Ch-5 कबीर के दोहे ‘Kabir Das ke dohe’ Class 8th Hindi (Malhar) NCERT Solution

कबीर के दोहे — प्रश्न-उत्तर एवं व्याख्या
पाठ 5 · मल्हार · हिंदी

कबीर के दोहे

सम्पूर्ण प्रश्न–उत्तर, व्याख्या एवं अर्थ सहित

संत कबीर · कबीर वचनावली

कवि से परिचय

एक ऐसे संत जो करघे पर कपड़ा और मन में कविता बुनते-बुनते इतने प्रसिद्ध हो गए कि उनकी कविताएँ आज भी लोग भजनों की तरह सुनते हैं और पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाते हैं। माना जाता है कि कबीर का जन्म चौदहवीं शताब्दी में काशी में हुआ था। उनकी रचनाएँ मुख्यतः कबीर ग्रंथावली में संगृहीत हैं। आज भी उनकी रचनाएँ हमें जीवन की सच्चाई को समझने और अच्छा मनुष्य बनने की प्रेरणा देती हैं।

कबीर का चित्र (डाक टिकट)
संत कबीर
करघे पर कपड़ा बुनते कबीर
करघे पर कबीर

मूल दोहे एवं अर्थ

1
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
अर्थ — सत्य के समान कोई तप (तपस्या) नहीं है और झूठ के समान कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य का वास है, उसके हृदय में स्वयं गुरु (ईश्वर) निवास करते हैं।
2
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
अर्थ — केवल बड़े या ऊँचे हो जाने का कोई लाभ नहीं, जैसे खजूर का पेड़ ऊँचा तो होता है पर राहगीर को न तो छाया देता है और उसके फल भी इतने दूर (ऊँचे) लगते हैं कि किसी के काम नहीं आते। अर्थात् बड़प्पन तभी सार्थक है जब वह दूसरों के काम आए।
ऊँचे खजूर के पेड़ों के पास चलते राहगीर

— ऊँचे खजूर देते हैं न छाया, न सहज फल

3
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
अर्थ — गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों एक साथ खड़े हैं, तो पहले किसके चरण छुऊँ? कबीर कहते हैं — मैं अपने गुरु पर न्योछावर जाता हूँ, क्योंकि उन्हीं ने मुझे गोविंद (ईश्वर) तक पहुँचने का मार्ग बताया।
4
अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
अर्थ — किसी भी बात की अति अच्छी नहीं होती — न तो अधिक बोलना अच्छा है, न अधिक चुप रहना; न अधिक वर्षा अच्छी है, न अधिक धूप। जीवन में हर परिस्थिति में संतुलन आवश्यक है।
5
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
अर्थ — ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें मन का अहंकार (आपा) न हो। ऐसी वाणी दूसरों को भी शीतलता (शांति) पहुँचाती है और स्वयं को भी शीतल व शांत रखती है।
6
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
अर्थ — अपनी निंदा (आलोचना) करने वाले को अपने पास ही रखना चाहिए, चाहे आँगन में कुटिया बनाकर। वह बिना पानी और बिना साबुन के ही हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है, क्योंकि वह हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का अवसर देता है।
7
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
अर्थ — साधु (विवेकशील व्यक्ति) को सूप (अनाज फटकने वाले छाज) के समान होना चाहिए, जो सार (उपयोगी अनाज) को रख लेता है और थोथा (निरर्थक भूसा) को उड़ा देता है। अर्थात् अच्छाई को ग्रहण करो और बुराई को छोड़ दो।
विचरण करते तीन साधु

— सार को थामे, थोथा को त्यागते साधु

8
कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
अर्थ — कबीर कहते हैं कि मन पक्षी के समान चंचल हो गया है, जहाँ चाहे वहाँ उड़ जाता है। मनुष्य जैसी संगति करता है, उसे वैसा ही फल (परिणाम और स्वभाव) प्राप्त होता है।
📖 पाठ से · अभ्यास प्रश्न

मेरी समझ से

उपयुक्त उत्तर के सम्मुख तारा (★) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं। (सही उत्तर ✓ चिह्न से दर्शाए गए हैं।)

