आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः
कथा-सारः
एक बड़े गाँव में एक भिक्षुक (भिखारी) रहता था। यद्यपि वह हृष्ट-पुष्ट युवक था, फिर भी वह भीख माँगता फिरता — “कृपया भिक्षा दीजिए, दरिद्र को दान कीजिए, पुण्य कमाइए।” कुछ लोग उसे धन देते, कुछ डाँट देते।
एक दिन उसी रास्ते से एक धनी व्यक्ति आया। भिक्षुक मन में सोचता है — “आज मेरा भाग्य अच्छा है, आज मुझे बहुत धन मिलेगा।” वह धनिक से भीख माँगता है। धनिक पूछता है — “तुम क्या चाहते हो?” भिक्षुक विनम्रता से कहता है — “मुझे बहुत धन चाहिए।”
धनिक कहता है — “मैं तुम्हें एक हज़ार रुपये देता हूँ, बदले में तुम मुझे अपने दोनों पैर दे दो।” भिक्षुक कहता है — “मैं अपने पैर कैसे दूँ? बिना पैरों के मैं कैसे चलूँगा?” धनिक फिर कहता है — “ठीक है, पाँच हज़ार रुपये लो, मुझे अपने दोनों हाथ दे दो।” भिक्षुक कहता है — “हाथों के बिना मैं भीख कैसे स्वीकारूँगा?” इसी तरह धनिक हज़ारों रुपयों के बदले भिक्षुक के कई अंग खरीदना चाहता है, परन्तु भिक्षुक हर बार मना कर देता है।
तब धनिक कहता है — “देखो मित्र! तुम्हारे पास ही हज़ारों की कीमत की वस्तुएँ (तुम्हारे अंग) हैं। फिर भी तुम स्वयं को कमज़ोर क्यों मानते हो? सौभाग्य से हमें मानव-जन्म मिला है। इसकी सफलता के लिए प्रयत्न करो। यहाँ से जाओ, शुभ हो।”
उस दिन से भिक्षुक ने भीख माँगना छोड़ दिया और परिश्रम से धन कमाकर सम्मानपूर्वक जीवन जीने लगा। इसीलिए सज्जन कहते हैं — “आलस्य ही मनुष्यों का शरीर में बसा सबसे बड़ा शत्रु है।”
मुख्य-श्लोकः — व्याख्या
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः, न अस्ति उद्यमसमः बन्धुः कृत्वा यं न अवसीदति।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः (अस्ति)। उद्यमसमः बन्धुः नास्ति यं कृत्वा न अवसीदति।
आलस्य मनुष्यों के शरीर में स्थित एक बड़ा शत्रु है, क्योंकि आलस्य के कारण कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। इसी तरह परिश्रम के समान कोई मित्र भी नहीं है, क्योंकि परिश्रम करके कोई भी दुःख नहीं पाता।
एकपदेन उत्तराणि यच्छन्तु
प्रश्नानाम् उत्तराणि ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति पदेन लिखन्तु
द्वितीयाविभक्तेः शब्दानां द्विवचने परिवर्तनं कृत्वा वाक्यानि लिखन्तु
चित्रं दृष्ट्वा द्वितीयाविभक्तेः वाक्यानि रचयन्तु
कोष्ठके शब्दानां द्वितीयाविभक्तेः एकवचनरूपेण सह वाक्यानि लिखन्तु
द्वितीयाविभक्तेः एकवचनशब्दानां बहुवचने परिवर्तनं कृत्वा वाक्यानि रचयन्तु
चित्रं दृष्ट्वा द्वितीयाविभक्तेः प्रयोगं कृत्वा दश वाक्यानि रचयन्तु
शब्दार्थाः — Vocabulary Reference
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| दृढकायः | दृढशरीरः | दृढ शरीर वाला | A person with strong body |
| भिक्षाटनम् | भिक्षार्थं भ्रमणम् | भीख के लिए घूमना | Roaming for begging |
| प्रभूतम् | पर्याप्तम्/अधिकम् | ढेर सारा | A lot of |
| अतीव | अत्यधिकम् | बहुत सारा | Excessive |
| मह्यम् | मम कृते | मुझे | For me |
| शरीराङ्गानि | शरीरस्य अङ्गानि | शरीर के अङ्ग | Body parts |
| निराकृतवान् | न स्वीकृतवान् | अस्वीकार किया | Refused |
| दुर्बलम् | बलहीनम् | निर्बल | Weak |
| त्यक्त्वा | त्यागं कृत्वा | त्याग करके | Having left |
| नावसीदति | दुःखितः न भवति | दुःखी नहीं होता है | Doesn’t feel sad |
द्वितीया-विभक्ति सारणी, अभ्यासः, श्लोकौ
१. शब्दरूप-सारणी (सन्दर्भार्थम्)
