NCERT · दीपकम् · कक्षा ६ · संस्कृतम्
त्रयोदशः पाठः — पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि
अष्ट सुभाषितानि — पदच्छेदः, अन्वयः, भावार्थः सहितम्। पाठ्यगत प्रश्न, अभ्यास (१–१०), योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्, सब उत्तर-सहित।
सुभाषित-दर्शकम्
Subhashita browser
कस्यचित् सुभाषितस्य उपरि स्पृशन्तु — तस्य पदच्छेदः अन्वयः भावार्थः च पश्यन्तु।
किसी भी सुभाषित को दबाइए — उसका पदच्छेद, अन्वय और भावार्थ तुरन्त दिख जाएगा। यही प्रश्न २, ३, ५, ९ और १० का आधार है।
पाठ्यगत प्रश्नाः (Intext)
पृष्ठ १३०–१३५
सुभाषितानि कानि? तानि किं कुर्वन्ति?
पाठ के आरम्भ में शिक्षक कक्षा में स्फोरकपत्र (पोस्टर) लाते हैं — उसी संवाद से पाठ आरम्भ होता है।
छात्राः! पश्यन्तु, अद्य मम हस्ते स्फोरकपत्राणि सन्ति।
श्रीमन्! स्फोरकपत्रे किम् अस्ति?
छात्राः! एतानि स्फोरकपत्राणि भित्तौ स्थापयन्तु। तदनन्तरं स्वयम् एव पश्यन्तु।
श्रीमन्! स्फोरकपत्रे तु सुन्दरं चित्रम् अस्ति। श्लोकाः अपि सन्ति।
सत्यम्! एतानि सुभाषितानि सन्ति। सुन्दरवचनानि एव सुभाषितानि भवन्ति। एतानि अस्माकं कृते उत्तमकार्यार्थं प्रेरणां यच्छन्ति।
श्रीमन्! तर्हि वयं सुभाषितानि पठामः।
सुभाषितम् इति किम्? सु + भाषितम् = अच्छी तरह कहा गया वचन। सुन्दर, सार्थक और शिक्षा देने वाले वचन ही सुभाषित कहलाते हैं।
अष्ट सुभाषितानि — पदच्छेदः, अन्वयः, भावार्थः च
पाठ के सभी आठ सुभाषित, पुस्तक के अनुसार पदच्छेद-अन्वय-भावार्थ और हिन्दी अर्थ के साथ।
सर्वाणि सुभाषितानि
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते॥
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत्॥
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥
वयं शब्दार्थान् जानीमः — मातृभाषया अर्थं लिखन्तु।
शब्दार्थ-तालिका (अन्तिम स्तम्भ भरा हुआ)
| शब्दः | संस्कृत-अर्थः | English | मातृभाषया अर्थः (हिन्दी) |
|---|---|---|---|
| मूढैः | मूर्खजनैः | By fools | मूर्खों के द्वारा |
| निजः | स्वकीयः | Own | अपना |
| परः | अन्यः जनः | Other | पराया / अन्य |
| लघुचेतसाम् | संकुचितहृदयानाम् | Of narrow-minded | छोटे हृदय वालों का |
| वसुधा | धरित्री | Earth | पृथ्वी |
| उद्यमेन | परिश्रमेण | Effort | परिश्रम से |
| वृद्धोपसेविनः | वृद्धानां सेवकस्य | Of the person who serves elders | बुज़ुर्गों की सेवा करने वाले का |
| सहायकृत् | सहायकः | One who helps | सहायता करने वाला |
| पात्रताम् | योग्यताम् | Ability | योग्यता को |
| आप्नोति | प्राप्तं करोति | Receives | प्राप्त करता है |
| गरीयसी | श्रेष्ठा | Great | महान् / श्रेष्ठ |
| परहस्तेषु | अन्येषां हस्तेषु | In others hand | दूसरों के हाथ में |
वयम् अभ्यासं कुर्मः (Exercise)
प्रश्न १ – १० · पृष्ठ १३५–१३९
एतानि सर्वाणि सुभाषितानि उच्चैः पठन्तु स्मरन्तु लिखन्तु च।
यह क्रियात्मक प्रश्न है — सभी सुभाषित ज़ोर से पढ़िए, याद कीजिए और लिखिए।
याद करने का क्रम
- पहले श्लोक को ज़ोर से लय के साथ २–३ बार पढ़िए। ऊपर ‘सुभाषित-दर्शकम्’ में सभी आठ श्लोक एक साथ मिलेंगे।