(1) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय।।” इस दोहे में किसके विषय में बताया गया है?
  • श्रम का महत्व
  • गुरु का महत्व
  • ज्ञान का महत्व
  • भक्ति का महत्व
क्यों? इस दोहे में कबीर ने गुरु को ईश्वर तक पहुँचाने वाला मार्गदर्शक बताया है — गुरु ने ही गोविंद का परिचय दिया, इसलिए यहाँ गुरु की महत्ता का वर्णन है।
(2) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप…” इस दोहे का मूल संदेश क्या है?
  • हमेशा चुप रहने में ही हमारी भलाई है
  • बारिश और धूप से बचना चाहिए
  • हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है
  • हमेशा मधुर वाणी बोलनी चाहिए
क्यों? दोहा बोलने–चुप रहने, वर्षा–धूप जैसे उदाहरणों से बताता है कि किसी भी चीज़ की अति हानिकारक है — जीवन में संतुलन सबसे आवश्यक है।
(3) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर…” यह दोहा किस जीवन कौशल को विकसित करने पर बल देता है?
  • समय का सदुपयोग करना
  • दूसरों के काम आना
  • परिश्रम और लगन से काम करना
  • सभी के प्रति उदार रहना
क्यों? खजूर ऊँचा होकर भी न छाया देता है, न उसके फल आसानी से मिलते हैं — अर्थात् बड़प्पन तभी सार्थक है जब हम दूसरों के काम आएँ
(4) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय…” इस दोहे के अनुसार मधुर वाणी बोलने का सबसे बड़ा लाभ क्या है?
  • लोग हमारी प्रशंसा और सम्मान करने लगते हैं
  • दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है
  • किसी से विवाद होने पर उसमें जीत हासिल होती है
  • सुनने वालों का मन इधर-उधर भटकने लगता है
क्यों? दोहे की पंक्ति “औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय” बताती है कि मधुर वाणी दूसरों को भी और स्वयं को भी शीतलता व मानसिक शांति देती है।
(5) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप…” इस दोहे से क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है? (इस प्रश्न के दो उत्तर सही हैं)
  • सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं होता है
  • सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है
  • बाहरी परिस्थितियाँ ही जीवन में सफलता तय करती हैं
  • सत्य महत्वपूर्ण जीवन मूल्य है जिससे हृदय प्रकाशित होता है
क्यों? “साँच बराबर तप नहीं” से स्पष्ट है कि सत्य का पालन किसी तप/साधना से कम नहीं; और “जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप” से पता चलता है कि सत्य से हृदय प्रकाशित (पवित्र) होता है।
(6) “निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय…” यहाँ जीवन में किस दृष्टिकोण को अपनाने की सलाह दी गई है?
  • आलोचना से बचना चाहिए
  • आलोचकों को दूर रखना चाहिए
  • आलोचकों को पास रखना चाहिए
  • आलोचकों की निंदा करनी चाहिए
क्यों? कबीर कहते हैं कि आलोचक हमारी गलतियाँ बताकर बिना पानी–साबुन के ही हमें ‘निर्मल’ बना देता है, इसलिए उसे पास रखना चाहिए।
(7) “साधू ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय…” इस दोहे में ‘सूप’ किसका प्रतीक है?
  • मन की कल्पनाओं का
  • सुख-सुविधाओं का
  • विवेक और सूझबूझ का
  • कठोर और क्रोधी स्वभाव का
क्यों? सूप सार (उपयोगी) को रखकर थोथा (बेकार) उड़ा देता है — ठीक वैसे ही विवेकशील व्यक्ति अच्छे–बुरे की पहचान करता है, इसलिए सूप विवेक और सूझबूझ का प्रतीक है।
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
समूह गतिविधि

यह आपस में चर्चा करने की गतिविधि है। प्रश्न (5) जैसे प्रश्नों में एक से अधिक उत्तर सही हो सकते हैं, इसलिए मित्रों के उत्तर भिन्न हो सकते हैं। चर्चा में अपने उत्तर का कारण/तर्क बताइए (जैसे — “मैंने यह उत्तर चुना क्योंकि दोहे की इस पंक्ति में…”) और दूसरों के तर्क भी ध्यान से सुनिए। इससे दोहे का अर्थ और गहराई से समझ आएगा।

मिलकर करें मिलान

(क) स्तंभ 1 की पंक्तियों को स्तंभ 2 में दिए उनके सही अर्थ/संदर्भ से मिलाइए।

स्तंभ 1 (पंक्ति)स्तंभ 2 (अर्थ/संदर्भ)
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।
7. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।
8. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।

(ख) स्तंभ 1 में दी गई दोहों की पहली पंक्ति को स्तंभ 2 की सही दूसरी पंक्ति से जोड़िए।