| (क) अकारान्त-पुंलिङ्गशब्दाः | |||
|---|---|---|---|
| शब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| ग्राम | ग्रामम् | ग्रामौ | ग्रामान् |
| भिक्षुक | भिक्षुकम् | भिक्षुकौ | भिक्षुकान् |
| बालक | बालकम् | बालकौ | बालकान् |
| (ख) आकारान्त-स्त्रीलिङ्गशब्दाः | |||
|---|---|---|---|
| शब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| भिक्षा | भिक्षाम् | भिक्षे | भिक्षाः |
| माला | मालाम् | माले | मालाः |
| बालिका | बालिकाम् | बालिके | बालिकाः |
| तत् | ताम् | ते | ताः |
| (ग) ईकारान्त-स्त्रीलिङ्गशब्दाः | |||
|---|---|---|---|
| शब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| नदी | नदीम् | नद्यौ | नदीः |
| लेखनी | लेखनीम् | लेखन्यौ | लेखनीः |
| भगिनी | भगिनीम् | भगिन्यौ | भगिनीः |
| (घ) अकारान्त-नपुंसकलिङ्गशब्दाः | |||
|---|---|---|---|
| शब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| फल | फलम् | फले | फलानि |
| जल | जलम् | जले | जलानि |
| गृह | गृहम् | गृहे | गृहाणि |
| (ङ) सर्वनामशब्दाः | |||
|---|---|---|---|
| शब्दः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
| अस्मद् | माम् | आवाम् | अस्मान् |
| युष्मद् | त्वाम् | युवाम् | युष्मान् |
| तद् | तम् | तौ | तान् |
| एतद् | एतम् | एतौ | एतान् |
२. उदाहरणानुसारं द्वितीयाविभक्तेः रूपाणि लिखन्तु
३. श्लोकौ
विना कविं कालिदासं भारतं भारतं न हि॥
वेद, गीता, रामायण की कथा, और कवि कालिदास के बिना भारत सच्चे अर्थों में “भारत” नहीं है। अर्थात् भारत का वास्तविक स्वरूप वेद, गीता, रामायण और कालिदास के काव्यों में ही देखा जा सकता है।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जो व्यक्ति सोते समय नित्य राम, स्कन्द (कार्तिकेय), हनुमान, गरुड़ (वैनतेय) और भीम (वृकोदर) का स्मरण करता है, उसका दुःस्वप्न (बुरा सपना) नष्ट हो जाता है।
४. कार्यकलापः — भाषाक्रीडा (सन्दर्भार्थम्)
बच्चों को दो समूहों में बाँटा जाता है। शिक्षक एक शब्द (प्रथमा विभक्ति में) बोलते हैं। पहले समूह का कोई छात्र उसी शब्द का द्वितीया-विभक्ति एकवचन रूप बोलता है, फिर दूसरे समूह का छात्र उसी शब्द का बहुवचन रूप बोलता है। जो समूह सही उत्तर देता है, उसे अंक मिलते हैं। इसी प्रकार द्वितीया-विभक्ति में वाक्य-निर्माण की प्रतियोगिता भी की जा सकती है।
मार्गदर्शनम्
निर्देशाः एवं सहायता
- चित्राधारित १० वाक्यानि: पाठ में दिखाए गए चित्रों (भिक्षुक, धनिक, मार्ग, आदि) के आधार पर द्वितीया विभक्ति का प्रयोग करते हुए दस वाक्य बनाइए — प्रश्न ७ के मॉडल-उत्तर इसमें सहायक हो सकते हैं।
- स्व-दिनचर्या (१० वाक्य, द्वितीया विभक्ति): अपनी दिनचर्या को द्वितीया विभक्ति के प्रयोग से लिखिए। उदाहरण:
१. अहं प्रातः जलं पिबामि।
२. अहं दन्तधावनं करोमि।
३. अहं स्नानं करोमि।
४. अहं प्रातराशं करोमि।
५. अहं विद्यालयं गच्छामि।
६. अहं पाठं पठामि।
७. अहं गृहपाठं लिखामि।
८. अहं क्रीडाङ्गणं गच्छामि।
९. अहं भोजनं करोमि।
१०. अहं निद्रां करोमि। - अरुणिमा सिन्हा — निबन्धः: अरुणिमा सिन्हा एक भारतीय पर्वतारोही हैं, जो एक दुर्घटना में अपना एक पैर खो देने के बाद भी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला दिव्यांग (amputee) पर्वतारोही बनीं। उनके साहस और दृढ़-संकल्प के विषय में जानकारी एकत्र करके अपनी भाषा में दस वाक्यों का निबन्ध लिखिए — यह विषय भी इसी पाठ के “परिश्रम व दृढ़-संकल्प” के भाव से जुड़ा है।
