परीक्षा
लेखक: मुंशी प्रेमचंद (1880–1936) · संपूर्ण प्रश्न-उत्तर हल
देवगढ़ रियासत में एक नए दीवान की खोज कैसे एक असली, अनकही परीक्षा में बदल गई — इसी कहानी पर आधारित पाठ्यपुस्तक के सभी अभ्यासों के विस्तृत उत्तर यहाँ दिए गए हैं।
✒️ लेखक परिचय
हिंदी के महान कथाकार व “कथा-सम्राट” प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपतराय था। उन्होंने समाज-सुधार और राष्ट्रीय भावना से भरी अनेक कहानियाँ और उपन्यास लिखे, जैसे — ईदगाह, बड़े भाईसाहब, गुल्ली-डंडा, दो बैलों की कथा।
📜 कहानी का सार
बूढ़े दीवान सुजानसिंह अपने उत्तराधिकारी की खोज का ज़िम्मा खुद उठाते हैं। विज्ञापन से सैकड़ों उम्मीदवार जुटते हैं, पर असली परीक्षा तब होती है जब एक बूढ़ा किसान (स्वयं दीवान) कीचड़ में फँसी गाड़ी के साथ मदद माँगता है — और सिर्फ़ एक युवक, जानकीनाथ, आगे आता है।
मेरी समझ से
महाराज ने अपने नीतिकुशल दीवान का बहुत आदर किया — कहानी में स्पष्ट लिखा है “राजा साहब अपने अनुभवशील नीतिकुशल दीवान का बड़ा आदर करते थे।” यानी दीवान की समझदारी-भरी नीति और अनुभव के कारण ही महाराज ने यह ज़िम्मेदारी उन्हीं पर छोड़ी।
दीवान सुजानसिंह ने स्वयं महाराज से कहा — “अब मेरी अवस्था भी ढल गई, राज-काज सँभालने की शक्ति नहीं रही।” यही उनके नौकरी छोड़ने का मुख्य और सटीक कारण था। भूल-चूक से बदनामी का डर एक अतिरिक्त वजह ज़रूर था, पर असल कारण उनकी घटती शारीरिक-मानसिक शक्ति ही थी।
ये उत्तर सीधे कहानी की पंक्तियों से लिए गए हैं, इसलिए सटीक हैं। बाकी विकल्प भी कहानी में मौजूद तो हैं, पर वे मुख्य कारण न होकर परिस्थिति के छोटे हिस्से हैं — जैसे “परमात्मा की याद आना” बुढ़ापे के एहसास को दर्शाता है, कारण नहीं बताता। चर्चा करते समय हमें कहानी की पंक्तियों को दोबारा पढ़कर यह जाँचना चाहिए कि कौन-सा विकल्प प्रश्न का सीधा और सटीक जवाब देता है।
शीर्षक
यह शीर्षक बिलकुल सटीक है क्योंकि पूरी कहानी एक परीक्षा के इर्द-गिर्द घूमती है — पर यह परीक्षा किताबी नहीं, बल्कि चरित्र, साहस और दया की असली परीक्षा है। दीवान बूढ़े किसान का रूप धरकर उम्मीदवारों की गुप्त परीक्षा लेते हैं, और जो व्यक्ति सच्चे दिल से एक अजनबी किसान की मदद करता है, वही इस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर दीवानी पद पाता है। इसलिए ‘परीक्षा’ शीर्षक कहानी के मूल भाव को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करता है।
इस कहानी को निम्नलिखित नाम भी दिए जा सकते हैं —
- “असली कसौटी” — क्योंकि यहाँ व्यक्ति की परख किताबी ज्ञान से नहीं, बल्कि व्यवहारिक कसौटी पर होती है।
- “सच्चा दीवान” — क्योंकि कहानी का केंद्र बिंदु वही युवक है जो सच्चे अर्थों में दीवान बनने योग्य साबित होता है।
- “दया की परख” — क्योंकि कहानी दया, साहस और उदारता जैसे गुणों की परख पर आधारित है।
पंक्तियों पर चर्चा
कहानी की कुछ महत्वपूर्ण पंक्तियाँ लेकर उनके अर्थ पर विचार कीजिए —
