए।

उदाहरण (हल सहित)
जिंदगी की साँझ से संवरती कविताएँ

-डॉ० रूप देवगुण

कविता-संग्रह : साँझ का स्वर
कवयित्री : डॉ० सुधा जैन
प्रकाशन : अक्षरधाम प्रकाशन, कैथल
मूल्य: 150/- वर्ष : 2012

डॉ० सुधा जैन हरियाणा की प्रतिष्ठित कवयित्री, कहानी लेखिका व लघुकथाकार हैं। ‘साँझ का स्वर’ इनका छठा काव्य-संग्रह है। इस संग्रह में इनकी कुछ कविताएँ जीवन की साँझ को मुखरित करती हैं। ‘साँझ घिर आई’ में वृद्धावस्था में व्यतीत हो रहे जीवन का लेखा-जोख है। दिनभर का लेखा-जोखा/क्या खोया क्या पाया/ ‘फिर मिलेंगे’ में बचपन, जवानी, बुढ़ापा, मृत्यु व पुनर्जन्म की बात की गई है। ‘हँसते-हँसते’ में फिर बुढ़ापे की जिंदगी को दोहराया गया है-बिस्तर में सिमट गई जिंदगी/किताबों में खो गई जिंदगी/ ‘भीतर की आंखें’ में बुजुर्गों की दयनीय दशा का वर्णन है। वे बाहर से अशक्त दिखाई देते हैं और भीतर की आंखों से ही संसार का अवलोकन कर सकते हैं-भीतर की खुल गई आँखें/मैं भी देख रही अब/अपने चारों ओर बिखरा संसार/ढलती उम्र में विस्मृतियों का सहारा लेना पड़ता है-पुरानी फाइलों में दबे पत्र पढ़े। कितनी घटनाएँ, कितने लोग, कितने नाम, विस्मृति के अंधेरे में खोये टिमटिमा उठे (विस्मृति का कोहरा)।

डॉ० सुधा जैन ने इस संग्रह की कई कविताओं में नारी के स्वर को तरजीह दी है। ‘घर-बाहर के बीच पिसती औरत’ कविता में नौकरी करने वाली औरतों की तकलीफदेह ज़िन्दगी का लेखा-जोखा है-सुबह पाँच बजे उठती/घर संवारती/चाय, नाश्ता, खाना बनाती/बच्चे स्कूल भेजतीं/पति को ऑफिस भेज/भागती दौड़ती/अपने दफ़्तर पहुँचती/बॉस की डांट सुनतीं/रोज ही देर हो जाती। औरत आज भी सुरक्षित नहीं है-आज भी सुरक्षित नहीं/औरत/इतनी शिक्षा/इतने ऊँचे-ऊँचे ओहदों पर/पहुँचने के बाद (औरत)। माँ की आँखें दफ़्तर से लौटने वाली जवान बेटी को खोज रही हैं- खोज रही आँखें/भीड़ में अपनी बेटी/लौटी नहीं/दफ्तर से।

घूमते सब ओर/सड़कों में, पार्कों में बसों में/ट्रेनों में (नहीं लौटेंगे कदम पीछे) वस्तुतः औरत संपन्न पिंजरे की मैना जैसी है-सबका मनोरंजन करती/मैं पिंजरे की मैना/उड़ना भूल गई/(पिंजरे की मैना) धन संपन्न नारियाँ अधिकतर रोगग्रस्त हैं, इसका वर्णन कवयित्री ने ‘धन संपन्न नारियाँ कविता में किया है। वास्तव में इनके पास सब कुछ है किंतु सुख नाम की कोई चीज़ नहीं है। गांव में रहने वाली औरत का और भी बुरा हाल है। ‘गांव की छोटी’ कविता में डॉ० सुधा जैन ने लिखा है-चाहा उसने यदि/अपने मन की मीत/ तो लांघ गई सीमा/गंडासे से काट दी जाति। ‘इतनी उपेक्षा क्यों’ कविता में भ्रूण समस्या को लिया गया है।

डॉ० सुधा जैन ने आज के मशीनी युग का वर्णन इस प्रकार किया है-मशीनी युग में। जीते-जीते/मशीनवत हो गए हम/(मशीनों का युग) विदेशी माल की भर्त्सना करते हुए कवयित्री ने लिखा है-बाजार भर गये/विदेशी माल से/ढूँढ़ते लोगी/चीनी जापानी…. बनी चीजें/(कहां खो गया अपना देश) डॉ० सुधा जैन ने ‘जीने की राह’ कविता में जीवन की एकरसता को तोड़ने के साधन बताए हैं- मेले पिकनिक/सेर सपाटे/यात्राएँ तीज/त्योहार/जन्मदिन/शादियों के आयोजन/भिन्न-भिन्न समारोह/तोड़ देते एक रसता।

‘त्राहि-त्राहि’ कविता में महँगाई की समस्या को लिया गया है। किसान की दुर्दशा का भी कवयित्री ने वर्णन किया है-कहीं बाढ़/बह रहे मवेशी, मनुष्य/गाँव के गाँव/कहीं रो रहा किसान (बाढ़) प्रकृति से हम दूर होते जा रहे हैं, इसका वर्णन ‘प्रकृति से टूट रहा नाता’ कविता में इस प्रकार किया है-रात को सोते थे/खुली छतर पर/चाँदनी में नहाते…. प्रभात की मंद बयार/कितना मोहक होता था। प्रकृति का वह पहर। ‘चदरिया’ में जीवन-मृत्यु की दार्शनिक बाते हैं फिर भी क्यों/जीने की चाह/न जन्म अपना/न मृत्यु अपनी।

डॉ० सुधा जैन की इन कविताओं में सरल भाषा है, तुलनात्मक व संस्मरणात्मक शैलियाँ हैं। इन्होंने नारी जाति की समस्याओं को विशेष रूप से अपनी कविताओं में लिया है। इनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता जीवन की सांध्य को लेकर लिखी रचनाएँ हैं। डॉ० सुधा जैन को अच्छी व स्तरीय कविताओं के लिए साधुवाद।

विसंगति, विडंबना और प्रेम

-डॉ० वेदप्रकाश अमिताभ

कहानी-संग्रह : प्रेम संबंधों की कहानियाँ
लेखक : संतोष श्रीवास्तव
प्रकाशन : नमन प्रकाशन, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, दिल्ली
मूल्यः 250/- प्रथम संस्करण : 2012

संतोष श्रीवास्तव की प्रेम संबंधों पर केंद्रित इन कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि प्रायः कोई न कोई हादसा कोमल रागात्मक संबंधों को आहत कर गया है। यह हादसा प्रायः किसी स्वजन की मृत्यु के रूप में है। हालांकि आकस्मिक मृत्यु के संदर्भ अलग-अलग हैं। अजुध्या की लपटें में रुस्तम जी सांप्रदायिक नफ़रत के शिकार हुए हैं, ‘अपना-अपना नर्क’ में शिशिर और अनूप सड़क दुर्घटना में क्षत-विक्षत हुए हैं। आतंकवाद के दानवी पंजे (‘शहीद खुर्शीद बी’)हों या विमान दुर्घटना (‘दरम्यान’) या रंगभेद हो या पर्वतारोहण (‘ब्लैक होल’) के दौरान घटित अघटित हो, एक व्यक्ति की मृत्यु उनके आत्मीयों के लिए अभिशाप बन गई है। हालांकि मरे हुओं के साथ दूसरे लोग मर नहीं जाते, जीवित रहते हैं। इस जीवित रहने में जो तकलीफ है, स्मृति के दंश हैं, पश्चाताप है, कुछ कठोर निर्णय हैं, उनका बहुत स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक और मार्मिक अंकन इन कहानियों में हुआ है।

यह ध्यानाकर्षक है कि कई कहानियों में विपरीत और त्रासद परिस्थितियों में भी रागात्मक लगाव जीवित रहता है। मृत्यु मनुष्यों की हुई है, बहुत से सपने असमय काल कवलित हुए हैं, पारिवारिक संबंधों में दरारें आयी हैं, लेकिन समर्पण-भाव और अनन्य अनुराग शिथिल या कम नहीं हुआ है। इस दृष्टि से ‘शहतूत पक गए हैं’, ‘आइरिश के निकट’, ‘फरिश्ता’, ‘ब्लैक होल’, एक मुट्ठी आकाश’ आदि कहानियाँ उल्लेखनीय हैं। ‘शहतूत पक गए हैं’ की दिदिया और जगदीश जैसे एक दूजे के लिए बने थे, लेकिन परिवारी जन उनका ‘साझा सपना’ साकार नहीं होने देते और दिदिया खुद को ‘अगरबत्ती की तरह’ आहिस्ता-आहिस्ता जलने को तैयार कर लेती हैं।

‘आइरिश के निकट’ और ‘अजुध्या की लपटें’ में ‘सम्प्रदाय’ दो दिलों के मिलने में आडे आया है। ‘फरिश्ता’ में रंगभेद श्वेत मेलोडी और अश्वेत एंजेली के बीच खाई बना है। ‘एक मुट्ठी आकाश’ में डिवॉसी कुमकुम से मनीष का लगाव भारी पड़ता है, परिवार, दोस्त, माँ सब मुँह फेर लेते हैं लेकिन इन सभी कहानियों में प्रेम अविचलित है, उसका संबंध तन तक सीमित नहीं है। ‘अपना अपना नर्क’ में मीनाक्षी और शिशिर का विवाह होने से पहले शिशिर एक दुर्घटना में जान गँवा देता है लेकिन मीनाक्षी उसकी स्मृतियों से मुक्त नहीं हो पाती। ‘ब्लैक होल’ की उर्मि भी प्रशांत की मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पाती है।

लेकिन ये कहानियाँ भावुकता में लिपटी कोरी प्रेम कहानियाँ नहीं हैं। संतोष श्रीवास्तव ने इन्हें परिवेश की प्रामाणिकता से समृद्ध कर बृहत्तर यथार्थ का संवाहक बना दिया है। प्रायः कहानियाँ नारी चरित्रों पर केंद्रित हैं, अतः स्त्री संबंध अवमूल्य और कुरूपताएँ विशेष मुखर हैं।

अपने अभिप्राय को व्यक्त करने में सर्वथा सक्षम भाषा संतोष श्रीवास्तव के पास है। अतः वे स्थितियों-मनः स्थितियों को सफलतापूर्वक उकेर सकी हैं। ‘तुम्हारा हिस्सा कनकलता’ में रवींद्र दा के निधन के बाद कात्यायनी की मनःस्थिति के चित्रण के लिए कहानीकार ने ‘चक्रवात’ और ‘कटे पेड़’ का सहारा लिया है और ‘ब्लैक होल’ में ब्लैक होल का प्रतीकार्थ व्यापक है। एक कहानी में ‘कलम’ को वह जादू की छड़ी कहा गया है, जो सिंड्रेला को राजकुमारी बना सकती है। कलम की कुछ नया और महत्त्वपूर्ण रचने की ताकत इन कहानियों में भी दबी-ढंकी नहीं है।

गलीवाला आम का वृक्ष

कहानी-संग्रह : गलीवाला आम का वृक्ष
लेखक : कुँवर किशोर टंडन
प्रकाशन : पहले-पहल प्रकाशन, भोपाल
मूल्य: 115/- पृष्ठ : 104

कुँवर किशोर टंडन का नवीनतम कहानी-संग्रह ‘गलीवाला आम का वृक्ष’ है। इससे पहले उनके दो काव्य-संग्रह आ चुके हैं। इस कहानी-संग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ शामिल हैं। सभी कहानियाँ मानव-जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी हुई हैं। इसके विभिन्न पात्र भी सभी समुदायों तथा वर्गों से लिए गए हैं।

आमतौर से यह धारणा बनी रहती है कि सरकारी उच्च अधिकारी सदा ऐश करते हैं और उन्हें काम-धाम नहीं करना पड़ता, वे लोग सिर्फ सरकारी तथा गैर-सरकारी सुख-सुविधाओं का उपभोग करते हैं, मगर टंडन की कहानी ‘आशंकाओं के घेरे’ पढ़ने के बाद यह धारणा काफ़ी बदल जाती है, क्योंकि एक छोटे से शक की वजह से एक सरकारी अधिकारी किस मुश्किल में पड़ सकता है, इसका अंदाजा एक साधारण व्यक्ति को नहीं हो सकता।