- फिर पदच्छेद देखिए — कौन-सा शब्द कहाँ से कहाँ तक है, यह स्पष्ट हो जाएगा।
- फिर भावार्थ पढ़कर श्लोक का मतलब समझिए। मतलब समझने पर याद करना आसान हो जाता है।
- अन्त में पुस्तक बन्द करके श्लोक लिखकर देखिए और मिलान कीजिए।
सङ्केतः: हर श्लोक की दो पंक्तियाँ हैं और आठ श्लोक हैं — कुल १६ पंक्तियाँ। रोज़ दो श्लोक याद करेंगे तो चार दिन में पूरा पाठ याद हो जाएगा।
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखन्तु —
उत्तराणि
| क्रमः | प्रश्नः | उत्तरम् | सुभाषितात् प्रमाणम् |
|---|---|---|---|
| (क) | पृथिव्यां कति रत्नानि सन्ति? | त्रीणि | पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि… |
| (ख) | अयं निजः परो वा इति गणना केषां भवति? | लघुचेतसाम् | …इति गणना लघुचेतसाम् |
| (ग) | कार्याणि केन सिद्ध्यन्ति? | उद्यमेन | उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि |
| (घ) | विद्या किं ददाति? | विनयम् | विद्या ददाति विनयम् |
| (ङ) | जननी जन्मभूमिश्च कस्मात् गरीयसी? | स्वर्गात् | …स्वर्गादपि गरीयसी |
| (च) | लङ्का कीदृशी आसीत्? | स्वर्णमयी | अपि स्वर्णमयी लङ्का… |
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु —
उत्तराणि
- (क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि कानि सन्ति?
पृथिव्यां जलम्, अन्नं सुभाषितं च — एतानि त्रीणि रत्नानि सन्ति।
पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित — ये तीन रत्न हैं। - (ख) उदारचरितानां भावः कः भवति?
उदारचरितानां कृते वसुधा एव कुटुम्बकम् इति भावः भवति।
उदार स्वभाव वालों का भाव यह होता है कि सारी पृथ्वी ही उनका परिवार है। - (ग) मृगाः स्वयमेव कस्य मुखे न प्रविशन्ति?
मृगाः स्वयमेव सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति।
हिरन स्वयं सोते हुए शेर के मुँह में नहीं घुसते। - (घ) अभिवादनशीलस्य नित्यं कानि वर्धन्ते?
अभिवादनशीलस्य नित्यम् आयुः, विद्या, यशः, बलं च — एतानि चत्वारि वर्धन्ते।
प्रणाम करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल — ये चार चीज़ें बढ़ती हैं। - (ङ) मनुष्यः धनात् किम् आप्नोति?
मनुष्यः धनात् धर्मम् आप्नोति।
मनुष्य धन से धर्म प्राप्त करता है। - (च) उत्पन्नेषु कार्येषु कीदृशं धनम् उपयोगाय न भवति?
परहस्तगतं धनम् उत्पन्नेषु कार्येषु उपयोगाय न भवति।
दूसरे के हाथ में गया हुआ धन काम पड़ने पर उपयोग में नहीं आता।
चित्रं दृष्ट्वा वाक्यानि रचयन्तु —
चित्र में वृक्ष तथा उससे मिलने वाली वस्तुएँ हैं — फल, पुष्प, पर्ण, काष्ठ, कागद-पत्राणि, छाया। उदाहरण के अनुसार तीन-तीन वाक्य बनाइए।
उत्तराणि
| क्रमः | प्रथमपुरुषः (वृक्षः) | मध्यमपुरुषः (त्वम्) | उत्तमपुरुषः (अहम्) |
|---|---|---|---|
| (क) | वृक्षः पुष्पाणि यच्छति। | त्वं पुष्पाणि स्वीकरोषि। | अहं पुष्पाणि स्वीकरोमि। |
| (ख) | वृक्षः पर्णानि यच्छति। | त्वं पर्णानि स्वीकरोषि। | अहं पर्णानि स्वीकरोमि। |
| (ग) | वृक्षः काष्ठं यच्छति। | त्वं काष्ठं स्वीकरोषि। | अहं काष्ठं स्वीकरोमि। |
| (घ) | वृक्षः कागदपत्राणि यच्छति। | त्वं कागदपत्राणि स्वीकरोषि। | अहं कागदपत्राणि स्वीकरोमि। |
