अध्याय 5 – रहीम के दोहे (दोहा) [Chapter 5 – Rahim Ke Dohe (Doha)] | Class 6 Hindi (Malhar) | NCERT Solutions

रहीम के दोहे — कक्षा 6 हिंदी (मल्हार) पाठ 5 | प्रश्न-उत्तर
कक्षा 6 · हिंदी · मल्हार · पाठ 5

रहीम के दोहे

— अब्दुर्रहीम खानखाना  |  संदर्भ: रहीम ग्रंथावली (सं.) विद्यानिवास मिश्र

सभी प्रश्नों के उत्तर दोहों का सरल अर्थ शब्दार्थ सहित NCERT आधारित
पाठ की कविता

दोहे एवं उनका सरल अर्थ

कवि
कवि से परिचय — अब्दुर्रहीम खानखाना
कवि रहीम का चित्र
परिचय

रहीम भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवि थे। माना जाता है कि उनका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था और मृत्यु 17वीं शताब्दी में हुई। उन्होंने नीति, भक्ति और प्रेम संबंधी रचनाएँ कीं।

उन्होंने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में कविताएँ लिखीं। वे रामायण, महाभारत आदि प्रसिद्ध ग्रंथों के अच्छे जानकार थे। आज भी आम जन-जीवन में उनके दोहे बहुत लोकप्रिय हैं।

1
पहला दोहा — छोटी वस्तु का महत्व
दोहा 1 — रहिमन देखि बड़ेन को
भावार्थ

रहीम कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु को त्याग नहीं देना चाहिए। जहाँ सुई का काम पड़ता है, वहाँ तलवार कुछ भी नहीं कर सकती। अर्थात् हर छोटी-बड़ी वस्तु का अपना-अपना महत्व और उपयोग होता है।

बड़ेन = बड़ों कोलघु = छोटाडारि = फेंकना/त्यागनाकहा = क्या
2
दूसरा दोहा — परोपकार
दोहा 2 — तरुवर फल नहिं खात हैं
भावार्थ

वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और सरोवर अपना जल स्वयं नहीं पीते। इसी प्रकार सज्जन व्यक्ति दूसरों की भलाई के लिए ही धन-संपत्ति एकत्र करते हैं।

तरुवर = वृक्षसरवर = सरोवर, तालाबपान = पानीपर काज = परोपकारसँचहि = संचय करते हैंसुजान = सज्जन
3
तीसरा दोहा — प्रेम का धागा
दोहा 3 — रहिमन धागा प्रेम का
भावार्थ

प्रेम रूपी धागे को झटके से तोड़ना नहीं चाहिए। एक बार टूट जाने पर वह फिर सहज ही नहीं जुड़ता; और यदि जुड़ भी जाए तो उसमें गाँठ पड़ जाती है — अर्थात् मन में खटास और दूरी बनी रहती है।

छिटकाय = झटके सेपरि जाय = पड़ जाती है
4
चौथा दोहा — पानी अर्थात् सम्मान
दोहा 4 — रहिमन पानी राखिये
भावार्थ

रहीम कहते हैं कि पानी की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि पानी के बिना सब सूना है। यहाँ ‘पानी’ के तीन अर्थ हैं और तीनों उदाहरणों पर लागू होते हैं — मोती की चमक, मनुष्य का सम्मान और चून (आटे/चूने) के लिए जल। इनके बिना तीनों बेकार हो जाते हैं।

‘पानी’ के तीन अर्थ
🦪मोतीपानी = चमक। चमक गई तो मोती बेकार।
🧍मानुषपानी = सम्मान/इज़्ज़त। सम्मान गया तो मनुष्य बेकार।
💧चूनपानी = जल। जल के बिना आटा/चूना बेकार।
5
पाँचवाँ दोहा — विपत्ति की परख
दोहा 5 — रहिमन बिपदाहू भली
भावार्थ

थोड़े दिनों की विपत्ति भी अच्छी है, क्योंकि उसी समय यह पता चल जाता है कि इस संसार में कौन हमारा हितैषी है और कौन अहितैषी

बिपदा = विपत्तिथोरे = थोड़ेहित-अनहित = भला-बुरा चाहने वालेजानि परत = जान पड़ता है
6
छठा दोहा — जीभ और सिर
दोहा 6 — रहिमन जिह्वा बावरी
भावार्थ

