हरिद्वार
लेखक — भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) • ‘कविवचन सुधा’, 1871 ई.
पाठ से
मेरी समझ से
- ○सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं
- ✓लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं★
- ○हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे
- ○लेखक को पत्थर मारकर पके फल तोड़कर खाना पसंद था
वृक्ष पर पत्थर मारने पर भी वह क्रोध नहीं करता, बल्कि फल देता है। लेखक इसी उदारता व सहनशीलता को सज्जनों के स्वभाव से जोड़कर वृक्षों का मानवीकरण करते हैं — सच्चा सज्जन बुरा करने वाले का भी भला ही करता है।
- ○शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी
- ○आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
- ✓मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव★
- ○सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
हरिद्वार के पवित्र वातावरण में लेखक के मन में बार-बार ज्ञान, वैराग्य व भक्ति के भाव उठते थे — यह उनके भीतर उपजी मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभूति को दर्शाता है।
- ✓संतुष्टि में सुख होता है★
- ○सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं
- ○लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी
- ○पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है
गंगा-तट पर सादगी से किया गया भोजन लेखक को सोने की थाली के भोजन से भी अधिक सुखद लगा। इससे यह जीवन-सत्य प्रकट होता है कि सच्चा सुख संतोष व मन की प्रसन्नता में है, साधनों के वैभव में नहीं।
- ○अंधविश्वास और लालच
- ○मानवता और देशप्रेम
- ✓सादगी और आत्मनिर्भरता★
- ✓स्वच्छता और प्रकृति प्रेम★
लेखक ने स्वयं रसोई बनाकर पत्थर पर सादगी से भोजन किया (सादगी व आत्मनिर्भरता) और वह भी पवित्र गंगा-तट के पास, प्रकृति की गोद में (प्रकृति प्रेम)। अतः यह प्रसंग सादगी, आत्मनिर्भरता व प्रकृति-प्रेम — सभी को बढ़ावा देता है।
- ○राजनीतिक
- ✓आध्यात्मिक★
- ○सामाजिक
- ✓प्राकृतिक★
लेखक का अनुभव मुख्यतः आध्यात्मिक (ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, मन की शांति) तथा प्राकृतिक (पर्वत, गंगा, हरियाली, पक्षी आदि का मनोरम सौंदर्य) था।
- ○कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता
- ○मुहावरों का अधिक प्रयोग
- ✓सरलता और चित्रात्मकता★
- ○जटिलता और संक्षिप्तता
यद्यपि भाषा लगभग 150 वर्ष पुरानी है, फिर भी वह सरल है और दृश्यों का ऐसा चित्रात्मक वर्णन करती है कि पाठक के सामने हरिद्वार का सजीव चित्र खिंच जाता है।
मैंने ये उत्तर इसलिए चुने क्योंकि वे पत्र के भाव व लेखक के अनुभव से सीधे मेल खाते हैं — वृक्षों का मानवीकरण उनकी उदारता दिखाता है, गंगा-तट का सादा भोजन संतोष का सुख देता है, और पूरा अनुभव आध्यात्मिक व प्राकृतिक है। साथियों के भिन्न उत्तर भी कुछ हद तक सही हो सकते हैं, पर ये उत्तर पाठ के सबसे निकट हैं।
मिलकर करें मिलान
मिलकर करें चयन
प्रत्येक वाक्य के दो निष्कर्ष — सही (हरे ✓) और भ्रामक (✕)।
पंक्तियों पर चर्चा
लेखक कहते हैं कि हरिद्वार इतनी पवित्र व अनोखी भूमि है कि यहाँ की साधारण घास (कुशा) से भी दालचीनी-जावित्री जैसी सुगंध आती है। इस अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन से वे इस तीर्थभूमि की विशिष्टता व पवित्रता को उभारते हैं — जहाँ की मिट्टी-घास तक सुगंधित व धन्य है।
