Ch-4 हरिद्वार “Haridwar” Class 8th Hindi (Malhar) NCERT Solution

हरिद्वार — प्रश्न-उत्तर | EduGrown
हरिद्वार — हर की पैड़ी
कक्षा 8 • मल्हार • पाठ 4 • यात्रा-वृत्तांत (पत्र)

हरिद्वार

लेखक — भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885) • ‘कविवचन सुधा’, 1871 ई.

गंगा-तट का मनोरम वर्णन सम्पूर्ण प्रश्न-उत्तर सरल व विस्तृत व्याख्या
भाग 1
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पाठ से

पत्र पर आधारित अभ्यास प्रश्न

मेरी समझ से

क-1“सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं” का क्या अर्थ है?
  • सज्जन लोग बिना पूछे स्वादिष्ट रसीले फल देते हैं
  • लेखक फलदार वृक्षों की उदारता को मानवीय रूप में व्यक्त कर रहे हैं
  • हरिद्वार के सभी दुकानदार बहुत सज्जन थे
  • लेखक को पत्थर मारकर पके फल तोड़कर खाना पसंद था
व्याख्या

वृक्ष पर पत्थर मारने पर भी वह क्रोध नहीं करता, बल्कि फल देता है। लेखक इसी उदारता व सहनशीलता को सज्जनों के स्वभाव से जोड़कर वृक्षों का मानवीकरण करते हैं — सच्चा सज्जन बुरा करने वाले का भी भला ही करता है।

क-2“वैराग्य और भक्ति का उदय होता था” — इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?
  • शारीरिक थकान और मानसिक बेचैनी
  • आर्थिक संतोष और मानसिक विकास
  • मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव
  • सामाजिक सद्भाव और पारिवारिक प्रेम
व्याख्या

हरिद्वार के पवित्र वातावरण में लेखक के मन में बार-बार ज्ञान, वैराग्य व भक्ति के भाव उठते थे — यह उनके भीतर उपजी मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभूति को दर्शाता है।

क-3“पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था” — सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष?
  • संतुष्टि में सुख होता है
  • सुखी लोग पत्थर पर भोजन करते हैं
  • लेखक के पास सोने की थाली नहीं थी
  • पत्थर पर रखा भोजन अधिक स्वादिष्ट होता है
व्याख्या

गंगा-तट पर सादगी से किया गया भोजन लेखक को सोने की थाली के भोजन से भी अधिक सुखद लगा। इससे यह जीवन-सत्य प्रकट होता है कि सच्चा सुख संतोष व मन की प्रसन्नता में है, साधनों के वैभव में नहीं।

क-4“…पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।” यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?
  • अंधविश्वास और लालच
  • मानवता और देशप्रेम
  • सादगी और आत्मनिर्भरता
  • स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
व्याख्या

लेखक ने स्वयं रसोई बनाकर पत्थर पर सादगी से भोजन किया (सादगी व आत्मनिर्भरता) और वह भी पवित्र गंगा-तट के पास, प्रकृति की गोद में (प्रकृति प्रेम)। अतः यह प्रसंग सादगी, आत्मनिर्भरता व प्रकृति-प्रेम — सभी को बढ़ावा देता है।

क-5लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः किस प्रकार का था?
  • राजनीतिक
  • आध्यात्मिक
  • सामाजिक
  • प्राकृतिक
व्याख्या

लेखक का अनुभव मुख्यतः आध्यात्मिक (ज्ञान, वैराग्य, भक्ति, मन की शांति) तथा प्राकृतिक (पर्वत, गंगा, हरियाली, पक्षी आदि का मनोरम सौंदर्य) था।

क-6पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?
  • कठिन शब्दों का प्रयोग और बोझिलता
  • मुहावरों का अधिक प्रयोग
  • सरलता और चित्रात्मकता
  • जटिलता और संक्षिप्तता
व्याख्या

यद्यपि भाषा लगभग 150 वर्ष पुरानी है, फिर भी वह सरल है और दृश्यों का ऐसा चित्रात्मक वर्णन करती है कि पाठक के सामने हरिद्वार का सजीव चित्र खिंच जाता है।