बावली जीभ स्वर्ग से पाताल तक की बातें कह जाती है और स्वयं मुँह के भीतर छिपकर बैठ जाती है। उसके कहे का दंड बेचारे सिर को जूते खाकर भुगतना पड़ता है। इसलिए सदा सोच-समझकर बोलना चाहिए।

जिह्वा = जीभबावरी = पगलीसरग = स्वर्गआपु = स्वयंकपाल = सिर, माथा
7
सातवाँ दोहा — सच्चा मित्र
दोहा 7 — कहि रहीम संपति सगे
भावार्थ

धन-संपत्ति के समय अनेक लोग तरह-तरह से सगे-संबंधी बन जाते हैं। परंतु जो विपत्ति की कसौटी पर खरे उतरते हैं, वही सच्चे मित्र होते हैं।

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संपति = संपत्तिसगे = अपनेकसौटी = परखसाँचे = सच्चेमीत = मित्र
INTEXT QUESTIONS

पाठ से

मेरी समझ से

क1
“रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।” — दोहे का भाव है—
दोहा — रहिमन जिह्वा बावरी
  • सोच-समझकर बोलना चाहिए।✔ सही
  • मधुर वाणी में बोलना चाहिए।
  • धीरे-धीरे बोलना चाहिए।
  • सदा सच बोलना चाहिए।
उत्तर

सही विकल्प — सोच-समझकर बोलना चाहिए।

दोहे में जीभ को ‘बावरी’ अर्थात् पगली कहा गया है, क्योंकि वह बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती है और स्वयं मुँह के भीतर छिप जाती है। उसके बिना सोचे कहे शब्दों का दंड सिर को भुगतना पड़ता है।

इसीलिए दोहे का मूल संदेश यह है कि बोलने से पहले सोचना ज़रूरी है, अन्यथा बिना विचारे कही गई बात अपमान और परेशानी का कारण बन जाती है।

अन्य विकल्प क्यों नहीं? मधुर वाणी, धीरे बोलना और सच बोलना — ये तीनों अच्छी बातें हैं, पर इस दोहे में इनका कोई संकेत नहीं है। यहाँ पूरा ज़ोर ‘बिना सोचे बोलने के परिणाम’ पर है।
क2
“रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि। जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि।” — इस दोहे का भाव क्या है?
दोहा — रहिमन देखि बड़ेन को
  • तलवार सुई से बड़ी होती है।
  • सुई का काम तलवार नहीं कर सकती।
  • तलवार का महत्व सुई से ज्यादा है।
  • हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।✔ सही
उत्तर

सही विकल्प — हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।

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रहीम सुई और तलवार का उदाहरण देकर यह समझाते हैं कि आकार से किसी का महत्व तय नहीं होता। सुई छोटी है, फिर भी कपड़े सिलने का काम केवल वही कर सकती है; बड़ी और शक्तिशाली तलवार वहाँ बिलकुल बेकार है।

इसलिए दोहे का सबसे सटीक भाव यही है कि प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति की अपनी-अपनी उपयोगिता होती है, और किसी को छोटा समझकर त्यागना नहीं चाहिए।

ध्यान दें — “सुई का काम तलवार नहीं कर सकती” वाक्य सही तो है, पर वह केवल एक उदाहरण है। दोहे का भाव (संदेश) उससे बड़ा है, इसलिए अंतिम विकल्प सबसे सटीक है।
अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने यही उत्तर क्यों चुने?
उत्तर (नमूना)

पहले प्रश्न के लिए — मैंने “सोच-समझकर बोलना चाहिए” इसलिए चुना, क्योंकि दोहे में जीभ को ‘बावरी’ कहा गया है। बावरी अर्थात् वह बिना सोचे बोल देती है। यदि दोहे का संदेश मीठा या धीरे बोलना होता, तो कवि जीभ को पगली न कहते और सिर के दंड की बात न करते।

दूसरे प्रश्न के लिए — मैंने “हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है” इसलिए चुना, क्योंकि दोहे की पहली पंक्ति ही कहती है कि बड़े को देखकर छोटे को मत त्यागो। सुई-तलवार तो केवल उदाहरण है; असली संदेश सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता को पहचानना है।