स्तंभ 1 (पहली पंक्ति)स्तंभ 2 (दूसरी पंक्ति)
1. गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
2. अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
3. ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
4. निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥
5. साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
6. कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
7. बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
8. साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।

पंक्तियों पर चर्चा

पंक्तियों का अर्थ समझकर अपने विचार लिखिए।

(क) “कबिरा मन पंछी भया भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै सो तैसा फल पाय।।”
उत्तर

इन पंक्तियों में कबीर कहते हैं कि हमारा मन पक्षी के समान बहुत चंचल है — जहाँ चाहे वहाँ उड़ जाता है, उसे एक जगह टिकाना कठिन है। दूसरी पंक्ति बताती है कि मनुष्य जैसी संगति (साथ) करता है, उसका स्वभाव और परिणाम भी वैसा ही बन जाता है। यदि हम अच्छे लोगों के साथ रहेंगे तो अच्छे गुण आएँगे, और बुरी संगति में बुरी आदतें। इसलिए हमें अपने चंचल मन को नियंत्रित करके अच्छी संगति चुननी चाहिए।

(ख) “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है ता हिरदे गुरु आप।।”
उत्तर

कबीर यहाँ सत्य की महिमा बताते हैं। उनके अनुसार सत्य बोलना और सत्य पर अडिग रहना किसी कठिन तप (तपस्या) से कम नहीं, और झूठ बोलना सबसे बड़े पाप के समान है। जिस व्यक्ति के हृदय में सच्चाई बसती है, उसके हृदय में स्वयं गुरु/ईश्वर का वास होता है — अर्थात् सच्चा मन ही पवित्र और प्रकाशित मन है। संदेश यह है कि हमें जीवन में सदा सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए।

💡सोच-विचार के लिए

(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।” इस दोहे में गुरु को गोविंद (ईश्वर) से भी ऊपर स्थान दिया गया है। क्या आप इससे सहमत हैं?
मॉडल उत्तर

हाँ, इस संदर्भ में कबीर की बात उचित प्रतीत होती है। ईश्वर सर्वोच्च है, परंतु ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग गुरु ही दिखाते हैं। बिना गुरु के ज्ञान, विवेक और सही दिशा संभव नहीं। गुरु अज्ञान के अंधकार को हटाकर हमें सच्चाई और भक्ति की ओर ले जाते हैं — इसीलिए कबीर पहले गुरु के चरण छूना चाहते हैं। अतः गुरु को इतना ऊँचा स्थान देना उनके योगदान का सम्मान है, ईश्वर का अनादर नहीं।

(ख) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।” बड़े या संपन्न होने के साथ-साथ मनुष्य में और कौन-कौन सी विशेषताएँ होनी चाहिए?
मॉडल उत्तर

केवल बड़ा या धनी होना पर्याप्त नहीं। मनुष्य में ये गुण भी होने चाहिए —

  • विनम्रता — बड़प्पन का अहंकार न हो।
  • परोपकार और दानशीलता — दूसरों के काम आना।
  • उदारता व सहानुभूति — जरूरतमंदों की सहायता।
  • सरलता और मधुर व्यवहार — सबके साथ प्रेमपूर्ण आचरण।

जैसे आम का पेड़ छाया और मीठे फल देता है, वैसे ही बड़ा व्यक्ति भी समाज के लिए उपयोगी होना चाहिए।

(ग) “ऐसी बानी बोलिए मन का आपा खोय।” क्या आप मानते हैं कि शब्दों का प्रभाव केवल दूसरों पर ही नहीं स्वयं पर भी पड़ता है? उदाहरण सहित बताइए।
मॉडल उत्तर

हाँ, शब्दों का प्रभाव दूसरों पर और स्वयं पर — दोनों पर पड़ता है। जब हम मधुर और शांत वचन बोलते हैं तो सुनने वाला भी प्रसन्न होता है और हमारा अपना मन भी शांत व हल्का रहता है। इसके विपरीत, क्रोध में कटु वचन बोलने पर सामने वाला तो दुखी होता ही है, बाद में हमें भी पछतावा और बेचैनी होती है।

उदाहरण — किसी मित्र की गलती पर यदि मैं चिल्लाने के बजाय प्यार से समझाऊँ, तो वह भी सुधर जाता है और मेरा मन भी संतुष्ट रहता है। इसीलिए कबीर कहते हैं कि अहंकार छोड़कर ऐसी वाणी बोलो जो सबको शीतलता दे।

