मैया मैं नहिं माखन खायो
सूरदास के इस प्रसिद्ध वात्सल्य-पद के सभी प्रश्नों के सरल एवं विस्तृत उत्तर — “पाठ से” व “पाठ से आगे” की हर गतिविधि, चित्रों सहित।
पद — एक झलक
मैया मैं नहिं माखन खायो। भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो। चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो॥ मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो। ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो॥ तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो। जिय तेरे कछु भेद उपजि हैं, जानि परायो जायो॥ ये ले अपनी लकुटि कमरिया, बहुतहिं नाच नचायो। सूरदास तब बिहँसि जसोदा, लै उर कंठ लगायो॥
- मुझे तुम पराया समझती हो।
- मेरी माता, तुम बहुत भोली हो।
- मुझे यह लाठी-कंबल नहीं चाहिए।
- मेरे छोटे-छोटे हाथ छीके तक कैसे जा सकते हैं?
कारण: कृष्ण कहते हैं — “मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो।” अर्थात् मैं तो छोटा-सा बालक हूँ, मेरी बाँहें (हाथ) बहुत छोटी हैं; फिर इतनी ऊँचाई पर लटके छीके तक भला मैं पहुँच ही कैसे सकता हूँ? यही उनका मुख्य तर्क है कि माखन खाना उनके लिए संभव ही नहीं था।
- गाय चरा रहे थे।
- माखन खा रहे थे।
- मधुबन में भटक रहे थे।
- मित्रों के संग खेल रहे थे।
कारण: कृष्ण अपनी सफ़ाई में बताते हैं कि सुबह होते ही उन्हें गायों के पीछे मधुबन भेज दिया गया था — “भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो।” यानी वे दिन भर गाय चरा रहे थे और साँझ ढले घर लौटे। (पद के अनुसार वे बंसीवट के पास इधर-उधर भी घूमते रहे, पर उनका मुख्य कार्य गाय चराना ही था।)
यह कक्षा-चर्चा गतिविधि है। दोनों उत्तर सीधे पद की पंक्तियों पर आधारित हैं — छीके तक छोटे हाथों का न पहुँचना, और सुबह गायों के साथ मधुबन जाना। मित्रों के साथ इन्हीं पंक्तियों के आधार पर अपने चुनाव को पुष्ट कीजिए।
| शब्द | सही अर्थ / संदर्भ | |
|---|---|---|
| 1 | जसोदा → | यशोदा, श्रीकृष्ण की माँ, जिन्होंने श्रीकृष्ण को पाला था। |
| 2 | पहर → | समय मापने की एक इकाई (तीन घंटे का एक पहर; एक दिन में आठ पहर होते हैं)। |
| 3 | लकुटि-कमरिया → | लाठी और छोटा कंबल/कमली (श्रीकृष्ण लकुटि-कमरिया लेकर गाय चराने जाते थे)। |
| 4 | बंसीवट → | एक वट वृक्ष (मान्यता है कि कृष्ण इसी वृक्ष पर चढ़कर वंशी की ध्वनि से गायों को बुलाते थे)। |
| 5 | मधुबन → | मथुरा के पास यमुना के किनारे का एक वन। |
| 6 | छीको → | रस्सियों का बुना गोल जाल, जो ऊँचाई पर लटकाया जाता है ताकि दूध-दही आदि को कुत्ते-बिल्ली न पा सकें। |
| 7 | माता → | जन्म देने वाली, जननी, माँ। |
| 8 | ग्वाल-बाल → | गाय पालने वालों के बच्चे, श्रीकृष्ण के संगी-साथी। |
