रहीम के दोहे
— अब्दुर्रहीम खानखाना | संदर्भ: रहीम ग्रंथावली (सं.) विद्यानिवास मिश्र
दोहे एवं उनका सरल अर्थ
रहीम भक्तिकाल के प्रसिद्ध कवि थे। माना जाता है कि उनका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था और मृत्यु 17वीं शताब्दी में हुई। उन्होंने नीति, भक्ति और प्रेम संबंधी रचनाएँ कीं।
उन्होंने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में कविताएँ लिखीं। वे रामायण, महाभारत आदि प्रसिद्ध ग्रंथों के अच्छे जानकार थे। आज भी आम जन-जीवन में उनके दोहे बहुत लोकप्रिय हैं।
रहीम कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देखकर छोटी वस्तु को त्याग नहीं देना चाहिए। जहाँ सुई का काम पड़ता है, वहाँ तलवार कुछ भी नहीं कर सकती। अर्थात् हर छोटी-बड़ी वस्तु का अपना-अपना महत्व और उपयोग होता है।
वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और सरोवर अपना जल स्वयं नहीं पीते। इसी प्रकार सज्जन व्यक्ति दूसरों की भलाई के लिए ही धन-संपत्ति एकत्र करते हैं।
प्रेम रूपी धागे को झटके से तोड़ना नहीं चाहिए। एक बार टूट जाने पर वह फिर सहज ही नहीं जुड़ता; और यदि जुड़ भी जाए तो उसमें गाँठ पड़ जाती है — अर्थात् मन में खटास और दूरी बनी रहती है।
रहीम कहते हैं कि पानी की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि पानी के बिना सब सूना है। यहाँ ‘पानी’ के तीन अर्थ हैं और तीनों उदाहरणों पर लागू होते हैं — मोती की चमक, मनुष्य का सम्मान और चून (आटे/चूने) के लिए जल। इनके बिना तीनों बेकार हो जाते हैं।
थोड़े दिनों की विपत्ति भी अच्छी है, क्योंकि उसी समय यह पता चल जाता है कि इस संसार में कौन हमारा हितैषी है और कौन अहितैषी।
बावली जीभ स्वर्ग से पाताल तक की बातें कह जाती है और स्वयं मुँह के भीतर छिपकर बैठ जाती है। उसके कहे का दंड बेचारे सिर को जूते खाकर भुगतना पड़ता है। इसलिए सदा सोच-समझकर बोलना चाहिए।
धन-संपत्ति के समय अनेक लोग तरह-तरह से सगे-संबंधी बन जाते हैं। परंतु जो विपत्ति की कसौटी पर खरे उतरते हैं, वही सच्चे मित्र होते हैं।
पाठ से
मेरी समझ से
- ★सोच-समझकर बोलना चाहिए।✔ सही
- ▪मधुर वाणी में बोलना चाहिए।
- ▪धीरे-धीरे बोलना चाहिए।
- ▪सदा सच बोलना चाहिए।
सही विकल्प — सोच-समझकर बोलना चाहिए।
दोहे में जीभ को ‘बावरी’ अर्थात् पगली कहा गया है, क्योंकि वह बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देती है और स्वयं मुँह के भीतर छिप जाती है। उसके बिना सोचे कहे शब्दों का दंड सिर को भुगतना पड़ता है।
इसीलिए दोहे का मूल संदेश यह है कि बोलने से पहले सोचना ज़रूरी है, अन्यथा बिना विचारे कही गई बात अपमान और परेशानी का कारण बन जाती है।
- ▪तलवार सुई से बड़ी होती है।
- ▪सुई का काम तलवार नहीं कर सकती।
- ▪तलवार का महत्व सुई से ज्यादा है।
- ★हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।✔ सही
सही विकल्प — हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है।
रहीम सुई और तलवार का उदाहरण देकर यह समझाते हैं कि आकार से किसी का महत्व तय नहीं होता। सुई छोटी है, फिर भी कपड़े सिलने का काम केवल वही कर सकती है; बड़ी और शक्तिशाली तलवार वहाँ बिलकुल बेकार है।
इसलिए दोहे का सबसे सटीक भाव यही है कि प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति की अपनी-अपनी उपयोगिता होती है, और किसी को छोटा समझकर त्यागना नहीं चाहिए।
पहले प्रश्न के लिए — मैंने “सोच-समझकर बोलना चाहिए” इसलिए चुना, क्योंकि दोहे में जीभ को ‘बावरी’ कहा गया है। बावरी अर्थात् वह बिना सोचे बोल देती है। यदि दोहे का संदेश मीठा या धीरे बोलना होता, तो कवि जीभ को पगली न कहते और सिर के दंड की बात न करते।
