दशमः पाठः – “समित्रिमेव कुरु त्यागः (क-भागः)” (Samitrimeva Kuru Tyāgaḥ (Ka-Bhāgaḥ)) Class 8th Sanskrit (Deepakam) NCERT Solution

सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) — दशमः पाठः — समाधानानि
कक्षा ८ · संस्कृतम् · दीपकम् · दशमः पाठः

सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः)

राजा शूद्रकः, स्वामिभक्त राजपुत्र वीरवरः, एवं देवी राजलक्ष्मीः — कर्तव्यनिष्ठा एवं स्वामिभक्ति की यह अमर कथा ‘हितोपदेश’ से ली गई है। इस पाठ के इनटेक्स्ट व्याकरण-बिन्दुओं तथा सभी ७ अभ्यासों के विस्तृत उत्तर नीचे क्रमबद्ध रूप से दिए गए हैं।

पात्राणि: शूद्रकः · वीरवरः · राजलक्ष्मीः · मन्त्री स्रोतः: हितोपदेशः व्याकरण-बिन्दु: मुक्तपदविन्यासक्रमः · भूतकालः · सन्धि-विच्छेदः
राजा शूद्रकः तथा वीरवरः राजसभायाम्
वीरवरः राजा शूद्रक की सभा में सेवा हेतु प्रार्थना करता हुआ (पाठ्यपुस्तक से)
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कथा-प्रवाह-चित्रम् (Story Flow)

वीरवर की सेवा-यात्रा एवं राजलक्ष्मी से भेंट का सचित्र सारांश
वीरवरस्य स्वामिभक्ति-यात्रा वीरवरः वृत्त्यर्थम् आगतः परिवार-सह राजद्वारे “नैतच्छक्यम्” राजा अस्वीकरोति बाहू-खड्गमात्र सामग्री मन्त्री की सलाह ताम्बूलदानेन नियुक्तिः दिन-रात सेवा वेतन का त्रि-विभाजन करुण- रोदन अर्धरात्रौ ध्वनिः श्रुता राजलक्ष्मीः रोदनपरा वन में भेंट · दुःसाध्य उपाय बताया
From seeking service to the midnight encounter with Rajlakshmi — the sequence of events (क-भाग)

कथा ‘हितोपदेश’ नामक ग्रन्थ से ली गई है। शोभावती नगरी के राजा शूद्रक अत्यन्त पराक्रमी, बहुशास्त्रज्ञ तथा पवित्र चरित्र वाले थे। एक दिन वीरवर नामक राजपुत्र अपने परिवार सहित आजीविका हेतु राजद्वार पर आया। उसने सामग्री के रूप में केवल अपनी दो भुजाएँ व तलवार बताईं, जिसे राजा ने असम्भव कहकर अस्वीकार कर दिया। परन्तु मन्त्री की सलाह पर, चार दिन के परीक्षण उपरान्त, वीरवर को ताम्बूल देकर सेवा में नियुक्त किया गया। वीरवर प्रतिदिन अपने वेतन का आधा भाग देवताओं को, शेष का आधा (अर्थात् चौथाई) दरिद्रों को दान करता तथा शेष चौथाई पत्नी को गृहव्यय हेतु देता था — फिर शस्त्रधारी होकर दिन-रात राजद्वार की रखवाली करता था। एक कृष्ण-चतुर्दशी की अर्धरात्रि में राजा ने करुण रुदन की ध्वनि सुनी और वीरवर को उसका अनुसरण करने को कहा। स्वयं राजा भी गुप्त रूप से खड्ग लेकर पीछे-पीछे चला। नगर के बाहर उन्होंने एक दिव्याभरणभूषिता, रोती हुई सुन्दरी को देखा — वह स्वयं राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी थी, जो राजा के आसन्न मृत्यु के कारण नगर छोड़कर जाने वाली थी। वीरवर के पूछने पर उसने बताया कि राजा को सौ वर्ष तक पुनर्जीवित करने का एक अत्यन्त कठिन उपाय है, परन्तु वह क्या है — यह अगले भाग (ख-भागः) में स्पष्ट होगा।