आपने ये उत्तर ही क्यों चुने — चर्चा कीजिए।
आदर्श उत्तर

मैंने ये उत्तर इसलिए चुने क्योंकि वे पत्र के भाव व लेखक के अनुभव से सीधे मेल खाते हैं — वृक्षों का मानवीकरण उनकी उदारता दिखाता है, गंगा-तट का सादा भोजन संतोष का सुख देता है, और पूरा अनुभव आध्यात्मिक व प्राकृतिक है। साथियों के भिन्न उत्तर भी कुछ हद तक सही हो सकते हैं, पर ये उत्तर पाठ के सबसे निकट हैं।

मिलकर करें मिलान

शब्द (1)हरिद्वार
संदर्भ (3)उत्तराखंड का प्रसिद्ध तीर्थस्थान, जहाँ से गंगा पहाड़ छोड़कर मैदान में आती है।
शब्द (2)गंगा
संदर्भ (5)भारत की प्रधान नदी, हिमालय से निकलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है; अनेक नाम।
शब्द (3)भगीरथ
संदर्भ (6)अयोध्या के सूर्यवंशी राजा, जो तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए।
शब्द (4)चण्डिका
संदर्भ (1)मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप।
शब्द (5)भागवत
संदर्भ (2)अठारह पुराणों में सर्वप्रसिद्ध पुराण; अधिकांश श्रीकृष्ण-कथाएँ।
शब्द (6)दालचीनी
संदर्भ (4)एक पेड़ (दारचीनी), दक्षिण भारत में; सुगंधित छाल दवा व मसाले के काम आती है।
सही जोड़े: 1→3, 2→5, 3→6, 4→1, 5→2, 6→4

मिलकर करें चयन

प्रत्येक वाक्य के दो निष्कर्ष — सही (हरे ✓) और भ्रामक (✕)।

1. पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है।
लताओं का फैलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं की तरह सौम्यता व सुंदरता दर्शाता है।
सज्जनों की शुभ इच्छाएँ लताओं के समान फैल जाती हैं।
2. बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं… घाम, ओस, वर्षा सहते हैं।
वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम सहने के लिए विवश हैं।
वृक्षों की स्थिति साधुओं जैसी है जो हर मौसम सहते हुए तपस्या करते हैं।
3. इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।
यहाँ के पक्षी प्रकृति में सुरक्षित अनुभव करते हैं, इसलिए निडर होकर कल्लोल करते हैं।
यहाँ के पक्षी नगर से डरकर इस जगह आ गए हैं, इसलिए कल्लोल करते हैं।
4. जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी, मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।
गंगाजल की ठंडक और मिठास का अनुभव बहुत मनोहारी है।
गंगाजल की शीतलता-मिठास से शक्कर और बरफ बनाई जा सकती है।
5. एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर भोजन किया।
भोजन इसलिए बनाया क्योंकि गंगा का पानी बहुत गरम था और पकाने में सहायक था।
लेखक ने गंगा के समीप बैठकर भोजन किया, जिससे प्रकृति से उनकी निकटता झलकती है।
6. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।
पत्र को महत्व देकर कहीं रखा/सँजोया जाए।
पत्र को महत्व देकर (पत्रिका में) प्रकाशित किया जाए — क्योंकि यह संपादक को लिखा गया है।

पंक्तियों पर चर्चा

भाव स्पष्ट कीजिए—
“यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है… यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।”
भाव

लेखक कहते हैं कि हरिद्वार इतनी पवित्र व अनोखी भूमि है कि यहाँ की साधारण घास (कुशा) से भी दालचीनी-जावित्री जैसी सुगंध आती है। इस अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन से वे इस तीर्थभूमि की विशिष्टता व पवित्रता को उभारते हैं — जहाँ की मिट्टी-घास तक सुगंधित व धन्य है।

भाव स्पष्ट कीजिए—
“अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं… फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।”
भाव

लेखक वृक्षों की परोपकारी प्रवृत्ति की प्रशंसा करते हैं। वृक्ष अपना सर्वस्व — फल, फूल, छाया, छाल, लकड़ी, यहाँ तक कि जलने के बाद कोयला व राख तक — मनुष्य के काम आने में लगा देते हैं। इनका जीवन पूर्णतः दूसरों के हित में समर्पित है, इसलिए इनका जन्म धन्य है।

सोच-विचार के लिए

“…मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…” — यह क्या दर्शाता है? क्या आपने ऐसा अनुभव किया है?
उत्तर

