अध्याय 4 – हार की जीत (Chapter 4 – Haar Ki Jeet) | Class 6 Hindi (Malhar) | NCERT Solutions

हार की जीत — प्रश्न व उत्तर | EduGrown

हिंदी · मल्हार · अध्याय 4

हार की जीत

कहानी — सुदर्शन · संपूर्ण पाठ्य-प्रश्नों के हल एक ही स्थान पर

✍️ लेखक: सुदर्शन (1896–1983) 📖 विधा: कहानी 🎯 सभी गतिविधियों के हल सहित
बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान की देखभाल करते हुए
📖 मूल कहानी

हार की जीत

सुदर्शन

माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवत भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे सुलतान कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। उन्होंने रुपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे। “मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा”, उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, “ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड्गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। एक दिन वह दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, “खड्गसिंह, क्या हाल है?” खड्गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।” — “कहो, इधर कैसे आ गए?” — “सुलतान की चाह खींच लाई।” — “विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।” — “मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।” — “उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!” — “कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।” — “क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।” — “बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”

बाबा भारती और खड्गसिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था। सोचने लगा, ‘भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ?’ कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”

बाबा भारती भी मनुष्य ही थे। अपनी चीज़ की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय भी अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए, घोड़ा हवा से बातें करने लगा। उसकी चाल को देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था, आदमी थे और बेरहमी थी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”

बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड्गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे। संध्या का समय था। बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे। सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”

अपाहिज बना डाकू खड्गसिंह घोड़े पर बैठा हुआ, बाबा भारती लगाम पकड़े हुए
🖼️ मूल पाठ्यपुस्तक का चित्र — अपाहिज बने खड्गसिंह को घोड़े पर बिठाते बाबा भारती

आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?” अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।” — “वहाँ तुम्हारा कौन है?” — “दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”

बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड्गसिंह था। बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”

खड्गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।” — “परंतु एक बात सुनते जाओ।” खड्गसिंह ठहर गया। बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ, इसे अस्वीकार न करना; नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।” — “बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँगा।” — “अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”

बाबा भारती और डाकू खड्गसिंह घोड़े सुलतान के साथ खड़े
🖼️ मूल पाठ्यपुस्तक का चित्र — बाबा भारती डाकू खड्गसिंह से वचन लेते हुए

खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसे लगा था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड्गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?” सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे किसी गरीब पर विश्वास न करेंगे। दुनिया से विश्वास उठ जाएगा।” यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न रहा हो।

बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, ‘कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह खयाल था कि कहीं लोग गरीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें।’

रात के अँधेरे में खड्गसिंह बाबा भारती के मंदिर में पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड्गसिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।

रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन-भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए। घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर घुसे और अपने घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े पुत्र से मिल रहा हो। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। और कहते थे, “अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”

थोड़ी देर के बाद जब वह अस्तबल से बाहर निकले तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह गिर रहे थे, जहाँ बाहर निकलने के बाद खड्गसिंह खड़ा होकर रोया था। दोनों के आँसुओं का उस भूमि की मिट्टी पर परस्पर मेल हो गया।

— सुदर्शन

लेखक सुदर्शन

लेखक से परिचय — सुदर्शन

(1896 – 1983)

यह कहानी हिंदी की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है और इसे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक सुदर्शन ने लिखा है। सुदर्शन का वास्तविक नाम बदरीनाथ भट्ट था। उन्होंने पहली कहानी तब लिखी थी जब वे स्वयं छठी कक्षा में पढ़ते थे।

सुदर्शन ने कहानियों के अतिरिक्त कविताएँ, लेख, नाटक और उपन्यास भी लिखे। इसके अलावा उन्होंने अनेक फ़िल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे।

