घर की याद
कवि — भवानीप्रसाद मिश्र · संपूर्ण प्रश्न-उत्तर
कविता का सार व पृष्ठभूमि
भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भाग लिया, जिसके कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन वर्ष का कारावास दिया। जेल में रहते हुए, परिवार से दूर, घर की याद में डूबकर उन्होंने ‘घर की याद’ कविता लिखी।
कविता की केंद्रीय संवेदना परिवार की स्मृति है। कवि सावन के बादल को संदेशवाहक बनाकर परिवार तक संदेश भेजता है और उससे आग्रह करता है कि वह घरवालों को जेल के कष्ट न बताए, बल्कि उन्हें सांत्वना दे।
मेरे उत्तर मेरे तर्क
- (क) विदेश से मित्र के लिए
- (ख) युद्धभूमि से जनता के लिए
- (ग) जेल से परिवार के लिए
- (घ) यात्रा से किसी संबंधी के लिए
- (क) उत्साह और आवेग
- (ख) भय और क्रोध
- (ग) साहस और उमंग
- (घ) चिंता और बेचैनी
- (क) कमजोर और निष्क्रिय
- (ख) स्नेहमयी और दृढ़
- (ग) शिक्षित और अनुशासनप्रिय
- (घ) सरल और उदासीन
- (क) कर्मठ और सृजनशील
- (ख) साहसी और पराक्रमी
- (ग) दृढ़ और संवेदनशील
- (घ) प्रसन्नचित्त और सक्रिय
- (क) पिता की कठोरता
- (ख) पिता की भावुकता
- (ग) वर्षा की तीव्रता
- (घ) पिता की निर्बलता
- (क) घर का समृद्ध होना
- (ख) घर की सजावट
- (ग) घर में दुख का वातावरण
- (घ) घर की शांति
- (क) कवि अपने जीवन में बहुत खुश है
- (ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है
- (ग) घर के लोगों के प्रति उदासीन है
- (घ) कवि प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत है
- (क) घर की शांति और सुरक्षा
- (ख) घर के सदस्यों के बीच का संबंध
- (ग) घर के निर्माण की प्रक्रिया
- (घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा
मेरी समझ मेरे विचार
कवि अपने पिता का बहुआयामी चित्र खींचते हैं, जिसमें कठोरता और कोमलता का अद्भुत मेल है—
- बलवान व साहसी — “वज्र-भुज”, “मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें” — मृत्यु व शेर से भी न डरने वाले निडर पुरुष।
- तेजस्वी वाणी व कर्मठता — “बोल में बादल गरजता, काम में झंझा लरजता” — उनकी आवाज़ में बादल की गरज और काम में तूफ़ान-सा वेग।
- अनुशासित व धार्मिक — रोज़ गीता-पाठ, दो सौ साठ दंड लगाना, मुगदर हिलाना — नियमित व्यायाम व पूजा।
- युवा-सा जोश — “जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा” — बुढ़ापे में भी दौड़ना, खिलखिलाना।
- कोमल व भावुक हृदय — “नवनीत-सा उर”, “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” — भीतर से अत्यंत संवेदनशील।
- वत्सल पिता — कवि को ‘सोने पर सुहागा’ मानते, प्यार में बहते रहे हैं।
इस प्रकार शक्ति और संवेदना, दृढ़ता और कोमलता का संयोग पिता के व्यक्तित्व को बहुआयामी बनाता है।
- त्याग — देश की स्वतंत्रता के लिए कवि ने घर-परिवार का सुख छोड़ दिया और जेल का कष्ट सहर्ष स्वीकार किया।
- साहस — कारावास की कठिनाई में भी वह टूटता नहीं; संदेश भिजवाता है कि वह मस्त है, खेलता-कूदता है, उसका वज़न सत्तर सेर है।
- धैर्य — घर की याद से व्याकुल होने पर भी वह स्वयं को सँभालता है — “कहाँ मैं रोता… धीर मैं खोता कहाँ हूँ”; बादल से कहता है कि घरवालों को धीरज देना।
