णमो अरिहन्ताणम्
ॠषभदेवः (आदिनाथः) · जैनधर्मः · सम्पूर्ण-प्रश्नोत्तराणि
कथासारः
राजा नाभेः मरुदेव्याश्च पुत्रः ॠषभः गुणसम्पन्नः राजनीतिज्ञः च आसीत्। दुर्भिक्षादिसमस्यासु राज्यभारं प्राप्य सः जनेभ्यः कृषि-वस्त्रनिर्माण-पशुपालन-गृहनिर्माणादीनि जीवनकौशलानि अशिक्षयत् — येन प्रजाः सुखिताः। तेन निर्मितस्य ‘विनिता’ नगरस्य कारणात् प्रजाः तं ‘राजा ॠषभदेवः’ इति अकथयन्। एकदा नृत्यप्रदर्शनसमये एका नर्तकी सहसा मृता — तेन संसारस्य अनित्यतां बुद्ध्वा ॠषभदेवः साम्राज्यं भरत-बाहुबलिभ्यां विभज्य संन्यासं गृहीत्वा कठोरं तपः अकरोत्। प्रपौत्रेण श्रेयांसेन दत्तेन इक्षुरसेन तस्य दीर्घोपवासः समाप्तः; अन्ते प्रयागे केवलज्ञानं प्राप्य सः जैनधर्मस्य प्रथमः आदिनाथः तीर्थङ्करः अभवत्। तेषां परमः मन्त्रः — “णमो अरिहन्ताणं…”।
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
पाठ्यपुस्तक-अभ्यासः — प्रश्न १ से ५ तक
- ॠषभेण निर्मितस्य नगरस्य नाम किम्? — विनिता (विनीता)
- ॠषभस्य प्रसिद्धे द्वे कन्ये के? — ब्राह्मी, सुन्दरी
- कस्यां लिप्यां नैकानि शास्त्राणि लिपिबद्धानि? — ब्राह्म्याम् (ब्राह्मीलिप्याम्)
- विनिता नामकं राज्यं ॠषभः कस्मै समर्पितवान्? — भरताय
- ॠषभः बाहुबलिने किं राज्यं प्रदत्तवान्? — तक्षशिलाम्
- प्रजाः भिक्षायां कानि वस्तूनि यच्छन्ति स्म? — आभरणानि (अनर्घवस्तूनि)
- देशे काः समस्याः सन्ति इति ॠषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता?
ॠषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः च — एताः मूलसमस्याः देशे सन्ति।
- महाराजः केषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्?
महाराजः कृषिकार्यं, भोजननिर्माणं, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणं, पशुपालनं, गृहनिर्माणं, नगरनिर्माणम् इत्यादिषु जीवनकौशलेषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्।
- ॠषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत्?
राजप्रासादे नृत्यप्रदर्शनसमये एका आरोग्यवती नर्तकी सहसा भूमौ पतित्वा मृता — एषा घटना ॠषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी आसीत्। तेन सः संसारस्य अनित्यतां बुद्ध्वा वैराग्यं प्राप्तवान्।
- ॠषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः कथम् अभवत्?
तस्य प्रपौत्रः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्, तेन ॠषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्तः। तत् वैशाखमासस्य अक्षयतृतीयादिनम् आसीत्।
- ॠषभदेवः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान्?
ॠषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।
- जनानां मार्गदर्शनार्थं कं क्रमं रचितवान्?
ॠषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः, भिक्षुणी, श्रावकः, श्राविका — इति क्रमं (जैनसङ्घं) रचितवान्।
| विग्रहवाक्यम् | समस्तपदम् |
|---|---|
| (क) महान् च असौ राजा च | महाराजः |
| (ख) प्रजानां सुखम् | प्रजासुखम् |
| (ग) मूलाः समस्याः | मूलसमस्याः |
| (घ) भोजनस्य निर्माणम् | भोजननिर्माणम् |
| (ङ) आर्थिकी स्थितिः | आर्थिकस्थितिः |
| (च) प्राप्तः आनन्दः येन सः | प्राप्तानन्दः |
| (छ) विधिना लिखितम् | विधिलिखितम् |
| (ज) गृहं गृहं प्रति | प्रतिगृहम् |
| (झ) ब्राह्मीनामा लिपिः | ब्राह्मीलिपिः |
यथा — जनैः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धम्। → जनाः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धवन्तः।
| कर्मवाच्यम् (दत्तम्) | कर्तृवाच्यम् (समाधानम्) |
|---|---|
| (क) महाराजेन राज्यं समर्पितम्। | महाराजः राज्यं समर्पितवान्। |
| (ख) केनापि तत् न चिन्तितम्। | कोऽपि तत् न चिन्तितवान्। |
| (ग) ॠषभदेवेन दीर्घकालिकः उपवासः कृतः। | ॠषभदेवः दीर्घकालिकम् उपवासं कृतवान्। |
| (घ) जनैः जीवनपद्धतिः परिवर्तिता। | जनाः जीवनपद्धतिं परिवर्तितवन्तः। |
| (ङ) ॠषभेण योजना कृता। | ॠषभः योजनां कृतवान्। |
नियमः: कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया + क्त-प्रत्ययः (कर्मानुसारि क्रिया); कर्तृवाच्ये कर्तरि प्रथमा + क्तवतु-प्रत्ययः (कर्त्रनुसारि क्रिया)।
| सन्धिविच्छेदः | सन्धिः (पदम्) | सन्धिनाम |
|---|---|---|
| (क) इति + अतः | इत्यतः | यण्-सन्धिः |
| (ख) च + इति | चेति | गुण-सन्धिः |
| (ग) देवस्य + अपि | देवस्यापि | दीर्घ (सवर्णदीर्घ)-सन्धिः |
| (घ) तथा + एव | तथैव | वृद्धि-सन्धिः |
| (ङ) इति + एतादृशाः | इत्येतादृशाः | यण्-सन्धिः |
| (च) ब्राह्मीद्वारा + एव | ब्राह्मीद्वारैव | वृद्धि-सन्धिः |
| (छ) प्रस्थितः + अयम् | प्रस्थितोऽयम् | विसर्ग-सन्धिः |
स्वाध्यायान्मा प्रमद:
णमोकारमन्त्रः · श्लोकाः · चतुर्विंशति-तीर्थङ्कराः · तीर्थस्थानानि · परियोजना · शब्दार्थः
तीर्थङ्करः — केवलज्ञानं प्राप्तः जिनः
“णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं,
णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्वसाहूणं॥”
अर्थः: अरिहन्तेभ्यः नमः, सिद्धेभ्यः नमः, आचार्येभ्यः नमः, उपाध्यायेभ्यः नमः, लोके सर्वसाधुभ्यः नमः। एषः मन्त्रः पञ्चपरमेष्ठिभ्यः (अरिहन्त · सिद्ध · आचार्य · उपाध्याय · सर्वसाधु) प्रणामं समर्पयति। प्रतिवर्षम् अप्रैल्-मासस्य नवमे दिनाङ्के ‘नवकारमहामन्त्रदिवसः’ इति आचर्यते।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥
| क्र. | तीर्थङ्करः | क्र. | तीर्थङ्करः |
|---|---|---|---|
| १ | ॠषभदेवः (आदिनाथः) | १३ | विमलनाथः |
| २ | अजितनाथः | १४ | अनन्तनाथः |
| ३ | सम्भवनाथः | १५ | धर्मनाथः |
| ४ | अभिनन्दननाथः | १६ | शान्तिनाथः |
| ५ | सुमतिनाथः | १७ | कुन्थुनाथः |
| ६ | पद्मप्रभः | १८ | अरनाथः |
| ७ | सुपार्श्वनाथः | १९ | मल्लिनाथः |
| ८ | चन्द्रप्रभः | २० | मुनिसुव्रतः |
| ९ | पुष्पदन्तः (सुविधिनाथः) | २१ | नमिनाथः |
| १० | शीतलनाथः | २२ | नेमिनाथः (अरिष्टनेमिः) |
| ११ | श्रेयांसनाथः | २३ | पार्श्वनाथः |
| १२ | वासुपूज्यः | २४ | महावीरः (वर्धमानः) |
ॠषभदेवः (१): प्रथमः तीर्थङ्करः ‘आदिनाथः’; आद्यः धर्मोपदेशकः — कृषि, लिपि, कला, व्यवसायः च जगति आरब्धाः। महावीरः (२४): चतुर्विंशः तीर्थङ्करः; वैशाली-कुण्डग्रामे जातः; पञ्चमहाव्रतानां प्रचारकः।
