राजा शूद्रकः, स्वामिभक्त राजपुत्र वीरवरः, एवं देवी राजलक्ष्मीः — कर्तव्यनिष्ठा एवं स्वामिभक्ति की यह अमर कथा ‘हितोपदेश’ से ली गई है। इस पाठ के इनटेक्स्ट व्याकरण-बिन्दुओं तथा सभी ७ अभ्यासों के विस्तृत उत्तर नीचे क्रमबद्ध रूप से दिए गए हैं।
वीरवरः राजा शूद्रक की सभा में सेवा हेतु प्रार्थना करता हुआ (पाठ्यपुस्तक से)
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कथा-प्रवाह-चित्रम् (Story Flow)
वीरवर की सेवा-यात्रा एवं राजलक्ष्मी से भेंट का सचित्र सारांश
From seeking service to the midnight encounter with Rajlakshmi — the sequence of events (क-भाग)
कथा ‘हितोपदेश’ नामक ग्रन्थ से ली गई है। शोभावती नगरी के राजा शूद्रक अत्यन्त पराक्रमी, बहुशास्त्रज्ञ तथा पवित्र चरित्र वाले थे। एक दिन वीरवर नामक राजपुत्र अपने परिवार सहित आजीविका हेतु राजद्वार पर आया। उसने सामग्री के रूप में केवल अपनी दो भुजाएँ व तलवार बताईं, जिसे राजा ने असम्भव कहकर अस्वीकार कर दिया। परन्तु मन्त्री की सलाह पर, चार दिन के परीक्षण उपरान्त, वीरवर को ताम्बूल देकर सेवा में नियुक्त किया गया। वीरवर प्रतिदिन अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को, शेष का आधा (अर्थात् चौथाई) दरिद्रों को दान करता तथा शेष चौथाई पत्नी को गृहव्यय हेतु देता था — फिर शस्त्रधारी होकर दिन-रात राजद्वार की रखवाली करता था। एक कृष्ण-चतुर्दशी की अर्धरात्रि में राजा ने करुण रुदन की ध्वनि सुनी और वीरवर को उसका अनुसरण करने को कहा। स्वयं राजा भी गुप्त रूप से खड्ग लेकर पीछे-पीछे चला। नगर के बाहर उन्होंने एक दिव्याभरणभूषिता, रोती हुई सुन्दरी को देखा — वह स्वयं राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी थी, जो राजा के आसन्न मृत्यु के कारण नगर छोड़कर जाने वाली थी। वीरवर के पूछने पर उसने बताया कि राजा को सौ वर्ष तक पुनर्जीवित करने का एक अत्यन्त कठिन उपाय है, परन्तु वह क्या है — यह अगले भाग (ख-भागः) में स्पष्ट होगा।
भाषिक बिन्दु — मुक्तः पदविन्यासक्रमः
Grammar Note · Free Word Order
नियमः / Rule
संस्कृत भाषा की एक विशेषता यह है कि वाक्य में कर्ता-कर्म-क्रिया आदि पदों को हम अपनी इच्छा से भिन्न-भिन्न क्रम में रख सकते हैं, फिर भी वाक्य का अर्थ नहीं बदलता — क्योंकि प्रत्येक पद की विभक्ति ही उसका कारक-सम्बन्ध निश्चित करती है, स्थान नहीं।
तीनों वाक्यों का अर्थ एक ही है — “राम वन को गया।” पाठ में भी लेखक ने साहित्यिक सौन्दर्य हेतु सामान्य क्रम को बदला है — यथा सामान्य क्रम “शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्” को पाठ में “आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी” के रूप में लिखा गया है।
कर्ता (राम), कर्म (वनम्) और क्रिया (अगच्छत्) — पद कहीं भी रखे जाएँ, अर्थ अपरिवर्तित रहता है
भाषिक बिन्दु — भूतकालः
Grammar Note · Past Tense Forms
भूतकाल के तीन रूप / Three Ways to Express Past Tense
वीरवरः अवदत् — “भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिद् उपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?”
वीरवर ने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर पूछा कि क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे राजलक्ष्मी यहीं दीर्घकाल तक निवास कर सकें और स्वामी (राजा) भी दीर्घायु प्राप्त कर सकें।
मन्त्री की सलाह पर राजा वीरवर को ताम्बूल देकर सेवा में नियुक्त करते हैं (पाठ्यपुस्तक से)
भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?
अन्वयः — भगवति ! अत्र कश्चित् उपायः अस्ति येन भगवत्याः इह पुनः चिरवासः भवति, स्वामी च सुचिरं जीवति (किम्) ?
(ज)
तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्।
अन्वयः — तदा राजा शूद्रकः वर्षाणां शतं पुनः जीविष्यति।
🔹 ध्यातव्यम् : अन्वय करते समय कर्ता प्रथमे, कर्म द्वितीयायाम्, तथा क्रियापद अन्त में — इसी सामान्य क्रम में पदों को पुनर्व्यवस्थित किया जाता है (देखें ऊपर ‘मुक्तपदविन्यास’ नियम)।
पदच्छेदः — एका एव अत्र प्रवृत्तिः, सा च अतीव दुःसाध्या।
राजलक्ष्मी वीरवर को दुःसाध्य उपाय के विषय में बताती हुई (पाठ्यपुस्तक से)
योग्यताविस्तरः — विस्तार-ज्ञानम्
Enrichment (for reference)
कर्तव्यनिष्ठा-विषयक सूक्तयः
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ (यजुर्वेदः ४०.२)
यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्। एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥ (पञ्चतन्त्रम्)
कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्। पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥ (वाल्मीकि-रामायणम्)
ये तीनों सूक्तियाँ कर्तव्य-पालन के महत्त्व को दर्शाती हैं — जैसे छाया व धूप सदैव साथ रहते हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता का सम्बन्ध अटूट होता है।
जीमूतवाहनस्य कथा (सारांशः)
राजा शुद्धकेतु का पुत्र जीमूतवाहन बचपन से ही धर्मनिष्ठ, त्यागशील तथा परोपकारी था। उसने स्वेच्छा से राज्य त्यागकर वन में निवास किया। वहाँ उसने एक दुःखी नाग को देखा, जिसका पुत्र शङ्खचूड उस दिन गरुड़ का भोजन बनने वाला था। दयार्द्र होकर जीमूतवाहन ने स्वयं नागरूप धारण कर गरुड़ के समक्ष अपना शरीर अर्पित कर दिया। जब गरुड़ को उसके त्याग व धैर्य का वास्तविक परिचय मिला, तो उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागवंश की हत्या न करने की प्रतिज्ञा की।
यह कथा वीरवर की कथा के समान ही त्याग व परोपकार की भावना को उजागर करती है — वृक्ष, नदी, गाय सभी दूसरों के हित के लिए ही होते हैं, वैसे ही यह शरीर भी परोपकार के लिए है।
जीमूतवाहन की परोपकार-कथा — गरुड़ व नाग के प्रसंग का चित्रण (पाठ्यपुस्तक से)