एक आशीर्वाद
कवि — दुष्यंत कुमार (1933–1975)
पाठ से
मेरी समझ से
- ○युवा वर्ग को
- ○नागरिकों को
- ✓बच्चों को★
- ○श्रमिकों को
यह कविता एक आशीर्वाद के रूप में बच्चे (बढ़ती हुई नई पीढ़ी) को संबोधित है। “भावना की गोद से उतरकर… चलना सीखें” और “अपने पाँवों पर खड़े हों” जैसी पंक्तियाँ एक नन्हे शिशु के बढ़ने व आत्मनिर्भर होने का संकेत देती हैं। कवि चाहता है कि वह बच्चा बड़े सपने देखे और स्वावलंबी बने।
- ○कल्पना की उड़ान भरना
- ✓आकांक्षाएँ और रुचियाँ रखना★
- ○बहुत-सी उपलब्धियाँ पाना
- ✓बड़े लक्ष्य निर्धारित करना★
यहाँ ‘स्वप्न’ का अर्थ नींद में देखे जाने वाले सपने नहीं, बल्कि जीवन की ऊँची आकांक्षाएँ, अभिलाषाएँ व बड़े लक्ष्य हैं। “स्वप्न बड़े हों” अर्थात् व्यक्ति बड़ी सोच रखे और जीवन में बड़े लक्ष्य तय करे।
- ✓चुनौतियों को स्वीकार करना★
- ○प्रकाश का प्रसार करना
- ○अग्नि के ताप का अनुभव करना
- ✓कष्टों से नहीं घबराना★
बच्चा हर दीये की रोशनी देखकर ललचाता है और उसे छूने के लिए उँगली तक जला बैठता है। इसका भाव है कि नई पीढ़ी चुनौतियों को स्वीकार करे और कष्ट सहकर भी सीखने/पाने से न घबराए। अनुभव व ज्ञान के लिए जोखिम उठाने का साहस रखे।
- ○अपने पैरों पर खड़े होना
- ○सफलता प्राप्त करना
- ○कठिनाइयों का सामना करना
- ✓आत्मनिर्भर होना★
यह एक मुहावरेदार अभिव्यक्ति है। ‘अपने पाँवों पर खड़े होना’ का आशय है आत्मनिर्भर बनना — दूसरों पर निर्भर न रहकर स्वयं के बल पर जीवन में आगे बढ़ना। कवि का आशीर्वाद है कि बच्चा स्वावलंबी बने।
मैंने ये उत्तर इसलिए चुने क्योंकि वे कविता के मूल भाव से सीधे मेल खाते हैं — कविता एक बच्चे को बड़े सपने (आकांक्षाएँ/लक्ष्य) देखने, चुनौतियों से न घबराने और आत्मनिर्भर बनने का आशीर्वाद देती है। कुछ साथियों ने ‘युवा वर्ग’ या ‘कल्पना की उड़ान’ भी चुना होगा, जो व्यापक अर्थ में स्वीकार्य है, पर कविता का सीधा संबोधन बच्चे/नई पीढ़ी से है।
मिलकर करें मिलान
पंक्तियों पर चर्चा
कवि नई पीढ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहता है — “जाओ, और तुम्हारे सपने बड़े हों।” अर्थात् व्यक्ति छोटी सोच में न बँधे, बल्कि बड़ी आकांक्षाएँ व ऊँचे लक्ष्य रखे। बड़े सपने ही व्यक्ति को बड़ी सफलता की ओर ले जाते हैं।
कवि चाहता है कि बच्चा केवल कल्पनाओं व भावनाओं में न खोया रहे, बल्कि शीघ्र ही धरती की वास्तविकता (यथार्थ) को समझे और व्यावहारिक जीवन में आगे बढ़ना सीखे। सपने देखने के साथ-साथ ज़मीनी हकीकत पर चलना भी ज़रूरी है।