चर्चा के लिए संकेत — कक्षा में अपने उदाहरण जोड़िए, जैसे — पेंसिल की नोक, चाबी, बटन, चींटी, दियासलाई की तीली। ये सब छोटे हैं, पर इनके बिना बड़े-बड़े काम रुक जाते हैं।

मिलकर करें मिलान

Q
पाठ में से कुछ दोहे स्तंभ 1 में और उनके भाव स्तंभ 2 में दिए गए हैं। रेखा खींचकर सही भाव से मिलान कीजिए।
मिलान तालिका — स्तंभ 1 और स्तंभ 2
पाठ में दी गई मूल मिलान तालिका
सही मिलान
स्तंभ 1 · (1)रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय। टूटे से फिर ना मिले, मिले गाँठ परि जाय।।
स्तंभ 2 · (3)प्रेम या रिश्तों को सहेजकर रखना चाहिए।
स्तंभ 1 · (2)कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत। बिपति कसौटी जे कसे, ते ही साँचे मीत।।
स्तंभ 2 · (2)सच्चे मित्र विपत्ति या विपदा में भी साथ रहते हैं।
स्तंभ 1 · (3)तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।
स्तंभ 2 · (1)सज्जन परहित के लिए ही संपत्ति संचित करते हैं।
उत्तर सारणी
स्तंभ 1स्तंभ 2कारण
13टूटा धागा जुड़ने पर भी गाँठ छोड़ देता है — इसलिए रिश्ते सहेजकर रखने चाहिए।
22विपत्ति ही मित्रता की कसौटी है — जो साथ रहे वही सच्चा मित्र।
31पेड़ और सरोवर की तरह सज्जन भी अपना संचय दूसरों के हित में लगाते हैं।

पंक्तियों पर चर्चा

निम्न दोहे का अर्थ या भावार्थ अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए—
दोहा — रहिमन बिपदाहू भली
“रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।।”
भावार्थ

शब्दार्थ — बिपदा = विपत्ति, मुसीबत; थोरे = थोड़े; हित = भला चाहने वाला; अनहित = बुरा चाहने वाला; जानि परत = जान पड़ जाता है; कोय = कोई।

सरल अर्थ — रहीम कहते हैं कि यदि विपत्ति थोड़े दिनों के लिए आए तो वह भी अच्छी ही है। कारण यह कि विपत्ति के समय ही यह पता चलता है कि इस संसार में कौन हमारा सच्चा हितैषी है और कौन केवल दिखावे का।

विस्तार से — सुख के दिनों में सभी मीठा बोलते हैं और साथ खड़े दिखते हैं। पर जैसे ही कठिनाई आती है, अधिकांश लोग किनारा कर लेते हैं और कुछ ही लोग साथ निभाते हैं। इस प्रकार विपत्ति एक परीक्षा या कसौटी का काम करती है, जो हमें अपने सच्चे और झूठे संबंधों की पहचान करा देती है।

संदेश — विपत्ति से घबराना नहीं चाहिए। वह हमें अनुभव देती है, मज़बूत बनाती है और लोगों को पहचानना सिखाती है। हाँ, कवि ने “थोरे दिन” कहा है — अर्थात् थोड़े समय की विपत्ति ही लाभदायक है, लंबी विपत्ति नहीं।

निम्न दोहे का अर्थ या भावार्थ अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए—
दोहा — रहिमन जिह्वा बावरी
“रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।।”
भावार्थ

शब्दार्थ — जिह्वा = जीभ; बावरी = पगली, बावली; सरग = स्वर्ग; पताल = पाताल; आपु = स्वयं; भीतर = मुँह के अंदर; जूती खात = जूते खाना (दंड पाना); कपाल = सिर, माथा।

सरल अर्थ — रहीम कहते हैं कि यह जीभ बड़ी बावली है। यह स्वर्ग से लेकर पाताल तक की — अर्थात् बड़ी-बड़ी और उल्टी-सीधी — सब बातें कह जाती है। कहकर स्वयं तो मुँह के भीतर छिपकर बैठ जाती है, पर उसके कहे का दंड बेचारे सिर को जूते खाकर भुगतना पड़ता है।