1️⃣ पाठ से — In-text Questions7 गतिविधियाँ

🌤️ मेरी समझ से

(क) 1. सुलतान के छीने जाने का बाबा भारती पर क्या प्रभाव हुआ?
⭐ बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया बाबा भारती ने गरीबों की सहायता करना बंद कर दिया बाबा भारती ने द्वार बंद करना छोड़ दिया बाबा भारती असावधान हो गए
सही उत्तर: बाबा भारती के मन से चोरी का डर समाप्त हो गया। कहानी में लिखा है — “फाटक खुला पड़ा था… परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था।” जब तक सुलतान उनके पास था, तब तक चोरी होने का डर बना रहता था और वे स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे। परंतु घोड़ा छिन जाने के बाद अब उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा था, इसलिए चोरी का डर अपने आप समाप्त हो गया।
2. “बाबा भारती भी मनुष्य ही थे।” इस कथन के समर्थन में लेखक ने कौन-सा तर्क दिया है?
बाबा भारती ने डाकू को घमंड से घोड़ा दिखाया ⭐ बाबा भारती घोड़े की प्रशंसा दूसरों से सुनने के लिए व्याकुल थे बाबा भारती को घोड़े से अत्यधिक लगाव और मोह था बाबा भारती हर पल घोड़े की रखवाली करते रहते थे
सही उत्तर: बाबा भारती घोड़े की प्रशंसा दूसरों से सुनने के लिए व्याकुल थे। कहानी में स्पष्ट लिखा है — “बाबा भारती भी मनुष्य ही थे। अपनी चीज़ की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय भी अधीर हो गया।” इसी कारण उन्होंने खड्गसिंह के उकसाने पर घोड़े को दौड़ाकर उसकी चाल दिखाई — यह मानवीय स्वभाव (अपनी वस्तु की तारीफ सुनने की चाह) एक साधु में भी होना यह सिद्ध करता है कि साधु होने के बावजूद बाबा भारती के भीतर भी सामान्य मनुष्यों जैसी भावनाएँ थीं।
(ख) अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
कक्षा में चर्चा करते समय बताया जा सकता है कि दोनों उत्तर सीधे कहानी की पंक्तियों पर आधारित हैं — पहले प्रश्न में कहानी स्वयं बताती है कि फाटक पर पहरा देने की ज़रूरत अब नहीं रही थी, और दूसरे प्रश्न में लेखक ने खुद यह वाक्य लिखा है कि बाबा भारती का हृदय प्रशंसा सुनने को अधीर हो गया था। इसलिए ये उत्तर कहानी में दिए गए प्रमाण (सबूत) के आधार पर सबसे सटीक हैं। (यह एक मौखिक चर्चा गतिविधि है — विद्यार्थी अपने शब्दों में तर्क दे सकते हैं।)

🏷️ शीर्षक

(क) सुदर्शन ने इस कहानी को ‘हार की जीत’ नाम क्यों दिया होगा? कारण भी लिखिए।
इस कहानी का शीर्षक एक गहरा भाव (विरोधाभास) छिपाए हुए है। ऊपर से देखने पर लगता है कि बाबा भारती अपना सबसे प्रिय घोड़ा सुलतान डाकू खड्गसिंह से ‘हार’ गए — उन्होंने उसे घोड़ा सौंप दिया। परंतु असल में यही उनकी सबसे बड़ी ‘जीत’ बनी — बाबा भारती के त्याग, प्रेम और उदारता ने डाकू खड्गसिंह जैसे कठोर हृदय वाले व्यक्ति को भी बदल दिया और उसे पश्चाताप कराकर घोड़ा लौटाने पर मजबूर कर दिया। अर्थात् भौतिक (सांसारिक) रूप से हारकर भी बाबा भारती ने नैतिक (मानवीय) रूप से जीत हासिल की — इसीलिए कहानी का नाम ‘हार की जीत’ रखा गया है।
(ख) यदि आपको इस कहानी को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? कारण भी बताइए।
नमूना उत्तर: इस कहानी को ‘सच्चा त्याग’ या ‘हृदय-परिवर्तन’ या ‘प्रेम की जीत’ नाम भी दिया जा सकता है।
➤ ‘हृदय-परिवर्तन’ इसलिए उपयुक्त है क्योंकि कहानी का मुख्य विषय यही है कि कैसे बाबा भारती के व्यवहार ने एक क्रूर डाकू के मन को पूरी तरह बदल दिया।
➤ ‘सच्चा त्याग’ इसलिए भी सही लगता है क्योंकि बाबा भारती ने अपनी सबसे प्रिय वस्तु का त्याग बिना किसी शिकायत के किया। (विद्यार्थी अपनी पसंद का कोई भी उपयुक्त नाम सोचकर लिख सकते हैं।)
(ग) बाबा भारती ने डाकू खड्गसिंह से कौन-सा वचन लिया?
बाबा भारती ने खड्गसिंह से घोड़ा वापस माँगने के बजाय केवल यह वचन लिया कि वह इस पूरी घटना (सुलतान के छीने जाने) को कभी किसी के सामने प्रकट न करे — क्योंकि यदि लोगों को यह पता चल जाता कि एक साधु का इकलौता प्रिय घोड़ा भी डाकू ने छीन लिया, तो दुनिया का गरीबों और साधु-संतों पर से विश्वास ही उठ जाता।