लेखक वृक्षों की परोपकारी प्रवृत्ति की प्रशंसा करते हैं। वृक्ष अपना सर्वस्व — फल, फूल, छाया, छाल, लकड़ी, यहाँ तक कि जलने के बाद कोयला व राख तक — मनुष्य के काम आने में लगा देते हैं। इनका जीवन पूर्णतः दूसरों के हित में समर्पित है, इसलिए इनका जन्म धन्य है।
सोच-विचार के लिए
यह वाक्य दर्शाता है कि हरिद्वार लेखक के मन में इतना गहरा बस गया कि शरीर से लौट आने पर भी उनका मन व चित्त अब भी वहीं रमा हुआ है। हाँ, मैंने भी ऐसा अनुभव किया है — किसी सुंदर स्थान (जैसे पहाड़ी यात्रा या ननिहाल) से लौटने के बाद भी कई दिनों तक मन वहीं की यादों में खोया रहता है।
यह संतोष का सुंदर उदाहरण है — थोड़े में भी प्रसन्न रहना। आज के भौतिकवादी समय में ऐसे संतोषी लोग कम हैं, पर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। आज भी अनेक साधु-संत, ईमानदार श्रमिक, गाँव के सीधे-सादे लोग व सेवाभावी व्यक्ति कम में संतुष्ट रहकर प्रसन्न जीवन जीते हैं। (उदाहरण — कोई शिक्षक जो कम वेतन में भी निष्ठा से पढ़ाता है।)
लेखक दीवान कृपा राम के बंगले पर ठहरे थे। उन्होंने उसे ‘टिकने योग्य’ इसलिए कहा क्योंकि वहाँ केवल आराम-सुविधा ही नहीं थी, बल्कि वह स्थान शांत, स्वच्छ व खुला था, चारों ओर से शीतल पवन आती थी और गंगा-तट के पवित्र वातावरण के निकट था — जो मन को शांति व प्रसन्नता देता था।
वृक्ष पूर्णतः परोपकारी हैं — वे हमें फल, फूल, छाया, औषधि (छाल), लकड़ी, ईंधन (कोयला), खाद (राख) व प्राणवायु देते हैं। जीवित रहते भी और जलने के बाद भी वे मनुष्य के काम आते हैं। अतः वृक्ष हमारे जीवन के लिए अनिवार्य हैं — हमें इन्हें काटने के बजाय लगाना व सँभालना चाहिए।
अनुमान और कल्पना से
मैं हर की पैड़ी पर गंगा-स्नान करूँगा, संध्या-आरती देखूँगा, हरे-भरे पर्वतों व मंदिरों की सैर करूँगा, गंगा-तट पर बैठकर शांति का अनुभव करूँगा, पक्षियों का कलरव सुनूँगा और प्रकृति की गोद में सादा भोजन करूँगा।
गंगा की ठंडी-ठंडी फुहारें जैसे ही मेरे चेहरे को छूतीं, सारी थकान दूर हो जाती। मन एकदम तरोताज़ा व शांत हो जाता, रोम-रोम पुलकित हो उठता और ऐसा लगता मानो प्रकृति स्वयं मुझे दुलार रही हो। उस शीतलता में एक अद्भुत आनंद और पवित्रता का अनुभव होता।
यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें, तो शायद वे अपने साथ हुए अन्याय (काटे जाने) का विरोध करते, बोल पड़ते और हमसे शिकायत करते। तब लोग उन्हें यूँ न काट पाते। पर वे हमें प्रेम से छाया, फल व फूल भी देते और हमें प्रकृति की रक्षा का पाठ पढ़ाते। संसार और भी सुंदर, हरा-भरा व संवेदनशील बन जाता।
‘गंगा’ को भारतीय संस्कृति में पवित्र नदी व माता के रूप में पूजा जाता है। लेखक ने उसके प्रति आदर, श्रद्धा व सम्मान प्रकट करने के लिए ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया। इससे उनकी गंगा के प्रति गहरी भक्ति-भावना झलकती है।
• दृष्टिबाधित साथी के लिए: हर दृश्य का सजीव वर्णन सुनाना, हाथ पकड़कर रास्ता दिखाना, गंगा-जल छूकर ठंडक का अनुभव कराना, आरती की ध्वनि व घंटियों का आनंद दिलाना, फिसलन वाले घाटों पर विशेष सावधानी।
• श्रवणबाधित साथी के लिए: संकेतों/लिखकर बातचीत करना, सब दृश्य दिखाना, सुरक्षित मार्ग चुनना, और हर गतिविधि में उसे साथ रखकर अकेलापन महसूस न होने देना।
लिखें संवाद