यह वाक्य दर्शाता है कि हरिद्वार लेखक के मन में इतना गहरा बस गया कि शरीर से लौट आने पर भी उनका मन व चित्त अब भी वहीं रमा हुआ है। हाँ, मैंने भी ऐसा अनुभव किया है — किसी सुंदर स्थान (जैसे पहाड़ी यात्रा या ननिहाल) से लौटने के बाद भी कई दिनों तक मन वहीं की यादों में खोया रहता है।

“पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।” — आज कितना सच?
उत्तर

यह संतोष का सुंदर उदाहरण है — थोड़े में भी प्रसन्न रहना। आज के भौतिकवादी समय में ऐसे संतोषी लोग कम हैं, पर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। आज भी अनेक साधु-संत, ईमानदार श्रमिक, गाँव के सीधे-सादे लोग व सेवाभावी व्यक्ति कम में संतुष्ट रहकर प्रसन्न जीवन जीते हैं। (उदाहरण — कोई शिक्षक जो कम वेतन में भी निष्ठा से पढ़ाता है।)

लेखक ने उस स्थान को ‘टिकने योग्य’ क्यों कहा? उसमें कौन-सी विशेषताएँ होंगी?
उत्तर

लेखक दीवान कृपा राम के बंगले पर ठहरे थे। उन्होंने उसे ‘टिकने योग्य’ इसलिए कहा क्योंकि वहाँ केवल आराम-सुविधा ही नहीं थी, बल्कि वह स्थान शांत, स्वच्छ व खुला था, चारों ओर से शीतल पवन आती थी और गंगा-तट के पवित्र वातावरण के निकट था — जो मन को शांति व प्रसन्नता देता था।

“फल, फूल, गंध, छाया… कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।” — वृक्षों के महत्व पर कौन-सी बातें सूझ रही हैं?
उत्तर

वृक्ष पूर्णतः परोपकारी हैं — वे हमें फल, फूल, छाया, औषधि (छाल), लकड़ी, ईंधन (कोयला), खाद (राख) व प्राणवायु देते हैं। जीवित रहते भी और जलने के बाद भी वे मनुष्य के काम आते हैं। अतः वृक्ष हमारे जीवन के लिए अनिवार्य हैं — हमें इन्हें काटने के बजाय लगाना व सँभालना चाहिए।

अनुमान और कल्पना से

कल्पना कीजिए आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?
गंगा-तट पर तर्पण करता साधु
गंगा-तट पर पवित्र वातावरण
आदर्श उत्तर

मैं हर की पैड़ी पर गंगा-स्नान करूँगा, संध्या-आरती देखूँगा, हरे-भरे पर्वतों व मंदिरों की सैर करूँगा, गंगा-तट पर बैठकर शांति का अनुभव करूँगा, पक्षियों का कलरव सुनूँगा और प्रकृति की गोद में सादा भोजन करूँगा।

गंगा के तट पर पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं — अपने अनुभव लिखिए।
कल्पनात्मक उत्तर

गंगा की ठंडी-ठंडी फुहारें जैसे ही मेरे चेहरे को छूतीं, सारी थकान दूर हो जाती। मन एकदम तरोताज़ा व शांत हो जाता, रोम-रोम पुलकित हो उठता और ऐसा लगता मानो प्रकृति स्वयं मुझे दुलार रही हो। उस शीतलता में एक अद्भुत आनंद और पवित्रता का अनुभव होता।

“सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” — यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?
कल्पनात्मक उत्तर

यदि पेड़-पौधे मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें, तो शायद वे अपने साथ हुए अन्याय (काटे जाने) का विरोध करते, बोल पड़ते और हमसे शिकायत करते। तब लोग उन्हें यूँ न काट पाते। पर वे हमें प्रेम से छाया, फल व फूल भी देते और हमें प्रकृति की रक्षा का पाठ पढ़ाते। संसार और भी सुंदर, हरा-भरा व संवेदनशील बन जाता।

‘गंगा’ शब्द के साथ ‘श्री’ और ‘जी’ क्यों लगाया गया होगा?
उत्तर

‘गंगा’ को भारतीय संस्कृति में पवित्र नदी व माता के रूप में पूजा जाता है। लेखक ने उसके प्रति आदर, श्रद्धा व सम्मान प्रकट करने के लिए ‘श्री’ और ‘जी’ लगाया। इससे उनकी गंगा के प्रति गहरी भक्ति-भावना झलकती है।

