प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः
यह पाठ उत्कलमणि गोपबन्धु दास के जीवन पर आधारित है — एक शिक्षक-छात्र संवाद के माध्यम से ओडिशा के इस महान समाजसेवक, स्वतन्त्रता सेनानी व दीनबन्धु के त्याग व सेवाभाव की कहानी प्रस्तुत की गई है। यहाँ संवाद, कथासार, शब्दार्थ, व्याकरण-सूत्र, जीवनपरिचय तथा समग्र प्रश्नोत्तर दिए गए हैं।
पाठ्यांश (संवाद) — आचार्य-छात्र संवादः
प्र.आचार्येण छात्रान् किं पृष्टम्, तथा छात्रेण किम् उत्तरं दत्तम्?
प्र.जलप्लावेन काः हानयः सञ्जाताः इति आचार्यः किं वर्णयति?
प्र.“गोपबन्धुः कः?” इति छात्रस्य प्रश्नस्य उत्तरं आचार्यः कथं ददाति?
कथासारः — गोपबन्धु दास का जीवन
भोजन-प्रसङ्गः : एकदा आचार्यहरिहरदासः सत्यवादि-वनविद्यालयस्य सर्वान् अध्यापकान् भोजनाय आमन्त्रितवान्। भोजनकाले हसन् गोपबन्धुः कहते हैं कि भोजन अत्यन्त दुर्लभ है और जीवन के लिए सुखप्रद है, अतः शरीर के प्रति संकोच न करते हुए भरपेट भोजन करना चाहिए। यह सुनकर सब हँस पड़ते हैं। ठीक उसी समय बाहर से एक भूखे भिक्षुक की करुण पुकार सुनाई देती है — “माता! मुझे कुछ भोजन दो, तीन दिनों से कुछ भी नहीं खाया।” यह सुनते ही दयाद्रवित गोपबन्धु अपनी आँखों में आँसू भरकर बिना कुछ सोचे अपने लिए परोसा गया भोजन हाथ में लेकर बाहर चले जाते हैं और उस भिक्षुक को भोजन कराते हैं।
परिचय व सेवाभाव : गोपबन्धुदास एक महान् समाजसेवक, सत्यवादि-वनविद्यालय के अध्यापक, तथा प्रसिद्ध पञ्चमित्रों में से एक स्वतन्त्रता सेनानी थे। ओडिशा राज्य के पुरी जनपद में साक्षीगोपाल के निकट सुआण्डो ग्राम में उनका जन्म हुआ। अध्ययनकाल से ही वे दरिद्रों व रोगियों की सेवा करते थे। सत्यवादि-वनविद्यालय में वे छात्रों को निःशुल्क पढ़ाते थे, निरक्षरता दूर करने का सतत प्रयास करते थे, तथा स्वयं सूत कातकर वस्त्र-निर्माण को बढ़ावा देते थे। महात्मा गांधी की प्रेरणा से उन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया, जिसके कारण उन्हें दो वर्ष का कारावास भी हुआ।
कारावास व साहित्य-सृजन : कारागार में रहते हुए उन्होंने ‘बन्दीर आत्मकथा’, ‘कारा-कविता’, ‘धर्मपद’, ‘गो-माहात्म्य’, ‘नचिकेता-उपाख्यान’ जैसी अनेक प्रेरणादायी पुस्तकें ओड़िआ भाषा में लिखीं। वे सदैव स्वदेशी वस्त्रों व वस्तुओं का ही उपयोग करते थे। मरणासन्न अपने पुत्र को भी छोड़कर वे बाढ़-पीड़ितों की सहायता हेतु हज़ारों लोगों को बचाने घर से बाहर निकल पड़े और समाज-सेवा में जुट गए।
सम्मान व विरासत : वे सत्यवादि-वनविद्यालय, दरिद्रनारायण-सेवा-सङ्घ, सत्यवादि-मुद्रणालय, तथा ‘समाज’ नामक दैनिक समाचारपत्र के संस्थापक थे। यह पत्रिका आज भी सौ से अधिक वर्षों से प्रकाशित होती है। समाज-सेवा व देश-सेवा में उनके असीम त्याग को देखकर वैज्ञानिक आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय ने उन्हें ‘उत्कलमणि’ (उड़ीसा की मणि) की उपाधि से सम्मानित किया।
प्रेरणादायी पद्यांशः
स्वदेशलोकास्तदनु प्रयान्तु नु।
स्वराज्यमार्गे यदि गर्तमालिका,
ममास्थिमांसैः परिपूरितास्तु सा ॥
भावार्थः
मेरा शरीर स्वदेश की भूमि में विलीन हो जाए। देशवासी उसके बाद मेरा अनुसरण करें। देश की स्वतन्त्रता के मार्ग में यदि गड्ढों की शृंखला हो, तो वे सभी गड्ढे मेरी हड्डियों और मांस से परिपूर्ण हो जाएँ — अर्थात् देश की स्वतन्त्रता के लिए गोपबन्धु अपना सर्वस्व बलिदान करने को तत्पर थे। यह भावना मूल रूप से ओड़िआ भाषा में भी रची गई है — “मिशु मोर देह ए देश माटिरे, देशवासी चालि जाआन्तु पिठिरे, देशर स्वराज्य पथे जेते गाड, पुरु तहिँ पडि मोर मांस हाड॥”