कल्लू जी: सच कहा आपने! गंगा की यह शीतल धारा और चारों ओर की हरियाली देखकर तो मन ही नहीं भरता।
लेखक: चलिए, आज गंगा-तट पर ही रसोई बनाकर भोजन करते हैं।
कल्लू जी: वाह! प्रकृति की गोद में भोजन का सुख तो सोने की थाली से भी बढ़कर होगा।
पर्वत: हम तपस्वी हैं, मित्र! सहना और देना ही हमारा स्वभाव है। हम गंगा को जन्म देते और जगत को छाया-शीतलता देते हैं।
लेखक: तुम्हारी सहनशीलता व उदारता को प्रणाम! मनुष्य को तुमसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।
पर्वत: बस, हमें सहेजकर रखना — यही हमारी सच्ची सेवा होगी।
‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग (आदरार्थ बहुवचन)
भावों की पहचान
काल की पहचान
• वर्तमान → भूत: “यह भूमि तीन ओर हरे-हरे पर्वतों से घिरी थी।”
• भूत → वर्तमान: “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।”
• वर्तमान → भविष्य: “वृक्ष ऐसे होंगे कि पत्थर मारने से फल देंगे।”
पत्र की रचना — विशेषताएँ व उदाहरण
संबोधन (प्रिय मित्र/आदरणीय…), यात्रा का स्थान व कारण, मार्ग व पहुँचने का अनुभव, वहाँ के दृश्य/स्थानों का चित्रात्मक वर्णन, अपनी भावनाएँ, और अंत में निवेदन व अपना नाम — इन्हें क्रम से लिखकर एक सुंदर यात्रा-पत्र तैयार किया जा सकता है।
लेखन के अनोखे तरीके
1. इन पेड़ों पर अनेक रंगों के पक्षी चहचहाते हैं और शहर के दुष्ट शिकारियों से बिना डरे आनंद से कलरव करते हैं।
2. वर्षा के कारण चारों ओर हरियाली ही दिखाई दे रही थी, मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरे रंग का गलीचा बिछा दिया गया हो।
3. यह इतना पवित्र तीर्थ है कि इच्छा और क्रोध से भरे (लोभी-क्रोधी) मनुष्य वहाँ रहते ही नहीं।
4. वहाँ जाते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और निर्मल हो गया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
5. यहाँ रात को ग्रहण लगा और हम लोगों ने ग्रहण के समय बड़े आनंद से स्नान किया तथा दिन में श्री भागवत का पाठ भी किया।
6. उस समय पत्थर पर बैठकर किए गए भोजन का सुख सोने की थाली के भोजन से कहीं अधिक था।
7. मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को (अपनी पत्रिका में) स्थान देंगे।
पाठ से आगे
आपकी बात
हाँ, एक बार हम पिकनिक पर नदी-किनारे बैठकर भोजन कर रहे थे। खुली हवा, पक्षियों की चहचहाहट और प्रकृति की गोद में किया वह भोजन घर के खाने से कहीं अधिक स्वादिष्ट व आनंददायक लगा — मन एकदम प्रसन्न व हल्का हो गया था।
हाँ, गर्मी की एक दोपहर थककर लौटने पर माँ के हाथ का एक गिलास ठंडा शिकंजी (नींबू-पानी) ने मुझे जो सुख दिया, वह किसी महँगी चीज़ से कम न था। कभी-कभी छोटी-सी चीज़ भी बड़ा संतोष व खुशी दे जाती है।
मुझे मंदिर/प्रार्थना-स्थल में तथा सुबह बगीचे या नदी-तट पर जाकर मन की गहरी शांति मिलती है। वहाँ की शांति, स्वच्छ हवा, हरियाली और सकारात्मक वातावरण से मन एकदम शांत व प्रसन्न हो जाता है।
हाँ, हमारे आँगन का आम का पेड़ मुझे बहुत प्रिय है। बचपन से मैंने उसकी छाया में खेला, उसके फल खाए और उस पर पक्षियों के घोंसले देखे। वह मेरे बचपन की अनगिनत यादों का साथी है, इसलिए उससे मेरा गहरा भावनात्मक जुड़ाव है।
पोस्टर पर लिख सकते हैं — “गंगा को स्वच्छ रखें, कचरा न फैलाएँ”, “पेड़ लगाएँ, धरती बचाएँ”, “प्लास्टिक नहीं, हरियाली अपनाएँ”, “तीर्थ ही नहीं, पूरी पृथ्वी पावन हो!” — साथ में स्वच्छ नदी, हरे पर्वत व पौधा लगाते बच्चों के चित्र बनाएँ।