अर्थ: कृष्ण माँ से कहते हैं कि सुबह होते ही, गायों के पीछे-पीछे उन्हें मधुबन (चरागाह) भेज दिया गया था। यानी वे अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि भेजे जाने पर सारा दिन गायें चराने गए थे। इस पंक्ति से उनका भोलापन और यह सफ़ाई झलकती है कि जब वे दिन भर घर से बाहर थे, तो घर का माखन कैसे खा सकते थे।
अर्थ: कृष्ण की भोली-भाली, तर्कपूर्ण बातें सुनकर यशोदा का मन प्यार से भर गया। वे मुसकरा उठीं (हँस पड़ीं) और कृष्ण को अपने हृदय से (गले) लगा लिया। इस पंक्ति में माँ का असीम वात्सल्य प्रकट होता है — डाँटने के बजाय वे बच्चे को स्नेह से गले लगा लेती हैं।
कृष्ण ने अपनी सफ़ाई में अपने बारे में ये बातें बताईं —
• वे सुबह ही गायों के पीछे मधुबन चराने भेज दिए गए थे।
• वे चार पहर (पूरा दिन) बंसीवट के पास घूमते रहे और साँझ ढले घर लौटे।
• वे तो छोटे-से बालक हैं, उनके हाथ (बाँहें) बहुत छोटे हैं।
• इतने छोटे हाथों से वे ऊँचाई पर लटके छीके तक पहुँच ही नहीं सकते।
• ग्वाल-बाल (साथी) उनसे बैर रखते हैं, इसलिए उन्होंने ज़बरदस्ती माखन उनके मुँह पर पोत दिया।
इस प्रकार वे बार-बार यही सिद्ध करना चाहते हैं कि उन्होंने माखन नहीं खाया।
नन्हे कृष्ण जिस भोलेपन और चतुराई से एक-एक तर्क देकर स्वयं को निर्दोष सिद्ध कर रहे थे, उससे यशोदा का हृदय ममता और स्नेह से भर उठा। उन्हें कृष्ण की बातें बड़ी प्यारी लगीं। बच्चे की मासूमियत पर उन्हें क्रोध आने के बजाय हँसी आ गई और वात्सल्य उमड़ पड़ा — इसीलिए उन्होंने कृष्ण को डाँटने के बजाय हँसते हुए गले से लगा लिया।
तुक: जब पंक्तियों के अंतिम शब्दों की ध्वनि एक जैसी होती है, तो उसे ‘तुक’ कहते हैं। जैसे — ‘पठायो’ और ‘आयो’ की अंतिम ध्वनि समान है।
इस पद की विशेषताएँ:
• पूरे पद में प्रत्येक पंक्ति के अंतिम शब्दों में तुक मिलता है (खायो–पठायो–आयो–पायो–लपटायो…), जिससे पद लयबद्ध व गेय बन जाता है।
• यह ब्रजभाषा में रचित है।
• अंतिम पंक्ति में कवि ने अपना नाम “सूरदास” भी दिया है (यह भनिता कहलाती है)।
• इसमें कृष्ण की बाल-लीला और माँ यशोदा का वात्सल्य बड़े मनोहारी ढंग से चित्रित है।
• भाषा सरल, संवादात्मक और भावपूर्ण है — पूरा पद माँ-बेटे के संवाद के रूप में है।
ग्वाल-बालों ने कृष्ण पर माखन चुराकर खाने का आरोप लगाया और उन्हें यशोदा के सामने ले आए। कृष्ण नहीं चाहते थे कि उनकी माँ उन्हें दोषी समझे या उन पर विश्वास खो दे। इसलिए वे स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने और माँ का प्यार व विश्वास बनाए रखने के लिए एक-एक करके तर्क दे रहे थे — ताकि माँ मान जाए कि उन्होंने सचमुच माखन नहीं खाया।