| (ङ) | वृक्षः छायां यच्छति। | त्वं छायां स्वीकरोषि। | अहं छायां स्वीकरोमि। |
व्याकरण-सङ्केतः: तीनों स्तम्भों में एक ही धातु के तीन पुरुष हैं — यच्छति (प्रथमपुरुष), स्वीकरोषि (मध्यमपुरुष), स्वीकरोमि (उत्तमपुरुष)। केवल वस्तु का नाम बदलता जाता है।
अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ‘आम्’ अथवा ‘न’ इति लिखन्तु —
उत्तराणि
| क्रमः | वाक्यम् | उत्तरम् | कारणम् |
|---|---|---|---|
| यथा | किं पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि सन्ति? | आम् (दिया हुआ) | हाँ, तीन ही रत्न हैं |
| (क) | त्रीणि रत्नानि जलम् अन्नं पाषाणः च सन्ति? | न | पाषाण नहीं — तीसरा रत्न सुभाषितम् है |
| (ख) | किं धर्मेण सुखं प्राप्यते? | आम् | ‘धनाद्धर्मं ततः सुखम्’ |
| (ग) | किं विद्या विनयं ददाति? | आम् | ‘विद्या ददाति विनयम्’ |
| (घ) | किम् अभिवादनशीलस्य विद्या वर्धते? | आम् | आयु, विद्या, यश, बल — चारों बढ़ते हैं |
| (ङ) | किम् उद्यमेन कार्याणि नश्यन्ति? | न | नष्ट नहीं — उद्यम से कार्य सिद्ध्यन्ति |
| (च) | किं जन्मभूमिः स्वर्गात् गरीयसी भवति? | आम् | ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ |
चित्रे दर्शितस्य नाम लिङ्गं च निर्दिशन्तु —
चित्र में दिखाई गई वस्तु का नाम और लिङ्ग बताइए। (यथा – गुलाब → पुष्पम् – नपुंसकलिङ्गम्)
उत्तराणि
| क्रमः | चित्रम् | नाम | लिङ्गम् |
|---|---|---|---|
| १ | गुलाब का फूल | पुष्पम् | नपुंसकलिङ्गम् (दिया हुआ) |
| २ | सिंह | सिंहः | पुंलिङ्गम् |
| ३ | सेब | फलम् | नपुंसकलिङ्गम् |
| ४ | माता / स्त्री | माता (जननी) | स्त्रीलिङ्गम् |
| ५ | पेड़ | वृक्षः | पुंलिङ्गम् |
| ६ | पुस्तकों का ढेर | पुस्तकानि | नपुंसकलिङ्गम् |
पहचान: ः पर समाप्त → पुंलिङ्ग · म् पर समाप्त → नपुंसकलिङ्ग · आ / ई पर समाप्त → स्त्रीलिङ्ग। बहुवचन में नपुंसकलिङ्ग आनि लेता है — जैसे पुस्तकानि।
वलये पदानि विलिख्य सुभाषितं पूरयन्तु —
गोलों में शब्द लिखकर सुभाषित पूरा कीजिए। यह श्लोक है — ‘विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्…’
उत्तरम् — पूर्णा शृङ्खला
| स्थानम् | पदम् | अर्थः |
|---|---|---|
| प्रथमा पङ्क्तिः · ३ | विनयम् | विनय को |
| प्रथमा पङ्क्तिः · ५ | याति | जाता है / पाता है |
| द्वितीया पङ्क्तिः · २ | पात्रत्वात् | योग्यता से |
| द्वितीया पङ्क्तिः · ४ | आप्नोति | प्राप्त करता है |
| तृतीया पङ्क्तिः · १ | धर्मम् | धर्म को |
| तृतीया पङ्क्तिः · ३ | सुखम् | सुख को |
पूरा सुभाषित: विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥
क्रम याद रखिए: विद्या → विनय → पात्रता (योग्यता) → धन → धर्म → सुख।
पट्टिकातः पदानि चित्वा निर्देशानुसारं पदानि लिखन्तु —
उत्तराणि
| क्रमः | निर्देशः | 1. | 2. | 3. | 4. |
|---|---|---|---|---|---|
| (क) | प्रथमान्त-पुंलिङ्गपदानि | उद्यमः | विनयः | निजः | पराक्रमः |
| (ख) | प्रथमान्त-स्त्रीलिङ्गपदानि | जननी | विद्या | बुद्धिः | शक्तिः |
| (ग) | प्रथमान्त-नपुंसकलिङ्गपदानि | धैर्यम् | पत्रम् | मूलम् | धनम् |