(ङ) “जो जैसी संगति करै सो तैसा फल पाय॥” हमारे विचारों और कार्यों पर संगति का क्या प्रभाव पड़ता है? उदाहरण सहित बताइए।
मॉडल उत्तर

संगति का हमारे विचारों, आदतों और व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अच्छी संगति में रहने से अच्छे विचार, अनुशासन और सद्गुण आते हैं, जबकि बुरी संगति में पड़कर व्यक्ति गलत आदतों का शिकार हो जाता है।

उदाहरण — मेहनती और पढ़ाई में रुचि रखने वाले मित्रों के साथ रहने से हम भी पढ़ाई में मन लगाते हैं; इसके विपरीत आलसी या गलत आदतों वाले साथियों के साथ रहकर हमारा ध्यान भी भटक जाता है। इसीलिए कहा गया है — “जैसा संग वैसा रंग।”

दोहे की रचना

“अति का भला न बोलना…” दोहे में चारों भागों का पहला शब्द ‘अति’ होने से एक विशेष ध्वनि-प्रभाव बनता है। नीचे ऐसी ही काव्य-विशेषताओं वाली पंक्तियाँ छाँटी गई हैं।

(1) एक ही अक्षर से प्रारंभ होने वाले शब्द एक साथ (अनुप्रास)

  • गुरु गोविंद दोऊ खड़े — (ग, ग)
  • सार सार को गहि रहै — (स, स, ग)
  • साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय — (स, स, स)
  • औरन को सीतल… आपहुँ सीतल — (स, स)

(2) एक शब्द एक साथ दो बार आया है (पुनरुक्ति)

  • सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।

(3) लगभग एक जैसे शब्द जिनमें केवल एक मात्रा का अंतर हो (जैसे — जल, जाल)

इन दोहों में ‘जल–जाल’ जैसा बिल्कुल स्पष्ट उदाहरण नहीं मिलता — यह आपके अन्वेषण के लिए छोड़ा गया है। (निकटवर्ती ध्वनि-समानता वाले शब्द जैसे तप–पाप, चूप–धूप तुकबंदी में अवश्य आए हैं।)

(4) एक ही पंक्ति में विपरीतार्थक शब्द (जैसे — अच्छा-बुरा)

  • साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप → साँच × झूठ
  • अति का भला न बोलना, अति का भला न चूपबोलना × चुप (मौन)
  • अति का भला न बरसना, अति की भली न धूपवर्षा × धूप
  • सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय → सार × थोथा

(5) किसी की तुलना किसी अन्य से (उपमा — जैसा)

  • बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर — व्यक्ति की तुलना खजूर के पेड़ से।
  • साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय — साधु की तुलना सूप से।

(6) किसी को कोई अन्य नाम दे दिया गया है (रूपक/मेटाफर)

  • कबिरा मन पंछी भया — चंचल मन को सीधे ‘पंछी (पक्षी)’ कह दिया गया।

(7) किसी शब्द की वर्तनी थोड़ी अलग है

  • चुप → चूप,   हृदय → हिरदे,   शीतल → सीतल
  • निकट → नियरे,   गोविन्द → गोविंद,   पक्षी → पंछी

(8) उदाहरण द्वारा कही गई बात को समझाया गया है

  • खजूर के पेड़ का उदाहरण — बड़ा होकर भी किसी के काम न आना।
  • सूप का उदाहरण — सार रखना, थोथा उड़ाना (विवेक की बात)।
  • बिन पानी–साबुन निर्मल करने का उदाहरण — निंदक की उपयोगिता।

🔮अनुमान और कल्पना से

मॉडल उत्तर (अपने अनुभव अनुसार लिखें)
(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौं पाँय।”

• यदि यह स्थिति आपके सामने होती तो आप क्या निर्णय लेते और क्यों?
मैं भी पहले गुरु के चरण छूता, क्योंकि गुरु ने ही मुझे ईश्वर और सच्चाई का मार्ग दिखाया — गुरु के मार्गदर्शन के बिना ईश्वर को जानना संभव नहीं।

• यदि संसार में कोई गुरु या शिक्षक न होता तो क्या होता?
तब ज्ञान, संस्कार और सही–गलत की पहचान का विकास रुक जाता; मनुष्य अशिक्षित और दिशाहीन रहता, सभ्यता आगे न बढ़ पाती।