नमूना उत्तर: माँ के गले लगते ही कृष्ण का सारा भय और शिकायत मिट गई होगी। उन्हें बहुत सुकून और खुशी मिली होगी कि माँ ने उन्हें डाँटा नहीं। कृष्ण भी माँ से लिपटकर मुसकरा दिए होंगे, और वह भोला-सा रूठना-मनाना प्रेम में बदल गया होगा। पास खड़े ग्वाल-बाल भी यह दृश्य देखकर मुसकरा उठे होंगे। घर का वातावरण फिर से स्नेह और आनंद से भर गया होगा।
| शब्द | अर्थ | |
|---|---|---|
| 1 | उपजि → | उपजना, उत्पन्न होना |
| 2 | जानि → | जानकर, समझकर |
| 3 | जायो → | जन्मा |
| 4 | जिय → | मन, जी |
| 5 | पठायो → | भेज दिया |
| 6 | पतियायो → | विश्वास किया, सच माना |
| 7 | बहियन → | बाँह, हाथ, भुजा |
| 8 | बिधि → | प्रकार, भाँति, रीति |
| 9 | बिहँसि → | मुसकाई, हँसी |
| 10 | भटक्यो → | इधर-उधर घूमा या भटका |
| 11 | लपटायो → | मला, लगाया, पोता |
इस पद में ‘ल’ और ‘र’ के आपस में बदल जाने के उदाहरण —
ब्रजभाषा में इस प्रकार का वर्ण-परिवर्तन (‘ल/ड़’ का ‘र’ में या ‘र’ का ‘ल’ में बदलना) बहुत आम है। ऐसे और शब्द ढूँढ़कर अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
| पंक्ति | भावार्थ | |
|---|---|---|
| 1 | भोर भयो गैयन के पाछे, मधुबन मोहि पठायो → | सुबह होते ही गायों के पीछे मुझे मधुबन भेज दिया। |
| 2 | चार पहर बंसीवट भटक्यो, साँझ परे घर आयो → | चार पहर बंसीवट में भटकने के बाद साँझ होने पर घर आया। |
| 3 | मैं बालक बहियन को छोटो, छीको केहि बिधि पायो → | मैं छोटा बालक हूँ, मेरी बाँहें छोटी हैं, मैं छीके तक कैसे पहुँच सकता हूँ? |
| 4 | ग्वाल-बाल सब बैर परे हैं, बरबस मुख लपटायो → | ये सब सखा मुझसे बैर रखते हैं, इन्होंने हठपूर्वक मक्खन मेरे मुख पर लिपटा दिया। |
| 5 | तू माता मन की अति भोरी, इनके कहे पतियायो → | माँ, तुम मन की बड़ी भोली हो, इनकी बातों में आ गई हो। |
| 6 | जिय तेरे कछु भेद उपजि है, जानि परायो जायो → | तेरे हृदय में अवश्य कोई भेद है, जो तूने मुझे पराया समझ लिया। |
नमूना उत्तर: एक बार कक्षा में एक सहपाठी की पेंसिल खो गई और सबने सोचा कि शायद मैंने ली है, क्योंकि वह मेरी पेंसिल जैसी थी। मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने शिक्षक के सामने अपनी बात सिद्ध करने के लिए तर्क दिए — कि मेरी पेंसिल पर मेरा नाम लिखा है, और मैं अपने बस्ते से अपनी पेंसिल निकालकर दिखा भी सकता हूँ। बाद में असली पेंसिल उसी सहपाठी के बस्ते में मिल गई और मेरी सच्चाई साबित हो गई। (आप अपने जीवन की ऐसी कोई घटना लिखिए।)
छीका: रस्सियों से बुना हुआ गोल जाल (झूला), जिसे छत या ऊँची जगह से लटकाया जाता है। इसमें दूध, दही, माखन आदि रखे जाते हैं ताकि बिल्ली-कुत्ते उन्हें न पा सकें। कृष्ण भी इसी छीके में रखा माखन निकालते थे।
चित्रों में दिखाई गई घरेलू वस्तुएँ (सामान्य नाम):
इन वस्तुओं के नाम आपके क्षेत्र में अलग भी हो सकते हैं। अपने घर में इन्हें जिस नाम से पुकारा जाता है, वह लिखिए।