ध्यातव्यम्: पुस्तक में उदाहरण-रूप में वसुधा (स्त्रीलिङ्ग) और साहसम् (नपुंसकलिङ्ग) भी दिए हैं — ये पट्टिका के बाहर के शब्द हैं, केवल नमूने के तौर पर हैं। पट्टिका के बारह शब्द ठीक चार-चार में बँट जाते हैं।
पाठगतानि सुभाषितानि स्मृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु —
उत्तराणि
| क्रमः | वाक्यम् | उत्तरम् |
|---|---|---|
| (क) | पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। | जलमन्नं |
| (ख) | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकं भवति। | वसुधैव |
| (ग) | उद्यमेन हि कार्याणि सिद्ध्यन्ति। | कार्याणि |
| (घ) | अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः चत्वारि वर्धन्ते। | चत्वारि |
| (ङ) | उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। | साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः |
| (च) | विद्या विनयं ददाति। | विनयं |
| (छ) | जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी भवति। | स्वर्गादपि |
(घ) के बारे में: जो चार चीज़ें बढ़ती हैं वे हैं — आयुः विद्या यशः बलम्। इसीलिए रिक्त स्थान में ‘चत्वारि’ आता है।
चित्राणि दृष्ट्वा उचितान् श्लोकांशान् लिखन्तु —
चित्र देखकर उपयुक्त श्लोकांश लिखिए। नीचे हर चित्र का विवरण और उसका सही श्लोकांश दिया गया है।
उत्तराणि
| स्थानम् | चित्रम् | उचितः श्लोकांशः |
|---|---|---|
| ऊर्ध्व-वामे | हथौड़े से पत्थर तोड़ता हुआ व्यक्ति | मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते। |
| ऊर्ध्व-दक्षिणे | नल से गिरता जल, थाली में भोजन, पुस्तकें | पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्। |
| मध्ये | भारत का मानचित्र | जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। |
| अधो-वामे | एक व्यक्ति दूसरे को धन की थैली देता हुआ | पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्। |
| अधो-दक्षिणे | पृथ्वी का गोला (ग्लोब) | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्। |
मिलान का तरीका: चित्र में जो मुख्य वस्तु है, उसी शब्द वाला श्लोकांश ढूँढिए — पत्थर → पाषाणखण्डेषु, जल-अन्न-पुस्तक → जलमन्नं सुभाषितम्, भारत → जन्मभूमिः, दूसरे के हाथ में धन → परहस्तगतं धनम्, पृथ्वी → वसुधैव कुटुम्बकम्।
योग्यताविस्तरः एवं परियोजनाकार्यम्
पृष्ठ १४०
एतानि सुभाषितानि विविधग्रन्थेभ्यः स्वीकृतानि सन्ति — तेषां ग्रन्थानां परिचयः
ग्रन्थ-परिचयः
| ग्रन्थः | रचनाकारः | परिचयः |
|---|---|---|
| चाणक्यनीतिः | चाणक्यः | एक नीतिग्रन्थ। इसमें सूत्र-रूप में धर्म, संस्कृति, न्यायव्यवस्था, शान्ति और सुशिक्षा आदि विषयों का सुन्दर विवरण है। |
| मनुस्मृतिः | महर्षिः मनुः | प्रसिद्ध नीतिग्रन्थ एवं धर्मग्रन्थ। इसमें बारह अध्याय हैं। संसार की उत्पत्ति, धर्म, संस्कृति और मनुष्य के कर्तव्यों का वर्णन है। |
| पञ्चतन्त्रम् | पण्डितः विष्णुशर्मा | कथाग्रन्थ। इसमें पाँच तन्त्र हैं — मित्रभेदः, मित्रलाभः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकम्। |
| हितोपदेशः | नारायणपण्डितः | इसमें पशु-पक्षियों की कथाओं द्वारा बच्चों के लिए नीति का बोध प्रस्तुत किया गया है। |
