गोल
‘हॉकी के जादूगर’ मेजर ध्यानचंद के संस्मरण पर आधारित पाठ के सम्पूर्ण प्रश्न-उत्तर — सरल, विस्तृत और चित्रों सहित।
पाठ से
पाठ पर आधारित समझ के प्रश्न
ध्यानचंद ने अपना ‘बदला’ हॉकी मारकर या झगड़ा करके नहीं, बल्कि एक के बाद एक छह गोल करके लिया और फिर उसी खिलाड़ी की पीठ थपथपाकर प्यार से समझाया। इससे साफ़ पता चलता है कि उनके मन में द्वेष या प्रतिशोध की भावना नहीं थी।
उनका पूरा संदेश यही है कि खेल में गुस्सा और हिंसा नहीं, बल्कि सच्ची खेल भावना होनी चाहिए — इसलिए सबसे सटीक उत्तर यही है।
बर्लिन ओलंपिक (1936) में लोग ध्यानचंद के गेंद पर अद्भुत नियंत्रण, तेज़ ड्रिबलिंग और लगातार गोल करने की असाधारण कुशलता से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहने लगे। गेंद मानो उनकी स्टिक से चिपक जाती थी।
यह चमत्कार उनकी स्टिक का नहीं, उनके खेल-कौशल का था — इसलिए सही उत्तर पहला विकल्प है।
पहले प्रश्न में मैंने “खेल को सही भावना से खेलना चाहिए” इसलिए चुना क्योंकि ध्यानचंद ने बदला हिंसा से नहीं, बल्कि अच्छे खेल-प्रदर्शन से लिया और अंत में उस खिलाड़ी से मित्रता जैसा व्यवहार किया।
दूसरे प्रश्न में “विशेष कौशल” इसलिए चुना क्योंकि पाठ में स्पष्ट लिखा है कि लोग उनके हॉकी खेलने के ढंग से प्रभावित होकर उन्हें जादूगर कहने लगे।
यह चर्चा-गतिविधि है — कक्षा में मित्रों के साथ अपने-अपने तर्क साझा कीजिए।
| शब्द | सही अर्थ या संदर्भ |
|---|---|
| 1. लांस नायक | → भारतीय सेना का एक पद (रैंक) है। |
| 2. बर्लिन ओलंपिक | → वर्ष 1936 में जर्मनी के बर्लिन शहर में आयोजित ओलंपिक खेल प्रतियोगिता, जिसमें 49 देशों ने भाग लिया था। |
| 3. पंजाब रेजिमेंट | → स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज़ों की भारतीय सेना का एक दल। |
| 4. सैंपर्स एंड माइनर्स टीम | → अंग्रेज़ों के समय का एक हॉकी दल। |
| 5. सूबेदार | → स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अधिकारियों का दूसरा सबसे बड़ा पद था। |
| 6. छावनी | → सैनिकों के रहने का क्षेत्र। |
जो व्यक्ति दूसरों के साथ बुरा करता है, उसके मन में हमेशा यह डर बना रहता है कि कहीं कोई उसके साथ भी वैसा ही बुरा व्यवहार न कर दे। बुरे कर्मों से मन कभी शांत नहीं रहता; अपराध-बोध और भय उसे चैन से जीने नहीं देते।
पाठ में जिस खिलाड़ी ने ध्यानचंद के सिर पर हॉकी मारी, वह बाद में हर समय डरता रहा कि ध्यानचंद कब बदला लेंगे — यही इस पंक्ति का जीता-जागता उदाहरण है।
ध्यानचंद स्वयं गोल करने का यश लेने के बजाय अपने साथी खिलाड़ियों को आगे बढ़ने और गोल करने का अवसर देते थे। यह उनकी टीम-भावना और निःस्वार्थता को दर्शाता है।
वे व्यक्तिगत प्रसिद्धि से ऊपर टीम की जीत को रखते थे। इसी सच्ची खेल भावना के कारण दुनिया भर के खेल-प्रेमियों ने उन्हें दिल से चाहा।
ध्यानचंद के अनुसार सफलता का कोई जादुई ‘गुरु-मंत्र’ नहीं था। उनकी सफलता के सबसे बड़े मंत्र थे —
- लगन — खेल के प्रति गहरा प्रेम और समर्पण।
- साधना — निरंतर, कठोर अभ्यास।
- खेल भावना — सच्ची भावना से, ईमानदारी और टीम-प्रेम के साथ खेलना।