विस्तार से — यहाँ जीभ और सिर के बीच एक सुंदर मानवीकरण है। जीभ बोलने का काम करती है, इसलिए ग़लती उसकी है; पर सज़ा शरीर के दूसरे अंग को मिलती है। इसी प्रकार जीवन में भी बिना सोचे कही गई एक बात अपमान, झगड़े और पछतावे का कारण बन जाती है। बोला हुआ शब्द वापस नहीं लिया जा सकता।

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संदेश — बोलने से पहले तौलना चाहिए। वाणी पर संयम रखना, नपे-तुले और विनम्र शब्द बोलना ही बुद्धिमानी है।

सोच-विचार के लिए

1क
इस दोहे में ‘मिले’ के स्थान पर ‘जुड़े’ और ‘छिटकाय’ के स्थान पर ‘चटकाय’ भी प्रचलित है। इसी प्रकार ‘डारि’ के स्थान पर ‘डार’, ‘तलवारि’ के स्थान पर ‘तरवार’ और ‘मानुष’ के स्थान पर ‘मानस’ का प्रयोग भी होता है। ऐसा क्यों होता है?
दोहा — रहिमन धागा प्रेम का
प्रचलित रूप —
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।”
उत्तर

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि रहीम के दोहे मुख्य रूप से पुस्तकों से नहीं, बोलचाल से लोगों तक पहुँचे हैं। इसके प्रमुख कारण ये हैं—

  • मौखिक (श्रुति) परंपरा — दोहे सुनकर याद किए जाते रहे और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बोलकर पहुँचे। सुनने-सुनाने में शब्द थोड़े-थोड़े बदलते चले गए।
  • क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव — हर क्षेत्र की अपनी बोली और उच्चारण है। ब्रज, अवधी, बुंदेली, भोजपुरी आदि में एक ही शब्द अलग-अलग रूप ले लेता है — जैसे तलवारि/तरवार, मानुष/मानस।
  • उच्चारण की सरलता — लोग कठिन शब्द को सरल और सुविधाजनक रूप में बोलते हैं, जैसे ‘छिटकाय’ की जगह ‘चटकाय’।
  • लय और तुक की सुविधा — गाते या दोहराते समय जो रूप लय में अधिक सुंदर बैठता है, वही चल पड़ता है, जैसे ‘मिले-मिले’ की जगह ‘जुड़े-जुड़े’।
  • अर्थ में कोई अंतर नहीं — रूप बदलने पर भी भाव वही रहता है, इसलिए लोगों ने दोनों रूपों को अपना लिया।
निष्कर्ष — लोक में रहने वाली रचना नदी की तरह होती है — बहते-बहते उसका रूप थोड़ा बदल जाता है, पर उसकी धारा (भाव) वही रहती है। इसी को पाठभेद कहते हैं।
1ख
इस दोहे में प्रेम के उदाहरण में धागे का प्रयोग ही क्यों किया गया है? क्या आप धागे के स्थान पर कोई अन्य उदाहरण सुझा सकते हैं? अपने सुझाव का कारण भी बताइए।
उत्तर

धागे का प्रयोग क्यों — धागा प्रेम के लिए सबसे सटीक उदाहरण है, क्योंकि—

  • धागा दो अलग-अलग चीज़ों को जोड़ता है, ठीक जैसे प्रेम दो हृदयों को जोड़ता है।
  • धागा दिखने में पतला और कोमल होता है, पर उसकी पकड़ मज़बूत होती है — प्रेम भी ऐसा ही नाज़ुक और मज़बूत होता है।
  • ज़रा-सा झटका लगते ही धागा टूट जाता है — प्रेम भी छोटी-सी कठोर बात से टूट जाता है।
  • सबसे बड़ी बात — टूटा धागा जोड़ने पर गाँठ छोड़ जाता है। इसी तरह बिगड़ा रिश्ता सुधरने पर भी मन में एक गाँठ रह जाती है।
  • धागा घर-घर में मिलने वाली साधारण वस्तु है, इसलिए हर व्यक्ति इस उदाहरण को तुरंत समझ लेता है।

