मञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा
संस्कृत-दिवस के अवसर पर दो सखियों के संवाद से आरम्भ होकर, यह पाठ संस्कृत भाषा की महिमा में रचित चार सुन्दर पद्यों के माध्यम से इसकी प्राचीनता, समृद्धि व गौरव का वर्णन करता है। यहाँ संवाद, पद्य-व्याख्या, शब्दार्थ, समास-व्याकरण, संस्कृत-प्रशस्तियाँ तथा समग्र प्रश्नोत्तर प्रस्तुत हैं।
पाठ्यांश (संवाद) — सखी-द्वय संवादः
प्र.प्रथमा भगिनी श्रावणी-पूर्णिमायाः विषये किं पृष्टवती, द्वितीया किम् उत्तरं ददौ?
प्र.विद्यालये संस्कृतदिवसम् अधिकृत्य कीदृशी योजना कृता?
प्र.गीतगायनप्रतियोगितायां का भागं ग्रहीष्यति?
प्र.सख्यौ परस्परं कां प्रतिज्ञां कुरुतः?
संस्कृतभाषायाः स्तुतौ चत्वारि पद्यानि — पदच्छेद, अन्वय, भावार्थ सहित
अयि मातस्तव पोषणक्षमता मम वचनातीता, सुन्दरसुरभाषा॥
पदच्छेदः
मुनिवर-विकसित-कविवर-विलसित-मञ्जुल-मञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा। अयि मातः! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः
(त्वं) मुनिवरविकसितकविवरविलसितमञ्जुलमञ्जूषा सुन्दरसुरभाषा (असि)। अयि मातः! तव पोषणक्षमता मम वचनातीता अस्ति।
भावार्थः
संस्कृतभाषा अत्यन्त सुन्दर भाषा है और देवभाषा के रूप में प्रसिद्ध है। मुनियों ने इस संस्कृतभाषा का विकास किया है। यह भाषा अधिकांश भारतीय भाषाओं तथा विश्व की अनेक भाषाओं की जननी (स्रोत-भाषा) अथवा पूरक-भाषा है। अनेक कवियों ने काव्य-रचना द्वारा इसके सौन्दर्य को और बढ़ाया है। कोमल शब्दों से परिपूर्ण यह मानो एक ज्ञान की पेटी है। संस्कृतभाषा अपने शब्द-भण्डार से अन्य भाषाओं को भी ज्ञान-विज्ञान से पुष्ट करती है। संस्कृतभाषा का गौरव वर्णन से परे है।
पौराणिक-सामान्य-जनानां जीवनस्य आशा, सुन्दरसुरभाषा॥
पदच्छेदः
वेदव्यास-वाल्मीकि-मुनीनाम् कालिदास-बाणादिकवीनाम् पौराणिक-सामान्य-जनानाम् जीवनस्य आशा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः
(त्वं) वेदव्यासवाल्मीकिमुनीनां कालिदास-बाणादिकवीनां पौराणिक-सामान्यजनानां जीवनस्य आशा (असि)। त्वं सुन्दरसुरभाषा (असि)।
भावार्थः
संस्कृतभाषा अत्यन्त रमणीय भाषा है। वाल्मीकि, वेदव्यास आदि मुनियों ने रामायण, महाभारत, पुराण आदि ग्रन्थों की रचना की। कालिदास, बाणभट्ट जैसे विशिष्ट कवियों ने भी उपादेय (उपयोगी) काव्य रचे। प्राचीन काल से लेकर आज तक सामान्य जनों का जीवन संस्कृतभाषा में रचित काव्यों से प्रभावित रहा है। संस्कृतभाषा अनेक लक्ष्यों को प्राप्त कराने वाली है। अतः संस्कृतभाषा सुन्दर भाषा है।
गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे तव संस्कृतिरेषा, सुन्दरसुरभाषा॥
पदच्छेदः
श्रुतिसुखनिनदे सकलप्रमोदे स्मृतिहितवरदे सरसविनोदे गति-मति-प्रेरककाव्यविशारदे तव संस्कृतिः एषा सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः
हे! श्रुतिसुखनिनदे! सकलप्रमोदे! स्मृतिहितवरदे! सरसविनोदे! गति-मति-प्रेरक-काव्यविशारदे! तव एषा संस्कृतिः (अस्ति)। (त्वं) सुन्दरसुरभाषा (असि)।
भावार्थः