(ख) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।”

• बहुत अधिक बोलने या बहुत चुप रहने वाले व्यक्ति के जीवन पर प्रभाव?
बहुत बोलने वाला बातूनी और कभी-कभी अविश्वसनीय लगता है; बहुत चुप रहने वाले की बात व भावनाएँ लोग समझ नहीं पाते और उसे अकेलापन मिल सकता है। संतुलित बोलने वाला सबका प्रिय बनता है।

• वर्षा आवश्यकता से अधिक या कम हो तो?
अधिक वर्षा से बाढ़ और फसल नष्ट; बहुत कम वर्षा से सूखा और पानी का संकट। दोनों ही हानिकारक — संतुलन आवश्यक।

• अधिक मोबाइल/मल्टीमीडिया प्रयोग के परिणाम?
आँखों व स्वास्थ्य पर बुरा असर, पढ़ाई व नींद में बाधा, समय की बर्बादी और एकाग्रता में कमी। इसलिए इसका भी संतुलित उपयोग करना चाहिए।

(ग) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।”

• झूठ बोलने पर जीवन पर प्रभाव?
झूठ से लोगों का विश्वास टूट जाता है, रिश्ते बिगड़ते हैं, और मन में सदा भय व तनाव बना रहता है। एक झूठ को छिपाने के लिए कई झूठ बोलने पड़ते हैं।

• शिक्षक ने गलत उत्तर के अंक दे दिए — आप क्या करेंगे?
मैं ईमानदारी से शिक्षक को बताऊँगा कि वह उत्तर गलत था, ताकि अंक सही किए जा सकें। सच बोलने से मुझे आत्म-संतोष और शिक्षक का विश्वास मिलेगा।

(घ) “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।”

• यदि सभी अपनी वाणी मधुर बना लें तो लोगों में क्या परिवर्तन आएँगे?
समाज में प्रेम, सौहार्द और शांति बढ़ेगी; झगड़े, कटुता और गलतफहमियाँ कम होंगी; लोग एक-दूसरे का सम्मान करेंगे।

• क्या कोई स्थिति हो सकती है जहाँ कटु वचन आवश्यक हो?
हाँ, कभी-कभी किसी को गलत काम से रोकने या अनुशासन सिखाने के लिए कठोर बोलना पड़ सकता है — परंतु बिना अपमान किए, उसके भले के लिए।

(ङ) “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।”

• अहंकारी व्यक्ति को ‘बड़े/संपन्न होने’ का क्या अर्थ समझाएँगे?
मैं समझाऊँगा कि सच्चा बड़प्पन धन या पद में नहीं, बल्कि विनम्रता और दूसरों के काम आने में है — जैसे आम का पेड़ छाया और फल देता है।

• खजूर, नारियल जैसे ऊँचे वृक्ष किस प्रकार उपयोगी हैं?
वे फल देते हैं, नारियल से पानी, तेल, रेशा और लकड़ी मिलती है; खजूर मीठे फल देता है। अर्थात् छाया न देकर भी वे अन्य रूपों में उपयोगी हैं।

• कक्षा-नायक (मॉनीटर) चुनते समय किन विशेषताओं पर ध्यान देंगे?
ईमानदारी, अनुशासन, नेतृत्व-क्षमता, सबकी सहायता करने की भावना, और न्यायप्रियता।

(च) “निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।”

• कोई आपकी गलतियाँ बताता रहे तो क्या लाभ?
मुझे अपनी कमियों का पता चलेगा और मैं उन्हें सुधार सकूँगा; इससे मेरा व्यक्तित्व निखरेगा।

• यदि समाज में कोई किसी की गलती न बताए तो?
तब लोग अपनी गलतियाँ पहचान नहीं पाएँगे, सुधार रुक जाएगा और गलतियाँ बढ़ती चली जाएँगी।

(छ) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।”

• ‘सूप’ जैसी विशेषता हो तो जीवन में क्या परिवर्तन आएँगे?
मैं अच्छी बातों को ग्रहण करूँगा और बेकार/गलत बातों को छोड़ दूँगा; मेरा विवेक बढ़ेगा और निर्णय सही होंगे।

• बिना सोचे-समझे हर बात स्वीकार कर लें तो?
तब हम भ्रमित हो सकते हैं, धोखा खा सकते हैं और गलत आदतें अपना सकते हैं। इसलिए हर बात को विवेक के ‘सूप’ से छानना जरूरी है।