भाषिक बिन्दु — मुक्तः पदविन्यासक्रमः

Grammar Note · Free Word Order

नियमः / Rule

संस्कृत भाषा की एक विशेषता यह है कि वाक्य में कर्ता-कर्म-क्रिया आदि पदों को हम अपनी इच्छा से भिन्न-भिन्न क्रम में रख सकते हैं, फिर भी वाक्य का अर्थ नहीं बदलता — क्योंकि प्रत्येक पद की विभक्ति ही उसका कारक-सम्बन्ध निश्चित करती है, स्थान नहीं।

रामः वनम् अगच्छत् । = अगच्छत् रामः वनम् । = वनम् अगच्छत् रामः ।
तीनों वाक्यों का अर्थ एक ही है — “राम वन को गया।” पाठ में भी लेखक ने साहित्यिक सौन्दर्य हेतु सामान्य क्रम को बदला है — यथा सामान्य क्रम “शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्” को पाठ में “आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी” के रूप में लिखा गया है।
मुक्त पद-विन्यास क्रम — एक ही अर्थ, तीन क्रम रामः वनम् अगच्छत् । अगच्छत् रामः वनम् । वनम् अगच्छत् रामः ।
कर्ता (राम), कर्म (वनम्) और क्रिया (अगच्छत्) — पद कहीं भी रखे जाएँ, अर्थ अपरिवर्तित रहता है

भाषिक बिन्दु — भूतकालः

Grammar Note · Past Tense Forms

भूतकाल के तीन रूप / Three Ways to Express Past Tense

🔹 लङ्-लकार : उपागच्छत् (उप+अगच्छत्), अनयत्, व्यचिन्तयत् (वि+अचिन्तयत्)
🔹 लट्-लकार + ‘स्म’ : प्रतिवसति स्म (वर्तमानकालिक क्रिया के साथ ‘स्म’ जोड़कर भी भूतकाल बनता है)
🔹 क्तवतु-प्रत्ययः : श्रुतवान् (कर्तृवाच्य में प्रयुक्त)
🔹 क्त-प्रत्ययः : निर्गतः, नियोजितः, आलोकिता (कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य अथवा भाववाच्य — तीनों में सम्भव)
कर्तृ-कर्म-भाव-वाच्य का विस्तृत अध्ययन अगले पाठ में किया जाएगा।

पाठम् आधृत्य उदाहरणानुगुणं लिखत ‘आम्’ अथवा ‘न’

Based on the lesson, answer ‘आम्’ (yes) or ‘न’ (no)
उदाहरणम्

किं राज्ञः शूद्रकस्य नगर्याः नाम शोभावती आसीत् ? आम्

उदाहरणम्

किं वीरवरः अनेकशास्त्राणां ज्ञाता आसीत् ?

यह गुण राजा शूद्रक का था (“नानाशास्त्रवित्”), वीरवर का नहीं।
(क)

किं वीरवरः राजपुत्रः आसीत् ? आम्

पाठ में स्पष्ट है — “वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थम् … राजद्वारम् उपागच्छत्।”
(ख)

“किं ते वर्तनम्” ? इति किं शूद्रकः अपृच्छत् ? आम्

राजा ने वीरवर से यह प्रश्न स्वयं पूछा था।
(ग)

किं वीरवरं राज्ञः समीपे दौवारिकः अनयत् ? आम्

“ततो दौवारिकः तं प्रभोः समीपम् अनयत्।” — द्वारपाल ही उसे राजा के पास लाया था।
(घ)

किं राजा शूद्रकः राजपुत्रं वीरवरं साक्षात् दृष्ट्वा एव वृत्तिम् अयच्छत् ?

राजा ने पहले “नैतच्छक्यम्” कहकर मना कर दिया था; मंत्री की सलाह पर चार दिन के परीक्षण बाद ही नियुक्ति हुई।
(ङ)

किं वीरवरः स्ववेतनस्य चतुर्थं भागम् एव पत्न्यै यच्छति स्म ? आम्

वेतन का आधा देवताओं को, शेष आधे में से आधा (यानी कुल का चौथाई) दरिद्रों को, और बचा हुआ चौथाई भाग पत्नी को दिया जाता था।
(च)

किं करुण-रोदन-ध्वनिं राजा श्रुतवान् ? आम्

“स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।”
(छ)

किं करुणरोदनध्वनिः दिवसे श्रुतः आसीत् ?