कल्पना कीजिए आप हरिद्वार किसी श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा अच्छी बनाने के सुझाव।
सुझाव

दृष्टिबाधित साथी के लिए: हर दृश्य का सजीव वर्णन सुनाना, हाथ पकड़कर रास्ता दिखाना, गंगा-जल छूकर ठंडक का अनुभव कराना, आरती की ध्वनि व घंटियों का आनंद दिलाना, फिसलन वाले घाटों पर विशेष सावधानी।
श्रवणबाधित साथी के लिए: संकेतों/लिखकर बातचीत करना, सब दृश्य दिखाना, सुरक्षित मार्ग चुनना, और हर गतिविधि में उसे साथ रखकर अकेलापन महसूस न होने देना।

लिखें संवाद

लेखक और कल्लू जी के बीच काल्पनिक संवाद।
नमूना संवाद
लेखक: कल्लू जी, देखिए हरिद्वार कितना मनोरम है! मन कैसा प्रसन्न हो उठा।
कल्लू जी: सच कहा आपने! गंगा की यह शीतल धारा और चारों ओर की हरियाली देखकर तो मन ही नहीं भरता।
लेखक: चलिए, आज गंगा-तट पर ही रसोई बनाकर भोजन करते हैं।
कल्लू जी: वाह! प्रकृति की गोद में भोजन का सुख तो सोने की थाली से भी बढ़कर होगा।
लेखक और प्रकृति (पर्वत बोल रहे हों) के बीच काल्पनिक संवाद।
नमूना संवाद
लेखक: हे पर्वतो! तुम साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा कैसे चुपचाप सहते हो?
पर्वत: हम तपस्वी हैं, मित्र! सहना और देना ही हमारा स्वभाव है। हम गंगा को जन्म देते और जगत को छाया-शीतलता देते हैं।
लेखक: तुम्हारी सहनशीलता व उदारता को प्रणाम! मनुष्य को तुमसे बहुत कुछ सीखना चाहिए।
पर्वत: बस, हमें सहेजकर रखना — यही हमारी सच्ची सेवा होगी।

‘है’ और ‘हैं’ का उपयोग (आदरार्थ बहुवचन)

आदर-सम्मान के लिए एकवचन संज्ञा के साथ भी ‘हैं’ का प्रयोग होता है। रिक्त स्थानों की पूर्ति:
उत्तर
1. प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं हैं, वे अभी सभा में उपस्थित हैं
2. माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं, हमें उनका कहना मानना चाहिए।
3. मेरी बहन बाजार जा रही है, वहाँ से किताबें ले आएगी।
4. बाहर फेरीवाला आया हैउसे बुला लाओ।
5. डाकिया जी आए हैं। उन्हें भी बुला लाओ।
6. आप तो बहुत दिन बाद आए हैं, आपका स्वागत है।
7. डॉक्टर साहब बहुत विद्वान हैं, उनसे परामर्श लेना चाहिए।
8. आपके माता-पिता कहाँ हैं? क्या मैं उनसे मिल सकता हूँ?
9. ये हमारे हिंदी के अध्यापक हैं, हम उनसे बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।
10. बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर रहा है
वाक्य 1, 2, 5–9 में आदरणीय/बड़े व्यक्तियों के लिए आदरार्थ बहुवचन ‘हैं’; जबकि 3, 4, 10 में सामान्य एकवचन ‘है’ है।

भावों की पहचान

दी गई पंक्तियों में कौन-सा भाव प्रकट हो रहा है?
1. “उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।” संतोष
2. “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।” वैराग्य / भक्ति
3. “पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।” संतोष
4. “हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।” शांति / प्रसन्नता
5. “सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।” परोपकार / दया

काल की पहचान

इन पंक्तियों में क्रिया किस काल को दर्शा रही है?
1. निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।भविष्य काल
2. यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।वर्तमान काल
3. वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं।वर्तमान काल
4. चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।भूतकाल
5. मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था।भूतकाल
ख — काल बदलकर (नमूना)

• वर्तमान → भूत: “यह भूमि तीन ओर हरे-हरे पर्वतों से घिरी थी।”
• भूत → वर्तमान: “चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।”
• वर्तमान → भविष्य: “वृक्ष ऐसे होंगे कि पत्थर मारने से फल देंगे।”