(ज) “कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।”

• यदि मन पंछी की तरह उड़ सकता तो उसे कहाँ ले जाना चाहते और क्यों?
(कल्पना) मैं उसे शांत प्रकृति, ज्ञान और अच्छे विचारों की ओर ले जाता, ताकि मन सकारात्मक और एकाग्र रहे।

• संगति का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?
अच्छी संगति अच्छे गुण और आदतें देती है, बुरी संगति बुरी — “जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।”

वाद-विवाद

“अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप…” — इस दोहे का आज के समय में क्या महत्व है? पक्ष व विपक्ष में तर्क प्रस्तुत कीजिए।
कक्षा गतिविधि — नमूना तर्क

पक्ष में (दोहा आज भी प्रासंगिक है):

  • वाणी और व्यवहार में संयम आज भी आवश्यक है — अति बोलना झगड़े को जन्म देता है।
  • मोबाइल, सोशल मीडिया, खान-पान — हर चीज़ में संतुलन से ही स्वास्थ्य और सफलता मिलती है।
  • प्रकृति में भी अति वर्षा/अति धूप दोनों हानिकारक — संतुलन ही जीवनदायी है।

विपक्ष में (आज के संदर्भ में सीमाएँ):

  • कभी-कभी अन्याय के विरुद्ध मुखर होकर ‘अधिक बोलना’ आवश्यक है — चुप रहना गलत होगा।
  • प्रतियोगिता के युग में लक्ष्य पाने के लिए ‘अति परिश्रम’ और जोश भी जरूरी होता है।
  • आपात स्थिति में संतुलन से अधिक त्वरित व अधिक प्रयास की आवश्यकता पड़ती है।

एक समूह पक्ष में, दूसरा विपक्ष में बोले; तीसरा समूह निर्णायक बने। तर्कों की सूची अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।

🔤शब्द से जुड़े शब्द

‘कबीर’ और ‘बानी’ से जुड़े शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए।
उत्तर

कबीर से जुड़े कुछ शब्द (पाठ एवं संदर्भ से) —

  • बानी (वाणी)
  • दोहे / साखी
  • भजन एवं लोकगीत
  • संत / साधू
  • करघा एवं बुनकर (कबीर जुलाहे थे)
  • काशी (जन्मस्थान)
  • कबीर ग्रंथावली / कबीर वचनावली (रचना-संग्रह)

🗣दोहे और कहावतें

“जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय” से बनी कहावत — और कुछ कहावतों के अपने वाक्य।
उत्तर

इस दोहे की दूसरी पंक्ति लोगों के बीच कहावत — ‘जैसा संग वैसा रंग’ के रूप में प्रसिद्ध है (अर्थात् व्यक्ति जैसी संगति में रहता है, वैसा ही उसका स्वभाव बन जाता है)।

अन्य कहावतें और उनके वाक्य (नमूना) —

  • जैसी करनी वैसी भरनी — मोहन ने सबको परेशान किया, अब अकेला पड़ गया; जैसी करनी वैसी भरनी।
  • अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत — परीक्षा से पहले न पढ़ने पर अब पछताने से क्या लाभ!
  • एक हाथ से ताली नहीं बजती — झगड़े में दोनों पक्ष दोषी थे, क्योंकि एक हाथ से ताली नहीं बजती।

🎭सबकी प्रस्तुति

समूह प्रस्तुति गतिविधि

पाठ के किसी एक दोहे को चुनकर समूह में भिन्न-भिन्न रूपों में कक्षा के सामने प्रस्तुत कीजिए, जैसे — लोकगीत शैली में गायन, भाव-नृत्य, कविता-पाठ, संगीत के साथ प्रस्तुति या अभिनय। उदाहरण: “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय” पर एक नाटक — एक दोस्त गुस्से में गलत कह देता है, दूसरा उसे मधुर भाषा का महत्व समझाता है।

🚀 पाठ से आगे

💬आपकी बात

व्यक्तिगत — मॉडल उत्तर
(क) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े…” — क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने आपको सही दिशा दिखाई हो?

नमूना — मेरे जीवन में मेरी हिंदी की शिक्षिका ने मुझे सही दिशा दिखाई। जब मैं पढ़ाई में पिछड़ रहा था, तब उन्होंने धैर्य से समझाया, मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया और मेहनत की प्रेरणा दी। उनके मार्गदर्शन से ही मैं आगे बढ़ सका। (आप अपने माता-पिता/शिक्षक/किसी बड़े का उदाहरण लिख सकते हैं।)

(ख) “निंदक नियरे राखिए…” — क्या कभी किसी ने आपकी गलतियाँ बताईं जिनसे सुधार का अवसर मिला?