जोखिम उठाकर मेहनत करने वाला ही सफलता पाता है। दीवान इसी कहावत से युवक को यह संकेत देते हैं कि जिसने साहस दिखाया, उसी को बड़ा पद (मोती) मिलेगा।
अधिकांश खिलाड़ी-उम्मीदवारों में अहंकार और स्वार्थ भरा था; उनमें दूसरों के प्रति दया व स्नेह बिलकुल नहीं था — यही पंक्ति असली और दिखावटी अच्छाई का फ़र्क़ उजागर करती है।
जब जानकीनाथ को दीवानी मिली, तो निष्पक्ष रईसों-कर्मचारियों की आँखों में सम्मान था, जबकि हारे हुए उम्मीदवारों की आँखों में जलन — यह मानव-स्वभाव के दो अलग पहलू दिखाती है।
विज्ञापन की यह पंक्ति बताती है कि दीवान पद के लिए डिग्री नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठा और चरित्र ज़्यादा मायने रखते हैं — यही कहानी का मूल संदेश भी है।
सोच-विचार के लिए
हर उम्मीदवार ने अपने स्वभाव के विपरीत जाकर अच्छा दिखने की कोशिश की —
- मिस्टर ‘अ’, जो नौ बजे तक सोते थे, अब सुबह बगीचे में टहलकर सूर्योदय देखने लगे।
- मिस्टर ‘द’, ‘स’ और ‘ज’, जो नौकरों से बुरा बर्ताव करते थे, अब उनसे ‘आप’ और ‘जनाब’ कहकर बात करने लगे।
- मिस्टर ‘ल’, जिन्हें किताबों से चिढ़ थी, अब बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ने का दिखावा करने लगे।
- सब लोग नम्रता और सदाचार का पाखंड करने लगे ताकि एक महीने की जाँच में अच्छे दिखें।
किसान का चेहरा देखते ही युवक (जानकीनाथ) समझ गया कि — बूढ़ा किसान बहुत देर से कीचड़ में फँसा हुआ है, उसके बैल कमज़ोर हैं और भारी गाड़ी को ऊपर नहीं चढ़ा पा रहे, आस-पास कोई मददगार नहीं है, और वह अकेला व निराश होकर परेशान है। यानी पूरी विपत्ति की स्थिति उसे एक ही नज़र में समझ आ गई।
रियासत के कर्मचारियों और रईसों की आँखों में सत्कार (सम्मान) था, क्योंकि वे निष्पक्ष थे और जानकीनाथ के सच्चे गुणों को पहचानते थे। वहीं उम्मीदवार दल की आँखों में ईर्ष्या थी, क्योंकि वे स्वयं वह ऊँचा पद पाना चाहते थे और किसी और को मिलने से उन्हें जलन हुई।
खोजबीन
“युवक ने किसान की तरफ़ गौर से देखा। उसके मन में एक संदेह हुआ, क्या यह सुजानसिंह तो नहीं हैं? आवाज़ मिलती है, चेहरा-मोहरा भी वही।“
“लोग समझते थे कि एक महीने का झंझट है, किसी तरह काट लें, कहीं कार्य सिद्ध हो गया तो कौन पूछता है?“
कहानी की रचना
“लोग पसीने से तर हो गए। खून की गरमी आँख और चेहरे से झलक रही थी।” — यह चित्रात्मक भाषा का उदाहरण है। कहानी में ऐसी और भी पंक्तियाँ खोजिए।
- “धावे के लोग जब गेंद को लेकर तेज़ी से उड़ते तो ऐसा जान पड़ता था कि कोई लहर बढ़ती चली आती है।”
- “खिलाड़ी इस बढ़ती हुई लहर को इस तरह रोक लेते थे कि मानो लोहे की दीवार है।”
- “रंगीन एमामे, चोगे और नाना प्रकार के अंगरखे और कंटोप देवगढ़ में अपनी सज-धज दिखाने लगे।”
- “गाड़ी ऊपर को न चढ़ती और चढ़ती भी तो कुछ दूर चढ़कर फिर खिसककर नीचे पहुँच जाती।”
ये पंक्तियाँ पाठक की आँखों के सामने पूरा दृश्य जीवंत कर देती हैं — यही चित्रात्मक (शब्दों से चित्र बनाने वाली) भाषा की खूबी है।