दोस्ती-यारी को जीवन में एक उच्च स्थान दिया जाता है, मगर आप जिसे दोस्ती समझ रहे हो, आपका मित्र उसका व्यावसायीकरण कर उसका इवजाना माँगने लगे तो ‘सो आवत यह देश’ के विवेक की भाँति मन यही सोचने लगता है कि शंकर ने उससे जो कहा, वह झूठ ही रहे। यह कहानी हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था पर भी काफ़ी गहरी चोट करती है, जिसकी धीमी प्रक्रिया सालों-साल लगा देती है।

‘गलीवाला आम का वृक्ष’ कहानी हमारी उस पारंपरिक सोच की ओर इंगित करती है, जहाँ पुरुष की बुरी नियत का शिकार होने पर सारा दोष लडकी को ही दिया जाता है, चाहे वह कितनी मासूम, भोली और कम उम्र की क्यों न हो और सबसे बड़ी बात बेकसूर होने पर भी समाज की ओर से दंड की भागीदारी उसे ही बनना पड़ता है।

कुछ इसी प्रकार की सच्चाइयाँ कहानीकार अपनी अन्य कहानियों में भी प्रस्तुत करता है, जिनमें से ‘मशीन और नारी’, ‘धागे से झूलती हुई ज़िन्दगी’, ‘एक टूटी हुई संवेदना’ आदि का जिक्र किया जा सकता है। इन सभी कहानियों की कथावस्तु इस बात का संज्ञान करवाती हैं कि वस्तुतः सामाजिक परिस्थितियों तथा भोगवादी प्रवृत्तियों के तहत आज की युवा पीढ़ी में ही नहीं बल्कि अधिकतर व्यक्तियों में संवेदनहीनता बढ़ती जाती है।

कहानियों में तनाव की स्थिति इस बात का अहसास करवाती है कि आज के युग में सामान्य जन-जीवन भी आसान नहीं। यथार्थ की कटुता के बीच भी ‘डायरी’ की वह तारीख तथा ‘बेंत वाली काठ की कुर्सी’ सरीखी भावुक तथा सौहार्दपूर्ण घटनायें भी जीवन को इंसानियत तथा रिश्तों की गरिमा के दायरे में बाँधती प्रतीत होती हैं। कुल मिलाकर ‘गलीवाला आम का वृक्ष’ के साथ पाठकों को निकटता का अहसास होता है।

कितने पास कितने दूर

कहानी-संग्रह : कितने पास कितने दूर ।
लेखक : आनंद प्रकाश ‘आर्टिस्ट’
प्रकाशन : सूर्य भारती प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य: 150/- पृष्ठ : 96

आनंद प्रकाश ‘आर्टिस्ट’ के प्रथम कहानी-संग्रह के रूप में पाठकों/आलोचकों के सामने आया ‘कितने पास कितने दूर’। नौ कहानियों का समावेश करता यह कहानी-संग्रह अपने मुख्य शीर्षक को ही तकरीबन सभी कहानियों में प्रतिपादित करता है। कौन कितना पास होकर भी दूर है, और कौन दूर होकर भी पास है, इसका सही-सही अनुमान लगाना आसान नहीं होता, विशेषकर प्रेमियों के संदर्भ में।

‘कितने पास कितने दूर’ नामक मुख्य शीर्षक वाली कहानी में दो प्रेमी आपस में प्रेम करने के बावजूद समाज के रीति-रिवाजों तथा नियमों के आड़े आ जाने के कारण शादी के बंधन में नहीं बँध पाते, मगर भावनाओं तथा संवेगों से एक-दूसरे से निकटता ही महसूस करते हैं।

‘कौन किसका है’ नामक कहानी में भी दो प्रेमियों के सामने वर्ग-श्रेणी आ जाती है। जिसे अपना मन का मीत माना जाता है, वही शादी के बाद बदल जाता है, ऐसे में कॉलेज समय का एक मित्र आकर कृष्णा को उसके दुख से उबारता है।

अध्यापन के क्षेत्र से जुड़े होने के कारण लेखक की कहानियों के अधिकतर पात्र अध्यापक वर्ग से लिए गये हैं। लेखक की नज़र में भी अध्यापकों का चरित्र ऊँचा होने के कारण वह इसी पारंपरिक अवधारणा को ही मान्यता देते हुए कहानियों के मुख्य पात्रों को आदर्श तथा उच्च चरित्र का ही दर्शाया है, जो अपने जीवन की सबसे बड़ी खुशी को भी समाज के नियमों के अधीन कुर्बान कर देते हैं। चाहे वे कितने पास कितने दूर का अध्यापक हो या कौन किसका है की कृष्णा या फिर ‘फूल तुम्हें भेजा है’ का अध्यापक अविनाश।

अन्य कहानियाँ ‘आदर्श, मुहब्बत का दर्द, खोया हुआ अतीत इत्यादि में भी लेखक आदर्शों तथा उच्च मूल्यों को अपनाने पर जोर देता है। उसकी सभी कहानियाँ वृत्तांत ढंग से बयान की गयी हैं। लंबे-लंबे संवाद, जो भाषण या प्रवचन शैली को अपनाते प्रतीत होते हैं। अधिकतर बात पात्रों के माध्यम से की गयी है। सभी कहानियों में शिक्षक, शिक्षा अधिकारी इत्यादि का ज़िक्र थोड़ा-सा अखरता भी है। हो सकता है, लेखक का प्रथम प्रयास होने के कारण उससे अनजाने में ऐसा हो गया हो। उम्मीद करते हैं कि लेखक का आने वाला अगला कहानी-संग्रह कुछ नवीन विषयों तथा पात्रों सहित पाठकों के सामने आएगा।

मानवीय परिप्रेक्ष्य का संवेदनात्मक विस्तार : हरियश राय की कहानियाँ

-डॉ० राजकुमार

अंतिम पड़ाव

पुस्तक : अंतिम पड़ाव (कहानी संग्रह)
लेखक : हरियश राय
प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य : एक सौ चालीस रुपये

हरियश राय के नवीनतम कहानी-संग्रह ‘अंतिम पड़ाव’ की अधिसंख्य कहानियों के केंद्र में वही सवाल हैं जो आज के समाज की चिंता के केंद्र में मौजूद हैं। भारत में बाज़ारवाद और धार्मिक संकीर्णतावाद एक तरह से जुड़वा अवधारणाओं की तरह उभरे हैं। धर्म के सहारे राजनीतिक और आर्थिक सत्ता की सीढ़ियां चढ़ता मध्ययुगीन तत्ववाद और सबकुछ मानवीयता को विस्थापित करता बाजारवाद। कहानीकार स्थानीय अनुभव को वैश्विक स्तर के परिदृश्य से जोड़कर अपने समय और समाज के क्रूर सत्य की इन दो तहों को खोलता हुआ आगे बढ़ता है। ‘न धूप न हवा’, ‘नींद’, ‘ढानी में ठिठुरन’, ‘होमोग्लोबीन’, ‘पानी की तेज़ धार’ जैसी कहानियों में महानगर से लेकर धुर देहात तक फैली आत्म-निर्वासन की उदासी पाठक की संवेदना को बार-बार झकझोरती है। समूचे परिवेश में पसरे इस आत्मनिर्वासन के अपने कारण, अपना स्वभाव और अपनी विशेष स्थिति है जो वर्तमान समाज के ढांचे और उसके अंतर्विरोधों से उत्पन्न हुई हैं।

इस निर्वासन का सामाजिक और इससे भी अधिक आर्थिक संदर्भ है। घोर आर्थिक विषमता में रहता हुआ आदमी ‘डिप्रेशन’ महसूस करता है। चूँकि उसका अपनी मेहनत से पैदा की गई वस्तु से कोई लगाव नहीं होता, यंत्रों की तरह संबंधहीनता और जड़ता उसमें समाती जाती है, जो सारे सामाजिक संबंधों और दायित्वों तक फैल जाती है। यह परायापन पूँजीवादी सभ्यता की देन है, जिसमें सभी ठोस परिस्थितियाँ और समूचा वातावरण आदमी को बराबर यह महसूस करवाते रहते हैं कि वह एक ऐसे निर्वैयक्तिक ढांचे-अप्रेटस पर निर्भर है जो उसके बाहर (और भीतर भी) चालू है और बिना उसकी संचेतना और सहयोग के उसे चलाता है।

‘न धूप न हवा’ का रामानंद, ‘नींद’ के नवीन शर्मा, ‘ढाणी में ठिठुरन’ का मंगला ‘हीमोग्लोबिन’ की विनय सुनेजा, ‘पानी की तेज़ धार’ के श्रीनिवासन इसी आत्मनिर्वासन के शिकार चरित्र हैं। ‘अंतिम पड़ाव’ में एक मुट्ठी चावल के लिए तेज़ धूप में मीलों खटती और रंचमात्र मानवीय संवेदना के लिए तरसती सोना घोष और पानूबाला के माध्यम से हरियश राय ने वृंदावन में घोर अमानवीय परिस्थितियों में जीवन काटती बंगाली विधवाओं की करुण गाथा को नया मानवीय संदर्भ दिया है।

‘खफा-खफा से’ कहानी में लेखक हिंदुत्ववादी शक्तियों के उभार के बाद आम मुस्लिम समाज की कठिनाइयों से हमें रू-ब-रू कराता है। नसीम अख्तर से पूछा गया रफीक हुसैन का यह सवाल हमारे जेहन में बराबर कौंधता है-“क्या आपको नहीं लगता सर कि हमारा उपहास-सा किया जा रहा है। हमें हाशिए पर जानबूझकर रखा जा रहा है। हमसे आत्मीयता नहीं जताई जाती। एक अनचाही-सी दूरी हमसे बनाई जाती है। आप ही बताइए सर, एक असुरक्षा की भावना क्यों है हममे? हम लोग अपनी बदनामी से क्यों इतना डरते हैं ? हम अपने जीवन के फैसले लेते समय अपने आपको मुस्लिम के रूप में क्यों देखते हैं ? हमारे लिए शहर के कुछ इलाके वर्जित क्यों हैं? हमें बार-बार क्यों यह अहसास कराया जाता है कि हम मुसलमान हैं? क्यों हम लोगों से एक दूरी लोग बनाए रखते हैं ? इन ढेर सारी मुश्किलों को हम कैसे अपनी कोशिशों से दूर कर सकते हैं ?”

महान कथाकार टामस हार्डी ने कहा था कि, ‘एक अच्छी कहानी थप्पड़-सा मारकर हमारी संवेदना को जगाती है और हमें नई सामाजिक सच्चाइयों की जानकारी देती है।’ इसी तर्ज पर हरियश राय की ये कहानियाँ हमारी संवेदना और सामाजिक जागरूकता को ज़रूर विस्तार देती हैं।

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फ़ीचर लेखन | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

 फ़ीचर लेखन 

प्रश्न :- निम्न में से किसी एक विषय पर फ़ीचर लेखन कीजिए-

मेरे विद्यालय का पुस्तकालय

अथवा

मेट्रो रेल का सफ़र

उत्तर:-

मेरे विद्यालय का पुस्तकालय

पुस्तकों का विशाल भण्डार, सुहाना मौन | व्यवस्थित मेज़-कुर्सियाँ | सेवा में तत्पर पुस्तकालयाध्यक्ष | यह है मेरे विद्यालय का पुस्तकालय | मेरे विद्यालय के पुस्तकालय के तीन तल हैं | निचले तल में समाचारपत्र, पत्रिकाएँ तथा बैठने के लिए मेज़-कुर्सियाँ हैं | बीच वाले तल में पुस्तकों की आलमारियाँ हैं | लगभग तीस-चालीस आलमारियों में हज़ारों मूल्यवान पुस्तकें व्यवस्था से सजी हैं | छात्र और अध्यापक अपनी इच्छा से इनमें से पुस्तकें खोजते हैं, पढ़ते हैं और पढ़कर वापस मेज़ पर छोड़ देते हैं | इस पुस्तकालय में पाठ्यक्रम से सम्बंधित पुस्तकें तो हैं ही; असली आकर्षण हैं- अन्य पुस्तकें- कथा कहानियों की पुस्तकें, महापुरुषों की जीवनियाँ, विश्व भर को चौकाने वाले कारनामे, वैज्ञानिक आविष्कार आदि-आदि | छात्र इन पुस्तकों को पुस्तकालय के तीसरे तल पर रखी मेज़-कुर्सियों पर बैठकर पढ़ सकते हैं | चाहे तो दो पुस्तकें घर भी ले जा सकते हैं | विद्यालय के तीन हज़ार विद्यार्थियों में से चालीस-पचास छात्र ही पुस्तकालय में दिखाई देते हैं | यहाँ बोलना बिल्कुल मना है | ज़रा भी बोले तो पुस्तकालयाध्यक्ष की पैनी नज़रें उन्हें मौन करा देती हैं | पुस्तकालय सचमुच ज्ञान की गंगा है | मेरे जैसे विद्या-व्यसनी के लिए तो यह सैरगाह है | मुझे ख़ाली समय में पुस्तकों की आलमारी के सामने खड़े होकर नये-नये शीर्षक देखना और जानकारी लेना अच्छा लगता है |