इसके साथ ही वे हार-जीत को व्यक्तिगत न मानकर देश की मानते थे और प्रतिद्वंद्वी के प्रति भी सद्भाव रखते थे — यही उनकी सफलता का असली रहस्य था।
- वे गेंद को गोल के पास ले जाकर साथी खिलाड़ी को दे देते ताकि गोल का श्रेय उसे मिले।
- सारे गोल स्वयं करने के बजाय पूरी टीम को आगे बढ़ाते थे।
- उन्होंने कहा — “हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।”
- सिर पर हॉकी मारने वाले खिलाड़ी से भी उन्होंने द्वेष-भरा बदला नहीं लिया।
ये सभी बातें दर्शाती हैं कि वे आत्म-प्रचार के बजाय टीम और देश को प्राथमिकता देते थे।
- यह उत्तम पुरुष (‘मैं’ शैली) में लिखा गया है — लेखक स्वयं अपनी कहानी सुनाता है।
- लेखक पाठक से सीधे बातचीत करता है, मानो अपनी यादें साझा कर रहा हो।
- इसमें बीते समय (सन् 1933, 1936 आदि) की सच्ची घटनाओं का वर्णन है।
- घटनाएँ तिथि/वर्ष के साथ क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत हैं।
- भाषा सरल, आत्मीय और सजीव है।
- इसमें लेखक के जीवन-मूल्य (खेल भावना, विनम्रता, देशप्रेम) झलकते हैं।
यह समूह-गतिविधि है। ऊपर दी गई विशेषताओं की सूची अपने समूह में तैयार कर, कक्षा में सबके सामने प्रस्तुत कीजिए और अन्य समूहों की सूची से मिलान कीजिए।
इनमें दोनों शब्द एक जैसे हैं; बीच में लगी छोटी रेखा ‘योजक चिह्न’ कहलाती है।
| दिया गया रूप | योजक सहित रूप |
|---|---|
| अच्छा या बुरा | अच्छा-बुरा |
| छोटा या बड़ा | छोटा-बड़ा |
| अमीर और गरीब | अमीर-गरीब |
| उत्तर और दक्षिण | उत्तर-दक्षिण |
| गुरु और शिष्य | गुरु-शिष्य |
| अमृत या विष | अमृत-विष |
पहले वाक्य में ‘ही’ शब्द है, जो बात पर बल (ज़ोर) देता है — अर्थात् “मैंने निश्चित/पक्के तौर पर बदला ले लिया है।” दूसरे वाक्य में ‘ही’ नहीं है, इसलिए वह एक सामान्य कथन बन जाता है और उसका ज़ोर कम हो जाता है।
‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ वाले पाठ के वाक्य (उदाहरण):
- “खेल में तो यह सब चलता ही है।”
- “उन दिनों भी यह सब चलता था।”
- “मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं।”
- “इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था।”
यदि इन वाक्यों से ‘ही/भी/तो’ हटा दिए जाएँ, तो उनमें जो ज़ोर है वह समाप्त हो जाएगा और कथन सामान्य व कमज़ोर पड़ जाएगा।
पाठ से आगे
विस्तार, रचनात्मक एवं गतिविधि प्रश्न
हाँ, मैं भी बदला लेता — पर हॉकी मारकर या झगड़ा करके नहीं। मैं ध्यानचंद की तरह अपने खेल-कौशल से अधिक गोल करके और बेहतरीन प्रदर्शन करके उस खिलाड़ी को दिखाता कि जीत गुस्से या हिंसा से नहीं, बल्कि मेहनत और खेल भावना से मिलती है।
इससे बदला भी लिया जाता और सामने वाले को एक अच्छी सीख भी मिलती।
यह व्यक्तिगत उत्तर है — आप अपने विचार अपने शब्दों में लिख सकते हैं।
मुझे हॉकी और क्रिकेट सबसे अच्छे लगते हैं, क्योंकि इनमें टीम-भावना, फुर्ती और रणनीति — तीनों की ज़रूरत होती है। खिलाड़ियों में मुझे मेजर ध्यानचंद सबसे प्रिय हैं, क्योंकि उनके अद्भुत खेल-कौशल के साथ-साथ उनकी विनम्रता, टीम-प्रेम और देशभक्ति भी अनूठी थी।
यह आपकी अपनी पसंद पर आधारित प्रश्न है — अपने पसंदीदा खेल व खिलाड़ी का नाम व कारण लिखिए।