अन्य संभव उदाहरण (कारण सहित) —

धागे के विकल्प
🪞काँच / दर्पणएक बार चटक जाने पर दरार सदा दिखती रहती है — जैसे टूटे रिश्ते की याद।
🏺मिट्टी का घड़ाजुड़ भी जाए तो जोड़ का निशान और रिसाव बना रहता है।
🌿पौधे की डालीटूटी डाली फिर से पहले जैसी नहीं जुड़ती, वहीं गाँठ बन जाती है।
🥛दूधएक बार फट जाए तो दोबारा दूध नहीं बनता — प्रेम में आया बिगाड़ भी वैसा ही है।
ध्यान दें — कोई भी उदाहरण चुनते समय यह देखिए कि उसमें दो बातें हों — (1) वह जोड़ने वाला या कोमल हो, और (2) टूटने पर उसका निशान बाक़ी रह जाए। तभी वह ‘गाँठ’ वाले भाव को पूरा कर पाएगा।
2
“तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान। कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान।।” — इस दोहे में प्रकृति के माध्यम से मनुष्य के किस मानवीय गुण की बात की गई है? प्रकृति से हम और क्या-क्या सीख सकते हैं?
दोहा — तरुवर फल नहिं खात हैं
उत्तर

मानवीय गुण — इस दोहे में परोपकार (दूसरों की भलाई करने) के गुण की बात की गई है। इसके साथ ही त्याग, उदारता और निःस्वार्थ भाव की सीख भी इसमें छिपी है।

वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाता और सरोवर अपना जल स्वयं नहीं पीता — दोनों अपनी संपत्ति दूसरों के लिए रखते हैं। रहीम कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति भी इसी तरह अपना धन अपने भोग के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने के लिए संचित करता है।

प्रकृति से अन्य सीखें —

प्रकृति के शिक्षक
🌳वृक्षपत्थर मारने वाले को भी फल देता है — क्षमा और उदारता।
🌊नदीबिना रुके बहती है और सबकी प्यास बुझाती है — निरंतर परिश्रम और सेवा।
☀️सूर्यप्रतिदिन समय पर उगता है — अनुशासन और नियमितता।
🌸फूलकाँटों के बीच रहकर भी महकता है — कठिनाई में भी प्रसन्न रहना।
🐝मधुमक्खीमिल-जुलकर काम करती है — सहयोग और परिश्रम।
🐜चींटीबार-बार गिरकर भी चढ़ती है — धैर्य और लगन।
🌍धरतीसब कुछ सहकर भी पालती है — सहनशीलता।
☁️बादलदूर से जल लाकर बरसते हैं — निःस्वार्थ दान।

शब्दों की बात

1
शब्द-संपदा — कविता में आए इन शब्दों को आपकी मातृभाषा में क्या कहते हैं? लिखिए।
शब्द-संपदा तालिका
पाठ में दी गई मूल तालिका
उत्तर

नीचे मानक हिंदी में समानार्थक शब्द दिए गए हैं। आप अपनी मातृभाषा (जैसे बुंदेली, मराठी, बांग्ला, तमिल आदि) के शब्द भी इसी प्रकार लिखिए।

कविता में आए शब्दहिंदी में समानार्थक शब्द
तरुवरपेड़, वृक्ष, तरु, दरख़्त
बिपतिविपत्ति, मुसीबत, संकट, आफ़त
छिटकायझटककर, झटके से, एकाएक खींचकर
सुजानसज्जन, समझदार, ज्ञानी, भला व्यक्ति
सरवरसरोवर, तालाब, ताल, पोखर
साँचेसच्चे, खरे, वास्तविक
कपालसिर, माथा, खोपड़ी, मस्तक
करके देखिए — इन्हीं शब्दों को अपने घर की भाषा में पूछिए। जैसे बुंदेली में तालाब को ‘ताल’, मराठी में पेड़ को ‘झाड’ और बांग्ला में ‘गाछ’ कहते हैं।
2
शब्द एक अर्थ अनेक — “रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।” इस दोहे में ‘पानी’ के तीन अर्थ हैं। इसी प्रकार नीचे दिए शब्दों के तीन-तीन अर्थ लिखिए।
शब्द एक अर्थ अनेक — कल, पत्र, कर, फल
उत्तर