| तीर्थस्थानम् | राज्यम् |
|---|---|
| सम्मेतशिखरम् (पारसनाथ पर्वतः) | झारखण्डः |
| श्रवणबेलगोळः | कर्नाटकम् |
| पावापुरी | बिहारः |
| रैवतकः (गिरनार पर्वतः) | गुजरातः |
| शत्रुञ्जयपर्वतः (पालीताणा) | गुजरातः |
| राजगृहम् | बिहारः |
| अयोध्या | उत्तरप्रदेशः |
| काशी (वाराणसी) | उत्तरप्रदेशः |
| चम्पापुरम् (भागलपुरम्) | बिहारः |
| हस्तिनापुरम् | उत्तरप्रदेशः |
| मिथिला | बिहारः |
| द्वारिका | गुजरातः |
| संस्कृतम् | प्राकृतम् |
|---|---|
| अहं विद्यालयं गच्छामि। | अहं विज्जालयं गच्छामि / गच्छमि / गच्छेमि / गच्छं। |
| सः जलं पिबति। | सो जलं पिवइ। |
| बालकः पद्यं पठति। | बालओ पोत्थं पढइ / पढए / पढदि / पढदे। |
| भवान् कुत्र गच्छति। | भवतो कत्थ गच्छउ। |
| अहं फलानि खादामि। | अहं फलाइं / फलाणि खामि। |
| एतत् मम मित्रम् अस्ति। | एसो मम / मज्झ मित्तो / मित्तं अत्थि। |
प्राकृतभाषाः: आर्ष · मागधी · शौरसेनी · महाराष्ट्री · पैशाची · चूलिका · अपभ्रंश। जैनागमाः अर्धमागधी-भाषायां लिखिताः। संस्कृतं यदि स्रोतस्विनी नदी, तर्हि प्राकृतं तस्याः सरलः प्रवाहः।
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| अचिन्तयत् | चिन्तितवान् | विचार किया | Considered |
| अधीतविद्यः | अधीता विद्या येन | पढ़ा-लिखा | Learned |
| अनर्घवस्तूनि | अनर्घाणि वस्तूनि | अनमोल वस्तुएँ | Precious items |
| अनुयायिनः | अनुगामिनः | अनुयायी | Followers |
| अनेकान्तवादः | सत्यस्य बहुपक्षवादः | अनेकान्तवाद | Multiplicity of views |
| अपरिग्रहः | न परिग्रहः | संग्रह न करना | Non-possession |
| अरिहन्ताणम् | जितशत्रूणाम् | अरिहन्तों का | Of Arihantas |
| आरम्भे | आदौ | आरम्भ में | At the beginning |
| आलस्यम् | प्रमादः | आलस्य | Laziness |
| इक्षुक्षेत्रम् | इक्षोः क्षेत्रम् | गन्ने का खेत | Sugarcane field |
| उत्पादनक्षमता | उत्पादनस्य क्षमता | उत्पादन क्षमता | Productivity |
| उपवासः | निराहारव्रतम् | उपवास | Fasting |
| कठोरतपसा | कठोरेण तपसा | कठोर तप से | Severe penance |
| करुणाशालिनी | दयायुक्ता | दयालु | Compassionate |
| केवलज्ञानम् | कैवल्यस्य ज्ञानम् | केवलज्ञान | Absolute knowledge |
| तीर्थङ्करः | धर्ममार्गप्रदर्शकः | तीर्थंकर | Tirthankara |
| दुर्भिक्षम् | भिक्षायाः अभावः | अकाल | Famine |
| दैवाधीनम् | दैवस्य अधीनम् | भाग्य के अधीन | Dependent on fate |
| निराहारम् | भोजनरहितम् | निराहार | Without food |
| न्यायिकव्यवस्था | न्यायसम्बन्धिनी व्यवस्था | न्याय व्यवस्था | Judicial system |
| परित्यज्य | त्यक्त्वा | त्यागकर | Abandoning |
| परिष्काराय | निवारणाय | समाधान के लिए | For rectification |
| परिहृताः | निवारिताः | दूर हुईं | Solved |
| विद्वेषः | वैरम् | द्वेष | Hatred |
| विधिलिखितम् | विधिना लिखितम् | नियति-निर्धारित | Predestined |
| विक्षुब्धम् | उद्विग्नम् | विचलित | Agitated |
| शाश्वतम् | नित्यम् | शाश्वत | Eternal |
| शिलालेखाः | शिलासु लिखिताः लेखाः | शिलालेख | Inscriptions |
| सङ्घः | समूहः | संघ | Community |
| सम्भ्रान्ताः | किंकर्तव्यमूढाः | विस्मित | Perplexed |
| सुप्रतिष्ठितम् | दृढरूपेण स्थापितम् | सुस्थापित | Well established |