जब मैं पाँच मिनट आँखें बंद करके मौन बैठा और अपनी साँसों पर ध्यान दिया, तो पहले आस-पास की छोटी-छोटी ध्वनियाँ — पंखे की आवाज़, पक्षियों की चहचहाहट — स्पष्ट सुनाई देने लगीं। धीरे-धीरे मन शांत होने लगा और भीतर एक हल्कापन व सुकून महसूस हुआ। ध्यान से मन एकाग्र होता है और तनाव दूर होता है।
ख — सूचना (योग दिवस)दिनांक: 21 जून
समस्त विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में विद्यालय प्रांगण में प्रातः 7:00 बजे सामूहिक योग कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। सभी विद्यार्थी समय पर, योग-वस्त्र में उपस्थित हों।
— प्रधानाचार्य
एक पौधा (जैसे तुलसी, नीम या आम) लगाइए, उसे प्यारा-सा नाम दीजिए, नियमित पानी व देखभाल कीजिए और अपनी दैनंदिनी (डायरी) में उसकी बढ़ती हुई अवस्था का वर्णन लिखिए — जैसे किसी मित्र की प्रगति देख रहे हों।
यात्रा के व्यय की गणना
| क्रम | मद (खर्च) | राशि (₹) |
|---|---|---|
| 1 | आने-जाने का किराया (बस/रेल) | 350 |
| 2 | भोजन (नाश्ता + दोपहर + शाम) | 250 |
| 3 | प्रवेश/दर्शन शुल्क | 100 |
| 4 | स्मृति-चिह्न (souvenir) | 150 |
| 5 | जलपान व अन्य | 100 |
| 6 | आपातकालीन बचत | 50 |
| कुल योग | 1000 | |
मैं एक छोटी-सी गंगाजल की बोतल या रुद्राक्ष की माला खरीदूँगा, क्योंकि वह सस्ती, उपयोगी और यात्रा की मधुर याद दिलाने वाली है, तथा मेरे ₹150 के बजट में आसानी से आ जाती है। (अनावश्यक महँगी चीज़ें खरीदकर बजट बिगाड़ना ठीक नहीं।)
(क) टूरिस्ट गाइड के रूप में: सबको साथ रखना, सुरक्षित व आरामदायक मार्ग चुनना, बच्चों-बुज़ुर्गों व दिव्यांगों का विशेष ध्यान रखना, समय पर भोजन-विश्राम की व्यवस्था, स्थानों की रोचक जानकारी देना और स्वच्छता बनाए रखना।
(ख) श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए: संकेतों या लिखकर बातचीत, सब दृश्य दिखाना, मार्ग-संकेत/नक्शे का उपयोग, और हर बात में उसे शामिल रखना ताकि वह अकेला महसूस न करे।
(ग) धरोहरों की सुरक्षा के लिए: दीवारों/मूर्तियों पर कुछ न लिखना-खुरचना, कचरा न फैलाना, निर्धारित मार्ग पर चलना, नियमों का पालन करना और दूसरों को भी जागरूक करना।
आज की पहेली
झरोखे से · खोजबीन
हरिद्वार के रास्ते में लेखक ने अनेक प्रकार के वृक्ष व पक्षी देखे — एक छोटा पीले रंग का सुंदर पक्षी भी देखा। बया नामक छोटी चिड़िया के अनेक घोंसले मिले, जो सूखे बबूल के काँटेदार वृक्ष पर एक-एक डाल में बीस-तीस की संख्या में लड़ी की भाँति लटकते हैं। बया की घोंसला बनाने की शिल्पकला प्रसिद्ध है — उसकी चतुराई इसी से प्रकट होती है कि उसने सुरक्षा के लिए सब वृक्ष छोड़कर काँटे के वृक्ष में ही घर बनाया।
“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल” का उद्घोष करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविता, नाटक, निबंध व यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में लेखन किया। उन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन आदि पत्रिकाएँ निकालीं। उनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम व स्वाधीनता के स्वर हैं। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। सत्य हरिश्चन्द्र, भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।