मेट्रो रेल का सफ़र

सामान्य भारतीय रेल और मेट्रो रेल के सफ़र में अंतर है | मेट्रो की यात्रा साफ़-सुथरी, वातानुकूलित और आरामदायक होती है | इसकी टिकट खिड़की से लेकर सवारी डिब्बे तक कहीं भी धूल-धक्कड़ या धींगामुश्ती नहीं होती | टिकट-खिड़की पर या तो भीड़ होती नहीं; होती भी है तो लोग पंक्तिबद्ध होकर टिकट लेते हैं | टिकट देने वाले कर्मचारी भी बड़ी कुशलता से टिकट बाँटते हैं | टोकन चेक़ करने की प्रणाली भी इलेक्ट्रानिक होती है इसलिए यात्री भी समझ लेते हैं कि यहाँ सबकुछ व्यवस्था के अनुरूप ही चलेगा, मनमानी से नहीं | मेट्रो प्लेटफ़ॉर्म तक पहुँचने के लिए या तो स्वचालित सीढ़ियाँ होती हैं, या साफ़-सुथरे चौड़े मार्ग होते हैं | प्लेटफ़ॉर्म बिल्कुल स्वच्छ और जगमगाते हुए होते हैं | प्रायः हर तीन से पाँच मिनट में एक गाड़ी आ जाती है | उसके दरवाजे स्वचालित रूप से खुलते और बंद होते हैं | अंदर साफ़-सुथरी सीटें होती हैं | खड़े यात्रियों के सहारे के लिए बीच में लटकनें लगी होती हैं |

मेट्रो रेल में भीड़ न हो तो उसके सुख का कहना ही क्या ? परन्तु भीड़ होने पर भी किसी प्रकार की धक्का-मुक्की, गंदगी या हुल्लड़बाज़ी नहीं होती | महानगरीय सभ्यता में ढले हुए लोग बड़े ही अनुशासन से यात्रा करते हैं | सबसे बड़ी सुविधा यह होती है कि हर स्टेशन के आने पर बराबर घोषणाएँ होती रहती हैं | इससे यात्रियों को बहुत ही आसानी होती है | यद्यपि मेट्रो की सुविधा को देखते हुए आजकल उसमें भी भीड़ बढ़ने लगी है, किन्तु यह भीड़ अराजक नहीं होती | इसलिए इसमें सफ़र करना बहुत आरामदायक है | इसमें लेट होने और समय पर न पहुँचने की परेशानियाँ भी न के बराबर हैं | वास्तव में महानगरों के आतंरिक यातायात के लिए यह सर्वोत्तम साधन है |

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आलेख लेखन | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

Class 12 Hindi आलेख लेखन

प्रश्नः 1.
आलेख के विषय में बताइए।
उत्तरः

आलेख वास्तव में लेख का ही प्रतिरूप होता है। यह आकार में लेख से बड़ा होता है। कई लोग इसे निबंध का रूप भी मानते हैं जो कि उचित भी है। लेख में सामान्यत: किसी एक विषय से संबंधित विचार होते हैं। आलेख में ‘आ’ उपसर्ग लगता है जो कि यह प्रकट करता है कि आलेख सम्यक् और संपूर्ण होना चाहिए। आलेख गद्य की वह विधा है जो किसी एक विषय पर सर्वांगपूर्ण और सम्यक् विचार प्रस्तुत करती है।

प्रश्नः 2.
सार्थक आलेख के गुण बताइए।
उत्तरः

सार्थक आलेख के निम्नलिखित गुण हैं –

  • नवीनता एवं ताजगी।
  • जिज्ञासाशील।
  • विचार स्पष्ट और बेबाकीपूर्ण ।
  • भाषा सहज, सरल और प्रभावशाली।
  • एक ही बात पुनः न लिखी जाए।
  • विश्लेषण शैली का प्रयोग।
  • आलेख ज्वलंत मुद्दों, विषयों और महत्त्वपूर्ण चरित्रों पर लिखा जाना चाहिए।
  • आलेख का आकार विस्तार पूर्ण नहीं होना चाहिए।
  • संबंधित बातों का पूरी तरह से उल्लेख हो।

उदाहरण

1. भारतीय क्रिकेट का सरताज : सचिन तेंदुलकर

पिछले पंद्रह सालों से भारत के लोग जिन-जिन हस्तियों के दीवाने हैं-उनमें एक गौरवशाली नाम है-सचिन तेंदुलकर। जैसे अमिताभ का अभिनय में मुकाबला नहीं, वैसे सचिन का क्रिकेट में कोई सानी नहीं। संसार-भर में एक यही खिलाड़ी है जिसने टेस्ट-क्रिकेट के साथ-साथ वन-डे क्रिकेट में भी सर्वाधिक शतक बनाए हैं। अभी उसके क्रिकेट जीवन के कई वर्ष और बाकी हैं। यदि आगे आने वाला समय भी ऐसा ही गौरवशाली रहा तो उनके रिकार्ड को तोड़ने के लिए भगवान को फिर से नया अवतार लेना पड़ेगा। इसीलिए कुछ क्रिकेट-प्रेमी सचिन को क्रिकेट का भगवान तक कहते हैं। उसके प्रशंसकों ने हनुमान-चालीसा की तर्ज पर सचिन-चालीसा भी लिख दी है।

मुंबई में बांद्रा-स्थित हाउसिंग सोसाइटी में रहने वाला सचिन इतनी ऊँचाइयों पर पहुँचने पर भी मासूम और विनयी है। अहंकार तो उसे छू तक नहीं गया है। अब भी उसे अपने बचपन के दोस्तों के साथ वैसा ही लगाव है जैसा पहले था। सचिन अपने परिवार के साथ बिताए हुए क्षणों को सर्वाधिक प्रिय क्षण मानता है। इतना व्यस्त होने पर भी उसे अपने पुत्र का टिफिन स्कूल पहुँचाना अच्छा लगता है।

सचिन ने केवल 15 वर्ष की आयु में पाकिस्तान की धरती पर अपने क्रिकेट-जीवन का पहला शतक जमाया था जो अपने-आप में एक रिकार्ड है। उसके बाद एक-पर-एक रिकार्ड बनते चले गए। अभी वह 21 वर्ष का भी नहीं हुआ था कि उसने टेस्ट क्रिकेट में 7 शतक ठोक दिए थे। उन्हें खेलता देखकर भारतीय लिटिल मास्टर सुनील गावस्कर कहते थे-सचिन मेरा ही प्रतिरूप है।

2.ग्रामीण संसाधनों के बल पर आर्थिक स्वतंत्रता

समाज में सकारात्मक बदलाव के तीन ही मुख्य सूचक होते हैं। आचरण, आर्थिकी व संगठनात्मक पहल। इन तीनों से ही समाज को असली बल मिलता है और प्रगति के रास्ते भी तैयार होते हैं। इन सबको प्रभाव में लाने के लिए सामूहिक पहल ही सही दिशा दे सकती है।

हेस्को (हिमालयन एन्वायर्नमेंटल स्टडीज कन्जर्वेशन ऑर्गेनाइजेशन) ने अपनी कार्यशैली में ये तीन मुद्दे केंद्र में रखकर सामाजिक यात्रा शुरू की। कुछ बातें स्पष्ट रूप से तय थीं कि किसी भी प्रयोग को स्थायी परिणाम तक पहुँचाना है तो स्थानीय भागीदारी, संसाधन और बाज़ार की सही समझ के बिना यह संभव नहीं होगा। वजह यह है कि बेहतर आर्थिकी गाँव समाज की पहली चिंता है और उसका स्थायी हल स्थानीय उत्पादों तथा संसाधनों से ही संभव है। सही, सरल व सस्ती तकनीक आर्थिक क्रांति का सबसे बड़ा माध्यम है। स्थानीय उत्पादों पर आधारित ब्रांडिंग गाँवों के उत्पादों पर उनका एकाधिकार भी तय कर सकती है और ये उत्पाद गुणवत्ता व पोषकता के लिए हमेशा पहचान बना सकते हैं, इसलिए बाज़ार के अवसर भी बढ़ जाते हैं।

गाँवों की बदलती आर्थिकी की दो बड़ी आवश्यकताएँ होती हैं। संगठनात्मक पहल, बराबरी व साझेदारी तय करती है। किसी • भी आर्थिक-सामाजिक पहल की बहुत-सी चुनौतियाँ संगठन के दम पर निपटाई जाती हैं। सामूहिक सामाजिक पहलुओं का अपना एक चरित्र व आचरण बन जाता है, जो आंदोलन को भटकने नहीं देता। हेस्को की इसी शैली ने हिमालय के घराटों में पनबिजली व पन उद्योगों की बड़ी क्रांति पैदा की। जहाँ ये घराट (पन चक्कियाँ) मृतप्राय हो गई थीं, अब एक बड़े आंदोलन के रूप में आटा पिसाई, धान कुटाई ही नहीं बल्कि पनबिजली पैदा कर घराटी नए सम्मान के साथ समाज में जगह बना चुके हैं।

इनके संगठन और आचरण ने मिलकर केंद्र व राज्यों में राष्ट्रीय घराट योजना के लिए सरकारों को बाध्य कर दिया। एक घराट की मासिक आय पहले 1,000 रुपए तक थी, आज वह 8,000 से 10,000 रुपए कमाता है। आज हज़ारों घराट नए अवतार में स्थानीय बिजली व डीजल चक्कियों को सीधे टक्कर दे रहे हैं। इन्होंने बाज़ार में अपना घराट आटा उतार दिया है, जो ज़्यादा पौष्टिक है।

फल-अनाज उत्पाद गाँवों को बहुत देकर नहीं जाते। विडंबना यह है कि उत्पादक या उपभोक्ता की बजाय सारा लाभ इनके बाजार या प्रसंस्करण में जुटा बीच का वर्ग ले जाता है। 1990 के दौरान हेस्को ने स्थानीय फल-फूलों को बेहतर मूल्य देने के लिए पहली प्रसंस्करण इकाई डाली और जैम-जेली जूस बनाने की शुरुआत की। देखते-देखते युवाओं-महिलाओं ने ऐसी इकाइयाँ डालनी शुरू की और आज उत्तराखंड में सैकड़ों प्रोसेसिंग इकाइयाँ काम कर रही हैं। एक-दूसरे के उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए संगठन भी खड़े कर दिए।

उत्तराखंड फ्रूट प्रोसेसिंग एसोसिएशन इसी का परिणाम है। ये जहाँ, अपने आपसी मुद्दों के प्रति सजग रहते हैं वहीं, सरकार को भी टोक-टोक कर रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं। ऐसे बहुत से प्रयोगों ने आज बड़ी जगह बना ली है। उत्तराखंड में मिस्त्री, लोहार, कारपेंटर आज नए विज्ञान व तकनीक के सहारे बेहतर आय कमाने लगे हैं। पहले पत्थरों का काम, स्थानीय कृषि उपकरण व कुर्सी-मेज के काम शहरों के नए उत्पादनों के आगे फीके पड़ जाते थे। आज ये नए विज्ञान व तकनीक से लैस हैं। इनके संगठन ने इन्हें अपने हकों के लिए लड़ना भी सिखाया है।

हेस्को पिछले 30 वर्षों में ऐसे आंदोलन के रूप में खड़ा हुआ, जिसमें हिमालय के ही नहीं बल्कि देश के कई संगठनों को भी दिशा दी है और ये आंदोलन मात्र आर्थिक ही नहीं था बल्कि समाज में संगठनात्मक व आचरण की मज़बूत पहल बनकर खड़ा हो गया। गाँवों की आर्थिकी का यह नया रास्ता अब राज्यों के बाद राष्ट्रीय आंदोलन होगा। जहाँ ग्रामीण संसाधनों पर आधारित गाँवों की अधिक स्वतंत्रता की पहल होगी।