यह ध्वनि कृष्णचतुर्दशी की अर्धरात्रि में सुनी गई थी, दिन में नहीं।
(ज)

किं राजलक्ष्म्या उक्तः उपायः अतीव दुःसाध्यः आसीत् ? आम्

“सा चातीव दुःसाध्या” — राजलक्ष्मी ने स्वयं इसे अत्यन्त कठिन बताया।
(झ)

किं भगवती सर्वमङ्गला उपायं संसूच्य शीघ्रमेव अदृश्या अभवत् ? आम्

“ततः सा तत्क्षणादेव गताऽदृश्यतां तत्सम्मुखात्।” — उपाय बताते ही राजलक्ष्मी तुरन्त अदृश्य हो गई।

अधोलिखितान् प्रश्नान् पूर्णवाक्येन उत्तरत

Answer the following questions in complete sentences
प्रश्न (क)

शूद्रकः कीदृशः राजा आसीत् ?

शूद्रकः महापराक्रमी, नानाशास्त्रवित्, पूतचरित्रः राजा आसीत्।
पाठ के आरम्भ में ही राजा शूद्रक का यह गुणवर्णन मिलता है — वह अत्यन्त बलशाली, अनेक शास्त्रों का ज्ञाता तथा पवित्र आचरण वाला था।
प्रश्न (ख)

वीरवरः कस्य समीपं गन्तुम् इच्छति स्म ?

वीरवरः स्वामिनः (राज्ञः शूद्रकस्य) समीपं गन्तुम् इच्छति स्म।
द्वारपाल से मिलते ही वीरवर ने कहा — “तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम्” अर्थात् मुझे स्वामी (राजा) के पास ले चलो।
प्रश्न (ग)

राज्ञः शूद्रकस्य ‘का ते सामग्री ?’ इति प्रश्नस्य उत्तरं वीरवरः किम् अयच्छत् ?

वीरवरः अयच्छत् — “इमौ बाहू, एष खड्गश्च।” (ये दोनों भुजाएँ और यह तलवार ही मेरी सामग्री है)
यह उत्तर वीरवर के आत्मविश्वास व शौर्य को दर्शाता है, जिसे सुनकर राजा को पहले असम्भव सा लगा था (“नैतच्छक्यम्”)।
प्रश्न (घ)

वीरवरः स्वगृहं कदा गच्छति स्म ?

यदा राजा स्वयम् आदिशति तदा वीरवरः स्वगृहं गच्छति स्म।
वीरवर अपनी इच्छा से नहीं, अपितु राजा की आज्ञा मिलने पर ही घर जाता था — यह उसकी कर्तव्यनिष्ठा का प्रमाण है।
प्रश्न (ङ)

वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं केभ्यः यच्छति स्म ?

वीरवरः स्ववेतनस्य अर्धं देवेभ्यः यच्छति स्म।
शेष बचे आधे भाग में से आधा दरिद्रों को दान करता था, और बचा हुआ चौथाई भाग पत्नी को घर-खर्च हेतु देता था।
प्रश्न (च)

राजलक्ष्मीः कुत्र सुखेन अवसत् ?

राजलक्ष्मीः राज्ञः शूद्रकस्य भुजच्छायायाम् सुमहता सुखेन अवसत्।
राजलक्ष्मी ने स्वयं कहा — “चिरम् एतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि” अर्थात् मैं दीर्घकाल से इस राजा की भुजाओं की छाया में सुखपूर्वक रह रही हूँ।
प्रश्न (छ)

राजलक्ष्म्याः दुःखस्य कारणं श्रुत्वा बद्धाञ्जलिः वीरवरः किम् अवदत् ?