💬 पंक्तियों पर चर्चा

कहानी से चुने गए इन वाक्यों को ध्यान से पढ़िए और इनका अर्थ लिखिए —
1. “भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता।”
इसका अर्थ है कि बाबा भारती अपने ईश्वर-भजन के अतिरिक्त बचा हुआ पूरा समय अपने घोड़े सुलतान की देखभाल में ही बिताते थे। यह पंक्ति दिखाती है कि उन्हें अपने घोड़े से लगभग भगवान जितना ही प्रेम था।
2. “बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से।”
बाबा भारती को अपने सुंदर घोड़े पर बड़ा गर्व (घमंड) था, इसलिए उन्होंने उसे बड़े गर्व के साथ दिखाया; वहीं खड्गसिंह ने अपने जीवन में सैकड़ों घोड़े देखे होने पर भी ऐसा सुंदर घोड़ा पहले कभी न देखा था, इसलिए वह आश्चर्यचकित रह गया।
3. “वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अधिकार समझता था।”
यह पंक्ति खड्गसिंह के डाकू-स्वभाव को उजागर करती है — वह बलपूर्वक दूसरों की मनपसंद चीज़ें छीन लेना अपना अधिकार समझता था। यह पंक्ति आगे होने वाली घटना (घोड़े को छल से छीनना) का पूर्वाभास (संकेत) भी देती है।
4. “बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है।”
यह उपमा (तुलना) बाबा भारती की बेबसी और लाचारी को दर्शाती है। जैसे एक बकरा मृत्यु के निकट कसाई के सामने असहाय होता है, वैसे ही बाबा भारती भी अपने प्रिय घोड़े को खोने की पीड़ा में स्वयं को असहाय महसूस कर रहे थे, फिर भी उन्होंने बड़े संयम और साहस से घोड़ा खड्गसिंह को सौंप दिया।
5. “उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई।”
बाबा भारती की आदत के अनुसार उनके पाँव स्वयं ही सुलतान को देखने के लिए अस्तबल की ओर बढ़ गए, पर फाटक पर पहुँचते ही उन्हें याद आया कि अब सुलतान वहाँ नहीं है — इसलिए यह उनकी ‘भूल’ (पुरानी आदतवश हुई गलती) थी, जिसने उन्हें गहरी निराशा से भर दिया।