3.कूड़े के ढेर हैं दुनिया की अगली चुनौती

शिक्षाविदों और पर्यावरण वैज्ञानिकों द्वारा एकत्रित जानकारी के आधार पर विश्व में अपशिष्ट के पचास महाकाय क्षेत्र हैं : 18 अफ्रीका में, 17 एशिया में, आठ दक्षिण अमेरिका में, पाँच मध्य अमेरिका और कैरिबियन में तथा दो यूरोप में। कूड़े की विशाल बस्तियाँ चीन में भी हैं, पर उनकी सही गिनती और ब्योरा पाना असंभव है। विश्व की आधी आबादी को बेसिक वेस्ट मैनेजमेंट

सुविधा उपलब्ध न होने के कारण अनुमानतः दुनिया का लगभग चालीस फीसदी कूड़ा खुले में सड़ता है, जो निकट बस्तियों में रहनेवालों के स्वास्थ्य के लिए घातक है। समृद्ध देशों में कूड़े की रीसाइकिलिंग महँगी पड़ती है। गरीब देशों के लिए कूड़ा अतिरिक्त आय का साधन बनता है, भले म अपशिष्ट को योजनाबद्ध और सुरक्षित तरीके से ठिकाने लगाने के लिए उनके पास धन व संसाधन का घोर अभाव हो। कारखानों, अस्पतालों से निकला विषाक्त मल ढोने वालों और उसकी री-साइकिलिंग करनेवालों के प्रशिक्षण या स्वास्थ्य सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं। वयस्क और युवा कूड़ा कर्मी नंगे हाथों काम करते हुए जख्मी होते हैं, उसमें से खाद्य सामग्री टटोलते और खाते फिरते हैं।

भीषण गरमी में बिना ढका-समेटा और सड़ता अपशिष्ट खतरनाक कीटाणु और जहरीली गैस पैदा करता है। बारिश में इसमें से रिसता पानी भूमिगत जल में समाता है और आसपास के नदी, नालों, जलाशयों को प्रदूषित करता है। जलते कूड़े की जहरीली गैस और घोर प्रदूषण के बीच जीविका कमाने वालों और निकटवर्ती बस्तियों में रहनेवाले लोगों के स्वास्थ्य को दीर्घावधि में जो हानि निश्चित है, उनका जीवन काल कितना घटा है, उसके प्रति विश्व स्वास्थ्य संगठन कितना चिंतित है? यह ऐसा टाइम बम है, जो फटने पर विश्व जन स्वास्थ्य में प्रलय ला सकता है। संयुक्त राष्ट्र को ब्रिटेन की लीड्स यूनिवर्सिटी में संसाधन प्रयोग कुशलता के लेक्चरार कॉस्टस वेलिस की चेतावनी है कि खुले कूड़े के विशालकाय ढेर मलेरिया, टाइफाइड, कैंसर और पेट, त्वचा, सांस, आँख तथा जानलेवा जेनेटिक और संक्रामक रोगों के जनक हैं।

विकसित देशों की कई ज़रूरतें पिछड़े देशों से पूरी होती हैं। ज़रूरतमंद देशों की ‘स्वेटशॉप्स’ में बना सामान लागत से कई गुनी अधिक कीमत पर पश्चिमी देशों की दुकानों में सजता है। बड़ी बात नहीं कि कूड़े से ऊर्जा उत्पादन में अग्रणी जर्मनी का अनुसरण करने वाले अन्य यूरोपीय देश अफ्रीका जैसे पिछड़े देशों से कूड़ा आयात करने लगें। वह कूड़ा, जो सर्वव्यापी उपभोक्तावाद के रूप में पश्चिम की देन का ही अंजाम है। यह भी निश्चित है कि तब संपूर्ण अपशिष्ट के बाकायदा ‘वेस्ट मैनेजमेंट’ के कड़े से कड़े नियम लागू किए जाने के लिए शोर भी उन्हीं की तरफ से उठेगा कि आयातित कडा पूर्ण रूप से प्रदूषण रहित और आरोग्यकर हो।

मुंबई की देओनार कचरा बस्ती को ऐकरा (घाना), इबादान (नाइजीरिया), नैरोबी (केन्या), बेकैसी (इंडोनेशिया) जैसी अन्य विशाल कूड़ा बस्तियों की दादी-नानी कहा गया है। 1927 से अब तक इसमें 170 लाख टन कूड़े की आमद आंकी गई है। इससे लगभग छह मील की परिधि में रहने वाली पचास लाख आबादी के विरोध पर इसे धीरे-धीरे बंद किया जा रहा है, पर अब भी 1,500 लोग यहाँ कूड़ा बीनने, छाँटने के काम से रोजी कमाते हैं। विश्व के समृद्ध देशों को भारतोन्मुख करने का सबसे सार्थक प्रयास ऊर्जा उत्पादन में हो सकता है। कूड़े से ऊर्जा उत्पादन में अग्रणी यूरोपीय देशों की तकनीक भारत की कूड़ा बस्तियों को अभिशाप से वरदान में बदल सकती है।
CBSE Class 12 Hindi आलेख लेखन

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रिपोर्ट लेखन | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

 Class 12 Hindi रिपोर्ट लेखन

प्रश्नः 1.
रिपोर्ट के विषय में बताइए।
उत्तरः

‘रिपोर्ट’ शब्द का हिंदी पर्याय ‘प्रतिवेदन’ है। समाचार संकलित करके उसे लिखकर प्रेस में भेजना रिपोर्टिंग कहलाता है। ज्यादातर यह कार्य फील्ड में जाकर किया जाता है। एक संवाददाता सेमिनार, रैली अथवा संवाददाता सम्मेलन से विविध प्रकार की खबरें एकत्रित करके उन्हें अपने कार्यालय में प्रेषित कर देता है। वास्तव में रिपोर्ट एक प्रकार की लिखित विवेचना होती है जिसमें किसी संस्था, सभा, दल, विभाग अथवा विशेष आयोजन की तथ्यों सहित जानकारी दी जाती है। रिपोर्टिंग का उद्देश्य संबंधित व्यक्ति, संस्था, परिणाम, जाँच अथवा प्रगति की सही एवं पूर्ण जानकारी देना है।

प्रश्नः 2.
रिपोर्टिंग के प्रकार बताइए।
उत्तरः

रिपोर्टिंग कई प्रकार की होती है; यथा –

  • राजनीतिक, साहित्यिक, सामाजिक, आर्थिक भाषणों एवं सम्मेलनों की रिपोर्ट।
  • अदालतों की रिपोर्ट।
  • आपराधिक मामलों की रिपोर्ट।
  • प्रेस कांफ्रेंस या संवाददाता सम्मेलन की रिपोर्ट।
  • युद्ध एवं विदेश यात्रा की रिपोर्ट।
  • प्राकृतिक आपदा, दुर्घटना, दंगा आदि की रिपोर्ट।
  • संगीत सम्मेलन व कला संबंधी रिपोर्ट।
  • खोजी समाचारों की रिपोर्ट।
  • व्यावसायिक प्रगति अथवा स्थिति की रिपोर्ट।
  • पुस्तक प्रदर्शनी, चित्र प्रदर्शनी आदि की रिपोर्ट।

प्रश्नः 3.
अच्छी रिपोर्टिंग के लिए अपेक्षित गुण बताइए।
उत्तरः

एक रिपोर्टिंग तभी अच्छी और उपयोगी बन सकती है, जब उसमें गुण हों। अच्छी रिपोर्टिंग के लिए निम्नलिखित गुण होना अनिवार्य है –

  • रिपोर्टर के डेस्क से संबंध अच्छे होने चाहिए।
  • रिपोर्ट पूरी तरह स्पष्ट और पूरी हो।
  •  रिपोर्ट की भाषा न आलंकारिक हो, न ही मुहावरेदार।
  • रिपोर्ट में सूचना भर होनी चाहिए।
  • किसी भी वाक्य के एक-से अधिक अर्थ न निकलें।
  • भाषा में प्रथम पुरुष का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
  • जो भी तथ्य दिए जाएँ वे विश्वसनीय एवं प्रामाणिक हों।
  • रिपोर्ट संक्षिप्त हों।
  • उन्हीं तथ्यों का समावेश करना चाहिए जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण हों।
  • तथ्यों का तर्क और क्रम सुविधानुसार हों।
  • रिपोर्ट का शीर्षक स्पष्ट और सुरुचिपूर्ण हों।
  • शीर्षक ऐसा हो जो मुख्य विषय को रेखांकित करे।
  • रिपोर्ट में प्रत्येक तथ्य और विषय को अलग अनुच्छेद में लिखा जाना चाहिए।
  • प्रतिवेदन के अंत में सभा अथवा दल अथवा संस्था के अध्यक्ष को हस्ताक्षर कर देने चाहिए।

प्रश्नः 4.
रिपोर्टिंग लिखने की विधि बताइए।
उत्तरः

रिपोर्टिंग लिखने में निम्नलिखित विधियों को अपनाना चाहिए –

  • सर्वप्रथम संस्था का नाम लिखा जाना चाहिए।
  • बैठक सम्मेलन का उद्देश्य स्पष्ट किया जाना चाहिए।
  • आयोजन स्थल का नाम लिखें।
  • आयोजन की तिथि और समय की सूचना दी जानी चाहिए।
  • कार्यक्रम में उपस्थित लोगों की जानकारी दी जाए।
  • कार्यक्रम एवं गतिविधियों की जानकारी दी जाए।
  • यदि भाषण है तो उसके मुख्य बिंदुओं के बारे में बताया जाए।
  • निर्णयों की जानकारी भी दी जानी चाहिए।
  • प्रतियोगिता का परिणाम आया हो तो उसका भी उल्लेख किया जाना चाहिए।

प्रश्नः 5.
रिपोर्ट की विशेषताएँ बताइए।
उत्तरः

रिपोर्ट अपने आप में एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसका महत्त्व मात्र समसामयिक नहीं होता अपितु संबंधित क्षेत्र में सुदूर भविष्य तक भी इसकी उपयोगिता रहती है। रिपोर्ट की विशेषताओं का विवेचन नीचे किया जा रहा है –

1. कार्य योजना-रिपोर्टर को पहले पूरी योजना बनानी चाहिए। विषय का अध्ययन करके उसके उद्देश्य को समझना चाहिए। इसकी प्रारंभिक रूपरेखा बनाने से रिपोर्ट लिखने में सहायता मिलती है।

2. तथ्यात्मकता-रिपोर्ट तथ्यों का संकलन होता है। इसलिए सबसे पहले विषय से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी लेनी पड़ती है। इसके लिए पुराने रिपोर्टों, फाइलों, नियम-पुस्तकों, प्रपत्रों के द्वारा आवश्यक सूचनाएँ इकट्ठी की जाती हैं। सर्वेक्षण तथा साक्षात्कार द्वारा आँकड़ों और तथ्यों को प्राप्त किया जाता है। इन तथ्यों को रिकार्ड किया जाए और आवश्यकता पड़े तो इनके फोटो भी लिए जा सकते हैं।

3. प्रामाणिकता-तथ्यों का प्रामाणिक होना अत्यंत आवश्यक है। किसी विषय, घटना अथवा शिकायत आदि के बारे में जो तथ्य जुटाए जाएँ, उनकी प्रामाणिकता से रिपोर्ट की सार्थकता बढ़ जाती है।

4. निष्पक्षता-रिपोर्ट एक प्रकार से वैधानिक अथवा कानूनी दस्तावेज़ बन जाती है। इसलिए रिपोर्टर का निर्णय विवेकपूर्ण होना अत्यंत आवश्यक है। रिपोर्ट लिखते समय या प्रस्तुत करते समय रिपोर्टर प्रत्येक तथ्य, वस्तुस्थिति, पक्ष-विपक्ष, मत-विमत का निष्पक्ष भाव से अध्ययन करे और फिर उसके निष्कर्ष निकाले। इस प्रकार प्रत्येक स्थिति में उसका यह नैतिक दायित्व हो जाता है कि वह नीर-क्षीर विवेक का परिचय दे। इससे रिपोर्ट उपयोगी होगा और मार्गदर्शक भी सिद्ध होगा।

5. विषय-निष्ठता-रिपोर्ट का संबंधित प्रकरण पर ही केंद्रित होना अपेक्षित है। यदि किसी विषय-विशेष पर रिपोर्ट लिखा जाना है तो उससे संबंधित तथ्यों, कारणों और सामग्री आदि तक ही सीमित रखना चाहिए। इसमें प्रकरण को एक सूत्र की तरह प्राप्त तथ्यों में पिरोया जाए, जिससे प्रकरण अपने-आप में स्पष्ट होगा।