समस्या और समाधान
समस्या: बूढ़े दीवान सुजानसिंह उम्र के कारण नौकरी छोड़ना चाहते थे और रियासत के लिए योग्य उत्तराधिकारी नहीं मिल रहा था।
समाधान: महाराज ने दीवान की प्रार्थना स्वीकार करते हुए यह शर्त रखी कि नए दीवान को खोजने की ज़िम्मेदारी दीवान साहब स्वयं निभाएँगे।
समस्या: सैकड़ों उम्मीदवारों में से कोई भी असली स्वभाव नहीं दिखा रहा था — सब दिखावटी अच्छाई का नाटक कर रहे थे, इसलिए सच्चे गुणी व्यक्ति को पहचानना कठिन था।
समाधान: दीवान साहब ने स्वयं एक बूढ़े किसान का भेष धरकर, कीचड़ में फँसी गाड़ी के बहाने, उम्मीदवारों की गुप्त और असली परीक्षा ली।
समस्या: बिना डिग्री की शर्त के, केवल एक महीने के आचार-व्यवहार के आधार पर खुद को योग्य साबित करना था।
समाधान (जो उन्होंने अपनाया): अधिकतर उम्मीदवारों ने असली सुधार करने की बजाय दिखावटी विनम्रता और बनावटी अच्छे व्यवहार का सहारा लिया — जो अंततः सच्ची परीक्षा में काम न आया।
मन के भाव
“स्वार्थ था, मद था, मगर उदारता और वात्सल्य का नाम भी न था।” — रेखांकित शब्द मन के भावों के नाम हैं। कहानी में से ऐसे ही अन्य नाम खोजिए।
अभिनय
युवक और किसान की बातचीत को संवाद के रूप में समूह के साथ अभिनय करके कक्षा में प्रस्तुत करना है।
यह एक कक्षा-गतिविधि है, इसका कोई निश्चित लिखित उत्तर नहीं होता। समूह में दो पात्र चुनें — एक “युवक” और एक “किसान (छिपे हुए दीवान)”। कहानी के भाग 4 के संवाद (“मैं तुम्हारी गाड़ी निकाल दूँ?” … “गहरे पानी में पैठने से ही मोती मिलता है”) को बोलने के लहज़े (झिझक, विनम्रता, संदेह, मुस्कान) के साथ अभिनीत करें। हर संवाद से पहले पुस्तक में दिया भाव (जैसे “झुककर बोला”, “हँसकर कहा”, “गंभीर भाव से कहा”) ज़रूर दिखाएँ — यही अभिनय को सजीव बनाता है।
विपरीतार्थक शब्द
सही जोड़े बनाइए —
कहावत
दी गई कहावतों को कहानी से जोड़िए —
अनुमान या कल्पना से
यह विज्ञापन दीवान सरदार सुजानसिंह ने स्वयं (या रियासत के किसी अधिकारी के माध्यम से) निकलवाया होगा, क्योंकि महाराज ने नया दीवान खोजने की पूरी ज़िम्मेदारी उन्हीं को सौंपी थी। इतने बड़े स्तर पर योग्य उम्मीदवार जुटाने के लिए प्रसिद्ध राष्ट्रीय पत्रों में विज्ञापन देना ही सबसे उचित तरीका था।
क्योंकि यह एक ऐसा ऊँचा पद था जिसके लिए कोई कठोर शर्त (जैसे डिग्री) नहीं थी और न ही किसी तरह की “कैद” थी — केवल भाग्य और आचार-व्यवहार का खेल था। ऐसा दुर्लभ अवसर पाकर देशभर से सैकड़ों लोग अपनी किस्मत आज़माने देवगढ़ की ओर दौड़ पड़े, जिससे पूरे मुल्क में हलचल मच गई।
विज्ञापन
रियासत देवगढ़ के लिए एक सुयोग्य दीवान की तुरंत आवश्यकता है।
✔ ग्रेजुएट होना ज़रूरी नहीं, परंतु हृष्ट-पुष्ट व स्वस्थ होना आवश्यक।
✔ एक माह तक रहन-सहन व आचार-विचार परखा जाएगा।
✔ विद्या से अधिक कर्तव्य-निष्ठा को महत्व दिया जाएगा।
✔ योग्य उम्मीदवार सरदार सुजानसिंह से संपर्क करें।