नमूना — एक बार मेरे मित्र ने बताया कि मैं बात-बात पर बीच में बोल पड़ता हूँ, जिससे दूसरों को बुरा लगता है। पहले मुझे बुरा लगा, पर फिर मैंने इस आदत को सुधारा। उसकी आलोचना मेरे लिए लाभदायक सिद्ध हुई।

(ग) “कबिरा मन पंछी भया…” — क्या आपकी संगति ने आपके विचारों/आदतों को प्रभावित किया?

नमूना — हाँ, जब मैं पढ़ाई में रुचि रखने वाले मित्रों के साथ रहा तो मेरी भी पढ़ाई में रुचि बढ़ी और समय पर गृहकार्य करने की आदत बनी। इससे मैंने अनुभव किया कि अच्छी संगति का प्रभाव सकारात्मक होता है।

सृजन

(क) “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।” — इस दोहे पर आधारित एक कहानी लिखिए जिसमें किसी व्यक्ति ने कठिन परिस्थिति में भी सत्य का साथ न छोड़ा। (संकेत — खेल में नियमों के उल्लंघन का विरोध)
नमूना कहानी

सच्चाई की जीत

अंतर-विद्यालय क्रिकेट के फाइनल में रोहन अपनी टीम का कप्तान था। आखिरी ओवर में जीत के लिए केवल चार रन चाहिए थे। तभी रोहन ने देखा कि उसकी टीम का गेंदबाज नो-बॉल फेंक रहा था, पर अंपायर का ध्यान नहीं गया और विरोधी बल्लेबाज आउट करार दे दिया गया।

टीम के सब साथी खुश थे — “चुप रहो, हम जीत जाएँगे!” पर रोहन का मन नहीं माना। उसने अंपायर के पास जाकर सच बता दिया कि वह गेंद नो-बॉल थी। उसके साथियों ने नाराज़गी जताई, पर रोहन ने कहा — “झूठ से मिली जीत, सच्ची हार के बराबर है।”

अंपायर ने निर्णय बदला और बल्लेबाज को जीवनदान मिला। उस ओवर में रोहन की टीम मैच हार गई, परंतु पूरे मैदान ने रोहन की ईमानदारी की प्रशंसा की। उसे ‘फेयर-प्ले अवार्ड’ मिला। उस दिन रोहन ने सीखा — “साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।”

(ख) “गुरु गोविंद दोऊ खड़े…” — किसी प्रेरणादायक शिक्षक से साक्षात्कार कर उनके योगदान पर निबंध लिखिए।
गतिविधि — लेखन मार्गदर्शन

साक्षात्कार में ये प्रश्न पूछ सकते हैं — आप शिक्षक क्यों बने? विद्यार्थियों को सही दिशा देने में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? कोई यादगार अनुभव? फिर निबंध में लिखें — शिक्षक का परिचय, उनके गुण (धैर्य, ज्ञान, मार्गदर्शन), विद्यार्थियों के जीवन में उनका योगदान, और अंत में उनके प्रति अपना आभार।

🕰कबीर हमारे समय में

(क) यदि कबीर आज होते तो किन-किन विषयों पर कविता लिख सकते थे? (ख) इन पर दो-दो पंक्तियाँ लिखिए।
मॉडल उत्तर

संभावित विषय — पर्यावरण व प्रदूषण, मोबाइल/सोशल मीडिया की लत, इंटरनेट पर सच–झूठ (फेक न्यूज़), ईमानदारी व भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक सद्भाव, स्वच्छता, परीक्षा का तनाव।

नमूना पंक्तियाँ —

कबिरा मोबाइल मन हरै, भूले राह सुजान।
सार-सार जो ग्रहण करे, सोई सच्चा ज्ञान॥

पेड़ बचा लो रे मनुष, धरती तेरी माय।
हरियाली बिन जीव का, जीवन व्यर्थ बिताय॥

(आप अपने मन से भी ऐसी सरल दो-दो पंक्तियाँ बना सकते हैं।)