🤔 सोच-विचार के लिए

“दोनों के आँसुओं का उस भूमि की मिट्टी पर परस्पर मेल हो गया।”
(क) किस-किस के आँसुओं का मेल हो गया था?
बाबा भारती के आँसुओं और डाकू खड्गसिंह के आँसुओं का मेल हो गया था — दोनों अलग-अलग समय पर उसी स्थान पर खड़े होकर रोए थे।
(ख) दोनों के आँसुओं में क्या अंतर था?
खड्गसिंह के आँसू पश्चाताप (ग्लानि) के आँसू थे — उसे अपने बुरे कर्म (घोड़ा छल से छीनने) पर गहरा अफ़सोस हो रहा था। वहीं बाबा भारती के आँसू हर्ष और संतोष के आँसू थे — अपने प्रिय घोड़े को वापस पाकर उनकी खुशी का ठिकाना न था। भावना अलग-अलग होते हुए भी दोनों के आँसू एक ही मिट्टी पर मिल गए, जो यह दर्शाता है कि प्रेम व सच्चाई ने अंततः दोनों के हृदय को भी आपस में जोड़ (मिला) दिया।

दिनचर्या

(क) कहानी के आधार पर बाबा भारती की दिनचर्या लिखिए — वे सुबह उठने से रात सोने तक क्या-क्या करते होंगे?
नमूना दिनचर्या:
समयक्रियाकलाप
सुबह जल्दी उठकरठंडे जल से स्नान करते
प्रातः कालभगवान का भजन-कीर्तन करते
भजन के बादसुलतान को नहलाते, खरहरा करते, अपने हाथ से दाना खिलाते
दोपहरकुटिया में विश्राम करते व साधु-संतों से भेंट करते
संध्या समयसुलतान पर सवार होकर आठ-दस मील की सैर (चक्कर) लगाते
रात्रिसुलतान की देखभाल कर, अस्तबल का फाटक बंद कर लाठी लेकर पहरा देते, फिर विश्राम करते
(ख) अब अपनी दिनचर्या भी लिखिए।
नमूना उत्तर: मैं सुबह ______ बजे उठता/उठती हूँ, स्नान करके स्कूल जाने के लिए तैयार होता/होती हूँ। स्कूल से आने के बाद खाना खाकर थोड़ा आराम करता/करती हूँ, फिर खेलने जाता/जाती हूँ और शाम को होमवर्क करता/करती हूँ। रात को परिवार के साथ भोजन करके सोने चला/चली जाता/जाती हूँ। (विद्यार्थी अपनी वास्तविक दिनचर्या के अनुसार इसे भर सकते हैं।)

🖋️ कहानी की रचना

(क) इस कहानी की कौन-कौन सी बातें आपको पसंद आईं?
नमूना उत्तर: मुझे यह बात सबसे अच्छी लगी कि बाबा भारती ने अपने सबसे प्रिय घोड़े को खोकर भी क्रोध या बदले की भावना नहीं दिखाई, बल्कि करुणा और क्षमाशीलता बनाए रखी। मुझे खड्गसिंह का हृदय-परिवर्तन (पश्चाताप करके घोड़ा लौटाना) भी बहुत भावुक और प्रेरणादायक लगा। कहानी का अंत जहाँ बाबा भारती अपने घोड़े से मिलकर रोते हैं, वह भाग सबसे मार्मिक (touching) है।
(ख) इस कहानी में आए संवादों के विषय में अपने विचार लिखिए।
इस कहानी के संवाद (जैसे बाबा भारती और खड्गसिंह के बीच की बातचीत) कहानी को बहुत सजीव और रोचक बनाते हैं। छोटे-छोटे संवादों से ही पात्रों के मन के भाव — जैसे खड्गसिंह का घमंड व लालच, बाबा भारती की सरलता व विश्वास, और अंत में खड्गसिंह का पश्चाताप — बहुत स्वाभाविक ढंग से सामने आ जाते हैं। संवादों की सरल भाषा के कारण पाठक को ऐसा लगता है मानो वह स्वयं इस घटना को अपनी आँखों से घटित होते देख रहा हो।

