रविन्द्र केलेकर  पतझर में टूटी पत्तियाँ का सार | Sparsh Hindi Class 10th | पाठ 16 | पतझर में टूटी पत्तियाँSummary | Quick revision Notes ch-16 Sparsh | EduGrown

लेखक परिचय

रविन्द्र केलेकर

इनका जन्म 7 मार्च 1925 को कोंकण क्षेत्र में हुआ था। ये छात्र जीवन से ही गोवा मुक्ति आंदोलन में शामिल हो गए। गांधीवादी चिंतक के रूप में विख्यात केलेकर ने अपने लेखन में जन-जीवन के विविध पक्षों, मान्यताओं और व्यकितगत विचारों को देश और समाज परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया है। इनकी अनुभवजन्य टिप्पणियों में अपनी चिंतन की मौलिकता के साथ ही मानवीय सत्य तक पहुँचने की सहज चेष्टा रहती है।

पतझर में टूटी पत्तियाँ Short Summary सारांश 

झर में टूटी पत्तियाँ पाठ  कहानी लेखक रविन्द्र केलेकर द्वारा दार्शिनिक रचनाएँ रची गई है जिसका नाम है

गिन्नी का सोना |इस कहानी में लेखक हमें शुद्ध सोना अर्थात् आदर्शवादी तरीके से रहने कि एवं और ताम्बे जैसे सख्त होने कि प्रेरणा देते हैं।  

झेन की देन -लेखक इस रचना से जापान पहुंच जाते हैं | पाठ में पता चलता है की जापानी मनोरुग्न से ग्रस्त हैं | उनकी मन की गति को धीमा करने के लिए एक झेन जो उनकी पुर्वज थे चो नो यू आयोजित करते थे | इस विधि को और इससे होने वाले परिणाम के विषय में लेखक ने अच्छे से बताया हैं |

 

तझर में टूटी पत्तियाँ Detailed Summary सारांश

तझर में टूटी पत्तियाँ Detailed Summary सारांश

गिन्नी का सोना

प्रस्तुत पाठ के उप-शीर्षक गिन्नी का सोना लेखक रवीन्द्र केलेकर जी के द्वारा लिखित है | इस प्रसंग के माध्यम से लेखक कहते हैं कि गिन्नी का सोना और शुद्ध सोना अलग-अलग होता है | आमतौर पर देखा जाए तो गिन्नी के सोने में थोड़ा सा ताँबा का अंश मिलाया जाता है, जिसकी वजह से यह ज्यादा चमकदार हो जाता है | जबकि शुद्ध सोने की अपेक्षा गिन्नी का सोना अधिक मजबूत भी होता है | 


परिणामतः ज्यादातर औरतें इसी के गहनें बनाया करती हैं | आगे लेखक कहते हैं कि ठीक इसी तरह शुद्ध सोने के समान ही शुद्ध आदर्श भी होते हैं | लेकिन कुछ लोग शुद्ध सोने रूपी आदर्श में व्यावहारिकता का थोड़ा सा ताँबा मिलाकर चलते हैं, जिन्हें हम ‘प्रैक्टिकल आइडीयालिस्ट’ के नाम से जानते हैं | आगे लेखक कहते हैं कि वक़्त के साथ-साथ उनके आदर्श भी पीछे हटने लगते हैं और व्यावहारिक सूझबूझ का ही वर्चस्व हो जाता है | अर्थात् सोना पीछे रह जाता है और केवल ताँबा आगे रह जाता है | लेखक के अनुसार, गाँधीजी बिल्कुल ‘प्रैक्टिकल इडीयालिस्ट’ थे | गांधीजी कभी अपने आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर नहीं, बल्कि वे व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाकर उसकी अहमियत बढ़ा देते थे | अर्थात् गाँधीजी सोने में ताँबा मिलाकर नहीं, बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ा देते थे | आगे लेखक कहते हैं कि व्यवहारवादी लोग हर काम को लाभ-हानि के आधार पर करते हैं | खुद ऊपर चढ़ें और साथ में दूसरों को भी ऊपर ले चलें, यह काम तो केवल आदर्शवादी लोगों ने ही किया है | जबकि व्यवहारवादी लोग तो सिर्फ समाज को नीचे गिराने का काम करते रहे हैं…||  

झेन की देन


लेखक जापान की यात्रा पर गए हुए थे। वहाँ उन्होंने अपने एक मित्र से पूछा कि यहाँ के लोगों को कौन-सी बीमारियाँ सबसे अधिक होती हैं इसपर उनके मित्र ने जवाब दिया मानसिक। जापान के 80 फीसदी लोग मनोरोगी हैं। लेखक ने जब वजह जानना चाहा तो उनके मित्र ने बताया की जापानियों की जीवन की रफ़्तार बहुत बढ़ गयी है। लोग चलते नहीं, दौड़ते हैं। महीने का काम एक दिन में पूरा करने का प्रयास करते हैं। दिमाग में ‘स्पीड’ का इंजन लग जाने से हजार गुना अधिक तेजी से दौड़ने लगता है। एक क्षण ऐसा आता है जब दिमाग का तनाव बढ़ जाता है और पूरा इंजन टूट जाता है इस कारण मानसिक रोगी बढ़ गए हैं।
शाम को जापानी मित्र उन्हें ‘टी-सेरेमनी’ में ले गए। यह चाय पीने की विधि है जिसे चा-नो-यू कहते हैं। वह एक छः मंजिली इमारत थी जिसकी छत पर दफ़्ती की दीवारोंवाली और चटाई की ज़मीनवाली एक सुन्दर पर्णकुटी थी। बाहर बेढब-सा एक मिटटी का बरतन था जिसमे पानी भरा हुआ था जिससे उन्होंने हाथ-पाँव धोए। तौलिये से पोंछकर अंदर गए। अंदर बैठे ‘चाजीन’ ने उठकर उन्हें झुककर प्रणाम किया और बैठने की जगह दिखाई। उसने अँगीठी सुलगाकर उसपर चायदानी रखी। बगल के कमरे से जाकर बरतन ले आया और उसे तौलिये से साफ़ किया। वह सारी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण तरीके से कर रहा था जिससे लेखक को उसकी हर मुद्रा में सुर गूँज हों। वातावरण इतना शांत था की चाय का उबलना भी साफ़ सुनाई दे रहा था।

चाय तैयार हुई और चाजीन ने चाय को प्यालों में भरा और उसे तीनो मित्रों के सामने रख दिया। शान्ति को बनाये रखने के लिए वहाँ तीन व्यक्तियों से ज्यादा को एक साथ प्रवेश नही दिया जाता। प्याले में दो घूँट से ज्यादा चाय नहीं थी। वे लोग ओठों से प्याला लगाकर एक-एक बूँद कर डेढ़ घंटे तक पीते रहे। पहले दस-पंद्रह मिनट तक लेखक उलझन में रहे परन्तु फिर उनके दिमाग की रफ़्तार धीमी पड़ती गयी और फिर बिल्कुल बंद हो गयी। उन्हें लगा वो अनंतकाल में जी रहे हों। उन्हें सन्नाटे की भी आवाज़ सुनाई देने लगी।

अक्सर हम भूतकाल में जीते हैं या फिर भविष्य में परन्तु ये दोनों काल मिथ्या हैं। वर्तमान ही सत्य है और हमें उसी में जीना चाहिए। चाय पीते-पीते लेखक के दिमाग से दोनों काल हट गए थे। बस वर्तमान क्षण सामने था जो की अनंतकाल जितना विस्तृत था। असल जीना किसे कहते हैं लेखक को उस दिन मालूम हुआ ।

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