प्रणम्यो देशभक्तोऽयं गोपबन्धुर्महामनाः ॥
भावार्थः
उत्कलमणि नाम से प्रसिद्ध यह लोकसेवक, यह महामना देशभक्त गोपबन्धु प्रणम्य (नमन करने योग्य) हैं।
वयं शब्दार्थान् जानीमः
| शब्दः | संस्कृत अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| जलप्लावपीडितानाम् | नद्यां बहुजलप्रवाहेण धनजीवनक्षतिग्रस्तानाम् | बाढ़ पीड़ितों का | Of flood victims |
| नष्टानि | क्षतिग्रस्तानि | नष्ट हुए | Destroyed |
| अनाहारेण | आहारेण विना | भोजन न करने से | By abstaining from food |
| नदीस्रोतसा | नदीजलप्रवाहेण | नदी के प्रवाह से | By river currents |
| अकुण्ठम् | कुण्ठं विना / साग्रहम् | आग्रहपूर्वक | Generously |
| समादृतः | आदरप्राप्तः | सम्मानित | Honored |
| सुस्वादूनि व्यञ्जनानि | रुचिकराणि सूपशाकादीनि | स्वादिष्ट भोजन | Delicious food |
| दौर्लभ्यम् | कष्टेन लभ्यम् | कष्ट से प्राप्त किया गया | Difficulty in being obtained |
| निःशुल्कम् | धनं विना | निःशुल्क | Without any fees |
| करुणध्वनिः | विकलस्वरः | करुणायुक्त ध्वनि | Weeping words |
| अगुञ्जत् | गुञ्जनम् अकरोत् | गूँजा | Echoes |
| बुभुक्षितः | क्षुधातुरः | भूखा | Hungry |
| दयाविगलितहृदयः | करुणार्द्रहृदयः | दयापूर्ण हृदय वाला / दयालु | Compassionate heart |
| अश्रुपूर्णनयनः | अश्रुयुक्तं नेत्रं यस्य सः | आँसू से भरी हुई आँखों वाला | Eyes filled with tears |
| परिवेषितम् | भोजनार्थं प्रदत्तम् (अन्नम्) | परोसा गया | Served |
| पञ्चमित्रेषु | पञ्चसंख्याकेषु मित्रेषु | पाँच मित्रों में | Among five friends |
| स्वतन्त्रता-सङ्ग्रामी | स्वतन्त्रता-सेनानीः | स्वतन्त्रता सेनानी | Freedom fighter |
| जन्म लब्धवान् | जन्म प्राप्तवान् | जन्म लिया | Was born |
| कारावासम् | कारागृहे बन्धनम् | कारागार में रहना | Living in jail |
| चिन्ताकुलः | चिन्तया व्याकुलः | चिन्ता से व्याकुल | Worried |
| देशसेवा-तत्परस्य | देशसेवां कर्तुं तत्परस्य | देश सेवा हेतु तत्पर का | Ready to serve the country |
| सहस्रशः | सहस्राधिकाः | हजारों | In thousands |
| लीयताम् | विलीनतां यान्तु | विलीन हो जाएँ | (May it) merge |
| प्रयान्तु | गच्छन्तु | चलें | (May they) walk over |
| गर्तमालिका | गर्तानां शृङ्खला | गड्ढों की शृंखला | Series of potholes |
| अस्थिमांसैः | अस्थिभिः मांसैः च | हड्डी और मांस से | With the bones and flesh |
| दैनिक-वार्तापत्रस्य | प्रतिदिनं प्रकाशित-पत्रस्य | दैनिक समाचारपत्र का | Of the daily newspaper |
| असीमम् | अतुलनीयम् | अपार | Immense |
| उत्कलमणिः | उत्कलस्य मणिसदृशः उपाधिविशेषः | उत्कल की मणि (एक उपाधि) | Gem of Odisha (a title) |
| सम्मानितवान् | मानेन प्रशंसितवान् | सम्मानित किया | Honored |
| लोकसेवकः | जनसेवकः | समाज सेवक | Social worker |
| महामनाः | उच्चविचारसम्पन्नः | उच्च विचार वाला | Broad-minded |
अभ्यासात् जायते सिद्धिः — सम्पूर्ण उत्तराणि
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत
एकवाक्येन उत्तरं लिखत
कगोपबन्धुः किमर्थम् अश्रुपूर्णनयनः अभवत्?