🔤 मुहावरे कहानी से

(क) कहानी से चुने गए मुहावरों को खोजकर उनका अर्थ व प्रयोग समझिए —
लट्टू होना
अर्थ: किसी पर पूरी तरह मोहित/आसक्त हो जाना।
कहानी में: “वे उसकी चाल पर लट्टू थे” — बाबा भारती सुलतान की चाल पर पूरी तरह मोहित थे।
हृदय पर साँप लोटना
अर्थ: ईर्ष्या, जलन या तीव्र लालच महसूस होना।
कहानी में: “उसकी चाल को देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया” — घोड़ा पाने का लालच खड्गसिंह के मन में जाग उठा।
फूले न समाना
अर्थ: बहुत अधिक प्रसन्न होना।
कहानी में: “मन में फूले न समाते थे” — घोड़े को देखकर बाबा भारती बहुत खुश हो जाते थे।
मुँह मोड़ लेना
अर्थ: किसी से नाता या संबंध तोड़ लेना।
कहानी में: “उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे कभी कोई संबंध ही न रहा हो।”
मुख खिल जाना
अर्थ: चेहरे पर खुशी छा जाना।
कहानी में: “इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था।”
न्योछावर कर देना
अर्थ: किसी के लिए अपना सब कुछ त्याग देना या समर्पित कर देना।
कहानी में: बाबा भारती ने अपना धन-संपत्ति त्यागकर अंततः अपना प्रिय घोड़ा भी न्योछावर कर दिया।
(ख) अब इन मुहावरों का प्रयोग करते हुए नए वाक्य बनाइए।
नमूना वाक्य:
  • मोहन अपनी नई साइकिल पर लट्टू हो गया।
  • परीक्षा में फेल होने की खबर सुनकर उसके हृदय पर साँप लोट गया।
  • पुरस्कार पाकर सीमा फूले न समाई।
  • दोस्त की बेईमानी देखकर राम ने उससे मुँह मोड़ लिया।
  • अच्छे अंक देखकर माँ का मुख खिल उठा।
  • सैनिकों ने देश की रक्षा के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया।

🎭 कैसे-कैसे पात्र

इस कहानी के तीन मुख्य पात्र हैं — बाबा भारती, डाकू खड्गसिंह और सुलतान घोड़ा। इनके गुणों को बताने वाले शब्दों से शब्द-चित्रों (word-clouds) को पूरा कीजिए —
बाबा भारती, डाकू खड्गसिंह और सुलतान घोड़ा के शब्द-चित्र मूल पाठ्यपुस्तक से
☀️ बाबा भारती
दयालु (दिया गया) धार्मिक त्यागी सरल-हृदय क्षमाशील विश्वासी
☀️ डाकू खड्गसिंह
बाहुबली (दिया गया) निर्दयी प्रसिद्ध (कुख्यात) लालची धूर्त (चालाक) पश्चातापी
☀️ सुलतान घोड़ा
सुंदर (दिया गया) बलवान स्वामिभक्त फुर्तीला बाँका (आकर्षक) अनोखा
📌 आपने जो शब्द लिखे हैं, वे किसी की विशेषता, गुण और प्रकृति के बारे में बताने के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। ऐसे शब्दों को विशेषण कहते हैं।
2️⃣ पाठ से आगे — Exercise Questions2 गतिविधियाँ

🐎 सुलतान की कहानी

मान लीजिए, यह कहानी सुलतान सुना रहा है। तब कहानी कैसे आगे बढ़ती? स्वयं को सुलतान के स्थान पर रखकर कहानी बनाइए। (संकेत — मेरा नाम सुलतान है। मैं एक घोड़ा हूँ….)
नमूना उत्तर: मेरा नाम सुलतान है। मैं एक घोड़ा हूँ। मेरे स्वामी बाबा भारती मुझसे बहुत प्रेम करते थे — वे अपने हाथों से मुझे दाना खिलाते और खरहरा करते थे। एक दिन एक डाकू खड्गसिंह मुझे देखने आया और मुझ पर मोहित हो गया। कुछ समय बाद वह छल से अपाहिज बनकर आया और मुझे लेकर भाग गया। मुझे अपने प्रिय स्वामी से दूर जाना बहुत बुरा लगा, परंतु जब खड्गसिंह के मन में पश्चाताप जागा, तो वह मुझे चुपचाप वापस बाबाजी के पास बाँध गया। जब बाबाजी की चाप मैंने पहचानी, तो मैं खुशी से ज़ोर से हिनहिनाया। मेरे स्वामी दौड़ते हुए आए और मुझसे लिपटकर रोने लगे — मुझे भी बहुत खुशी हुई कि मैं अपने प्रिय स्वामी के पास वापस आ गया। (यह एक रचनात्मक लेखन गतिविधि है — विद्यार्थी अपनी कल्पना से इसे आगे बढ़ा सकते हैं।)