- गाय (या भैंस) से दूध दुहा जाता है।
- दूध को आँच पर उबाला/गरम किया जाता है।
- गरम दूध को हल्का ठंडा करके उसमें थोड़ा जामन (दही) मिलाकर जमाया जाता है — इससे दही बनता है।
- जमे हुए दही को मथानी (रई) से मथा/बिलोया जाता है।
- मथने पर ऊपर मक्खन तैरने लगता है, जिसे इकट्ठा कर लिया जाता है।
- इस मक्खन को बर्तन में डालकर आँच पर गरम किया जाता है।
- गरम होते ही मक्खन पिघलकर सुनहरा घी बन जाता है, जिसे छानकर बर्तन/मर्तबान में भर लिया जाता है।
पहर और साँझ की तरह समय बताने वाले कुछ शब्द — पल, क्षण, घड़ी, प्रहर, वेला, भोर, दोपहर, संध्या, कल, आज, अभी/अब, पखवाड़ा, सप्ताह, माह, ऋतु, वर्ष, दशक, सदी (शताब्दी), युग, अवधि आदि।
कृष्ण कहते हैं वे चार पहर गाय चराते/घूमते रहे। एक पहर = 3 घंटे।
अर्थात् श्रीकृष्ण लगभग 12 घंटे गाय चराते थे (भोर से साँझ तक)।
वे कुल 12 घंटे बाहर रहे और शाम 6 बजे (सायं 6:00) लौटे। अतः निकलने का समय —
अर्थात् वे सुबह लगभग 6 बजे गाय चराने के लिए घर से निकले होंगे।
तीसरा पहर 12 बजे शुरू होता है और हर पहर 3 घंटे का होता है। पीछे की ओर गिनने पर —
अर्थात् दिन के पहले पहर का प्रारंभ लगभग सुबह 6 बजे होगा।
नमूना उत्तर:
• मेरी: मुझे अच्छी चित्रकारी करना / कहानियाँ सुनाना आता है।
• मेरे परिजन (माँ) की: स्वादिष्ट भोजन बनाना और सबका ध्यान रखना।
• मेरे शिक्षक की: कठिन विषय को भी बहुत सरल व रोचक ढंग से समझाना।
• मेरे मित्र की: बहुत तेज़ दौड़ना / सुंदर गाना।
(आप अपनी और अपने आसपास के लोगों की विशेष क्षमताएँ लिखिए।)
• पढ़ना जानता है पर पाठ समझ नहीं आ रहा — उसे धैर्य से, आसान उदाहरणों के साथ समझाऊँगा।
• पढ़ना अच्छा लगता है पर देख नहीं सकता — उसे पाठ पढ़कर सुनाऊँगा; ब्रेल पुस्तकें/ऑडियो दिलाने में मदद करूँगा।
• बहुत जल्दी-जल्दी बोलता है, भाषण देना है — उसे रुक-रुककर, धीरे बोलने का अभ्यास कराऊँगा।
• अटक-अटक कर बोलता है, भाषण देना है — प्रोत्साहन दूँगा, बार-बार अभ्यास कराऊँगा और आत्मविश्वास बढ़ाऊँगा।
• चलने में कठिनाई है, सबके साथ दौड़ना चाहता है — उसका सहारा बनूँगा और ऐसे खेल चुनूँगा जिनमें वह भी शामिल हो सके।
• रोज़ आता है पर सुनने में कठिनाई है — उसे आगे बिठाऊँगा, बातें लिखकर/इशारों से समझाऊँगा।
सहायता, सहानुभूति और सबके प्रति संवेदनशीलता — यही वह विशेष क्षमता है जो हम सबके पास होती है।
उत्तर:
महाकवि सूरदास की कुछ प्रमुख रचनाएँ —
• सूरसागर (उनकी सबसे प्रसिद्ध व विशाल रचना, कृष्ण-लीला पर आधारित)
• सूरसारावली
• साहित्य लहरी
इन रचनाओं में से कुछ पद खोजकर पढ़िए और उनमें व्यक्त कृष्ण-भक्ति व वात्सल्य को समझिए।
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