अपने घर या पुस्तकालय से समाचार-पत्र लेकर उसका खेल पृष्ठ देखिए। किसी एक रोचक खेल-समाचार को चुनिए और उसमें ये बातें ध्यान से लिखिए —
- शीर्षक (समाचार का नाम)
- कौन-सा खेल, कहाँ और कब हुआ
- कौन जीता/हारा और परिणाम क्या रहा
- खास खिलाड़ी या रोचक घटना
रेडियो/दूरदर्शन की कमेंटरी शैली में, पाँच मिनट के लिए किसी खेल का सजीव वर्णन कीजिए। जैसे —
“…और गेंद अब मैदान के बीचोंबीच है! खिलाड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा है… ड्रिबल… पास… और गोल! क्या शानदार गोल है, दर्शक झूम उठे हैं…”
बारी-बारी से प्रत्येक समूह कक्षा के सामने बैठकर कमेंटरी का अभिनय करेगा।
- पहले माध्यम चुनिए — कोई लेखन-पुस्तिका या ऑनलाइन मंच।
- आप प्रतिदिन, कुछ दिनों में एक बार, या जब मन करे तब लिख सकते हैं।
- शब्दों/वाक्यों की कोई सीमा नहीं — दो वाक्य हों या दो पृष्ठ। बस उचित और शालीन शब्दों में लिखिए।
नमूना डायरी-प्रविष्टि:
“आज दिनांक … । आज विद्यालय में हमने हॉकी खेली। मेरी टीम हार गई, पर मैंने ठान लिया है कि कल और अभ्यास करूँगा — क्योंकि ध्यानचंद जी कहते थे, सफलता का मंत्र लगन और साधना है।”
यह एक मज़ेदार भूल-भुलैया (maze) है। हर खिलाड़ी की गेंद से शुरू होकर पीली रेखाओं के रास्ते पर उँगली/पेंसिल घुमाते हुए आगे बढ़िए। जिस खिलाड़ी की गेंद का रास्ता बिना रुके, बिना दीवार से टकराए सीधे गोल (जाल) तक पहुँच जाता है — वही खिलाड़ी गोल करेगा।
संकेत: बाकी दो रास्ते बीच में ही बंद (dead-end) हो जाते हैं। रंगीन गेंद से गोल तक रेखा को ध्यान से जोड़कर स्वयं उत्तर खोजिए — यही इस पहेली का मज़ा है!
- दो दल बनाइए, हर दल में कम-से-कम दो-दो खिलाड़ी हों।
- टॉस कीजिए; जीतने वाला दल खेल आरंभ करेगा।
- बाँस की गेंद (दुईत) को छोटे घेरे में रखकर ‘गोथा’ (डंडे) से पीटते हुए विरोधी दल के पाले में दूर तक ले जाइए।
- जो दल गेंद को अधिक-से-अधिक बार विरोधी के पाले में ढकेल दे, वही विजयी होता है।
यह गतिविधि-प्रश्न है — मैदान में मित्रों के साथ खेलकर आनंद लीजिए।
- दो दल होते हैं; एक दल पीछा करता है, दूसरा बचता है।
- पीछा करने वाले दल के 8 खिलाड़ी एक पंक्ति में बारी-बारी विपरीत दिशा में बैठते हैं; एक खिलाड़ी ‘चेज़र’ होता है।
- चेज़र दौड़कर विरोधी को छूता है; ‘खो’ बोलकर बैठे साथी को दौड़ने का मौका दे सकता है।
- निश्चित समय में जो दल अधिक खिलाड़ियों को आउट करे, वही जीतता है।
आप अपने मोहल्ले/विद्यालय के किसी भी खेल (जैसे कबड्डी, पिट्ठू, लंगड़ी) के नियम इसी सरल ढंग से लिख सकते हैं।
- हॉकी के जादूगर – मेजर ध्यानचंद : प्रेरक गाथाएँ
- हॉकी के जादूगर – मेजर ध्यानचंद
- ओलंपिक
- मेजर ध्यानचंद से साक्षात्कार
ये सामग्री पाठ्यपुस्तक में छपे क्यू.आर. कोड को स्कैन करके देखी जा सकती है।
दौड़ में एक बच्चा गिर पड़ा तो बाकी सभी प्रतिभागी रुककर लौट आए, उसे उठाया और सबने हाथ पकड़कर एक साथ दौड़ पूरी की। निर्णायकों ने सबको स्वर्ण पदक दिया।
यह प्रसंग बताता है कि जीत से बड़ी मित्रता और खेल भावना होती है — ठीक वैसे ही जैसे ध्यानचंद हार-जीत को व्यक्तिगत नहीं, पूरी टीम व देश की मानते थे।
हिंदी · मल्हार · पाठ 2 : गोल (मेजर ध्यानचंद)