जैसे बच्चा चाँद-तारों (जो पहुँच से बाहर हैं) को पाने के लिए रूठता व मचलता है, वैसे ही व्यक्ति को असंभव-से लगने वाले ऊँचे लक्ष्यों के लिए भी हठ व निरंतर प्रयास करना चाहिए। कठिन से कठिन लक्ष्य के लिए जिद ठानने से ही बड़ी उपलब्धियाँ संभव होती हैं।
अनुमान और कल्पना से
बड़े सपने वे हो सकते हैं जैसे — डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षक या इंजीनियर बनना, देश की सेवा करना, समाज से गरीबी/अशिक्षा मिटाना, पर्यावरण की रक्षा करना या कोई बड़ी खोज करना। ये सपने इसलिए बड़े हैं क्योंकि इन्हें पूरा करने में कठिन परिश्रम लगता है और इनसे स्वयं के साथ-साथ समाज व देश का भी भला होता है।
केवल ललक (इच्छा) से सपने पूरे नहीं होते। ललक के साथ आवश्यक हैं — स्पष्ट योजना, निरंतर परिश्रम व प्रयास, धैर्य, लगन, अनुशासन और दृढ़ संकल्प। क्योंकि इच्छा तो दिशा दिखाती है, पर मंज़िल तक योजना बनाकर लगातार मेहनत करने से ही पहुँचा जा सकता है। बिना प्रयास के केवल इच्छा अधूरी रह जाती है।
मैं अपने सपने से कहूँगा — “प्यारे मित्र! तुम मेरी आँखों में बसे हो और मुझे रात-दिन प्रेरित करते हो। कभी-कभी रास्ता कठिन लगता है और मैं थक जाता हूँ, पर तुम मुझे हिम्मत देते रहना, मेरा साथ कभी मत छोड़ना। मैं वादा करता हूँ कि कठिन परिश्रम करके तुम्हें ज़रूर सच कर दिखाऊँगा।”
मैं अपने छोटे भाई/बहन को यह आशीर्वाद दूँगा कि वह स्वस्थ रहे, खूब पढ़े, बड़े सपने देखे और आत्मनिर्भर बने। साथ ही वह सदा सच्चा, मेहनती व दयालु बने रहे। ऐसा इसलिए, क्योंकि अच्छी शिक्षा, परिश्रम और अच्छे संस्कार ही जीवन को सफल व सार्थक बनाते हैं।
इस कविता में सपने को मनुष्य की तरह हँसते, मुसकराते व गाते हुए दिखाया गया है — यह मानवीकरण (personification) है। अन्य विशेषताएँ —
• आशीर्वाद/संबोधन शैली — “जा, तेरे स्वप्न बड़े हों”।
• सुंदर बिंब/प्रतीक — चाँद-तारे, दीये की रोशनी, उँगली जलाना।
• प्रेरणादायी व सकारात्मक भाव — आत्मनिर्भरता, साहस, बड़े लक्ष्य।
• सरल, प्रवाहपूर्ण मुक्त छंद (बिना कठिन तुकबंदी के) तथा क्रिया-शब्दों की लड़ी (चलना, रूठना, मचलना, हँसना, गाना)।
• आरंभ व अंत में “जा, तेरे स्वप्न बड़े हों” की पुनरावृत्ति से भाव की गहराई।
घिरते देखा है,
गरजते देखा है,
बरसते देखा है,
उमड़ते-घुमड़ते देखा है,
प्यासी धरती को
हँसते-झूमते देखा है॥
मैं शीर्षक चुनूँगा — “तेरे स्वप्न बड़े हों” अथवा केवल “स्वप्न”।
कारण: यही पंक्ति पूरी कविता की केंद्रीय भावना है और आरंभ व अंत दोनों में दोहराई गई है। पूरी कविता ‘स्वप्न’ शब्द के इर्द-गिर्द ही बुनी गई है, इसलिए यह शीर्षक कविता के भाव को सबसे सही ढंग से व्यक्त करेगा।
भाषा की बात
पाठ से आगे