वीरवरः अवदत् — “भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिद् उपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?”
वीरवर ने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर पूछा कि क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे राजलक्ष्मी यहीं दीर्घकाल तक निवास कर सकें और स्वामी (राजा) भी दीर्घायु प्राप्त कर सकें।
राजसभा में मन्त्री की सलाह
मन्त्री की सलाह पर राजा वीरवर को ताम्बूल देकर सेवा में नियुक्त करते हैं (पाठ्यपुस्तक से)

उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्वयरूपेण लिखत

Rewrite each sentence in normal (prose) word order — अन्वयः
उदाहरणम्

वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि, तस्मान्नय मां स्वामिनः समीपम्।

अन्वयः — (अहं) राजपुत्रः वृत्त्यर्थम् आगतः अस्मि, तस्मात् मां स्वामिनः समीपं नय।
(क)

आसीत् शोभावती नाम काचन नगरी।

अन्वयः — शोभावती नाम काचन नगरी आसीत्।
(ख)

प्रतिदिनं सुवर्णशतचतुष्टयं देव !

अन्वयः — देव ! प्रतिदिनं (मम वर्तनम्) सुवर्णशतचतुष्टयम् (अस्ति)।
(ग)

देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन प्रथमम् अवगम्यतां स्वरूपमस्य वेतनार्थिनो राजपुत्रस्य, किमुपपन्नमेतत् वेतनं न वेति।

अन्वयः — देव ! दिनचतुष्टयस्य वेतनार्पणेन वेतनार्थिनः अस्य राजपुत्रस्य स्वरूपं प्रथमम् अवगम्यताम्, एतत् वेतनम् उपपन्नं न वा (इति ज्ञायताम्)।
(घ)

क्रन्दनमनुसर राजपुत्र !

अन्वयः — राजपुत्र ! क्रन्दनम् अनुसर।
(ङ)

अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।

अन्वयः — अथ नरपतिना मन्त्रिणां वचनात् असौ राजपुत्रः वीरवरः ताम्बूलदानेन नियोजितः।
(च)

नैष गन्तुमर्हति राजपुत्र एकाकी सूचिभेद्ये तिमिरेऽस्मिन्।

अन्वयः — एषः राजपुत्रः अस्मिन् सूचिभेद्ये तिमिरे एकाकी गन्तुम् न अर्हति।
(छ)

भगवति ! अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति, सुचिरं जीवति च स्वामी ?

अन्वयः — भगवति ! अत्र कश्चित् उपायः अस्ति येन भगवत्याः इह पुनः चिरवासः भवति, स्वामी च सुचिरं जीवति (किम्) ?
(ज)

तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्।

अन्वयः — तदा राजा शूद्रकः वर्षाणां शतं पुनः जीविष्यति।
🔹 ध्यातव्यम् : अन्वय करते समय कर्ता प्रथमे, कर्म द्वितीयायाम्, तथा क्रियापद अन्त में — इसी सामान्य क्रम में पदों को पुनर्व्यवस्थित किया जाता है (देखें ऊपर ‘मुक्तपदविन्यास’ नियम)।

उदाहरणानुगुणं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयत

Sandhi-Vichchheda — split each word into its two component parts
सन्धि-पदम्प्रथमः अंशःद्वितीयः अंशः
अथैकदा=अथ+एकदा
वृत्त्यर्थम्=वृत्ति+अर्थम्
कस्मादपि=कस्मात्+अपि
कोऽपि=कः+अपि
राजपुत्रोऽस्मि=राजपुत्रः+अस्मि
यथेष्टम्=यथा+इष्टम्
वेतनार्पणेन=वेतन+अर्पणेन
तदालोक्य=तत्+आलोक्य
ततोऽसौ=ततः+असौ
वर्त्तनार्थिनो=वर्त्तन+अर्थिनः
तदवशिष्टं=तत्+अवशिष्टम्
राजदर्शनादनन्तरं=राजदर्शनात्+अनन्तरम्
वेति=वा+इति
राजलक्ष्मीरुवाच=राजलक्ष्मीः+उवाच
चार्द्धं=+अर्धम्
बहिर्नगरादालोकिता=बहिः+नगरात् + आलोकिता
कापि=का+अपि
प्रत्युवाच=प्रति+उवाच
राजलक्ष्मीरस्मि=राजलक्ष्मीः+अस्मि
स्थास्यामीति=स्थास्यामि+इति
भुजच्छायायां=भुज+छायायाम्
अस्त्यत्र=अस्ति+अत्र
कश्चिदुपायो=कः + चित्+उपायः
नारंगी अक्षरों वाले पद ही रिक्त-स्थान के सही उत्तर हैं — संस्कृत की स्वर-सन्धि व विसर्ग-सन्धि के नियमों के अनुसार दोनों शब्द जुड़कर एक पद बनाते हैं।