पानी के तीन अर्थ — सम्मान (मनुष्य के लिए), जल (चून के लिए), चमक (मोती के लिए)।

शब्दअर्थ 1अर्थ 2अर्थ 3
कलबीता हुआ / आने वाला दिनमशीन, यंत्र (कल-पुर्ज़े)चैन, आराम (कल न पड़ना)
पत्रचिट्ठी, ख़तपत्ता (वृक्ष का)पन्ना, काग़ज़ (समाचार-पत्र)
करहाथटैक्स, राजस्वकिरण (सूर्य के कर)
फलवृक्ष का फल (आम, सेब)परिणाम, नतीजालाभ, प्राप्ति / चाकू का फल
अतिरिक्त उदाहरण — ‘हार’ — पराजय, माला, थकना। ‘सोना’ — स्वर्ण, नींद लेना, बहुत सुंदर। ‘नग’ — रत्न, पर्वत, वस्तु की गिनती।
EXERCISE QUESTIONS

पाठ से आगे

आपकी बात

Q
अपने मनपसंद दोहे को इस तरह की शैली में अपने शब्दों में लिखिए। दोहा पाठ से या पाठ से बाहर का हो सकता है।
दोहा — रहिमन देखि बड़ेन को
पाठ में दिया गया नमूना

“रहिमन देखि बड़ेन को…” दोहे का भाव — न कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा। सबके अपने-अपने काम हैं, सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता और महत्ता है। चाहे हाथी हो या चींटी, तलवार हो या सुई — सबका अपना आकार-प्रकार है। सिलाई का काम सुई से ही होता है, तलवार से नहीं। सुई जोड़ने का काम करती है, तलवार काटने का। कोई वस्तु हो या व्यक्ति, छोटा हो या बड़ा — सबका सम्मान करना चाहिए।

उत्तर — नमूना 1
“रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।”

इस दोहे का भाव है — जीवन में सबसे बड़ी पूँजी ‘पानी’ है। यहाँ पानी का अर्थ केवल जल नहीं है। मोती के लिए पानी उसकी चमक है, मनुष्य के लिए पानी उसका सम्मान है और चून यानी आटे के लिए पानी सचमुच का जल है। जिस मोती की चमक चली जाए, वह केवल पत्थर का दाना रह जाता है। जिस मनुष्य का सम्मान चला जाए, उसे कोई पूछता नहीं। और जल के बिना आटा गूँधा ही नहीं जा सकता। इसलिए हमें अपने व्यवहार, वाणी और कर्मों से अपना सम्मान बनाए रखना चाहिए, क्योंकि सम्मान एक बार चला जाए तो लौटाना बहुत कठिन होता है।

उत्तर — नमूना 2 (पाठ से बाहर)
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।” — कबीर

इस दोहे का भाव है — केवल आकार में बड़ा हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर उसकी छाया इतनी कम होती है कि थका हुआ राही उसके नीचे विश्राम नहीं कर पाता, और उसके फल इतने ऊपर लगते हैं कि आसानी से किसी के हाथ नहीं आते। इसी प्रकार जो व्यक्ति पद, धन या शरीर से बड़ा हो, पर किसी के काम न आए, उसकी बड़ाई व्यर्थ है। सच्ची बड़ाई तो दूसरों के काम आने में है।

आप ऐसे लिखिए — (1) पहले दोहा लिखिए, (2) फिर कठिन शब्दों के अर्थ, (3) फिर दोहे का सरल भाव अपने शब्दों में, (4) अंत में जीवन से जुड़ा एक उदाहरण।

सरगम

1
दोहों की रिकॉर्डिंग (ऑडियो या विजुअल) कीजिए। इन्हें दोस्तों के साथ समूह में या अकेले गा सकते हैं। रिकॉर्डिंग के बाद दोहे स्वयं भी सुनें और लोगों को भी सुनाएँ।
उत्तर (क्रियाकलाप)

यह करके सीखने वाली गतिविधि है। इसे इस तरह कीजिए—

  1. पहले दोहे को कई बार पढ़कर कंठस्थ कीजिए और उसका अर्थ समझ लीजिए।
  2. दोहे की लय पकड़िए — दोहे की हर पंक्ति दो भागों में गाई जाती है, बीच में हल्का ठहराव आता है।
  3. शांत जगह चुनिए, ताकि आवाज़ साफ़ रिकॉर्ड हो। सामान्य मोबाइल से रिकॉर्डिंग हो सकती है।
  4. चाहें तो ढोलक, मंजीरा, तबला या हारमोनियम के साथ गाइए। समूह में गाने पर आनंद और बढ़ जाएगा।
  5. रिकॉर्डिंग सुनिए — जहाँ उच्चारण या लय में कमी लगे, उसे सुधारकर दोबारा रिकॉर्ड कीजिए।
  6. तैयार रिकॉर्डिंग कक्षा में, घर पर और विद्यालय की सभा में सुनाइए।
2
दोहे आज भी जनजीवन में लोकप्रिय हैं। इन दोहों को एकत्र कीजिए और अंत्याक्षरी खेलिए।
उत्तर (क्रियाकलाप)