6. निर्णयात्मकता-रिपोर्ट मात्र विवरण नहीं होती। इसलिए रिपोर्टर को संबंधित विषय का विशेष जानकार होना आवश्यक है। यदि वह विशेषज्ञ होगा तो साक्ष्यों और तथ्यों का सही या गलत अनुमान लगा पाएगा तथा उनका विश्लेषण करने में समर्थ होगा। साथ ही वह प्राप्त तथ्यों, साक्ष्यों और तर्कों का सम्यक परीक्षण कर पाएगा और अपने सुझाव तथा निर्णय भी दे पाएगा।

7. संक्षिप्तता और स्पष्टता-रिपोर्ट लिखते समय यह ध्यान रखा जाए कि उसमें अनावश्यक विस्तार न हो। प्रत्येक तथ्य या साक्ष्य का संक्षिप्त और सुस्पष्ट विवरण दिया जाए। यदि रिपोर्ट काफी लंबा हो गया हो तो उसका सार दिया जाए जिससे प्राप्त तथ्यों और सुक्षावों पर ध्यान तुरंत आकृष्ट हो सके। लेकिन अस्पष्ट सूचना या विवरण से उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। अत: रिपोर्ट संक्षिप्त होते हुए भी अपने आप में स्पष्ट और पूर्ण होनी चाहिए।

उदाहरण

प्रश्नः 1.
अपने मोहल्ले में हुई चोरी की वारदात पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तरः

गत 20 जून, 2016 को हमारे मोहल्ले में लाला खजूरी दास के यहाँ चोरी हो गई। चोरी रात के लगभग 12 बजे हुई। घर के सभी लोग शादी समारोह में गए थे। हमारे मोहल्ले में हर रोज रात 11 बजे से 2 बजे तक बिजली गुल हो जाती है। चोरों ने इसका भरपूर फायदा उठाया। वे पीछे के दरवाज़े से कोठी में दाखिल हुए। उन्होंने घर की प्रत्येक चीज़ का मुआयना किया। वे अपने साथ 50,000 रुपये नकद, 21 तोले सोना और अन्य कीमती सामान ले गए। लाला जी को चोरी की बात सुबह 2:30 बजे पता चली जब वे वापिस लौटे। वे कुछ गणमान्य व्यक्तियों को साथ लेकर थाने में पहुँचे। पुलिस ने चोरी की रिपोर्ट दर्ज कर ली है। वह चोरों की तलाश में जुट गई है। इंस्पेक्टर महोदय ने आश्वासन दिया है कि जल्द ही चोरों को पकड़ लिया जायेगा।

प्रश्नः 2.
पार्क में हुई छेड़छाड़ की घटना पर रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तरः

स्थानीय पार्क में आम दिनों की तरह ही कल भी भारी भीड़ थी। लोग काफ़ी संख्या में मौजूद थे। बच्चे, बूढ़े, युवक युवतियाँ सभी पार्क में घूमने फिरने का आनंद उठा रहे थे। तभी अचानक हलचल-सी शुरू हो गई जिसे देखो वही पार्क के पश्चिमी छोर की ओर भागा जा रहा था। पता चला कि कुछ मनचले युवकों ने एक लड़की से छेड़छाड़ की है। पता चलते ही लोगों ने उन युवकों को पकड़ लिया। लड़की ने सारी घटना कह सुनाई। इसके बाद लोगों में रोष भर आया। उन्होंने तसल्ली से उन मनचले युवकों की पिटाई कर दी। अंत में लड़कों ने सभी से माफ़ी माँगी तथा युवती को बहन कहा। लोगों में बहुत गुस्सा भरा था अतः एक बुजुर्ग व्यक्ति ने मोबाइल से पुलिस को बुला लिया। पुलिस सभी मनचले युवकों को पकड़कर ले गई। लड़की के बयान पुलिस ने दर्ज कर ली है। आगे की कार्यवाही जारी है।

प्रश्नः 3.
भारतीय संस्कृति संस्थान की आगरा शाखा ने 13 मई से 13 जून तक संस्कृति मास मनाया। इसका संक्षिप्त रिपोर्ट तैयार करें।
उत्तरः

भारतीय संस्कृति संस्थान की आगरा शाखा ने 13 मई से 13 जून तक संस्कृति मास बड़ी धूमधाम से मनाया। इसके अंतर्गत कई स्कूली प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं। नागरिकों के लिए भी कई प्रतियोगिताएँ रखी गई थीं। इन प्रतियोगिताओं में सरस्वती वंदना, भाषण, कथा, सुलेख, रागिनी, देशप्रेम गीत, समूहगान, वंदे मातरम् गायन, पुष्प सज्जा, रंगोली, चित्रकला, कोलॉज और फैंसी ड्रेस आदि प्रमुख थी।

इन प्रतियोगिताओं में 50 विद्यालयों के 1200 बच्चों ने भाग लिया। सभी प्रतियोगिताएँ शाखा के अनुसार की गई। आगरा में संस्थान की कुल 15 शाखाएँ हैं। इसके बाद खंड के अनुसार प्रतियोगिताएँ हुईं। अंत में पूरे आगरा से चयनित कलाकारों की प्रतियोगिताएँ हुई। सारा आयोजन कुशलता और सादगी से हुआ। आगरा शाखा के संरक्षक डॉ० राजेश्वर गोयल ने बताया कि इस वर्ष से सामूहिक गान का आयोजन अखिल भारतीय स्तर पर आरंभ किया हुआ है जो भविष्य में भी जारी रहेगा। राष्ट्रीय गान प्रतियोगिता में काँटे की टक्कर थी। निर्णायक मंडल को भी निर्णय लेने में अतिरिक्त समय लगा। इस प्रतियोगिता में 300 बच्चों ने भाग लिया था। नागरिकों के लिए रखी गई प्रतियोगिताओं में भी शहर के हजारों लोगों ने रुचि पूर्वक भाग लिया। विजेताओं को पुरस्कार मिले। अंत में राष्ट्रगान से संस्कृति मास का समापन हो गया।

प्रश्नः 4.
आप जयेश सिंहल हैं। जम्मू के रघुनाथ मंदिर के नजदीक जबरदस्त बम विस्फोट हुआ है। विस्फोट के समय आप वहीं मौजूद थे। अपने अखबार के लिए इस विस्फोट की रिपोर्ट तैयार करें।

उत्तरः
रघुनाथ मंदिर के नजदीक जबरदस्त बम विस्फोट : आज दिनांक 10 अगस्त को जम्मू के विश्व प्रसिद्ध रघुनाथ मंदिर के नजदीक जबरदस्त बम विस्फोट हो गया। विस्फोट शाम को लगभग 5:30 बजे हुआ। धमाके के साथ ही लोगों में हाय-तौबा मच गई। विस्फोट इतना जबरदस्त था कि कई दुकानों के शीशे तक टूट गए। शाम के समय इस बाज़ार में बहुत भीड़ होती है। बम के छर्रे कई लोगों को लगे। इस विस्फोट में 10 लोग मौके पर ही मारे गए। लगभग 3 दर्जन से ज़्यादा लोग घायल हुए। घायलों में महिलाएँ ज़्यादा थीं। पुलिस ने घटना स्थल पर पहुँचकर स्थिति को नियंत्रण में कर लिया है। – जयेश सिंहल

प्रश्नः 5.
आपके विद्यालय में पिछले सप्ताह रक्तदान शिविर लगाया गया। अपने विद्यालय की वार्षिक पत्रिका के लिए इस शिविर पर एक रिपोर्ट लिखें जो 120 शब्दों से ज़्यादा न हों।
उत्तरः

विद्यालय में रक्तदान शिविर का आयोजन –
हमारे विद्यालय में पिछले सप्ताह रेड क्रास सोसायटी द्वारा रक्तदान शिविर आयोजित किया गया। प्राचार्य महोदय ने स्वयं छात्रों को रक्तदान के लिए प्रेरित किया। उन्होंने स्वयं रक्तदान कर छात्रों के सामने उदाहरण पेश किया। उन्होंने बताया कि आपके द्वारा दान की गई रक्त की एक बूंद भी दूसरे को जीवन दे सकती है। हमारे विद्यालय के कई अध्यापकों और छात्रों ने इस शिविर में बढ़-चढ़कर भाग लिया। यह शिविर सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक चला। रेड क्रास सोसाइटी के जिला अधिकारियों द्वारा रक्तदान करने वालों को प्रमाण-पत्र दिए गए। नारायण शंकर कक्षा-ग्यारहवीं

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संपादकीय लेखन | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

Class 12 Hindi संपादकीय लेखन

प्रश्नः 1.
संपादकीय का क्या महत्त्व है?
उत्तरः

संपादक संपादकीय पृष्ठ पर अग्रलेख एवं संपादकीय लिखता है। इस पृष्ठ के आधार पर संपादक का पूरा व्यक्तित्व झलकता है। अपने संपादकीय लेखों में संपादक युगबोध को जाग्रत करने वाले विचारों को प्रकट करता है। साथ ही समाज की विभिन्न बातों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। संपादकीय पृष्ठों से उसकी साधना एवं कर्मठता की झलक आती है। वस्तुतः संपादकीय पृष्ठ पत्र की अंतरात्मा है, वह उसकी अंतरात्मा की आवाज़ है। इसलिए कोई बड़ा समाचार-पत्र बिना संपादकीय पृष्ठ के नहीं निकलता।

पाठक प्रत्येक समाचार-पत्र का अलग व्यक्तित्व देखना चाहता है। उनमें कुछ ऐसी विशेषताएँ देखना चाहता है जो उसे अन्य समाचार से अलग करती हों। जिस विशेषता के आधार पर वह उस पत्र की पहचान नियत कर सके। यह विशेषता समाचार-पत्र के विचारों में, उसके दृष्टिकोण में प्रतिलक्षित होती है, किंतु बिना संपादकीय पृष्ठ के समाचार-पत्र के विचारों का पता नहीं चलता। यदि समाचार-पत्र के कुछ विशिष्ट विचार हो, उन विचारों में दृढ़ता हो और बारंबार उन्हीं विचारों का समर्थन हो तो पाठक उन विचारों से असहमत होते हुए भी उस समाचार-पत्र का मन में आदर करता है। मेरुदंडहीन व्यक्ति को कौन पूछेगा। संपादकीय लेखों के विषय समाज के विभिन्न क्षेत्रों को लक्ष्य करके लिखे जाते हैं।

प्रश्नः 2.
किन-किन विषयों पर संपादकीय लिखा जाता है?
उत्तरः

जिन विषयों पर संपादकीय लिखे जाते हैं, उनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है –

  • समसामयिक विषयों पर संपादकीय
  • दिशा-निर्देशात्मक संपादकीय
  • संकेतात्मक संपादकीय
  • दायित्वबोध और नैतिकता की भावना से परिपूर्ण संपादकीय
  • व्याख्यात्मक संपादकीय
  • आलोचनात्मक संपादकीय
  • समस्या संपादकीय
  •  साहित्यिक संपादकीय
  • सांस्कृतिक संपादकीय
  • खेल से संबंधित संपादकीय
  • राजनीतिक संपादकीय।

प्रश्नः 3.
संपादकीय का अर्थ बताइए।
उत्तरः

‘संपादकीय’ का सामान्य अर्थ है-समाचार-पत्र के संपादक के अपने विचार। प्रत्येक समाचार-पत्र में संपादक प्रतिदिन ज्वलंत
विषयों पर अपने विचार व्यक्त करता है। संपादकीय लेख समाचार पत्रों की नीति, सोच और विचारधारा को प्रस्तुत करता है। संपादकीय के लिए संपादक स्वयं जिम्मेदार होता है। अतएव संपादक को चाहिए कि वह इसमें संतुलित टिप्पणियाँ ही प्रस्तुत करे।

संपादकीय में किसी घटना पर प्रतिक्रिया हो सकती है तो किसी विषय या प्रवृत्ति पर अपने विचार हो सकते हैं, इसमें किसी आंदोलन की प्रेरणा हो सकती है तो किसी उलझी हुई स्थिति का विश्लेषण हो सकता है।