अधोलिखितेषु वाक्येषु रक्तवर्णीयपदानि केभ्यः प्रयुक्तानि इति उदाहरणानुगुणं लिखत

Identify which noun each highlighted pronoun refers to
उदाहरणम्

अहं भवतः सेवायां नियोजितः। → राज्ञे

(क)

ततः असौ तद्रोदनस्वरानुसरणक्रमेण प्रचलितः।

असौ → वीरवराय (यह पद ‘वीरवर’ के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो रुदन-ध्वनि के पीछे चला)
(ख)

तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य।

अहम् → राज्ञे शूद्रकाय (राजा स्वयं मन में सोचते हुए यह कह रहा है)
(ग)

चिरम् एतस्य भुजच्छायायां सुमहता सुखेन निवसामि।

एतस्य → राज्ञः शूद्रकस्य (राजलक्ष्मी राजा शूद्रक के विषय में कह रही है)
(घ)

सा चातीव दुःसाध्या।

सा → प्रवृत्तये (यह पद उस ‘उपाय/प्रवृत्ति’ के लिए है जो अत्यन्त कठिन है)
(ङ)

किं ते वर्तनम् ?

ते → वीरवराय (राजा वीरवर से उसका वेतन पूछ रहा है)

अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं वाक्यांशं पाठात् चित्वा लिखत

Read each summary sentence and quote the matching original line from the lesson
(क)

राजलक्ष्मीः वदति यत् यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु त्यजति तदा सा पुनः शूद्रकस्य समीपे स्थास्यति।

पाठ का सम्बद्ध वाक्य — “यदि त्वया स्वस्य सर्वतः प्रियं वस्तु सहासवदनेन भगवत्यै सर्वमङ्गलायै उपहारः क्रियेत, तदा पुनर्जीविष्यति राजा शूद्रको वर्षाणां शतम्, अहञ्च सुखेन निवत्स्यामि।”
(ख)

राजा शूद्रकः प्रथमं वीरवरस्य वृत्त्यर्थं प्रार्थनां न स्वीकरोति।

पाठ का सम्बद्ध वाक्य — “नैतच्छक्यम् !” (राजा उवाच)
(ग)

एकदा कोऽपि वीरवरः नाम राजपुत्रः वृत्तिं प्राप्तुं राज्ञः शूद्रकस्य समीपं गच्छति।

पाठ का सम्बद्ध वाक्य — “अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्।”
(घ)

सः तस्य कर्तव्यनिष्ठां साक्षात् पश्यति।

पाठ का सम्बद्ध वाक्य — “ततो नरपतिः खड्गपाणिः तस्य अनुसरणक्रमेण बहिः निरगच्छत् नगरीद्वारात्।”
राजा स्वयं गुप्त रूप से खड्ग लेकर वीरवर का अनुसरण करते हुए, उसकी स्वामिभक्ति व कर्तव्यनिष्ठा को अपनी आँखों से देखता है।
(ङ)

राजा मन्त्रिणां मन्त्रणया वीरवराय वृत्तिं यच्छति।

पाठ का सम्बद्ध वाक्य — “अथ मन्त्रिणां वचनात् ताम्बूलदानेन नियोजितोऽसौ राजपुत्रो वीरवरो नरपतिना।”
राजा तथा वीरवरः वने राजलक्ष्मीं पश्यन्तौ
राजा तथा वीरवर, नगर के बाहर रोती हुई दिव्य सुन्दरी (राजलक्ष्मी) को देखते हुए (पाठ्यपुस्तक से)