जैसे किसी शिक्षा-संस्थान या स्वास्थ्य-जागरूकता का विज्ञापन जो सरल भाषा, आकर्षक चित्रों और छोटे संदेश से बात समझा देता है — ऐसा विज्ञापन इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि यह जल्दी याद रह जाता है, ईमानदार लगता है, और असल ज़रूरत की जानकारी सीधे तरीके से देता है। (विद्यार्थी अपने अनुभव से अपना उदाहरण भी लिख सकते हैं।)
लाभ: सही जानकारी जल्दी और व्यापक स्तर पर लोगों तक पहुँचती है; रोज़गार, वस्तुएँ व सेवाएँ आसानी से मिलती हैं — जैसे कहानी में विज्ञापन से योग्य दीवान की खोज संभव हुई।
हानि: कभी-कभी विज्ञापन बढ़ा-चढ़ाकर या भ्रामक जानकारी देते हैं, जिससे लोग गुमराह हो सकते हैं — जैसे कहानी में कई उम्मीदवारों ने केवल दिखावटी व्यवहार अपनाकर धोखा देने की कोशिश की।
आगे की कहानी
‘परीक्षा’ कहानी जहाँ समाप्त होती है, उसके आगे क्या हुआ होगा — अपनी कल्पना से लिखिए।
जानकीनाथ ने दीवान का पद संभालते ही सबसे पहले सुजानसिंह जी से मार्गदर्शन माँगा। उन्होंने रियासत में गरीब किसानों के लिए सड़कों और नालों पर पुल बनवाए, ताकि फिर किसी को अकेले संकट में न फँसना पड़े। उन्होंने न्याय व्यवस्था को भी सरल बनाया, जिससे आम जनता सीधे अपनी समस्या दरबार तक पहुँचा सके। धीरे-धीरे देवगढ़ की गिनती राज्य के सबसे सुव्यवस्थित व सुखी रियासतों में होने लगी, और लोग कहने लगे — “सच्ची परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति ही सच्चा शासक बनता है।”
आपकी बात
मैं भी किसी वास्तविक परिस्थिति (जैसे कोई कठिनाई या ज़रूरतमंद की मदद का मौका) के ज़रिए उम्मीदवारों को बिना बताए परखता, क्योंकि असली स्वभाव तभी सामने आता है जब व्यक्ति को पता न हो कि उसे देखा जा रहा है। मैं देखता कि कौन बिना स्वार्थ के, बिना दिखावे के, सच्चे दिल से मदद के लिए आगे आता है।
मैं मॉनिटर चुनने के लिए इन गुणों को परखूँगा — ईमानदारी, ज़िम्मेदारी, सहपाठियों के प्रति सहयोग की भावना, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता। गुणों की परख के लिए मैं कुछ दिनों तक बिना बताए यह देखूँगा कि कौन साथियों की मदद के लिए खुद आगे आता है, कक्षा का काम ज़िम्मेदारी से करता है, और मुश्किल समय में शांत रहकर सही निर्णय लेता है — ठीक वैसे ही जैसे कहानी में युवक की परख की गई थी।
नया-पुराना
“कोई नए फैशन का प्रेमी, कोई पुरानी सादगी पर मिटा हुआ।” — अपने परिवार से चर्चा करके तालिका पूरी कीजिए।
| मेरे लिए नई वस्तुएँ | मेरे लिए पुरानी वस्तुएँ | बड़ों के लिए नई वस्तुएँ | बड़ों के लिए पुरानी वस्तुएँ |
|---|---|---|---|
| स्मार्टफोन | साइकिल | वीडियो कॉल | चिट्ठी-पत्री |
| ऑनलाइन क्लास | कहानी की किताबें | ऑनलाइन बैंकिंग | ग्रामोफोन |
| टैबलेट | कैरम बोर्ड | ई-मेल | तार (टेलीग्राम) |
यह तालिका हर परिवार में अलग होगी — अपने माता-पिता व दादा-दादी से चर्चा करके अपनी खुद की सूची बनाइए।
वाद-विवाद
विषय: “आपस में हॉकी का खेल हो जाए। यह भी तो आखिर एक विद्या है।” — क्या हॉकी जैसा खेल भी विद्या है?