समूह बनाकर पुस्तकालय, इंटरनेट, शिक्षकों और अभिभावकों की सहायता से दोहे इकट्ठे कीजिए और एक ‘दोहा-पुस्तिका’ बनाइए। फिर अंत्याक्षरी में एक दल जिस अक्षर पर दोहा समाप्त करे, दूसरा दल उसी अक्षर से नया दोहा शुरू करे।

अंत्याक्षरी के लिए कुछ दोहे —

  • रहीम — “रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय। सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।।”
  • कबीर — “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय।।”
  • तुलसीदास — “तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। वशीकरण इक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।।”
  • वृंद — “करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।।”
  • बिहारी — “कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सौं बात।।”

आज की पहेली

Q
नीचे दी गई दोनों पहेलियों को बूझिए।
आज की पहेली — पाठ से
उत्तर
पहेलियों के उत्तर
पहेली 1
चना

“दो अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ खाने के काम। उल्टा होकर नाच दिखाऊँ…”

पहेली 2
माचिस

“एक किले के दो ही द्वार, उनमें सैनिक लकड़ीदार…”

पहेली 1 की व्याख्या — ‘चना’ दो अक्षरों (च + ना) का शब्द है और यह खाने के काम आता है। इसे उल्टा पढ़ने पर ‘नाच’ बन जाता है — इसीलिए कहा गया है कि “उल्टा होकर नाच दिखाऊँ”।

पहेली 2 की व्याख्या — माचिस की डिब्बी एक किले जैसी है, जिसके दो ही द्वार (दोनों खुले सिरे) होते हैं। भीतर भरी लकड़ी की तीलियाँ उसके सैनिक हैं। जब तीली डिब्बी की खुरदरी दीवार से रगड़ी जाती है, तब आग जल उठती है — इसी को “जल उठे सारा संसार” कहा गया है। इसे दियासलाई भी कहते हैं।

खोजबीन के लिए

Q
रहीम के कुछ अन्य दोहे पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता से पढ़ें, देखें व समझें।
उत्तर — रहीम के कुछ प्रसिद्ध दोहे व उनके अर्थ

1. “रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि…” — पहले ही पढ़ चुके हैं।

“रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।।”

अर्थ — अपने मन की व्यथा मन में ही छिपाकर रखनी चाहिए। सुनकर लोग केवल मज़ाक उड़ाएँगे; दुख बाँटने कोई नहीं आएगा।

“रूठे सुजन मनाइए, जो रूठे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार।।”

अर्थ — यदि कोई अपना सौ बार भी रूठे तो हर बार उसे मना लेना चाहिए, जैसे मोतियों का हार टूटने पर हम उसे बार-बार पिरो लेते हैं।

“रहिमन विपदा हूँ भली, जो थोरे दिन होय…”

अर्थ — थोड़े दिन की विपत्ति भी अच्छी है, क्योंकि उसमें अपने-पराए की पहचान हो जाती है।

“जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय।।”

अर्थ — छोटे मन का व्यक्ति ऊँचा पद पाकर इतराने लगता है, जैसे शतरंज का प्यादा वज़ीर बनते ही टेढ़ी चाल चलने लगता है।

“बड़े बड़ाई ना करें, बड़ो न बोलें बोल।
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरो मोल।।”

अर्थ — सचमुच बड़े लोग अपनी बड़ाई स्वयं नहीं करते। हीरा कभी यह नहीं कहता कि मेरा मोल लाख टका है — उसका मूल्य लोग स्वयं जानते हैं।

खोज कैसे करें — ‘रहीम ग्रंथावली’, ‘रहीम के दोहे’ जैसी पुस्तकें पुस्तकालय से लीजिए; कक्षा में हर विद्यार्थी एक दोहा लाकर उसका अर्थ सुनाए और सबके दोहों का एक चार्ट बनाइए।

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