इस पाठ में हम जानेंगे कि मनुष्य के शरीर में ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है — नाभि-प्रदेश से लेकर आस्य (मुख) तक की पूरी यात्रा, तथा वर्णों के उच्चारण में स्थान (Place) और करण (Tool) की भूमिका। इस तकनीकी पाठ के सभी 5 अभ्यासों के विस्तृत, चित्र-सहित उत्तर नीचे दिए गए हैं।
मुख्यभावः: स्थानम् · करणम् · आभ्यन्तर-प्रयत्नःदृष्टान्तः: मुरली (बाँसुरी) की उपमावेदाङ्गः: शिक्षा (Phonetics)
ध्वनि-उत्पत्ति के चार अंग-तन्त्र — मांसपेशी-बल-तन्त्रम्, वायु-बल-तन्त्रम्, ध्वनि-तन्त्रम्, उच्चारण-तन्त्रम् (पाठ्यपुस्तक से)
Step-by-step airflow: navel muscles → chest/lungs → larynx → mouth, where it finally becomes a वर्ण
चतुःसोपान-प्रक्रिया / The Four-Step Process
1
नाभि-प्रदेशः
मांसपेश्यः उरः नोदयन्ति (Abdominal muscles push the chest)
2
उरः
श्वासकोशस्थितं वायुम् ऊर्ध्वं निःसारयति (Lungs push air upward)
3
कण्ठ-बिलम्
वायुः ऊर्ध्वं सरन् कण्ठ-बिलं प्राप्नोति (Air reaches the larynx)
4
आस्यम्
वायुः पुनः ऊर्ध्वं सरन् आस्यं प्रविशति, तत्र वर्णरूपेण प्रकटीभवति
📍
(क) स्थानम् — आस्ये षट् उच्चारण-स्थानानि
The Six Places of Articulation inside the mouth
मुख के भीतर वर्णों के छह उच्चारण-स्थान — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका (पाठ्यपुस्तक से)
परिभाषा / Definition
वर्ण के उच्चारण के समय श्वासकोश से ऊर्ध्व सरता हुआ वायु, कण्ठ-बिल के माध्यम से आस्य के भीतर प्रवेश कर, मुख अथवा नासिका में जिस स्थल पर वर्णरूप में प्रकट होता है, उसे ‘स्थानम्’ कहते हैं।
आस्ये कुल षट् स्थानानि — मुखे पाँच (कण्ठः, तालु, मूर्धा, दन्तः, ओष्ठः) + नासिकायाम् एक (नासिका) = ६
दृष्टान्त — मुरली (बाँसुरी): जिस प्रकार मुरली की अंगुलि-छिद्र (finger-holes) विभिन्न ध्वनियों के ‘स्थान’ का काम करते हैं, उसी प्रकार मुख के छह स्थान वर्णों के उत्पत्ति-स्थल हैं।
🛠️
(ख) करणम् — उच्चारण का उपकरण
The Tool/Organ of Articulation
परिभाषा / Definition
वर्ण के उच्चारण के समय आस्य का जो भाग ‘स्थान’ को स्पर्श करता है अथवा उसके समीप जाता है, उसे ‘करणम्’ कहते हैं — अर्थात् वह ‘उपकरण’ जिससे उच्चारण-क्रिया सम्पन्न होती है।
🔹 जिह्वा — करणम्: तालु, मूर्धा, दन्त — इन तीन स्थानों के वर्णों के लिए जिह्वा ही करण बनती है (क्रमशः जिह्वा-मध्य, जिह्वा-उपाग्र, जिह्वा-अग्र भाग द्वारा)।
🔹 स्व-स्थानम् — करणम्: कण्ठ, ओष्ठ, नासिका — इन तीन स्थानों के वर्णों में जिह्वा प्रायः निष्क्रिय रहती है; स्वयं उस स्थान का अगला भाग, उसी स्थान के पिछले भाग को स्पर्श करता है (जैसे निचला होंठ ऊपरी होंठ को स्पर्श करता है)।
दृष्टान्त — मुरली बजाने वाली अंगुलियाँ (‘करणानि’) मुरली के अंगुलि-छिद्रों (‘स्थानानि’) को स्पर्श कर विविध ध्वनियाँ उत्पन्न करती हैं।
मुरलीधर श्रीकृष्ण — ‘स्थान’ व ‘करण’ के सम्यक् कार्य-निदर्शन हेतु मुरली एक समुचित उदाहरण है (पाठ्यपुस्तक से)
मुरली के अंगुलि-छिद्र ‘स्थान’ के समान, तथा उन्हें स्पर्श करने वाली अंगुलियाँ ‘करण’ के समान कार्य करती हैं (पाठ्यपुस्तक से)
The tongue acts as the करण for तालव्य, मूर्धन्य and दन्त्य sounds — only the contact-point differs
🔤
अत्र इदम् अवधेयम् — स्वरः व व्यञ्जनम् परिभाषा
Formal definitions of vowel and consonant
‘स्वरः’ परिभाषा-वाक्यम् — स्वयं राजन्ते इति स्वराः। अर्थः : जो वर्ण स्वयं स्वतन्त्र रूप से उच्चरित होते हैं, वे स्वर कहलाते हैं।
‘व्यञ्जनम्’ परिभाषा-वाक्यम् — अन्वग् भवति व्यञ्जनम्। अर्थः : उच्चारण के लिए जो वर्ण किसी स्वर पर आश्रित रहता है, वह व्यञ्जन कहलाता है।
१
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन द्विपदेन वा उत्तरत
तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं ‘जिह्वा’ अस्ति।
प्रश्न (च)
कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये किं भवति ?