दूसरे प्रश्न के लिए — मैंने “हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्व होता है” इसलिए चुना, क्योंकि दोहे की पहली पंक्ति ही कहती है कि बड़े को देखकर छोटे को मत त्यागो। सुई-तलवार तो केवल उदाहरण है; असली संदेश सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता को पहचानना है।
मिलकर करें मिलान
| स्तंभ 1 | स्तंभ 2 | कारण |
|---|---|---|
| 1 | 3 | टूटा धागा जुड़ने पर भी गाँठ छोड़ देता है — इसलिए रिश्ते सहेजकर रखने चाहिए। |
| 2 | 2 | विपत्ति ही मित्रता की कसौटी है — जो साथ रहे वही सच्चा मित्र। |
| 3 | 1 | पेड़ और सरोवर की तरह सज्जन भी अपना संचय दूसरों के हित में लगाते हैं। |
पंक्तियों पर चर्चा
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय।।”
शब्दार्थ — बिपदा = विपत्ति, मुसीबत; थोरे = थोड़े; हित = भला चाहने वाला; अनहित = बुरा चाहने वाला; जानि परत = जान पड़ जाता है; कोय = कोई।
सरल अर्थ — रहीम कहते हैं कि यदि विपत्ति थोड़े दिनों के लिए आए तो वह भी अच्छी ही है। कारण यह कि विपत्ति के समय ही यह पता चलता है कि इस संसार में कौन हमारा सच्चा हितैषी है और कौन केवल दिखावे का।
विस्तार से — सुख के दिनों में सभी मीठा बोलते हैं और साथ खड़े दिखते हैं। पर जैसे ही कठिनाई आती है, अधिकांश लोग किनारा कर लेते हैं और कुछ ही लोग साथ निभाते हैं। इस प्रकार विपत्ति एक परीक्षा या कसौटी का काम करती है, जो हमें अपने सच्चे और झूठे संबंधों की पहचान करा देती है।
संदेश — विपत्ति से घबराना नहीं चाहिए। वह हमें अनुभव देती है, मज़बूत बनाती है और लोगों को पहचानना सिखाती है। हाँ, कवि ने “थोरे दिन” कहा है — अर्थात् थोड़े समय की विपत्ति ही लाभदायक है, लंबी विपत्ति नहीं।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल।।”
शब्दार्थ — जिह्वा = जीभ; बावरी = पगली, बावली; सरग = स्वर्ग; पताल = पाताल; आपु = स्वयं; भीतर = मुँह के अंदर; जूती खात = जूते खाना (दंड पाना); कपाल = सिर, माथा।
सरल अर्थ — रहीम कहते हैं कि यह जीभ बड़ी बावली है। यह स्वर्ग से लेकर पाताल तक की — अर्थात् बड़ी-बड़ी और उल्टी-सीधी — सब बातें कह जाती है। कहकर स्वयं तो मुँह के भीतर छिपकर बैठ जाती है, पर उसके कहे का दंड बेचारे सिर को जूते खाकर भुगतना पड़ता है।
विस्तार से — यहाँ जीभ और सिर के बीच एक सुंदर मानवीकरण है। जीभ बोलने का काम करती है, इसलिए ग़लती उसकी है; पर सज़ा शरीर के दूसरे अंग को मिलती है। इसी प्रकार जीवन में भी बिना सोचे कही गई एक बात अपमान, झगड़े और पछतावे का कारण बन जाती है। बोला हुआ शब्द वापस नहीं लिया जा सकता।
संदेश — बोलने से पहले तौलना चाहिए। वाणी पर संयम रखना, नपे-तुले और विनम्र शब्द बोलना ही बुद्धिमानी है।
सोच-विचार के लिए
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।।”
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि रहीम के दोहे मुख्य रूप से पुस्तकों से नहीं, बोलचाल से लोगों तक पहुँचे हैं। इसके प्रमुख कारण ये हैं—
- मौखिक (श्रुति) परंपरा — दोहे सुनकर याद किए जाते रहे और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक बोलकर पहुँचे। सुनने-सुनाने में शब्द थोड़े-थोड़े बदलते चले गए।
- क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव — हर क्षेत्र की अपनी बोली और उच्चारण है। ब्रज, अवधी, बुंदेली, भोजपुरी आदि में एक ही शब्द अलग-अलग रूप ले लेता है — जैसे तलवारि/तरवार, मानुष/मानस।
- उच्चारण की सरलता — लोग कठिन शब्द को सरल और सुविधाजनक रूप में बोलते हैं, जैसे ‘छिटकाय’ की जगह ‘चटकाय’।
- लय और तुक की सुविधा — गाते या दोहराते समय जो रूप लय में अधिक सुंदर बैठता है, वही चल पड़ता है, जैसे ‘मिले-मिले’ की जगह ‘जुड़े-जुड़े’।