💗 मन के भाव

(क) कहानी में से चुने गए शब्द — बताइए, कहानी में कौन, कब, ऐसा अनुभव कर रहा था?
भावकौन, कब अनुभव कर रहा था
चकितखड्गसिंह जब उसने सुलतान को पहली बार देखा — “खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से।”
अधीरबाबा भारती जब घोड़े की प्रशंसा दूसरों से सुनने को व्याकुल हुए; खड्गसिंह जब सुलतान को देखने का हृदय अधीर हो उठा।
डरबाबा भारती जब खड्गसिंह ने कहा, “मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”
प्रसन्नताबाबा भारती जब वे सुलतान पर सवार होकर घूमते थे, और अंत में जब घोड़ा वापस मिला।
करुणाअपाहिज (असल में खड्गसिंह) की आवाज़ में करुणा थी, जिसे सुनकर बाबा भारती द्रवित हो गए।
निराशाबाबा भारती जब फाटक पर पहुँचकर उन्हें याद आया कि सुलतान अब वहाँ नहीं है।
(ख) आप उपर्युक्त भावों को कब-कब अनुभव करते हैं?
नमूना उत्तर: मुझे प्रसन्नता तब होती है जब मुझे परीक्षा में अच्छे अंक मिलते हैं। मुझे डर तब लगता है जब मैं अंधेरे कमरे में अकेला जाता/जाती हूँ। मुझे किसी दुखी या घायल व्यक्ति/जानवर को देखकर करुणा महसूस होती है। जब मुझे कोई पसंदीदा उपहार मिलने वाला हो तो मैं अधीर हो जाता/जाती हूँ, और जब कोई काम बिगड़ जाए तो मुझे निराशा होती है।
3️⃣ झरोखे से — Extra Reading2 भाग

🍃 झरोखे से — वह चली हवा

लेखक सुदर्शन ने अनेक कविताएँ भी लिखी हैं। उनकी लिखी यह कविता पढ़िए —
वह चली हवा
वह चली हवा,
वह चली हवा।
ना तू देखे
ना मैं देखूँ

पर पत्तों ने तो देख लिया
वरना वे खुशी मनाते क्यों?
वह चली हवा,
वह चली हवा।
— सुदर्शन
साझी समझ — आपको इस कविता में क्या अच्छा लगा?
नमूना उत्तर: मुझे इस कविता में यह बात सबसे अच्छी लगी कि हवा को हम अपनी आँखों से नहीं देख सकते, फिर भी पेड़ों के हिलते हुए पत्तों को देखकर हमें पता चल जाता है कि हवा चली है। कवि ने बहुत सुंदर ढंग से यह बताया है कि कुछ चीज़ें सीधे दिखाई न देने पर भी अपने प्रभाव (असर) से महसूस की जा सकती हैं — जैसे पत्तों का हिलना व खुशी से लहराना हवा के चलने का प्रमाण देता है। कविता की सरल भाषा और दोहराव (जैसे “वह चली हवा, वह चली हवा”) इसे गुनगुनाने में भी आसान बनाते हैं।

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📚 यह एक स्वाध्याय (स्वयं पढ़ने की) गतिविधि है, इसमें कोई निश्चित ‘उत्तर’ नहीं है — विद्यार्थियों को सुदर्शन की अन्य रचनाओं को पढ़कर कक्षा में उन पर चर्चा करनी है।
🐎 सभी उत्तर NCERT ‘मल्हार’ पाठ्यपुस्तक, अध्याय 4 — ‘हार की जीत’ पर आधारित हैं। @EduGrown

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