यह कथन कवि के संघर्षशील, दृढ़ मनोबल वाले स्वभाव को उजागर करता है — वह दुख से भागता नहीं, बल्कि उसे डटकर पीछे धकेलता है।
- वर्षा कवि के मन की उमड़ती भावनाओं का प्रतीक है — बाहर की बारिश और भीतर की उदासी एक साथ बहती है।
- जैसे-जैसे पानी गिरता है, घर की याद गहराती है — “बहुत पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है”।
- वर्षा कवि की बचपन की स्मृतियाँ जगाती है (उसे बरसात बहुत प्रिय थी)।
- अंत में पानी का थमना मन के कुछ शांत/नम होने का संकेत देता है — इस प्रकार प्रकृति और भाव का सुंदर संयोजन बनता है।
माँ बेटे को कमजोर न पड़ने की सीख देती है — यदि वह विचलित होगा तो बाकी बच्चे भी रो पड़ेंगे।
यदि बेटा देशसेवा से पीछे हटता तो माँ की कोख लज्जित होती — माँ को बेटे की देशभक्ति पर गर्व है।
माँ बेटे के निर्णय का गर्व-सहित समर्थन करती है। भाव — माँ स्नेहमयी होकर भी कमजोर नहीं; वह दुख छिपाकर बेटे को साहस देती है — यही उसकी भावनात्मक दृढ़ता है।
मुझे यह अंश सबसे प्रभावी लगता है, क्योंकि यहाँ कवि अपना सारा दुख भुलाकर केवल अपने माता-पिता के सुख की कामना करता है। वह बादल से प्रार्थना करता है कि वह स्वयं बरस ले, पर उसके माता-पिता उसके लिए न तरसें। यह निःस्वार्थ प्रेम और त्याग पाठक का हृदय छू लेता है।
कविता का सौंदर्य
नीचे प्रत्येक विशेषता वाली पंक्तियाँ कविता से चुनकर दी गई हैं—
कविता की संरचना
‘घर की याद’ कवि के भीतर उठते भावों की यात्रा है। प्रकृति के माध्यम से व्यक्त इस यात्रा के प्रमुख चरण—
- पानी का गिरना — रात भर अविरल वर्षा, मन का घिरना; उदासी व बेचैनी का आरंभ।
- सबेरा होना — बादल की अँधेरी में सही समय का पता न चलना; अनिश्चय की स्थिति।
- घर की ओर मन का खिंचना — भाई, बहन, माँ, पिता की एक-एक कर स्मृति।
- पिता का विस्तृत चित्र — दृढ़ता व कोमलता; माँ-पिता की कल्पित प्रतिक्रिया।
- वर्षा का थमना — बादलों का जमना, मन का नम होना; पंछी व क्षितिज का चिंतन।
- संदेश का आग्रह — बादल/हवा से कहना कि घरवालों को कष्ट न बताएँ, धीरज दें।
विषयों से संवाद
| पक्ष | संयुक्त परिवार | एकल परिवार |
|---|---|---|
| पसंद | आपसी सहयोग, बड़ों का मार्गदर्शन, बच्चों को भरपूर स्नेह, सुख-दुख साझा। | निर्णय की स्वतंत्रता, कम झंझट, गोपनीयता, सीमित खर्च। |
| नापसंद | निजता की कमी, कभी-कभी मतभेद/टकराव। | अकेलापन, संकट में सहारे की कमी, बच्चों को संस्कारों/अपनेपन की कमी। |
मुझे संयुक्त परिवार का अपनापन और सहयोग सबसे अधिक प्रिय है, क्योंकि इसी से ‘घर’ केवल भवन न रहकर भावनाओं का केंद्र बनता है — ठीक वैसे ही जैसे कविता में चित्रित है।
| ग्रामीण क्षेत्र | शहरी क्षेत्र |
|---|---|
| खेत व फ़सल जलमग्न होना, मिट्टी का कटाव, कच्चे मकान गिरना, गाँव का संपर्क टूटना, पशुओं को चारे की कमी। | सड़कों व नालियों का जाम होना, जल-भराव, यातायात ठप, बिजली कटौती, रोग फैलना, बस्तियों में पानी घुसना। |
दोनों ही क्षेत्रों में अति-वर्षा से बाढ़, रोग और जन-धन की हानि होती है।
| पुराने माध्यम | नए माध्यम |
|---|---|