| रामायणम् | महर्षिः वाल्मीकिः | यह ग्रन्थ भारतीय संस्कृति का आदर्श-स्वरूप दिखाता है। इसमें भगवान् श्रीराम का चरित वर्णित है। यह आदिकाव्यम् नाम से प्रसिद्ध है। |
| सुभाषितरत्नभाण्डागारः | सङ्कलन-ग्रन्थः | इस ग्रन्थ में सुभाषितों का संग्रह है। विविध संस्कृत-ग्रन्थों से सुभाषित चुनकर इसमें संकलित किए गए हैं। |
चत्वारि कार्याणि
ये चारों स्वयं करने योग्य कार्य हैं — नीचे हर कार्य के लिए मार्गदर्शन और नमूना दिया गया है।
१. सर्वाणि सुभाषितानि बृहत्-स्फोरकपत्रे सचित्रं लिखित्वा कक्षायाः भित्तौ स्थापयन्तु।
बड़े चार्ट-पेपर पर आठों सुभाषित सुन्दर अक्षरों में लिखिए और हर श्लोक के साथ उससे जुड़ा चित्र बनाइए — जैसे ‘उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति’ के साथ सोता हुआ सिंह और हिरन, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के साथ पृथ्वी का गोला। फिर उसे कक्षा की दीवार पर लगाइए।
२. सुभाषितेषु प्रयुक्तानां क्रियापदानां सूचीं कुर्वन्तु। तेषाम् आधारेण वाक्यरचनां कुर्वन्तु।
| क्रियापदम् | धातुः | पुरुषः · वचनम् | नूतनं वाक्यम् |
|---|---|---|---|
| विधीयते | वि + धा | प्रथमः · एकवचनम् | कार्यं समये विधीयते। |
| सिद्ध्यन्ति | सिध् | प्रथमः · बहुवचनम् | परिश्रमेण कार्याणि सिद्ध्यन्ति। |
| प्रविशन्ति | प्र + विश् | प्रथमः · बहुवचनम् | छात्राः कक्षां प्रविशन्ति। |
| वर्धन्ते | वृध् | प्रथमः · बहुवचनम् | वृक्षाः जलेन वर्धन्ते। |
| वर्तन्ते | वृत् | प्रथमः · बहुवचनम् | तत्र बहवः जनाः वर्तन्ते। |
| ददाति | दा | प्रथमः · एकवचनम् | माता पुत्राय भोजनं ददाति। |
| याति | या | प्रथमः · एकवचनम् | सः विद्यालयं याति। |
| आप्नोति | आप् | प्रथमः · एकवचनम् | परिश्रमी जनः सफलताम् आप्नोति। |
| रोचते | रुच् | प्रथमः · एकवचनम् | मह्यं संस्कृतं रोचते। |
| भवति | भू | प्रथमः · एकवचनम् | सत्यम् एव जयशीलं भवति। |
३. विद्या, उद्यमः, अभिवादनशीलः इत्यादिगुणाः येषु सन्ति तादृशानां पञ्चानां महापुरुषाणां जीवनपरिचयं पठन्तु लिखन्तु च।
ऐसे पाँच महापुरुष चुनकर उनका जीवन-परिचय लिखिए। नमूना-सूची —
| क्रमः | महापुरुषः | प्रमुखः गुणः |
|---|---|---|
| १ | स्वामी विवेकानन्दः | विद्या एवं आत्मविश्वास |
| २ | डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल-कलामः | उद्यमः एवं परिश्रमः |
| ३ | महात्मा गान्धी | सत्यम् एवं विनयः |
| ४ | डॉ. भीमराव-अम्बेडकरः | विद्या एवं धैर्यम् |
| ५ | आचार्यः चाणक्यः | बुद्धिः एवं नीतिः |
इनके अतिरिक्त अन्य महापुरुषों को भी चुना जा सकता है।
४. ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इति विषये एकां भाषणप्रतियोगिताम् आयोजयन्तु।
कक्षा में इस विषय पर भाषण-प्रतियोगिता कराइए। भाषण में ये बिन्दु रखे जा सकते हैं —
- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का अर्थ — सारी पृथ्वी ही एक परिवार है।
- यह वचन कहाँ से आया — महोपनिषद् से, और यही भाव इस पाठ के दूसरे सुभाषित में है।
- संकुचित सोच (‘यह अपना, यह पराया’) से क्या हानि होती है।
- उदार सोच से समाज और विश्व में शान्ति कैसे आती है।
- अपने जीवन में इसे कैसे अपनाएँ — पड़ोसी, सहपाठी और अपरिचितों के साथ व्यवहार में।