पत्र की रचना — विशेषताएँ व उदाहरण

1. व्यक्तिपरकतालेखक के विचार/भावनाएँ
“मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है…”
2. संवादात्मकतापाठक से सीधा संवाद
“और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ…”
3. स्वाभाविक शैलीसहज, कृत्रिमता-रहित भाषा
“यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…”
4. व्यक्तिगत अनुभववास्तविक अनुभव साझा
“एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके…” / “ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…”
5. अभिवादन / संबोधनआरंभिक आदरपूर्ण संबोधन
“श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!”
6. हस्ताक्षरनाम/संबंध से समाप्ति
“आपका मित्र — यात्री (भारतेंदु हरिश्चंद्र)”
7. उपसंहार व निवेदनसमाप्ति + निवेदन
“निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।”
8. मुख्य विषय-वस्तुकेंद्रीय वर्णन
हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, गंगा-स्नान आदि का विस्तृत वर्णन।
एक विशेषता एक से अधिक वाक्यों से भी जुड़ सकती है (जैसे व्यक्तिगत अनुभव)।
✉️ पत्र — अपनी किसी यात्रा के विषय में परिचित को पत्र लिखिए (गतिविधि)
रेलगाड़ी — यात्रा
यात्रा-वर्णन को पत्र के रूप में लिखिए
संकेत

संबोधन (प्रिय मित्र/आदरणीय…), यात्रा का स्थान व कारण, मार्ग व पहुँचने का अनुभव, वहाँ के दृश्य/स्थानों का चित्रात्मक वर्णन, अपनी भावनाएँ, और अंत में निवेदन व अपना नाम — इन्हें क्रम से लिखकर एक सुंदर यात्रा-पत्र तैयार किया जा सकता है।

🔗 शब्द से जुड़े शब्द — ‘हरिद्वार’ से जुड़े शब्द
गंगाहर की पैड़ीघाट हरिद्वार तीर्थस्नानआरती पर्वतमंदिरकनखल पुण्यभूमिधर्मशालानीलधारा

लेखन के अनोखे तरीके

तुलनात्मक वाक्य — पाठ में लेखक ने इन्हें किस विशिष्ट तरीके से लिखा?
वृक्ष ↔ साधु“बड़े-बड़े वृक्ष ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा सहते हैं।”
गंगाजल की मिठास ↔ चीनी“जल… मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।”
हरियाली ↔ गलीचा“सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।”
नदी की धारा ↔ भगीरथ का यश“श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता-सी दिखाई देती है।”
इन प्राचीन-शैली की पंक्तियों को आज की हिंदी में लिखिए।
आज की हिंदी में

1. इन पेड़ों पर अनेक रंगों के पक्षी चहचहाते हैं और शहर के दुष्ट शिकारियों से बिना डरे आनंद से कलरव करते हैं।

2. वर्षा के कारण चारों ओर हरियाली ही दिखाई दे रही थी, मानो यात्रियों के विश्राम के लिए हरे रंग का गलीचा बिछा दिया गया हो।

3. यह इतना पवित्र तीर्थ है कि इच्छा और क्रोध से भरे (लोभी-क्रोधी) मनुष्य वहाँ रहते ही नहीं।

4. वहाँ जाते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और निर्मल हो गया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

5. यहाँ रात को ग्रहण लगा और हम लोगों ने ग्रहण के समय बड़े आनंद से स्नान किया तथा दिन में श्री भागवत का पाठ भी किया।

6. उस समय पत्थर पर बैठकर किए गए भोजन का सुख सोने की थाली के भोजन से कहीं अधिक था।

7. मुझे विश्वास है कि आप इस पत्र को (अपनी पत्रिका में) स्थान देंगे।

प्राचीन वर्तनी वाले शब्द — सूची व आज की वर्तनी।
शिषरशिखर
जात्रियोंयात्रियों
बरफबर्फ
ठंढेठंडे
मनोर्थमनोरथ
दृष्टि पड़तीदिखाई पड़ती
भाग 2
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पाठ से आगे

विस्तार / सृजनात्मक प्रश्न

आपकी बात

1क्या आपने कभी खुले वातावरण/प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?
आदर्श उत्तर