| पत्र, तार (टेलीग्राम), संदेशवाहक, कबूतर, ढोल/नगाड़ा। धीमे, समय लगता था, पर भावनात्मक। | मोबाइल, ई-मेल, वीडियो कॉल, सोशल मीडिया, संदेश ऐप। तुरंत, दूर तक, सस्ते, पर कभी-कभी अवैयक्तिक। |
कविता में कवि के पास तेज़ माध्यम न होने से वह कल्पना में सावन के बादल को दूत बनाता है — यह पुराने, भावपूर्ण संचार का काव्यात्मक रूप है।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम
भारत लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहा। स्वतंत्रता-प्राप्ति की यह यात्रा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से आरंभ मानी जाती है। इसके बाद अनेक आंदोलन हुए — असहयोग आंदोलन (1920), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (1942)।
महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा के मार्ग से जन-आंदोलन खड़ा किया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों ने भी बलिदान दिए। भवानीप्रसाद मिश्र जैसे अनेक कवि-लेखकों ने भी आंदोलन में भाग लेकर जेल यातनाएँ सहीं — इसी दौरान उन्होंने ‘घर की याद’ लिखी।
अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। यह स्वतंत्रता असंख्य सेनानियों के त्याग और बलिदान का परिणाम है, जिसे हमें सदैव स्मरण रखना चाहिए।
सृजन
प्रिय भवानी,
आशीर्वाद!
तेरे बिना घर सूना-सूना लगता है। आज भी सावन बरस रहा है और मुझे तेरा बचपन याद आ रहा है, जब तू भीगता हुआ बाड़े में लौकी के बीज बोता था। बेटा, मन छोटा मत करना — तूने जो राह चुनी है, वह सच्ची और पवित्र है। हम सब ठीक हैं, तू अपना ध्यान रखना और खूब हिम्मत से रहना। तेरे पिताजी तुझ पर गर्व करते हैं। जल्दी घर लौटना।
तेरी माँ
माँ — सुनिए जी, आज फिर बहुत पानी बरस रहा है। हमारे भवानी की बहुत याद आ रही है।
पिताजी — हाँ, उसे तो बरसात बहुत प्यारी थी। पर तुम चिंता मत करो, वह हिम्मती है।
माँ — जेल में न जाने कैसे रहता होगा। आँखें भर आती हैं।
पिताजी — रोओ मत। उसने देश के लिए यह कष्ट चुना है — हमें गर्व करना चाहिए।
माँ — सच कहा आपने। हम धीरज रखेंगे, ताकि वह भी मजबूत रहे।
मैं संदेश भेजने के लिए हवा को चुनूँगा/चुनूँगी, क्योंकि हवा हर जगह बिना रुके पहुँच जाती है, सीमाएँ नहीं देखती और सबको छू लेती है। वह कोमलता से मेरे प्रियजनों तक मेरा स्नेह-भरा संदेश पहुँचा सकती है। (आप बादल, नदी, चिड़िया आदि भी चुन सकते हैं।)
व्याकरण की बात
| शब्द | अर्थ | नया वाक्य |
|---|---|---|
| छिन | क्षण, पल | एक छिन में मौसम बदल गया। |
| फलानी / फलाना | अमुक, कोई निश्चित (व्यक्ति/वस्तु) | फलाने आदमी ने यह काम पूरा किया। |
| भौजी | भाई की पत्नी, भाभी | मेरी भौजी बहुत स्नेहशील हैं। |
| बड़ | बरगद, वट वृक्ष | गाँव के चौराहे पर पुराना बड़ खड़ा है। |
(क) “बहुत पानी गिर रहा है” उदाहरण
| पानी | संज्ञा |
| बहुत | विशेषण |
| गिर रहा है | क्रिया |
(ख) “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा”
| बुढ़ापा | संज्ञा (भाववाचक) |
| व्यापा | क्रिया |
| जिनको | सर्वनाम (संबंधवाचक) |
(ग) “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह”
| खुले | विशेषण |
| वह | सर्वनाम (पुरुषवाचक) |
| बदन | संज्ञा |