प्रश्नः 4.
संपादकीय पृष्ठ के बारे में बताइए।
उत्तरः

संपादकीय पृष्ठ को समाचार-पत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पृष्ठ माना जाता है। इस पृष्ठ पर अखबार विभिन्न घटनाओं और समाचारों पर अपनी राय रखता है। इसे संपादकीय कहा जाता है। इसके अतिरिक्त विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर अपने विचार लेख के रूप में प्रस्तुत करते हैं। आमतौर पर संपादक के नाम पत्र भी इसी पृष्ठ पर प्रकाशित किए जाते हैं। वह घटनाओं पर आम लोगों की टिप्पणी होती है। समाचार-पत्र उसे महत्त्वपूर्ण मानते हैं।

प्रश्नः 5.
अच्छे संपादकीय में क्या गुण होने चाहिए?
उत्तरः

एक अच्छे संपादकीय में अपेक्षित गुण होने अनिवार्य हैं –

  • संपादकीय लेख की शैली प्रभावोत्पादक एवं सजीव होनी चाहिए।
  • भाषा स्पष्ट, सशक्त और प्रखर हो।
  • चुटीलेपन से भी लेख अपेक्षाकृत आकर्षक बन जाता है।
  • संपादक की प्रत्येक बात में बेबाकीपन हो।
  • ढुलमुल शैली अथवा हर बात को सही ठहराना अथवा अंत में कुछ न कहना-ये संपादकीय के दोष माने जाते हैं,अतः संपादक को इनसे बचना चाहिए।

उदाहरण

1. दाऊद पर पाक को और सुबूत

डॉन को सौंप सच्चे पड़ोसी बने जनरल

भारत ने एक बार फिर पाकिस्तान के चेहरे से नकाब नोच फेंका है। मुंबई बमकांड के प्रमुख अभियुक्तों में से एक और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के पाक में होने के कुछ और पक्के सुबूत मंगलवार को नई दिल्ली ने इस्लामाबाद को सौंपे हैं। इनमें प्रमाण के तौर पर दाऊद के दो पासपोर्ट नंबर पाकिस्तान को सौंपे हैं। यही नहीं, भारत सरकार ने दाऊद के पाकिस्तानी ठिकानों से संबंधित कई साक्ष्य भी जनरल साहब को भेजे हैं। इनमें दो पते कराची के हैं। भारत एक लंबे समय से पाकिस्तान से दाऊद के प्रत्यर्पण की माँग करता आ रहा है। अमेरिका भी बहुत पहले साफ कर चुका है कि दाऊद पाक में ही है। पिछले दिनों बुश प्रशासन ने वांछितों की जो सूची जारी की थी, उसमें दाऊद का पता कराची दर्ज है। दरअसल अलग-अलग कारणों से भारत, अमेरिका और पाकिस्तान के लिए दाऊद अह्म होता जा रहा है। भारत का मानना है कि 1993 में मुंबई में सिलसिलेवार धमाकों को अंजाम देने के बाद, फरार डॉन अब भी पाकिस्तान से बैठकर भारत में आतंकवाद को गिजा-पानी मुहैया करा रहा है।

अमेरिका ने दाऊद को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादियों की फेहरिस्त में शामिल कर लिया है। वाशिंगटन का दावा है कि दाऊद कराची से यूरोप और अमेरिकी देशों में ड्रग्स का करोबार भी चला रहा है, लिहाजा उसका पकड़ा जाना बहुत ज़रूरी है। तीसरी तरफ, पाकिस्तान के लिए दाऊद इब्राहिम इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में आतंक फैला रहे संगठनों को जोड़े रखने और उनको पैसे तथा हथियार मुहैया कराने में दाऊद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। खबर तो यहाँ तक है कि दाऊद ने पाकिस्तान की सियासत में भी दखल देना शुरू कर दिया है और यही वह मुकाम है, जब राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को कभी-कभी दाऊद खतरनाक लगने लगता है। फिर भी, वह उसे पनाह दिए हुए है। जब भी भारत दाऊद की माँग करता है, पाक का रटा-रटाया जवाब होता है कि वह पाकिस्तान में है ही नहीं पिछले दिनों परवेज मुशर्रफ ने कोशिश की कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और इंटरपोल की फेहरिस्तों से दाऊद के पाकिस्तानी पतों को खत्म करा दिया जाए, लेकिन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश इसके लिए तैयार नहीं हुए।

भारत के खिलाफ आतंकवाद को पालने-पोसने और शह देने में पाकिस्तान की भूमिका जग-जाहिर है। एफबीआई ने दो दिन पूर्व अमेरिका की एक अदालत में सचित्र साक्ष्यों के साथ एक हलफनामा दायर कर दावा किया है कि पाक के बालाघाट में आतंकी शिविर सक्रिय है। बुधवार को भारत की सर्वोच्च पंचायत संसद में सरकार ने खुलासा किया कि पाक अधिकृत कश्मीर में 52 आतंकी शिविर चल रहे हैं। क्या जॉर्ज बुश इन बातों पर गौर फरमाएँगे? भारत को भी दाऊद चाहिए और अमेरिका को भी, तो क्यों नहीं बुश प्रशासन पाकिस्तान पर जोर डालता है कि वह डॉन को भारत को सौंपकर एक सच्चे पड़ोसी का हक अदा करे। पाकिस्तान के शासन को भी समझना चाहिए, साँप-साँप होता है जिस दिन उनको डसेगा, तब पता चलेगा।

2. धरती के बढ़ते तापमान का साक्षी बना नया साल

उत्तर भारत में लोगों ने नववर्ष का स्वागत असामान्य मौसम के बीच किया। इस भू-भाग में घने कोहरे और कडाके की ठंड के बीच रोमन कैलेंडर का साल बदलता रहा है, लेकिन 2015 ने खुले आसमान, गरमाहट भरी धूप और हल्की सर्दी के बीच हमसे विदाई ली। ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं हुआ। ब्रिटेन के मौसम विशेषज्ञ इयन कुरी ने तो दावा किया कि बीता महीना ज्ञात इतिहास का सबसे गर्म दिसंबर था। अमेरिका से भी ऐसी ही खबरें आईं। संयुक्त राष्ट्र पहले ही कह चुका था कि 2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहेगा। भारतीय मौसम विभाग के मुताबिक उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में आने वाले दिनों में तापमान ज्यादा नहीं बदलेगा। यानी आने वाले दिनों में भी वैसी सर्दी पड़ने की संभावना नहीं है, जैसा सामान्यतः वर्ष के इन दिनों में होता है। दरअसल, कुछ अंतरराष्ट्रीय जानकारों का अनुमान है कि 2016 में तापमान बढ़ने का क्रम जारी रहेगा और संभवतः नया साल पुराने वर्ष के रिकॉर्ड को तोड़ देगा।

इसकी खास वजह प्रशांत महासागर में जारी एल निनो परिघटना है, जिससे एक बार फिर दक्षिण एशिया में मानसून प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से हवा का गरमाना जारी है। इन घटनाक्रमों का ही सकल प्रभाव है कि गुजरे 15 वर्षों में धरती के तापमान में चिंताजनक स्तर तक वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप हो रहे जलवायु परिवर्तन के लक्षण अब स्पष्ट नज़र आने लगे हैं। आम अनुभव है कि ठंड, गर्मी और बारिश होने का समय असामान्य हो गया है। गुजरा दिसंबर और मौजूदा जनवरी संभवत: इसी बदलाव के सबूत हैं। जलवायु परिवर्तन के संकेत चार-पाँच दशक पहले मिलने शुरू हुए। वर्ष 1990 आते-आते वैज्ञानिक इस नतीजे पर आ चुके थे कि मानव गतिविधियों के कारण धरती गरम हो रही है।

उन्होंने चेताया था कि इसके असर से जलवायु बदलेगी, जिसके खतरनाक नतीजे होंगे, लेकिन राजनेताओं ने उनकी बातों की अनदेखी की। हालाँकि, जलवायु परिवर्तन रोकने की पहली संधि वर्ष 1992 में ही हुई, लेकिन विकसित देशों ने अपनी वचनबद्धता के मुताबिक उस पर अमल नहीं किया। अब जबकि खतरा बढ़ चुका है, तो बीते साल पेरिस में धरती के तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्शियस तक सीमित रखने के लिए नई संधि हुई। नया साल यह चेतावनी लेकर आया है कि अगर इस बार सरकारों ने लापरवाही दिखाई तो बदलता मौसम मानव सभ्यता की सूरत ही बदल देगा।

3. कामकाजी महिलाओं को मज़बूती देता फैसला

मातृत्व अवकाश की अवधि 12 से 26 हफ्ते करने और माँ बनने के बाद दो साल तक घर से काम करने का विकल्प देने का केंद्र का इरादा सराहनीय है। आशा है, इसका चौतरफा स्वागत होगा। सरकार इन प्रावधानों को निजी क्षेत्र में भी लागू करना चाहती है, लेकिन इससे कॉर्पोरेट सेक्टर को आशंकित नहीं होना चाहिए। इन नियमों को लागू कर कंपनियाँ न सिर्फ समाज में लैंगिक समता लाने में सहायक बनेंगी, बल्कि गहराई से देखें तो उन्हें महसूस होगा कि कामकाजी महिलाओं के लिए अधिक अनुकूल स्थितियाँ खुद उनके लिए भी फायदेमंद हैं। अक्सर माँ बनने के साथ महिलाओं के कॅरियर में बाधा आ जाती है।

अनेक महिलाएँ तब नौकरी छोड़ देती हैं। इसके साथ ही उन्हें ट्रेनिंग और तजुर्बा देने में कंपनियाँ, जो निवेश करती हैं वह बेकार चला जाता है। असल में अनेक कंपनियाँ यही सोचकर नियुक्ति के समय प्रतिभाशाली महिला उम्मीदवारों का चयन नहीं करतीं। इस तरह वे श्रेष्ठतर मानव संसाधन से वंचित रह जाती हैं। नए प्रस्ताव लागू होने पर महिलाएँ नौकरी छोड़ने पर मजबूर नहीं होंगी। साथ ही ये नियम बड़े सामाजिक उद्देश्यों के अनुरूप भी हैं। मसलन, बाल विकास की दृष्टि से जीवन के आरंभिक छह महीने बेहद अहम होते हैं। उस दौरान शिशु को माता-पिता के सघन देखभाल की आवश्यकता होती है, इसीलिए अब विकसित देशों में पितृत्व अवकाश भी दिया जाने लगा है, ताकि नवजात बच्चों की तमाम शारीरिक, मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक ज़रूरतें पूरी हो सकें।

फिर जब आधुनिक सूचना तकनीक भौतिक दूरियों को अप्रासंगिक करती जा रही है, तो (जहाँ संभव हो) घर से काम करने का विकल्प देने में किसी संस्था/कंपनी को कोई नुकसान नहीं होगा। केंद्रीय सिविल सर्विस सेवा (अवकाश) नियम-1972 के तहत सरकारी महिला कर्मचारियों को छह महीने का मातृत्व अवकाश पहले से मिल रहा है। अब दो साल तक घर से काम करने का विकल्प सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों की नई माँ बनीं महिला कर्मचारियों को देना प्रगतिशील कदम माना जाएगा। .इससे भारत उन देशों में शामिल होगा, जहाँ महिला कर्मचारियों के लिए उदार कायदे अपनाए गए हैं। 42 देशों में 18 हफ्तों से अधिक मातृत्व अवकाश का प्रावधान लागू है। वहाँ का अनुभव है कि इन नियमों से सामाजिक विकास को बढ़ावा मिला, जबकि उत्पादन या आर्थिक विकास पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं हुआ। बेशक ऐसा ही भारत में भी होगा। अत: नए नियमों को लागू करने की तमाम औपचारिकताएँ सरकार को यथाशीघ्र पूरी करनी चाहिए।

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जनसंचार माध्यम प्रिंट माध्यम | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

जनसंचार माध्यम 

1. प्रभाष जोशी किस क्षेत्र से सम्बंधित हैं ?

उतर: पत्रकारिता 

2. संचार किसे कहते हैं ?

उत्तर: ‘संचार’ शब्द चर् धातु के साथ सम् उपसर्ग जोड़ने से बना है- इसका अर्थ है चलना या एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना संचार संदेशों का आदान-प्रदान है।

सूचनाओं, विचारों और भावनाओं का लिखित, मौखिक या दृश्य-श्रव्य माध्यमों के जरिये सफ़लता पूर्वक आदान-प्रदान करना या एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना संचार है।

3. “संचार अनुभवों की साझेदारी है”- किसने कहा है ?