🛡साइबर सुरक्षा और दोहे

(क) “अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।” — इंटरनेट पर अनावश्यक सूचनाएँ साझा करने के क्या-क्या संकट हो सकते हैं?
उत्तर
  • पहचान की चोरी (Identity theft) — निजी जानकारी का दुरुपयोग।
  • साइबर ठगी व फिशिंग — बैंक/पासवर्ड संबंधी धोखाधड़ी।
  • ब्लैकमेल व उत्पीड़न — तस्वीरों/सूचनाओं का गलत प्रयोग।
  • गोपनीयता भंग — स्थान, परिवार, स्कूल की जानकारी असुरक्षित होना।
  • अफवाह व गलत सूचना का तेजी से फैलना।

इसलिए ‘अति’ से बचकर इंटरनेट पर सोच-समझकर ही जानकारी साझा करनी चाहिए।

(ख) “साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।” — वेबसाइट, ईमेल या मीडिया की जानकारी को ‘सूप’ की तरह छानने की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर

इंटरनेट पर मिलने वाली हर जानकारी सही नहीं होती — बहुत-सी अफवाहें, फेक न्यूज़ और भ्रामक संदेश होते हैं। ‘सूप’ की तरह हमें सार (सही, उपयोगी सूचना) को ग्रहण करना और थोथा (गलत/हानिकारक सूचना) को छोड़ देना चाहिए।

कैसे तय करें कि सूचना उपयोगी है या हानिकारक —

  • स्रोत की विश्वसनीयता जाँचें (सरकारी/प्रतिष्ठित वेबसाइट)।
  • तथ्यों को एक से अधिक भरोसेमंद स्रोतों से सत्यापित करें।
  • संदिग्ध लिंक, झूठे प्रलोभन और बिना प्रमाण के दावों से बचें।
  • जो जानकारी डर या जल्दबाज़ी फैलाए, उस पर बिना जाँचे विश्वास न करें।

📌आज के समय में

नीचे दी गई घटनाओं को पढ़कर बताइए कि कौन-सा दोहा याद आता है।

घटनासंबंधित दोहा
अमित गलत संगति में चला गया और उसके अंक कम आए — “संगति का असर जीवन पर पड़ता है।”कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥
पिता ने कहा — “हर जानकारी सही नहीं होती, सही बातों को चुनो और बेकार छोड़ दो।”साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
मोहन ने बहुत अधिक बोला, रमेश बिल्कुल चुप रहा — गुरुजी ने कहा “बोलचाल में संतुलन आवश्यक है।”अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥
सुरेश को ‘प्रतिभा सम्मान’ मिला — “इसमें मेरे परिश्रम के साथ गुरुजनों का मार्गदर्शन भी सम्मिलित है।”गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
रीमा ने गुस्से में सहकर्मी को बुरा-भला कहा; बाद में समझी कि शांति से बात करती तो समस्या हल हो जाती।ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥
मित्र की आलोचना से पहले परेशान हुए, फिर सोचा — “आलोचना मुझे सुधरने का मौका देती है।”निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय॥

🔎खोजबीन के लिए

खोज गतिविधि

परिजनों, मित्रों, शिक्षकों, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता से कबीर के भजन, गीत और लोकगीत खोजिए व सुनिए। किसी एक गीत को अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए और कक्षा के सभी समूहों के गीतों को जोड़कर एक पुस्तिका बनाइए।

📜 पढ़ने के लिए · बोनस

कदम मिलाकर चलना होगा

पहाड़ पर एक-दूसरे का हाथ थामे चढ़ते बच्चे

— मिलकर, एक-दूसरे का हाथ थामे आगे बढ़ते बच्चे

यह प्रेरक कविता अटल बिहारी वाजपेयी (भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रसिद्ध कवि–लेखक) द्वारा रचित है। यह पाठ में ‘पढ़ने के लिए’ दी गई है — इस पर कोई अभ्यास-प्रश्न नहीं हैं।

कविता का भाव — जीवन में बाधाएँ, संकट और कठिनाइयाँ आती रहती हैं, पर हमें घबराए बिना, हँसते हुए, सबके साथ कदम मिलाकर निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए। सुख-दुख, हार-जीत, मान-अपमान — हर परिस्थिति में संघर्ष करते हुए, स्वार्थ छोड़कर दूसरों के हित में जीना ही सच्चा जीवन है। पंक्ति “कदम मिलाकर चलना होगा” पूरी कविता में बार-बार आकर एकता, साहस और दृढ़ संकल्प का संदेश देती है।

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