अधोलिखितानां वाक्यानां पदच्छेदं कुरुत

Split the sandhi-joined words within each sentence into separate words
उदाहरणम्

अथैकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मादपि देशाद् राजद्वारमुपागच्छत्।

पदच्छेदः — अथ एकदा वीरवरनामा राजपुत्रः वृत्त्यर्थं कस्मात् अपि देशात् राजद्वारम् उपागच्छत्।
(क)

वृत्त्यर्थमागतो राजपुत्रोऽस्मि।

पदच्छेदः — वृत्त्यर्थम् आगतः राजपुत्रः अस्मि।
(ख)

अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यामर्धरात्रे स राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिं कञ्चन।

पदच्छेदः — अथ एकदा कृष्णचतुर्दश्याम् अर्धरात्रे सः राजा श्रुतवान् करुणरोदनध्वनिम् कञ्चन।
(ग)

तदहमपि गच्छामि पृष्ठतोऽस्य निरूपयामि च किमेतदिति।

पदच्छेदः — तत् अहम् अपि गच्छामि पृष्ठतः अस्य, निरूपयामि च किम् एतत् इति।
(घ)

अस्त्यत्र कश्चिदुपायो येन भगवत्याः पुनरिह चिरवासो भवति।

पदच्छेदः — अस्ति अत्र कः चित् उपायः येन भगवत्याः पुनः इह चिरवासः भवति।
(ङ)

एकैवात्र प्रवृत्तिः सा चातीव दुःसाध्या।

पदच्छेदः — एका एव अत्र प्रवृत्तिः, सा च अतीव दुःसाध्या।
राजलक्ष्मी तथा वीरवरः
राजलक्ष्मी वीरवर को दुःसाध्य उपाय के विषय में बताती हुई (पाठ्यपुस्तक से)

योग्यताविस्तरः — विस्तार-ज्ञानम्

Enrichment (for reference)
कर्तव्यनिष्ठा-विषयक सूक्तयः

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ (यजुर्वेदः ४०.२)

यथा छायातपौ नित्यं सुसंबद्धौ परस्परम्। एवं कर्म च कर्ता च संश्लिष्टावितरेतरम्॥ (पञ्चतन्त्रम्)

कार्ये कर्मणि निर्वृत्ते यो बहून्यपि साधयेत्। पूर्वकार्याविरोधेन स कार्यं कर्तुमर्हति॥ (वाल्मीकि-रामायणम्)

ये तीनों सूक्तियाँ कर्तव्य-पालन के महत्त्व को दर्शाती हैं — जैसे छाया व धूप सदैव साथ रहते हैं, वैसे ही कर्म और कर्ता का सम्बन्ध अटूट होता है।
जीमूतवाहनस्य कथा (सारांशः)

राजा शुद्धकेतु का पुत्र जीमूतवाहन बचपन से ही धर्मनिष्ठ, त्यागशील तथा परोपकारी था। उसने स्वेच्छा से राज्य त्यागकर वन में निवास किया। वहाँ उसने एक दुःखी नाग को देखा, जिसका पुत्र शङ्खचूड उस दिन गरुड़ का भोजन बनने वाला था। दयार्द्र होकर जीमूतवाहन ने स्वयं नागरूप धारण कर गरुड़ के समक्ष अपना शरीर अर्पित कर दिया। जब गरुड़ को उसके त्याग व धैर्य का वास्तविक परिचय मिला, तो उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और नागवंश की हत्या न करने की प्रतिज्ञा की।

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥
यह कथा वीरवर की कथा के समान ही त्याग व परोपकार की भावना को उजागर करती है — वृक्ष, नदी, गाय सभी दूसरों के हित के लिए ही होते हैं, वैसे ही यह शरीर भी परोपकार के लिए है।
जीमूतवाहन नाग गरुड़ कथा
जीमूतवाहन की परोपकार-कथा — गरुड़ व नाग के प्रसंग का चित्रण (पाठ्यपुस्तक से)

Prepared for Class 8 Sanskrit (Dipakam) · Chapter 10 — सन्निमित्ते वरं त्यागः (क-भागः) · All illustrations © NCERT, used for educational reference · @EDUGROWN

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