कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
रूपकम् “एकचक्रम्” (एन्. रङ्गनाथशर्मा) · बकासुरवधः · सम्पूर्ण-प्रश्नोत्तराणि
कथासारः
पाण्डवाः एकचक्रनगरे एकस्य ब्राह्मणस्य गृहे प्रच्छन्नरूपेण निवसन्ति स्म। तस्य नगरस्य समीपे पर्वते बकः नाम राक्षसः वसति, यः प्रतिदिनं एकस्मात् गृहात् शकटपूरं भोजनम् एकं मनुष्यं च बलिरूपेण गृह्णाति। पर्यायेण सा वारा प्रतिवेशिनः ब्राह्मणस्य आगता। ब्राह्मणस्य उपकारस्य प्रत्युपकाररूपेण कुन्ती स्वपुत्रं भीमं प्रेषयितुं निश्चिनोति। भीमः भोजनं स्वयं भुक्त्वा मल्लयुद्धे बकासुरं हत्वा नगरं रक्षति — “कृतं प्रत्युपकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः।”
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
पाठ्यपुस्तक-अभ्यासः — प्रश्न १ से १० तक
- भीमस्य जननी का? — कुन्ती
- कुन्त्या निश्चितं कः न समर्थयति? — युधिष्ठिरः
- पाण्डवानाम् उपकर्ता कः? — ब्राह्मणः (विप्रः)
- कं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते? — भीमम्
- पाण्डवाः कुत्र निवसन्ति स्म? — एकचक्रनगरे
- भरतवंशप्रदीपः कः? — भीमः
- कः भृशं परिदेव्यते? — तपस्वी ब्राह्मणः (विप्रः)
- “भैक्षप्रदानेन…” इति श्लोकानुसारं सनातनः धर्मः कः?
परैः कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः करणीयः — “कृतं प्रत्युपकृतं भूयात्” — एषः एव सनातनः (शाश्वतः) धर्मः।
- बकनामा दैत्यः कुत्र वसति?
बकनामा दैत्यः एकचक्रनगरस्य अदूरवर्तिनि पर्वते (व्याघ्रगह्वरे) वसति।
- कुन्ती किं प्रतिश्रुतवती?
कुन्ती प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय स्वपुत्राणाम् एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयिष्यामि इति प्रतिश्रुतवती।
- भीमस्य अग्रजः कः?
भीमस्य अग्रजः युधिष्ठिरः अस्ति।
- का प्रत्यादेशं न अर्हति?
मातुः आज्ञा प्रत्यादेशं (अवज्ञाम्) न अर्हति।
- पौराः बकासुराय कथं बलिम् आहरन्ति?
पौराः पर्यायेण (वारानुसारं) प्रतिदिनं शकटपूरं भोजनं एकं नगरवासिनं च बकासुराय बलिम् आहरन्ति।
- क्षत्रियाणां धर्मः कः?
क्षत्रियाणां धर्मः नररक्षणम् अस्ति — “नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।”
| क्र. | वाक्यानि | केन / कया | कं / कां प्रति |
|---|---|---|---|
| यथा | तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति | कुन्त्या | भीमम् |
| १ | न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति | भीमेन | युधिष्ठिरम् |
| २ | न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते | भीमेन | अर्जुनम् |
| ३ | क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम् | भीमेन | कुन्तीम् (मातरम्) |
| ४ | अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यते | सहदेवेन | भीमम् |
| ५ | तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्? | युधिष्ठिरेण | कुन्तीम् (मातरम्) |
| ६ | नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः | बकेन (बकासुरेण) | भीमम् |
यथा — न चैतावत् → च + एतावत् (वृद्धि-सन्धिः)
| रेखाङ्कितपदम् | सन्धिविच्छेदः | सन्धिनाम |
|---|---|---|
| (क) सम्यगनुष्ठितम् | सम्यक् + अनुष्ठितम् | जश्त्व-सन्धिः |
| (ख) पुरस्यादूरवर्तिनि | पुरस्य + अदूरवर्तिनि | दीर्घ (सवर्णदीर्घ)-सन्धिः |