इन तीनों वर्गों में स्थान व करण के मध्य कोई भेद नहीं होता — अपितु उस-उस स्थान का ही एक भाग (पूर्व-भाग) उसी स्थान के दूसरे भाग (पर-भाग) को स्पर्श करता है, अर्थात् ‘स्व-स्थानम्’ ही ‘करणम्’ बन जाता है।
३
अधोलिखितेषु वाक्येषु आम् / न इति लिखित्वा उचितभावं सूचयत
Write आम् (yes) or न (no) for each statement
(क)
श्वासकोशस्थितः वायुः ऊर्ध्वं चरन् पूर्वम् आस्यं प्राप्नोति। न
वायु पहले कण्ठ-बिलं प्राप्त करता है, तत्पश्चात् आस्य को — क्रम है: नाभि → उरः → कण्ठ-बिल → आस्य।
(ख)
सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्याः कण्ठं नोदयन्ति। न
नाभि-प्रदेश की मांसपेशियाँ सर्वप्रथम उरः (छाती) को नोदयन्ति (धकेलती हैं), कण्ठ को नहीं।
Arrange these places of articulation from outermost to innermost (reverse of the standard order)
पाठ में मुख के स्थानों का मानक क्रम (भीतर से बाहर) है : कण्ठः → तालु → मूर्धा → दन्तः → ओष्ठः। इस अभ्यास में हमें इसका विपरीत क्रम (बाहर से भीतर) लिखना है :
1ओष्ठः (सबसे बाहर — होंठ)
2दन्तः
3मूर्धा
4तालु
5कण्ठः (सबसे भीतर — गला)
अतः दिए गए पदों का क्रमांक : (क) मूर्धा → ३, (ख) दन्तः → २, (ग) तालु → ४, (घ) कण्ठः → ५, (ङ) ओष्ठः → १
५
यथायोग्यं मेलनं कुरुत
Match the four columns: general/specific place and general/specific tool
सामान्य-स्थानम्
विशेष-स्थानम्
सामान्य-करणम्
विशेष-करणम्
ओष्ठः
उत्तरोष्ठः
स्वस्थानं करणम्
अधरोष्ठः
दन्तः
दन्तः
जिह्वा करणम्
जिह्वाग्रः
नासिका
नासिकामूलस्य उपरिभागः
स्वस्थानं करणम्
नासिकामूलस्य अधोभागः
कण्ठः
कण्ठस्य पृष्ठभागः
स्वस्थानं करणम्
कण्ठस्य अग्रभागः
मूर्धा
मूर्धा
जिह्वा करणम्
जिह्वोपाग्रः
तालु
तालु
जिह्वा करणम्
जिह्वामध्यः
ध्यातव्यम् : तालु, मूर्धा, दन्तः का सामान्य-स्थान व विशेष-स्थान एक समान ही रहता है (इनका कोई और सूक्ष्म उप-भाग नहीं बताया गया); जबकि ओष्ठ, कण्ठ, नासिका के विशेष-स्थान अलग से निर्दिष्ट किए गए हैं (क्रमशः उत्तरोष्ठ, कण्ठ-पृष्ठभाग, नासिकामूल-उपरिभाग)।
पारिभाषिक-शब्दार्थाः — सन्दर्भ-सूची
Reference Glossary (selected key terms)
शब्दः
अर्थः / हिन्दी
English
स्थानम्
आस्ये उच्चारणस्य स्थलम्
‘Place’ of Articulation
करणम्
आस्ये उच्चारणस्य उपकरणम्
‘Tool’ of Articulation
कण्ठः / कण्ठ्यः
गला / कण्ठ-स्थान में उत्पन्न वर्ण
Throat / Guttural
तालु / तालव्यः
तालु-स्थान / तालु-स्थान में उत्पन्न वर्ण
Hard Palate / Palatal
मूर्धा / मूर्धन्यः
मूर्धा-स्थान / मूर्धा-स्थान में उत्पन्न वर्ण
Alveolar Ridge / Retroflex
दन्तः / दन्त्यः
दाँत / दन्त-स्थान में उत्पन्न वर्ण
Tooth / Dental
ओष्ठः / ओष्ठ्यः
होंठ / ओष्ठ-स्थान में उत्पन्न वर्ण
Lip / Labial
नासिक्यः
नासिका-स्थान में उत्पन्न वर्ण
Nasal (Letter)
जिह्वा-मध्यः / उपाग्रः / अग्रः
जीभ का मध्य / अग्र से पहले / अग्र भाग
Middle / Near-tip / Tip of tongue
स्वस्थानकरणः
जिस वर्ण का उच्चारण-स्थान का पर-भाग ही उसका करण हो