वस्तुतः यह अत्यन्त रमणीय, दिव्यता प्रदान करने वाली संस्कृतभाषा संस्कृति की जननी के समान है। संस्कृतभाषा का ध्वनि-श्रवण करने मात्र से सुख की वृद्धि होती है, सभी लोग आनन्दित होते हैं। संस्कृतभाषा वर के रूप में संस्कारजन्य ज्ञान प्रदान करती है, तथा सरस विनोद-भाव भी प्रकट करती है। यह मानव-जीवन में उत्तम गति व बुद्धि प्रदान करती है। काव्यशास्त्र से परिपूर्ण संस्कृतभाषा हमारी संस्कृति की रक्षा करती है और उसका प्रसार भी करती है।
वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायां, सुन्दरसुरभाषा॥
पदच्छेदः
नवरस-रुचिरा अलङ्कृति-धारा वेदविषय-वेदान्त-विचारा। वैद्य-व्योम-शास्त्रादि-विहारा विजयते धरायाम् सुन्दरसुरभाषा।
अन्वयः
नवरस-रुचिरा अलङ्कृतिधारा वेदविषयवेदान्तविचारा वैद्यव्योमशास्त्रादिविहारा धरायां सुन्दरसुरभाषा विजयते।
भावार्थः
संस्कृत के काव्यशास्त्रों में शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शान्त — ये नौ रुचिकर रस हैं। इसमें शब्द-अर्थ से परिपूर्ण विविध अलंकार शोभा देते हैं। वेद, उपनिषद्, वेदान्त, पुराण आदि के विचार लोगों को प्रेरित करते हैं। चिकित्साविज्ञान (आयुर्वेद), खगोलशास्त्र (ज्योतिष) आदि के साथ संस्कृतभाषा सम्पूर्ण पृथ्वी पर विचरण करती है। इस प्रकार संस्कृतभाषा सर्वत्र विजयी होती है।
वयं शब्दार्थान् जानीमः
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| विकसिता | विस्तारिता | विकसित की गई | Progressively developed |
| विलसिता | रञ्जिता | आनन्द देने वाली | That which gives joy |
| मञ्जुला | मनोहरा | मन को हरने वाली | Lovely / Charming |
| मञ्जूषा | पेटिका | पेटी | Box / Encasement |
| पोषणक्षमता | पालनशक्तिः | पोषण की क्षमता | Nurturing capacity |
| मे | मम | मेरे | Mine |
| अतीता | अतिक्रान्ता | पार हो | Beyond |
| वृन्दानाम् | समूहानाम् | समूहों की | Of groups |
| नवम् | नूतनम् | नई | New |
| वचनातीता | वर्णनातीता | वाणी से परे | Beyond words |
| भूयिष्ठानाम् | अधिकतराणाम् | अधिकांश | Mostly |
| श्रुतिसुखनिनदे! | श्रवणसुखध्वनिदात्रि! | कर्णप्रिय ध्वनि देने वाली! | Sound pleasant to listen |
| सकलप्रमोदे! | सर्वेभ्यः आनन्दमयि! | सभी को आनन्द देने वाली | That which gives pleasure to all |
| सरसविनोदे | सरसविनोदशीले | मधुर विनोद करने वाली | That which creates pleasant humour |
| काव्यविशारदे! | काव्यपारङ्गते | काव्य करने में पारंगत | Proficient in literature |
| रुचिरा | रुचिकरा | आनन्द प्रदान करने वाली | That which gives happiness |
| अलङ्कृतिधारा | अलङ्काराणाम् आधात्री | अलंकारों को धारण करने वाली | Well ornamented |
| व्योमशास्त्रम् | अन्तरिक्षशास्त्रम् | अन्तरिक्ष विज्ञान | Astronomy |
| धरायाम् | पृथिव्याम् | धरती पर | On earth |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सम्पूर्ण उत्तराणि
अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां एकपदेन उत्तरं लिखत
अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत
कसंस्कृतभाषा केषां जीवनस्य आशा अस्ति?
खकेषां विचाराः जनान् अभिप्रेरयन्ति?
गकैः रसैः समृद्धा साहित्यपरम्परा विराजते?
घसंस्कृतभाषा केषु शास्त्रेषु विहरति?
ङसंस्कृतभाषायाः कानि कानि सम्बोधनपदानि अत्र प्रयुक्तानि?