- अर्थ में कोई अंतर नहीं — रूप बदलने पर भी भाव वही रहता है, इसलिए लोगों ने दोनों रूपों को अपना लिया।
धागे का प्रयोग क्यों — धागा प्रेम के लिए सबसे सटीक उदाहरण है, क्योंकि—
- धागा दो अलग-अलग चीज़ों को जोड़ता है, ठीक जैसे प्रेम दो हृदयों को जोड़ता है।
- धागा दिखने में पतला और कोमल होता है, पर उसकी पकड़ मज़बूत होती है — प्रेम भी ऐसा ही नाज़ुक और मज़बूत होता है।
- ज़रा-सा झटका लगते ही धागा टूट जाता है — प्रेम भी छोटी-सी कठोर बात से टूट जाता है।
- सबसे बड़ी बात — टूटा धागा जोड़ने पर गाँठ छोड़ जाता है। इसी तरह बिगड़ा रिश्ता सुधरने पर भी मन में एक गाँठ रह जाती है।
- धागा घर-घर में मिलने वाली साधारण वस्तु है, इसलिए हर व्यक्ति इस उदाहरण को तुरंत समझ लेता है।
अन्य संभव उदाहरण (कारण सहित) —
मानवीय गुण — इस दोहे में परोपकार (दूसरों की भलाई करने) के गुण की बात की गई है। इसके साथ ही त्याग, उदारता और निःस्वार्थ भाव की सीख भी इसमें छिपी है।
वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाता और सरोवर अपना जल स्वयं नहीं पीता — दोनों अपनी संपत्ति दूसरों के लिए रखते हैं। रहीम कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति भी इसी तरह अपना धन अपने भोग के लिए नहीं, बल्कि दूसरों के काम आने के लिए संचित करता है।
प्रकृति से अन्य सीखें —
शब्दों की बात
नीचे मानक हिंदी में समानार्थक शब्द दिए गए हैं। आप अपनी मातृभाषा (जैसे बुंदेली, मराठी, बांग्ला, तमिल आदि) के शब्द भी इसी प्रकार लिखिए।
| कविता में आए शब्द | हिंदी में समानार्थक शब्द |
|---|---|
| तरुवर | पेड़, वृक्ष, तरु, दरख़्त |
| बिपति | विपत्ति, मुसीबत, संकट, आफ़त |
| छिटकाय | झटककर, झटके से, एकाएक खींचकर |
| सुजान | सज्जन, समझदार, ज्ञानी, भला व्यक्ति |
| सरवर | सरोवर, तालाब, ताल, पोखर |
| साँचे | सच्चे, खरे, वास्तविक |
| कपाल | सिर, माथा, खोपड़ी, मस्तक |
पानी के तीन अर्थ — सम्मान (मनुष्य के लिए), जल (चून के लिए), चमक (मोती के लिए)।
| शब्द | अर्थ 1 | अर्थ 2 | अर्थ 3 |
|---|---|---|---|
| कल | बीता हुआ / आने वाला दिन | मशीन, यंत्र (कल-पुर्ज़े) | चैन, आराम (कल न पड़ना) |
| पत्र | चिट्ठी, ख़त | पत्ता (वृक्ष का) | पन्ना, काग़ज़ (समाचार-पत्र) |
| कर | हाथ | टैक्स, राजस्व | किरण (सूर्य के कर) |
| फल | वृक्ष का फल (आम, सेब) | परिणाम, नतीजा | लाभ, प्राप्ति / चाकू का फल |
पाठ से आगे
आपकी बात
“रहिमन देखि बड़ेन को…” दोहे का भाव — न कोई बड़ा है और न ही कोई छोटा। सबके अपने-अपने काम हैं, सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता और महत्ता है। चाहे हाथी हो या चींटी, तलवार हो या सुई — सबका अपना आकार-प्रकार है। सिलाई का काम सुई से ही होता है, तलवार से नहीं। सुई जोड़ने का काम करती है, तलवार काटने का। कोई वस्तु हो या व्यक्ति, छोटा हो या बड़ा — सबका सम्मान करना चाहिए।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून।।”
इस दोहे का भाव है — जीवन में सबसे बड़ी पूँजी ‘पानी’ है। यहाँ पानी का अर्थ केवल जल नहीं है। मोती के लिए पानी उसकी चमक है, मनुष्य के लिए पानी उसका सम्मान है और चून यानी आटे के लिए पानी सचमुच का जल है। जिस मोती की चमक चली जाए, वह केवल पत्थर का दाना रह जाता है। जिस मनुष्य का सम्मान चला जाए, उसे कोई पूछता नहीं। और जल के बिना आटा गूँधा ही नहीं जा सकता। इसलिए हमें अपने व्यवहार, वाणी और कर्मों से अपना सम्मान बनाए रखना चाहिए, क्योंकि सम्मान एक बार चला जाए तो लौटाना बहुत कठिन होता है।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।” — कबीर