हाँ, एक बार हम पिकनिक पर नदी-किनारे बैठकर भोजन कर रहे थे। खुली हवा, पक्षियों की चहचहाहट और प्रकृति की गोद में किया वह भोजन घर के खाने से कहीं अधिक स्वादिष्ट व आनंददायक लगा — मन एकदम प्रसन्न व हल्का हो गया था।

2क्या कभी किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया?
आदर्श उत्तर

हाँ, गर्मी की एक दोपहर थककर लौटने पर माँ के हाथ का एक गिलास ठंडा शिकंजी (नींबू-पानी) ने मुझे जो सुख दिया, वह किसी महँगी चीज़ से कम न था। कभी-कभी छोटी-सी चीज़ भी बड़ा संतोष व खुशी दे जाती है।

3आपको किस स्थान पर पवित्रता व प्रसन्नता का अनुभव होता है?
आदर्श उत्तर

मुझे मंदिर/प्रार्थना-स्थल में तथा सुबह बगीचे या नदी-तट पर जाकर मन की गहरी शांति मिलती है। वहाँ की शांति, स्वच्छ हवा, हरियाली और सकारात्मक वातावरण से मन एकदम शांत व प्रसन्न हो जाता है।

4क्या कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं? क्यों?
आदर्श उत्तर

हाँ, हमारे आँगन का आम का पेड़ मुझे बहुत प्रिय है। बचपन से मैंने उसकी छाया में खेला, उसके फल खाए और उस पर पक्षियों के घोंसले देखे। वह मेरे बचपन की अनगिनत यादों का साथी है, इसलिए उससे मेरा गहरा भावनात्मक जुड़ाव है।

🌿 प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण — “तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!”
गंगा-तट के घाट
हरिद्वार के मनोरम घाट
पोस्टर हेतु संदेश (नमूना)

पोस्टर पर लिख सकते हैं — “गंगा को स्वच्छ रखें, कचरा न फैलाएँ”, “पेड़ लगाएँ, धरती बचाएँ”, “प्लास्टिक नहीं, हरियाली अपनाएँ”, “तीर्थ ही नहीं, पूरी पृथ्वी पावन हो!” — साथ में स्वच्छ नदी, हरे पर्वत व पौधा लगाते बच्चों के चित्र बनाएँ।

🧘 स्वास्थ्य और योग
क — ध्यान का अनुभव (नमूना अनुच्छेद)

जब मैं पाँच मिनट आँखें बंद करके मौन बैठा और अपनी साँसों पर ध्यान दिया, तो पहले आस-पास की छोटी-छोटी ध्वनियाँ — पंखे की आवाज़, पक्षियों की चहचहाहट — स्पष्ट सुनाई देने लगीं। धीरे-धीरे मन शांत होने लगा और भीतर एक हल्कापन व सुकून महसूस हुआ। ध्यान से मन एकाग्र होता है और तनाव दूर होता है।

ख — सूचना (योग दिवस)
सूचना
दिनांक: 21 जून
समस्त विद्यार्थियों को सूचित किया जाता है कि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में विद्यालय प्रांगण में प्रातः 7:00 बजे सामूहिक योग कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। सभी विद्यार्थी समय पर, योग-वस्त्र में उपस्थित हों।
— प्रधानाचार्य
🌳 सज्जन वृक्ष — एक पौधा लगाइए व उसका मित्र बनिए (गतिविधि)
सुझाव

एक पौधा (जैसे तुलसी, नीम या आम) लगाइए, उसे प्यारा-सा नाम दीजिए, नियमित पानी व देखभाल कीजिए और अपनी दैनंदिनी (डायरी) में उसकी बढ़ती हुई अवस्था का वर्णन लिखिए — जैसे किसी मित्र की प्रगति देख रहे हों।

🔤 अपने शब्द — ‘शीतल’ शब्द-चित्र
अर्थठंडा, शीतलता देने वाला
वाक्य प्रयोगगंगा का जल अत्यंत शीतल था।
समानार्थी शब्दठंडा, शीत, सर्द, हिमवत्
विपरीतार्थक शब्दउष्ण, गरम, तप्त