| (ग) दुरात्मनो वृत्तम् | दुरात्मनः + वृत्तम् | विसर्ग (उत्व)-सन्धिः |
| (घ) मानुषोऽपि | मानुषः + अपि | विसर्ग-सन्धिः |
| (ङ) नास्त्यत्र | नास्ति + अत्र | यण्-सन्धिः |
| (च) यदुचितम् | यत् + उचितम् | जश्त्व-सन्धिः |
| (छ) पुत्रस्तपस्वी | पुत्रः + तपस्वी | विसर्ग (सत्व)-सन्धिः |
| (ज) सङ्कल्पितम् | सम् + कल्पितम् | परसवर्ण (अनुस्वार)-सन्धिः |
| (झ) धर्मसङ्ग्रहोऽत्र | सङ्ग्रहः + अत्र | विसर्ग-सन्धिः |
| (ञ) राक्षस इति | राक्षसः + इति | विसर्ग (लोप)-सन्धिः |
यथा — पिता = जनकः
| पदम् | पर्यायः |
|---|---|
| (क) आयोधनम् | ५. युद्धम् |
| (ख) विप्रः | १. ब्राह्मणः |
| (ग) असुरः | ४. दैत्यः |
| (घ) अम्ब | २. जननी |
| (ङ) हुताशनः | ३. अग्निः |
यथा — पीवरः × कृशः
| शब्दः | विपरीतार्थकः |
|---|---|
| (क) उपकृतः | अपकृतः |
| (ख) अग्रजस्य | अनुजस्य |
| (ग) उचितम् | अनुचितम् |
| (घ) हर्षः | शोकः / विषादः |
मञ्जूषा: क्षत्रियाणी · शकटपूरं · प्रतिवेशी · खरदंष्ट्रः · जठरस्थः · कौन्तेयः · पीवरौ | यथा — पीवरौ बाहू
| विशेषणम् (समाधानम्) | विशेष्यम् |
|---|---|
| (क) शकटपूरं | मृष्टान्नम् |
| (ख) प्रतिवेशी | ब्राह्मणः |
| (ग) खरदंष्ट्रः | मृगाधिपः |
| (घ) कौन्तेयः | भीमः |
| (ङ) क्षत्रियाणी | कुन्ती |
| (च) जठरस्थः | हुताशनः |
यथा — मृष्टम् अन्नं → मृष्टान्नम्
| वाक्यम् (रेखाङ्कितम्) | समस्तपदम् |
|---|---|
| (क) वीरस्य भुजयोः बलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहे। | भुजबलम् |
| (ख) भवता धर्माणां सङ्ग्रहः द्रष्टव्यः। | धर्मसङ्ग्रहः |
| (ग) नहि मातुः आज्ञा प्रत्यादेशमर्हति। | मातुराज्ञा |
| (घ) धनुः धरति इति अहम् अनुगमिष्यामि। | धनुर्धरः |
| (ङ) नहि खरदंष्ट्रः मृगाणाम् अधिपः सहायमपेक्षते। | मृगाधिपः |
| (च) अस्य पुरस्य न दूरे वर्तते पर्वते वसति बकनामा दैत्यः। | अदूरवर्ती |
भावाः: १. हासः · २. निराशा · ३. ग्लानिः · ४. अधिकारः · ५. ओजः · ६. धैर्यम् | यथा — प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम् → हर्षः
| वाक्यम् | भावः | कारणम् |
|---|---|---|
| (क) धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि। | ५. ओजः | अर्जुनस्य उत्साहः-पराक्रमः |
| (ख) भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्? | ३. ग्लानिः | युधिष्ठिरस्य व्यथा-दुःखम् |
| (ग) अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यते? | १. हासः | सहदेवस्य परिहासः |
| (घ) हनिष्यामि तं दुरात्मानम्। | ६. धैर्यम् | भीमस्य निश्चयः-साहसम् |
| (ङ) स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेव्यते। | २. निराशा | ब्राह्मणस्य शोक-विलापः |
| (च) मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्। | ४. अधिकारः | बकासुरस्य आज्ञा-दर्पः |
यथा — भवत्या प्रतिश्रुतम्। → भवती प्रतिश्रुतवती।
| कर्मवाच्यम् (दत्तम्) | कर्तृवाच्यम् (समाधानम्) |
|---|---|
| (क) क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम्। | क्षत्रियाणी अनुष्ठितवती। |
| (ख) भवत्या सज्जीक्रियताम्। | भवती सज्जीकरोतु। |
| (ग) भवत्या उपक्षिप्तम्। | भवती उपक्षिप्तवती। |
| (घ) त्वया सङ्कल्पितम्। | त्वं सङ्कल्पितवान् / सङ्कल्पितवती। |
| (ङ) भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः। | भवान् धर्मसङ्ग्रहं द्रष्टुम् अर्हति। |