इस दोहे का भाव है — केवल आकार में बड़ा हो जाना कोई बड़ी बात नहीं है। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर उसकी छाया इतनी कम होती है कि थका हुआ राही उसके नीचे विश्राम नहीं कर पाता, और उसके फल इतने ऊपर लगते हैं कि आसानी से किसी के हाथ नहीं आते। इसी प्रकार जो व्यक्ति पद, धन या शरीर से बड़ा हो, पर किसी के काम न आए, उसकी बड़ाई व्यर्थ है। सच्ची बड़ाई तो दूसरों के काम आने में है।
सरगम
यह करके सीखने वाली गतिविधि है। इसे इस तरह कीजिए—
- पहले दोहे को कई बार पढ़कर कंठस्थ कीजिए और उसका अर्थ समझ लीजिए।
- दोहे की लय पकड़िए — दोहे की हर पंक्ति दो भागों में गाई जाती है, बीच में हल्का ठहराव आता है।
- शांत जगह चुनिए, ताकि आवाज़ साफ़ रिकॉर्ड हो। सामान्य मोबाइल से रिकॉर्डिंग हो सकती है।
- चाहें तो ढोलक, मंजीरा, तबला या हारमोनियम के साथ गाइए। समूह में गाने पर आनंद और बढ़ जाएगा।
- रिकॉर्डिंग सुनिए — जहाँ उच्चारण या लय में कमी लगे, उसे सुधारकर दोबारा रिकॉर्ड कीजिए।
- तैयार रिकॉर्डिंग कक्षा में, घर पर और विद्यालय की सभा में सुनाइए।
समूह बनाकर पुस्तकालय, इंटरनेट, शिक्षकों और अभिभावकों की सहायता से दोहे इकट्ठे कीजिए और एक ‘दोहा-पुस्तिका’ बनाइए। फिर अंत्याक्षरी में एक दल जिस अक्षर पर दोहा समाप्त करे, दूसरा दल उसी अक्षर से नया दोहा शुरू करे।
अंत्याक्षरी के लिए कुछ दोहे —
- रहीम — “रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय। सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।।”
- कबीर — “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपहु शीतल होय।।”
- तुलसीदास — “तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। वशीकरण इक मंत्र है, तज दे वचन कठोर।।”
- वृंद — “करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान।।”
- बिहारी — “कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात। भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सौं बात।।”
आज की पहेली
“दो अक्षर का मेरा नाम, आता हूँ खाने के काम। उल्टा होकर नाच दिखाऊँ…”
“एक किले के दो ही द्वार, उनमें सैनिक लकड़ीदार…”
पहेली 1 की व्याख्या — ‘चना’ दो अक्षरों (च + ना) का शब्द है और यह खाने के काम आता है। इसे उल्टा पढ़ने पर ‘नाच’ बन जाता है — इसीलिए कहा गया है कि “उल्टा होकर नाच दिखाऊँ”।
पहेली 2 की व्याख्या — माचिस की डिब्बी एक किले जैसी है, जिसके दो ही द्वार (दोनों खुले सिरे) होते हैं। भीतर भरी लकड़ी की तीलियाँ उसके सैनिक हैं। जब तीली डिब्बी की खुरदरी दीवार से रगड़ी जाती है, तब आग जल उठती है — इसी को “जल उठे सारा संसार” कहा गया है। इसे दियासलाई भी कहते हैं।
खोजबीन के लिए
1. “रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि…” — पहले ही पढ़ चुके हैं।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय।।”
अर्थ — अपने मन की व्यथा मन में ही छिपाकर रखनी चाहिए। सुनकर लोग केवल मज़ाक उड़ाएँगे; दुख बाँटने कोई नहीं आएगा।
रहिमन फिरि-फिरि पोइए, टूटे मुक्ताहार।।”
अर्थ — यदि कोई अपना सौ बार भी रूठे तो हर बार उसे मना लेना चाहिए, जैसे मोतियों का हार टूटने पर हम उसे बार-बार पिरो लेते हैं।
अर्थ — थोड़े दिन की विपत्ति भी अच्छी है, क्योंकि उसमें अपने-पराए की पहचान हो जाती है।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाय।।”
अर्थ — छोटे मन का व्यक्ति ऊँचा पद पाकर इतराने लगता है, जैसे शतरंज का प्यादा वज़ीर बनते ही टेढ़ी चाल चलने लगता है।
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरो मोल।।”
अर्थ — सचमुच बड़े लोग अपनी बड़ाई स्वयं नहीं करते। हीरा कभी यह नहीं कहता कि मेरा मोल लाख टका है — उसका मूल्य लोग स्वयं जानते हैं।