- खेल भी अनुशासन, एकाग्रता, टीम-भावना और निर्णय-क्षमता सिखाता है, जो किसी भी विद्या के मूल गुण हैं।
- हॉकी जैसे खेल में कौशल और निरंतर अभ्यास ज़रूरी होता है, ठीक वैसे ही जैसे संगीत या चित्रकला में।
- शारीरिक स्वास्थ्य भी शिक्षा जितना ही ज़रूरी है, इसलिए खेल को भी विद्या माना जाना चाहिए।
- परंपरागत रूप से ‘विद्या’ शब्द पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक ज्ञान से जोड़ा जाता रहा है।
- कहानी के समय में समाज दौड़-कूद के खेलों को केवल बच्चों का खेल मानता था, गंभीर विद्या नहीं।
- शतरंज व ताश जैसे बौद्धिक खेलों की तुलना में शारीरिक खेल को कमतर आँका जाता था।
कक्षा में दोनों पक्षों के समूह बनाकर, तर्कों के साथ चर्चा कीजिए और अंत में अपनी राय बनाइए।
अच्छाई और दिखावा
कहानी के अनुसार व सामान्य जीवन में लोग — जल्दी उठना, बगीचे में टहलना, विनम्र भाषा (आप/जनाब) बोलना, बड़ी किताबें पढ़ने का दिखावा करना, साफ़-सुथरे व सज-धज से रहना, कसरत व मेहनत करने का प्रदर्शन करना आदि करते हैं, ताकि दूसरों की नज़र में अच्छे दिखें।
हाँ, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। ‘स्वयं को अच्छा दिखाना’ केवल बाहरी दिखावा है — यह अस्थायी होता है और परिस्थिति या दर्शकों के अनुसार बदल जाता है (जैसे कहानी के नकली उम्मीदवार)। जबकि ‘स्वयं के अच्छा होना’ हृदय से आने वाला सच्चा गुण है, जो बिना किसी को दिखाए भी वैसा ही बना रहता है — ठीक जानकीनाथ की तरह, जिसने बिना यह जाने कि कोई परीक्षा ले रहा है, सच्चे मन से किसान की मदद की।
परिधान तरह-तरह के
परिधानों के नाम और उनके चित्र मिलाइए, और उन्हें अन्य किन नामों से जाना जाता है यह भी जानिए —
नोट: क्षेत्रीय भाषा के अनुसार इन परिधानों के नाम अलग-अलग हो सकते हैं — अपने घर व आस-पास पूछकर अपनी सूची भी बनाइए।
आपकी परीक्षाएँ
हम सभी अपने जीवन में अनेक प्रकार की परीक्षाएँ लेते और देते हैं। अपने अनुभवों से उदाहरण बताइए।
- जब मेरे दोस्त ने मुझ पर भरोसा दिलाने के लिए बिना सहारे साइकिल चलाकर दिखाई।
- जब शिक्षक ने अचानक कक्षा में मौखिक प्रश्न पूछकर हमारी तैयारी परखी।
- जब मेरी माँ ने घर की ज़िम्मेदारी सौंपकर देखा कि मैं कितना ज़िम्मेदार बनता हूँ।
- जब किसी दोस्त ने चुनौती देकर देखा कि मैं मुश्किल काम कैसे पूरा करता हूँ।
आज की पहेली — अंतर खोजिए
दोनों चित्रों में कुल 5 अंतर छिपे हैं — ध्यान से देखकर खोजने की कोशिश कीजिए!