| (च) पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः। | पौरजनाः मानुषं प्रेषयेयुः। |
नियमः: कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया (भवत्या, त्वया); कर्तृवाच्ये कर्तरि प्रथमा (भवती, त्वम्) — क्त-प्रत्ययः क्तवतु-प्रत्यये परिणमति।
“सिंहः क्षुद्रमृगं यथा” — भीमेन बकासुरस्य वधः
स्वाध्यायान्मा प्रमदः
पात्र-परिचयः · श्लोक-भावार्थः · शब्दार्थः · ‘यस्तु क्रियावान्’ परियोजना
एकचक्रम् — पात्र-सम्बन्ध-चित्रम्
| पात्रम् | परिचयः |
|---|---|
| कुन्ती | पाण्डवानां माता; धर्मपरायणा, ब्राह्मणस्य उपकारं स्मृत्वा भीमं प्रेषयति। |
| भीमसेनः | कौन्तेयः, महाबलः वीरः; बकासुरं हत्वा नगरं रक्षति। |
| युधिष्ठिरः | भीमस्य अग्रजः, धर्मज्ञः; प्रथमं भीमस्य प्रेषणं न समर्थयति। |
| अर्जुन·नकुल·सहदेव | अन्ये पाण्डवाः; अर्जुनः सहगन्तुम् इच्छति, सहदेवः परिहासं करोति। |
| ब्राह्मणः | प्रतिवेशी आतिथेयः; पाण्डवानाम् उपकर्ता, यस्य रक्षणाय कुन्ती प्रतिश्रुतवती। |
| बकासुरः | मांसाशी राक्षसः; प्रतिदिनं नरबलिं गृह्णाति, अन्ततः भीमेन हतः। |
कृतं प्रत्युपकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥
बकं विधंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥
निषूदको हि हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥
| शब्दः | अर्थः | हिन्दी | English |
|---|---|---|---|
| अभिहितम् | उक्तम् | कहा गया | Said |
| आकर्ण्य | श्रुत्वा | सुनकर | Having heard |
| आतिथेयः | अतिथिसेवाकारकः | मेज़बान | Host |
| आयोधनम् | युद्धम् | युद्ध | Battle |
| उत्फुल्लाक्षः | विकसितनयनः | विकसित नेत्र वाला | Wide-open eyes |
| औदरिकः | भोजनप्रियः | पेटू | Glutton |
| कामम् | निश्चयेन | निश्चित ही | Certainly |
| जठरस्थाय | उदरे तिष्ठति, तस्मै | पेट में स्थित के लिए | For the stomach-fire |
| निषूदकः | विनाशकः | विनाशक | Destroyer |
| क्षुद्रमृगम् | लघुः मृगः | छोटा पशु | Small animal |
| क्षत्रियाण्या | क्षत्रियस्य पत्न्या | क्षत्रिय की पत्नी से | By the Kshatriya-wife |
| परिदेव्यते | विलपति | विलाप करता है | Laments |
| परिवेष्य | स्थापय / परिवेषणं कुरु | परोसो | (You) Serve |
| पीवरौ | स्थूलौ | दो स्थूल | (Two) Stout |
| पौराः | नागरिकाः | नागरिक | Citizens |
| प्रतिवेशी | निकटगृहवासी | पड़ोसी | Neighbour |
| प्रतिश्रुतम् | प्रतिज्ञातम् | प्रतिज्ञा की | Promised |
| प्रभूतम् | अधिकम् | अधिक | Abundant |
| प्रत्यादेशम् | अवज्ञा / उल्लङ्घनम् | अवज्ञा | Disobedience |
| बाढम् | नूनम् | निश्चित | Certainly |
| मल्लयुद्धम् | मल्लानां युद्धम् | पहलवानों का युद्ध | Wrestling |
| मानुषापसद | निकृष्ट मानव (सम्बोधने) | हे नीच मानव | O low human |
| मृष्टान्नम् | मृष्टम् अन्नम् | स्वादिष्ट भोजन | Tasty food |
| वाचाट | प्रलापक (सम्बोधने) | हे डींगमार | O boastful |
| विप्रस्य | ब्राह्मणस्य | ब्राह्मण का | Of Brahmana |
| व्याघ्रगह्वरम् | व्याघ्रस्य गह्वरम् | बाघ की गुफा | Tiger-cave |
| श्रोत्रियः | वेदाध्यायी | वेद पढ़ा हुआ | Vedic scholar |
| हनिष्यामि | वधं करिष्यामि | मार दूँगा | Will kill |
| हुताशनाय | अग्नये | अग्नि को | For the fire |