| फिरता | क्रिया |
(घ) “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए”
| एक | विशेषण (संख्यावाचक) |
| फूट जाए | क्रिया |
| पत्ता | संज्ञा |
(ङ) “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन”
| सजीले | विशेषण |
| मेरे | सर्वनाम (सार्वनामिक विशेषण) |
| सावन | संज्ञा |
गतिविधियाँ
परिवार-वृक्ष में सबसे ऊपर दादा-दादी/नाना-नानी, उसके नीचे माता-पिता व उनके भाई-बहन, फिर आप व आपके भाई-बहन रखें। प्रत्येक के नाम के साथ एक-दो विशेषता लिखें — जैसे—
- दादा जी — अनुशासनप्रिय, कहानियाँ सुनाने वाले।
- माँ — स्नेहमयी, घर को जोड़े रखने वाली।
- पिताजी — मेहनती, हमारी हर ज़रूरत का ध्यान रखने वाले।
ये अनुकरणात्मक (ध्वन्यात्मक) शब्द हैं, जो वास्तविक ध्वनियों का अनुकरण करते हैं—
- झरा-झर — पानी के लगातार झरने/गिरने की ध्वनि — मूसलधार वर्षा का दृश्य।
- हरा-हर — पत्तों के हिलने की आवाज़।
- सर-सर — हवा के बहने की मधुर ध्वनि।
- थर-थर — काँपने/सिहरने का भाव — मन की बेचैनी।
इन शब्दों से कविता में नाद-सौंदर्य और सजीव वर्षा-वातावरण बनता है — पाठक को वर्षा का दृश्य व ध्वनि दोनों अनुभव होते हैं। इन्हें ऊँचे स्वर में लय के साथ पढ़ने पर प्रभाव और बढ़ जाता है।
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| घनेरा/घना | गाढ़ा, जिसके अवयव पास-पास सटे हों |
| तिर/तिरना | तैरना, उतराना, पार होना |
| परिताप | अत्यधिक दुख, शोक, बहुत गर्मी, अत्यधिक ताप |
| चतुर्दिक् | चारों ओर, चौखूँट |
| वज्र | बहुत कठोर, जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े |
| नवनीत | ताजा मक्खन |
| उर | हृदय, श्रेष्ठ, मन |
| झंझा | तेज़ हवा, आँधी-पानी |
| लरजता | काँपना, हिलना-डुलना, भयभीत होना |
| मूठ | मुट्ठी-भर चीज, मुट्ठी, दस्ता |
| अभागा | भाग्यहीन |
| धीर | विचलित न होने वाला, दृढ़, गंभीर |
| झारी | हाथ-मुँह धुलाने आदि के लिए टोंटीदार बर्तन |
| बेला | एक सुगंधित फूल (मोगरा); कटोरा |
| फलानी/फलाँ | कोई आदिष्ट व्यक्ति/वस्तु, अमुक |
| निहायत | बहुत ज़्यादा, अत्यधिक |
| लुनाई | सुंदरता, सलोनापन; फसल काटने की क्रिया |
| क्षितिज | जहाँ धरती और आकाश मिलते दिखें |
| तृषा | तीव्र इच्छा, प्यास, लोभ |
| अश्रु | आँसू |
| हास | हँसी, प्रसन्नता, खुशी |
| क्लेश | दुख, पीड़ा, क्रोध, द्वेष |
| बड़ | बरगद, वट |
| उमग | उल्लास, मौज, जोश, आकांक्षा |
| ख़म | झुका हुआ, टेढ़ा, वक्र, घुमाव |
| विरस | नीरस, अप्रिय, जी उबाने वाला |
| कातना | चरखे/तकली पर रुई से धागा निकालना |
| अस्त | डूबा हुआ, समाप्त, अदृश्य होना, अंत |
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यह सहयोगी कविता ईश्वर के प्रति कवि की भक्ति-भावना को व्यक्त करती है। प्रकृति के सुंदर क्षणों में — सुबह चिड़ियों के गीत, कलियों का खिलना, ठंडी हवा, चमकते तारे और शान से उठते चाँद को देखकर — कवि को जगत के रचयिता प्रभु की याद आती है।
‘घर की याद’ में जहाँ कवि को परिवार की याद आती है, वहीं यहाँ कवि को प्रकृति के माध्यम से ईश्वर की स्मृति होती है — दोनों कविताओं में स्मृति और प्रेम की भावना समान रूप से उभरती है।