उत्तर: प्रसिद्ध संचार शास्त्री ‘विल्बर श्रेम’ ने।

4. संचार माध्यम से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर: संचार-प्रक्रिया को संपन्न करने में सहयोगी तरीके तथा उपकरण संचार के माध्यम कहलाते हैं।

5. संचार के मूल तत्व लिखिए।

उत्तर: 

• संचारक या स्रोत

• एन्कोडिंग (कूटीकरण)

• संदेश (जिसे संचारक प्राप्तकर्ता तक पहुँचाना चाहता है)

• माध्यम (संदेश को प्राप्तकर्ता तक पहुँचाने वाला माध्यम होता है जैसे- ध्वनि-तरंगें, वायु तरंगें, टेलीफोन, समाचारपत्र, रेडियो, टी वी आदि)

• प्राप्तकर्ता (डीकोडिंग कर संदेश को प्राप्त केरने वाला)

• फीडबैक (संचार प्रक्रिया में प्राप्तकर्ता की प्रतिक्रिया)

• शोर (संचार प्रक्रिया में आने वाली बाधा)

6. संचार के प्रमुख प्रकारों का उल्लेख कीजिए:

उत्तर: 

• सांकेतिक संचार

• मौखिक संचार

• आमौखिक संचार

• अंतः वैयक्तिक संचार

• अंतरवैयक्तिक संचार

• समूह संचार

• जनसंचार

7. जनसंचार से आप क्या समझते हैं ?

उत्तर: प्रत्यक्ष संवाद के बजाय किसी तकनीकी या यांत्रिक माध्यम के द्वारा समाज के एक विशाल वर्ग से संवाद कायम करना जनसंचार कहलाता है।

8. जनसंचार के प्रमुख माध्यमों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर: अखबार, रेडियो, टीवी, इंटरनेट, सिनेमा आदि।

9. जनसंचार की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:

• इसमें फ़ीडबैक तुरंत प्राप्त नहीं होता।

• इसके संदेशों की प्रकृति सार्वजनिक होती है।

• संचारक और प्राप्तकर्ता के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता।

• जनसंचार के लिए एक औपचारिक संगठन की आवश्यकता होती है।

• इसमें ढेर सारे द्वारपाल काम करते हैं।

10. जनसंचार के प्रमुख कार्य कौन-कौन से हैं ?

उत्तर:

• सूचना देना

• शिक्षित करना

• मनोरंजन करना

• निगरानी करना

• एजेंडा तय करना विचार-विमर्श के लिए मंच उपलब्ध कराना

11. लाइव से क्या अभिप्राय है ?

उत्तर: किसी घटना का घटना-स्थल से सीधा प्रसारण लाइव कहलाता है।

12. भारत का पहला समाचार वाचक किसे माना जाता है ?

उत्तर: देवर्षि नारद।

13. जनसंचार का सबसे पहला महत्त्वपूर्ण तथा सर्वाधिक विस्तृत माध्यम कौन-सा था ?

उत्तर: समाचार-पत्र और पत्रिका

14. प्रिंट मीडिया के प्रमुख तीन पहलू कौन-कौन से हैं ?

उत्तर:

• समाचारों को संकलित करना

• संपादन करना

• मुद्रण तथा प्रसारण

15. समाचारों को संकलित करने का कार्य कौन करता है ?

उत्तर: संवाददाता

16. भारत में पत्रकारिता की शुरुआत कब और किससे हुई ?

उत्तर: भारत में पत्रकारिता की शुरुआत सन 1780 में जेम्स आगस्ट हिक्की के ‘बंगाल गजट’ से हुई जो कलकत्ता से निकला था।

17. हिंदी का पहला साप्ताहिक पत्र किसे माना जाता है ?

उत्तर: हिंदी का पहला साप्ताहिक पत्र ‘उदंत मार्तंड’ को माना जाता है जो कलकत्ता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल के संपादन में निकला था।

18. आजादी से पूर्व कौन-कौन प्रमुख पत्रकार हुए ?

उत्तर: महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, मदन मोहन मालवीय, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रताप नारायण मिश्र, बाल मुकुंद गुप्त आदि हुए।

19. आजादी से पूर्व के प्रमुख समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के नाम लिखिए।

उत्तर: केसरी, हिन्दुस्तान, सरस्वती, हंस, कर्मवीर, आज, प्रताप, प्रदीप, विशाल भारत आदि।

20. आजादी के बाद की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं तथा पत्रकारों के नाम लिखए।

उत्तर: प्रमुख पत्र- नव भारत टाइम्स, जनसत्ता, नई दुनिया, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण आदि।

प्रमुख पत्रिकाएँ- धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दिनमान, रविवार, इंडिया टुडे, आउट लुक आदि।

प्रमुख पत्रकार- अज्ञेय, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती, मनोहर श्याम जोशी, राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी आदि।

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कार्यालयी पत्र | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

कार्यालयी पत्र

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह अपने भावों-विचारों और सूचनाओं को दूसरे तक संप्रेषित करना चाहता है। इस कार्य के लिए पत्र सर्वाधिक उत्तम साधन है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने इच्छित व्यक्ति से अपने मन की बात आसानी से कह सकता है। इसके अतिरिक्त, आज का दैनिक जीवन बहुत-जटिल हो गया है। मनुष्य को सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं आदि से संबंध स्थापित करने पड़ते हैं। इस कार्य में पत्र बहुत ही सहायक सिद्ध हुआ है।

पत्र के प्रकार

पत्र अनेक प्रकार के होते हैं। विषय, संदर्भ, व्यक्ति और स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के पत्रों को लिखने का तरीका भी अलग-अलग होता है। आम तौर पर पत्र दो प्रकार के होते हैं-

(क) अनौपचारिक-पत्र

(ख) औपचारिक-पत्र

(क) अनौपचारिक-पत्र इस तरह के पत्र निकट संबंधियों तथा मित्रों को लिखे जाते हैं। इसमें पत्र पाने वाले तथा लिखने वाले के बीच घनिष्ठ संबंध होता है। यह संबंध पारिवारिक तथा मित्रता का भी हो सकता है। ऐसे पत्रों को व्यक्तिगत-पत्र भी कहा जाता है। इन पत्रों की विषयवस्तु निजी व घरेलू होती है। इनका स्वरूप संबंधों के आधार पर निर्धारित होता है। इन पत्रों की भाषा-शैली में कोई औपचारिकता नहीं होती तथा इनमें आत्मीयता का भाव व्यक्त होता है।

(ख) औपचारिक-पत्र इस तरह के पत्रों में एक निश्चित शैली का प्रयोग किया जाता है। सरकारी, गैर-सरकारी संदभों में औपचारिक स्तर पर भेजे जाने वाले पत्रों को औपचारिक-पत्र कहा जाता है। इनमें व्यावसायिक, कार्यालयी और सामान्य जीवन-व्यवहार के संदर्भ में लिखे जाने वाले पत्रों को शामिल किया जाता है।

औपचारिक-पत्रों के दो प्रकार के होते हैं-

  1. सरकारी, अर्धसरकारी और व्यावसायिक संवभाँ में लिखे जाने वाले पत्र-इनकी विषयवस्तु प्रशासन, कार्यालय और कारोबार से संबंधित होती है। इनकी भाषा-शैली का स्वरूप निश्चित होता है। इनका प्रारूप भी प्राय: निश्चित होता है। सरकारी कार्यालयों, बैंकों और व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा किया जाने वाला पत्र-व्यवहार इस वर्ग के अंतर्गत आता है। विभिन्न पदों के लिए लिखे गए आवेदन-पत्र भी इसी वर्ग के हैं।
  2. सामान्य जीवन व्यवहार तथा अन्य विशिष्ट संदर्भों में लिखे जाने वाले पत्र-ये पत्र परिचित एवं अपरिचित व्यक्तियों को तथा विविध क्षेत्रों से संबद्ध अधिकारियों को लिखे जाते हैं। इनका विषयवस्तु आम जीवन से संबद्ध होती है। इनका प्रारूप, स्थिति व संदर्भ के अनुसार परिवर्तन हो सकता है। इसके अंतर्गत शुभकामना-पत्र, बधाई-पत्र, निमंत्रण-पत्र, शोक संवेदना-पत्र, शिकायती-पत्र, समस्यामूलक-पत्र, संपादक के नाम पत्र आदि आते हैं।

पत्र के अंग

पत्र का वर्ग कोई भी हो, उसके चार अंग होते हैं-

  1. पता और दिनांक
  2. संबोधन व अभिवादन शब्दावली
  3. पत्र की सामग्री या कलेवर
  4. पत्र की समाप्ति या समापन भाग

1. पता व दिनांक

अनौपचारिक-पत्र के बाई ओर ऊपर कोने में पत्र लेखक अपना पता लिखता है और उसके नीचे तिथि दी जाती है औपचारिक-पत्र में प्रेषक के विभाग का नाम, पता व दिनांक दी जाती है। इसके बाद बाई ओर प्राप्तकर्ता का नाम, पद, विभाग आदि दिया जाता है।

2. संबोधन तथा अभिवादन

अनौपचारिक स्थिति में-

  • पत्र जिसे लिखते हैं उसे संबोधित करते हैं; जैसे-आदरणीय पिता जी, आदरणीय दादा जी, पूजनीया माता जी, श्रद्धेय ताऊ जी, आदरणीय भैया, प्यारे भाई, प्रिय मित्र आदि।
  • इसके नीचे सम्मानसूचक शब्द अवश्य लिखते हैं; जैसे-प्रणाम, सादर प्रणाम, आशीर्वाद, चरण-स्पर्श, प्रसन्न रहो अादि
  • अभिवादन लिखने के बाद पूर्णविराम अवश्य लगाना चाहिए; जैसे
  • पूज्य पिता जी,
  • प्रणाम।
  • औपचारिक स्थिति में–
  • पत्र शुरू करने से पहले पत्र लिखने का कारण यानी कि विषय अवश्य लिखना चाहिए।
  • विषय लिखने के बाद संबोधन लिखा जाता है; जैसे-श्रीमान, महोदय, मान्यवर आदि।

3. पत्र की सामग्री या कलेवर

अभिवादन के बाद पत्र की सामग्री लिखी जाती है। इसे हम कलेवर भी कह सकते हैं। इसमें हम अपनी बात कहते हैं। कलेवर के संबंध में निम्नलिखित सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए-

  • कलेवर की भाषा सरल होनी चाहिए तथा वाक्य छोटे-छोटे होने चाहिए।
  • लेखक का अर्थ स्पष्ट होना चाहिए।
  • कलेवर बहुत विस्तृत नहीं होना चाहिए।
  • सरकारी-पत्र में यदि काटकर कुछ लिखा जाता है तो उस पर छोटे हस्ताक्षर कर देने चाहिए।
  • पत्र में पुनरुक्ति नहीं होनी चाहिए।
  • पत्र लिखते समय ‘गागर में सागर’ भरने की शैली को अपनाया जाना चाहिए।

4. पत्र की समाप्ति या समापन भाग

  • अनौपचारिक-पत्र के अंत में लिखने वाले और पाने वाले की आयु, अवस्था तथा गौरव-गरिमा के अनुरूप स्वनिर्देश बदल जाते हैं; जैसे- म्हारा, आपका, स्नेही, शुभचिंतक, विनीत आदि।
  • औपचारिक-पत्रों का अंत प्राय: निर्धारित स्वनिर्देश द्वारा होता है; यथा-भवदीय, आपका, शुभेच्छु आदि। इसके बाद पत्र लेखक के हस्ताक्षर होते हैं। औपचारिक-पत्रों में हस्ताक्षर के नीचे प्राय: प्रेषक का पूरा नाम और पद का नाम लिखा जाता है।

विशेष– परीक्षा में प्रेषक के नाम के स्थान पर ‘क, ख, ग, ‘ लिखना चाहिए। पते के स्थान पर ‘परीक्षा भवन’ तथा नगर के स्थान पर ‘क, ख, ग,’ लिख देना चाहिए। इससे उत्तर-पुस्तिका की गोपनीयता भंग नहीं होती।

I. आवेदन-पत्र

प्रश्न 1:

शिक्षा निदेशालय, दिल्ली को विभिन्न विषयों के प्रशिक्षित स्नातक अध्यापकों की आवश्यकता है। इस पद के लिए शिक्षा निदेशक को एक आवेदन-पत्र लिखिए।

उत्तर –

प्रति,

शिक्षा निदेशक

शिक्षा निदेशालय

दिल्ली।

विषय-प्रशिक्षित स्नातक अध्यापकों की भर्ती हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय

मुझे 05 फरवरी, 20xx को प्रकाशित दैनिक जागरण समाचार-पत्र से ज्ञात हुआ कि शिक्षा निदेशालय को विभिन्न विषयों के प्रशिक्षित स्नातक अध्यापकों की आवश्यकता है। प्रार्थी भी स्वयं को एक उम्मीदवार के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

नाम – मनोज कुमार

पिता का नाम – श्री राम स्वरूप

जन्मतिथि-25 दिसंबर,1991

पता – सी/125 सागरपुर दिल्ली।

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प्रश्न 2:

भारतीय स्टेट बैंक मुंबई के महाप्रबंधक को लिपिक पद के लिए आवेदन-पत्र लिखिए।

उत्तर –

प्रति,

महाप्रबंधक

भारतीय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया

नारीमन प्वाइंट मुंबई।

विषय-लिपिक पद हेतु आवेदन-पत्र।

मान्यवर,

दिनांक 27 जनवरी, 20xx के महाराष्ट्र टाइम्स में प्रकाशित विज्ञापन से ज्ञात हुआ कि आपके कार्यालय में लिपिकों की आवश्यकता है। मैं स्वयं को इस पद के योग्य मानकर आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रही हूँ, मेरा संक्षिप्त व्यक्तिगत विवरण निम्नलिखित है-

नाम – सुमन शर्मा

पिता का नाम – श्री विजय कुमार

जन्मतिथि – 14 दिसंबर, 1987

पता – ए 4/75, गोकुलपुरी, दिल्ली।

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प्रश्न 3:

सुविधा इलेक्ट्रॉनिक्स प्रा० लिमिटेड जालंधर पंजाब को मार्केटिंग एक्जक्यूटिव पद के लिए आवेदन-पत्र लिखिए।

उत्तर –

प्रति,

प्रबंधक

सुविधा इलेक्ट्रॉनिक्स प्रा० लिमिटेड

जालधर पंजाब।

विषय-मार्केटिंग एक्जक्यूटिव पद के लिए आवेदन-पत्र।

महोदय,

चंडीगढ़ से प्रकाशित दिनांक 25 फरवरी, 20xx के पंजाब केसरी समाचार-पत्र से ज्ञात हुआ कि सुविधा इलेक्ट्रॉनिक्स को कुछ मार्केटिंग एक्जक्यूटिव की आवश्यकता है स्वयं को इस पद के योग्य समझते हुए मैं अपना आवेदन-पत्र प्रेषित कर रहा हूँ। मेरा संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

नाम – सौरभ सैनी

पिता का नाम – श्री फूल सिंह सैनी

जन्मतिथि – 10 जुलाई, 1992

पता – बी/25, राजा गार्डन, दिल्ली।

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प्रश्न 4:

खादी ग्रामोदयोग बोर्ड, किंग्सवे कैंप, दिल्ली के महाप्रबंधक को विक्रय प्रतिनिधि (सेल्स एक्जक्यूटिव) पद के लिए आवेदन-पत्र लिखिए।

उत्तर –

प्रति,

महप्रबंधक

खादी ग्रामोद्योग

किंग्सवे कैंप, दिल्ली।

विषय-विक्रय प्रतिनिधि पद हेतु आवेदन-पत्र।

महोदय,

दिनांक 15 सितंबर, 20xx के ‘पंजाब केसरी’ समाचार-पत्र से ज्ञात हुआ कि गांधी जयंती के अवसर पर खादी एवं हथकरघा की बनी वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने हेतु इस बोर्ड को विक्रय प्रतिनिधियों की आवश्यकता है। इस पद के लिए मैं भी आवेदन-पत्र भेज रहा हूँ। मेरा संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-

नाम – आशीष सैनी

पिता का नाम – श्री फूल सिंह सैनी

जन्मतिथि – 15 दिसंबर, 1991

पता – wz15, मौर्या इंक्लेव, पीतमपुरा, दिल्ली।

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प्रश्न 5:

दिल्ली नगर निगम सिविल लाइंस क्षेत्र, दिल्ली के आयुक्त को प्राथमिक अध्यापकों की आवश्यकता है। इस पद के लिए आवेदन-पत्र लिखिए। आप विकास कुमार ए 2/127, अभिनव इंक्लेव, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली के निवासी हैं।

उत्तर –

प्रति,

आयुक्त

दिल्ली नगर निगम

सिविल लाइस क्षेत्र

16, राजपुर रोड, दिल्ली।

विषय-प्राथमिक अध्यापक पद हेतु आवेदन-पत्र।

मान्यवर,

दिनांक 15 जनवरी, 20xx के ‘जनसत्ता’ दैनिक समाचार-पत्र से ज्ञात हुआ कि सिविल लाइंस क्षेत्र में प्राथमिक कक्षा के बच्चों को पढ़ाने के लिए अध्यापकों के कुछ पद रिक्त हैं। मैं भी इस पद के लिए अपना आवेदन-पत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ। मेरा संक्षिप्त व्यक्तिगत विवरण इस प्रकार है-

नाम – विकास कुमार

पिता का नाम – श्री राम रतन

जन्मतिथि – 10 अक्टूबर, 1992

पता – A2/127, अभिनव इंक्लेव, सेक्टर-15, रोहिणी, दिल्ली।

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अनुच्छेद लेखन | class 12th | Important question Hindi कार्यालयी हिंदी और रचनात्मक लेखन

अनुच्छेद लेखन

किसी विषय से संबंद्ध महत्तवपूर्ण बातों का सार एक अनुच्छेद में सुंदर ढंग से उपस्थित कर देना “अनुच्छेद लेखन” कहलाता है। अनुच्छेद और निबंध में काफी अंतर होता है। जैसे:

  • 1. निबंध में किसी विषय को विस्तार में प्रयुक्त किया जाता है जबकि अनुच्छेद में विषय का सार लिखा जाता है।
  • 2. निबंध में हर बिंदु को अलग-अलग पैरा में लिखा है जबकि अनुच्छेद में केवल एक ही पैरा में लिखा जाता है।
  • 3. निबंध में उदाहरण, सूक्तियाँ, उद्धरण आदि का समावेश होता है, जबकि अनुच्छेद में प्रायः ऐसा नहीं होता।
  • 4. निबंध के शब्दों की मात्रा अनुच्छेद से बहुत अधिक होती है।

अनुच्छेद लिखने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
विषय से संबंधित सभी बातों को एकत्र कर लीजिए। मुख्य सामग्री को प्रमुख बिंदुओं में बाँट लीजिए। तत्पश्चात् उन्हें संक्षेप में स्पष्ट कीजिए। विषय के अनावश्यक विस्तार तथा पक्ष-विपक्ष की विवेचना से बचना चाहिए। वाक्य छोटे व प्रभावशाली हों। भाषा सरल और सुगम होनी चाहिए। आरंभ में बिना भूमिका बाँधे सीधे विषय पर आ जाना चाहिए। सभी प्रमुख बिंदुओं का समावेश होना चाहिए। लेखन करते समय वाक्यों में तारतम्य बना रहना चाहिए। अनुच्छेद में अनेक पैरा नहीं बनाना चाहिए। केवल एक ही पैरा में लिखना चाहिए।

उदाहरण स्वरूप कुछ अनुच्छेद आगे दिए जा रहे हैं:

सच्चा मित्र

यदि हम किसी से कोई सहायता न माँगें तो सारी दुनिया ऐसा दर्शाएगी जैसे कि वह हमारी मित्र है। पर, जैसे ही हम किसी के सामने मदद के लिए हाथ पसारते हैं, तो कोई भी मदद के लिए नहीं आता। विपत्ति के समय हमें अकेला रहना पड़ता है। संपन्नता में तो हमारे कई मित्र बन जाते हैं, परंतु संकट की घड़ी में सही मित्रों की पहचान होती है। दरअसल, सच्चा मित्र वही है, जो संकट के समय काम आए। जो व्यक्ति कठिनाई के वक्त हमारी सहायता करता है, वही सच्चा मित्र है, बाकी सब मतलब के यार हैं। सच्चा मित्र हमें आफत में फंसा देखकर भाग नहीं सकता। वह हरसंभव उपाय करेगा। इसलिए तो किसी ने कहा है- सच्चा मित्र वही है जो संकट के समय काम आए।

वसंत ऋतु

वर्षा यदि ऋतुओं की रानी है तो वसंत “ऋतुराज” है। ऋतुराज वसंत फाल्गुन, चैत्र एवं वैशाख मास में आता है। वसंत अत्यंत सौंदर्ययुक्त ऋतु है। इस समय न अधिक गर्मी होती है, और न अधिक सर्दी। वसंत की सुहावनी वायु मन को आनंदित कर देती है। वृक्षों के सूखे पत्ते झड़ जाते हैं। प्रकृति नए-नए वस्त्र धारण करके, नूतन श्रृंगार करके एक दूल्हन की भाँति सजधज कर आती है। भाँति-भाँति के सुगंधित पुष्पों पर भौरे गूंजने लगते हैं। सरसों के खेतों को देखकर प्रतीत होता है मानो प्रकृति ने पीली चादर ओढ़ ली है। वास्तव में देखा जाए तो वसंत मौज-मस्ती, मादकता तथा सौंदर्य की ऋतु है। इस ऋतु में भ्रमण करने से अजीब आनंद मिलता है। इसी ऋतु में वसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। वसंत ऋतु का प्रारंभ ही वसंत पंचमी से होता है। कहते हैं, इसी दिन ज्ञान की देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। अतः वसंत पंचमी के दिन धूमधाम से सरस्वती देवी की पूजा-अर्चना विद्यार्थी लोग करते हैं।

प्रदूषण

आज के युग को विज्ञान का युग कहा जाता है। आज मनुष्य ने पृथ्वी, आकाश तथा जल पर अपना आधिपत्य जमा लिया है तथा अपनी सुविधाओं के लिए अनेक मशीनों एवं आविष्कारों को जन्म दिया है। जनसंख्या वृद्धि के कारण वनों की कटाई तेजी से हुई है और वहाँ उद्योग-धंधों का विस्तार हुआ है। वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया है। वर्षा, जलवायु तथा भूमि पर इसका दुष्प्रभाव पड़ा है। चिमनियों से निकलने वाले धुएँ बसों-ट्रकों आदि वाहनों से निकलने वाले धुएँ से वातावरण प्रदूषित हो गया है जिससे अनेक प्रकार के रोग हो रहे हैं। धुएँ में जहरीले पदार्थ होते हैं जो साँस के द्वारा हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं। इसी प्रकार मिलों से बेकार हो जाने वाला पदार्थ नदियों में बहा दिया जाता है। इससे पानी प्रदूषित हो जाता है जिससे अनेक प्रकार के रोगों का जन्म होता है। प्रदूषण की समस्या अत्यंत भयंकर समस्या है। वनों की कटाई पर रोक लगाई जानी चाहिए तथा वृक्षारोपण पर बल दिया जाना चाहिए। इससे प्रदूषण कम होता जाएगा क्योंकि वृक्ष दूषित वायु को स्वच्छ वायु में परिवर्तित करते हैं। हम सबका यह कर्तव्य है कि वृक्ष लगाएँ।

आत्म सम्मान

मानव जीवन में आत्मसम्मान या स्वाभिमान का बहुत अधिक महत्त्व है। आत्म सम्मान में अपने व्यक्ति को अधिक-से-अधिक सशक्त एवं प्रतिष्ठित बनाने की भावना निहित होती है। इससे शक्ति, साहस, उत्साह आदि गुणों का जन्म होता है; जो जीवन की उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। आत्मसम्मान की भावना से पूर्ण व्यक्ति संघर्षों की परवाह नहीं करता है और हर विषम परिस्थिति से टक्कर लेता है। आत्मसम्मानी व्यक्ति धर्म, सत्य, न्याय और नीति के पथ का अनुगमन करता है। ऐसे व्यक्ति में राष्ट्र के प्रति सच्ची निष्ठा होती है। चूँकि आत्मसम्मानी व्यक्ति अपनी अथवा दूसरों की आत्मा का हनन करना पसंद नहीं करता, इसलिए वह ईर्ष्या-द्वेष जैसी भावनाओं से मुक्त होकर मानव-मात्र को अपने परिवार का सदस्य मानता है। निश्छल हृदय होने के कारण वह आसुरी वृत्तियों से सर्वथा मुक्त होता है। उसमें ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति, विश्वास एवं निष्ठा होती है, जिससे उसकी आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है। जीवन को सरस और मधुर बनाने के लिए आत्मसम्मान रसायन-तुल्य है।

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