यात्रा के व्यय की गणना

मान लीजिए यात्रा के लिए ₹1000 दिए गए हैं। यात्रा, खाना आदि मिलाकर एक व्यय-विवरण बनाइए।
नमूना व्यय-विवरण
क्रममद (खर्च)राशि (₹)
1आने-जाने का किराया (बस/रेल)350
2भोजन (नाश्ता + दोपहर + शाम)250
3प्रवेश/दर्शन शुल्क100
4स्मृति-चिह्न (souvenir)150
5जलपान व अन्य100
6आपातकालीन बचत50
कुल योग1000
350 + 250 + 100 + 150 + 100 + 50 = ₹1000 ✓
एक छोटी वस्तु (स्मृति-चिह्न) क्या खरीदेंगे और क्यों?
उत्तर

मैं एक छोटी-सी गंगाजल की बोतल या रुद्राक्ष की माला खरीदूँगा, क्योंकि वह सस्ती, उपयोगी और यात्रा की मधुर याद दिलाने वाली है, तथा मेरे ₹150 के बजट में आसानी से आ जाती है। (अनावश्यक महँगी चीज़ें खरीदकर बजट बिगाड़ना ठीक नहीं।)

🧭 यात्रा सबके लिए
विविध यात्रियों का समूह
हर यात्री की अलग-अलग आवश्यकताएँ हो सकती हैं
उत्तर

(क) टूरिस्ट गाइड के रूप में: सबको साथ रखना, सुरक्षित व आरामदायक मार्ग चुनना, बच्चों-बुज़ुर्गों व दिव्यांगों का विशेष ध्यान रखना, समय पर भोजन-विश्राम की व्यवस्था, स्थानों की रोचक जानकारी देना और स्वच्छता बनाए रखना।

(ख) श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए: संकेतों या लिखकर बातचीत, सब दृश्य दिखाना, मार्ग-संकेत/नक्शे का उपयोग, और हर बात में उसे शामिल रखना ताकि वह अकेला महसूस न करे।

(ग) धरोहरों की सुरक्षा के लिए: दीवारों/मूर्तियों पर कुछ न लिखना-खुरचना, कचरा न फैलाना, निर्धारित मार्ग पर चलना, नियमों का पालन करना और दूसरों को भी जागरूक करना।

आज की पहेली

पाठ में से शब्द खोजिए—
1. एक मसालादालचीनी (या जावित्री)
2. कपास से जुड़ा शब्दजनेऊ
3. जहाँ स्नान होता हैघाट / हर की पैड़ी
4. वृक्ष का कोई अंगछाल / पत्ते / जड़ / बीज / फल / फूल
5. एक नगर/तीर्थहरिद्वार / कनखल / कुशावर्त / ज्वालापुर
6. व्यापार से जुड़ा स्थानदुकान / बाजार
7. एक नदीगंगा / नीलधारा
8. एक पर्वतविल्व पर्वत / नील पर्वत
9. एक धार्मिक ग्रंथभागवत

झरोखे से · खोजबीन

भारतेंदु का एक और पत्र-अंश — ‘हरिद्वार के मार्ग में’
बबूल के पेड़ पर बया के लटकते घोंसले
बया के लटकते कलात्मक घोंसले
सारांश

हरिद्वार के रास्ते में लेखक ने अनेक प्रकार के वृक्ष व पक्षी देखे — एक छोटा पीले रंग का सुंदर पक्षी भी देखा। बया नामक छोटी चिड़िया के अनेक घोंसले मिले, जो सूखे बबूल के काँटेदार वृक्ष पर एक-एक डाल में बीस-तीस की संख्या में लड़ी की भाँति लटकते हैं। बया की घोंसला बनाने की शिल्पकला प्रसिद्ध है — उसकी चतुराई इसी से प्रकट होती है कि उसने सुरक्षा के लिए सब वृक्ष छोड़कर काँटे के वृक्ष में ही घर बनाया।

खोजबीन: भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रसिद्ध नाटक अंधेर नगरी पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँढ़कर पढ़िए और चर्चा कीजिए।
👤 लेखक परिचय — भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850–1885)
संक्षेप में

“निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल” का उद्घोष करने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कविता, नाटक, निबंध व यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में लेखन किया। उन्होंने कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन आदि पत्रिकाएँ निकालीं। उनकी रचनाओं में समाज-सुधार, राष्ट्र-प्रेम व स्वाधीनता के स्वर हैं। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक माना जाता है। सत्य हरिश्चन्द्र, भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।

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