खकीदृशं पुत्रं विहाय गोपबन्धुः समाजसेवाम् अकरोत्?
गगोपबन्धोः कृते उत्कलमणिः इति उपाधिः किमर्थं प्रदत्तः?
घगोपबन्धुः कुत्र जन्म लब्धवान्?
ङगोपबन्धुः सर्वदा केषाम् उपयोगं कृतवान्?
कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत
चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि रचयत
समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत
उदाहरणानुसारं क्रियापदं स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत
समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत
घटनाक्रमेण वाक्यानि पुनः लिखत
- अतिथयो हस्तपादं क्षालयित्वा आसनेषु उपविष्टवन्तः।
- दिनत्रयात् किमपि न भुक्तम्।
- गोपबन्धुः अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्।
- भिक्षुकञ्च तद्भोजितवान्।
- प्रफुल्लचन्द्ररायः गोपबन्धुम् उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्मानितवान्।
परियोजनाकार्यम्
१स्वप्रदेशस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामिणां नामानि सङ्गृह्य तेषु एकस्य सचित्रां संक्षिप्तजीवनीं लिखत।
२जलप्लावपीडितानां साहाय्यार्थं स्वकीयाम् एकां कार्ययोजनां लिखत।
२. अस्वस्थजनानां चिकित्सार्थं शिविराणि आयोजनीयानि।
३. गृहहीनजनानां तात्कालिक-आवासव्यवस्था करणीया।
४. स्वयंसेवकैः सह मिलित्वा राहत-कार्ये सहयोगः देयः।
५. भविष्ये एतादृश-आपदां निवारणाय जनजागरणं करणीयम्।
अत्र इदम् अवधेयम्
पूर्वरूपसन्धिः
पदस्य अन्ते यदा “ए” कारः अथवा “ओ” कारः भवति, तदनन्तरम् अग्रिमपदस्य प्रथमवर्णः “अ” कारः भवति, तदा पूर्वरूपसन्धिः भवति। तत्र “अ” कारस्य स्थाने “ऽ” इति अवग्रहचिह्नस्य प्रयोगः भवति।
देशभक्तो + अयम् = देशभक्तोऽयम्
सर्वे + अपि = सर्वेऽपि
पशवो + अपि = पशवोऽपि
बुभुक्षितो + अस्मि = बुभुक्षितोऽस्मि
अश्रुपूर्णनयनो + अभवत् = अश्रुपूर्णनयनोऽभवत्
उत्कलमणि-गोपबन्धुदासस्य जीवनपरिचयः
| नाम | उत्कलमणिः गोपबन्धुदासः |
| जन्म | ०९/१०/१८७७ |
| जन्मस्थानम् | सुआण्डो-ग्रामः, पुरी-जनपदः, ओडिशाराज्यम् |
| पिता | दैत्यारिदासः |
| माता | स्वर्णमयी देवी |
| पत्नी | मोती देवी |
| एफ़्.ए. उत्तीर्णः | १९००, रेभेन्सा महाविद्यालयः, कटकम्, ओडिशा |
| बी.एल्. उत्तीर्णः | १९०६, कलकत्ता-विश्वविद्यालयः |
| सत्यवादि-वनविद्यालयस्य प्रतिष्ठा | १९०९ |
| बिहार-ओडिशा व्यवस्थापकसभायाः सदस्यः | १९१७ |
| समाज-साप्ताहिकपत्रिकायाः प्रकाशनम् | १९१९ |
| भारतीय-जातीय-आन्दोलने योगदानम् | १९२० |
| उत्कलमणिः इति उपाधिना सम्माननम् | १९२४ |
| रचनाः | अवकाशचिन्ता, बन्दीर आत्मकथा, कारा-कविता, धर्मपद, गो-माहात्म्य, नचिकेता-उपाख्यान |
| स्वर्गारोहणम् (साक्षी-गोपाले) | १७.०६.१९२८ |