रेखाङ्कितपदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
अधः प्रदत्तानां पदानाम् उदाहरणानुसारं विभक्तिं वचनं च लिखत
| पदम् | विभक्तिः | वचनम् |
|---|---|---|
| मातः (उदाहरणम्) | सम्बोधनम् | एकवचनम् |
| तव | षष्ठी विभक्तिः | एकवचनम् |
| मञ्जूषा | प्रथमा विभक्तिः | एकवचनम् |
| संस्कृतिः | प्रथमा विभक्तिः | एकवचनम् |
| जनानाम् | षष्ठी विभक्तिः | बहुवचनम् |
| जीवनस्य | षष्ठी विभक्तिः | एकवचनम् |
| धरायाम् | सप्तमी विभक्तिः | एकवचनम् |
| शास्त्रेषु | सप्तमी विभक्तिः | बहुवचनम् |
अधोलिखितानां पद्यांशानां यथायोग्यं मेलनं कुरुत
उदाहरणानुसारम् अधः प्रदत्तानां पदानाम् एकपदेन अर्थं लिखत (समासः)
पेटिकातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत
अधोलिखितविकल्पेषु प्रसङ्गानुसारम् अर्थं चिनुत (बहुविकल्पीय प्रश्नाः)
(क) “मञ्जुलमञ्जूषा” इत्यस्य अर्थः कः?
उत्तरम्: (iii) मनोहररूपेण संकलिता
(ख) सुन्दरसुरभाषा केषां जीवनस्य आशा उच्यते?
उत्तरम्: (iii) पौराणिक-सामान्यजनानाम्
(ग) सुन्दरसुरभाषा कुत्र विजयते?
उत्तरम्: (iii) धरायाम्
(घ) सुन्दरसुरभाषायां किं नास्ति?
उत्तरम्: (iv) अशुद्धिः
(ङ) कविः सुन्दरसुरभाषां केन पदेन सम्बोधयति?
उत्तरम्: (ii) मातः
परियोजनाकार्यम्
१संस्कृतेन जीवनं कथं समृद्धं भवेत् इति अधिकृत्य ‘सुन्दरसुरभाषा धरायां विजयते’ इति संस्कृतनाटिकया छात्राः जागरूकाः करणीयाः।
२सरलसंस्कृतगीतानां सङ्ग्रहं कुरुत कक्षायां च गायत।
३संस्कृतसाहित्ये प्रसिद्धानां कवीनां काव्यानां च सङ्ग्रहः करणीयः।
अत्र इदम् अवधेयम् — समासः
समासः
परस्परसम्बद्धानां सार्थकपदानाम् एकपदीभावः समासः इति कथ्यते। प्रायेण द्वयोः ततोऽधिकानां वा पदानां संक्षिप्तीकरणं नाम समासः। यथा —
नद्याः तीरम् – नदीतीरम्। राज्ञः पुत्रः – राजपुत्रः। सुराणां भाषा – सुरभाषा। पोषणस्य क्षमता – पोषणक्षमता। वचनम् अतीता – वचनातीता। नवसंख्याकाः रसाः – नवरसाः। नवरसैः रुचिरा – नवरसरुचिरा।
समासानां विविधाः प्रभेदाः सन्ति — अव्ययीभावः, तत्पुरुषः, कर्मधारयः, द्विगुः, द्वन्द्वः, बहुव्रीहिः च इति।
- अव्ययीभावसमासे प्रायः पूर्वम् अव्ययपदस्य प्रयोगः भवति। यथा — रूपस्य योग्यम् — अनुरूपम्।
- तत्पुरुषसमासे परपदस्य प्राधान्यं भवति। यथा — सुराणां भाषा — सुरभाषा।
- द्विगुसमासे पूर्वं संख्यावाचकपदस्य व्यवहारः भवति। यथा — पञ्चानां वटानां समाहारः — पञ्चवटी।
- बहुव्रीहिसमासे अन्यपदस्य प्राधान्यं भवति। यथा — पीतम् अम्बरं यस्य सः — पीताम्बरः (श्रीविष्णुः)।
संस्कृतप्रशस्तयः
भारतं मातृभूमिर्नो मातृभाषा हि संस्कृतम्॥
विहाय संस्कृतं नास्ति संस्कृतिः संस्कृताश्रिता॥
संस्कृतेन विचारेण राष्ट्रं भातु सुसंस्कृतम्॥
वेदतत्त्वार्थसञ्जुष्टं लोकालोककरं शिवम्॥
यावद् गङ्गा च गोदा च तावदेव हि संस्कृतम्॥