यह व्यक्तिगत डायरी-गतिविधि है — दिनभर की गतिविधियों पर ध्यान देकर लिखिए कि आप कब-कब हँसे, मुसकराए, गाए, रूठे और मचले। उदाहरण —
आपकी बात
मुझे प्रायः ये आशीर्वाद मिलते हैं — “खूब पढ़ो और बड़े बनो”, “स्वस्थ व खुश रहो”, “हमेशा सच बोलो और अच्छे काम करो”, “परीक्षा में सफल हो”, “दीर्घायु हो व नाम रोशन करो।” ये आशीर्वाद मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा व आत्मविश्वास देते हैं।
मैं अपने छोटों से कहता हूँ — “खूब मन लगाकर पढ़ो”, “हमेशा खुश व स्वस्थ रहो”, “बड़ों का आदर करो”, “अपने सपनों को पूरा करो।” कभी-कभी उन्हें प्यार से सिर पर हाथ रखकर या प्रोत्साहन के दो मीठे शब्द कहकर भी मैं अपनी शुभकामना व्यक्त करता हूँ।
सपनों की बातें
मेरा सपना: एक अच्छा वैज्ञानिक बनना। इसे पूरा करने के लिए —
• प्रयत्न: रोज़ नियमित अध्ययन, विज्ञान के प्रयोग व पुस्तकें पढ़ना।
• योजना: कक्षावार लक्ष्य तय करना, समय-सारणी बनाना, कमज़ोर विषयों पर अधिक ध्यान।
• सहयोग: माता-पिता, शिक्षकों व पुस्तकालय/इंटरनेट से मार्गदर्शन।
• संभावित चुनौतियाँ: समय का अभाव, संसाधनों की कमी, असफलता का डर — जिन्हें धैर्य, परिश्रम व आत्मविश्वास से पार किया जा सकता है।
झरोखे से · साझी समझ
डॉ. कलाम कहते हैं कि सच्चे सपने वे होते हैं जो हमें चैन से सोने नहीं देते। सपनों को पूरा करने के लिए पूरी तरह आँखें खोलकर जागते रहना पड़ता है, यानी सतत प्रयासरत रहना होता है।
इक्कीसवीं सदी में पहले से कहीं अधिक संभावनाएँ हैं, पर समय सीमित है। हर युवा को सब अनुभव मिल सकें, इसके लिए दो उपाय हैं — या तो उपलब्ध समय को बढ़ाएँ, या उतने ही समय में अधिक काम/उपलब्धि की मात्रा बढ़ाएँ। इन दोनों जीवन-लक्ष्यों को समझ लेने से प्रगति के अनेक द्वार स्वयं खुल जाते हैं — यही वह ‘लंबी छलांग’ है जो मानवता को विकास के अगले चरण तक पहुँचा सकती है।
कला, विज्ञान, राजनीति, खेल व मनोरंजन आदि क्षेत्रों के सफल व्यक्तियों ने अपने सपनों को साकार करने के लिए कैसे योजना बनाई व संघर्ष किया — पुस्तकालय या इंटरनेट से इनके बारे में पढ़िए। (उदाहरण — डॉ. कलाम, मैरी कॉम, ध्यानचंद, लता मंगेशकर, सी.वी. रमन आदि की संघर्ष-यात्रा प्रेरणादायी है।)
दुष्यंत कुमार हिंदी के लोकप्रिय रचनाकारों में से एक थे। इनका जन्म बिजनौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ। बहुत कम समय में ही इन्होंने हिंदी साहित्य को विविध रचनाओं व जीवंत भाषा से समृद्ध किया। साये में धूप इनका सर्वाधिक चर्चित ग़ज़ल-संग्रह है, और इनका संपूर्ण रचना-संसार दुष्यंत कुमार रचनावली (चार खंडों) में प्रकाशित है।
